श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय १८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुण्ठितं हि दधीचेन च्यावनेन जगद्गुरो।<br>दण्डं शार्ङ्गं तवास्त्रं च लब्धं दैत्यैः प्रसादतः ॥ १४<br>पुरा जलन्धरं हन्तुं निर्मितं त्रिपुरारिणा।<br>रथाङ्गं सुशितं घोरं तेन तान् हन्तुमर्हसि ॥ १५<br>तस्मात्तेन निहन्तव्या नान्यैः शस्त्रशतैरपि।<br>ततो निशम्य तेषां वै वचनं वारिजेक्षणः ॥ १६<br>वाचस्पतिमुखानाह स हरिश्चक्रभृत्स्वयम्। | देनेवाले अस्त्रोंसे भी अवध्य हो गये हैं। हे जगद्गुरो ! च्यवनपुत्र दधीचने सूर्यमण्डलसे उत्पन्न आपके उठे हुए चक्रको कुण्ठित कर दिया था। आपकी कृपासे दैत्योंने आपके दण्ड, धनुष तथा अस्त्रको प्राप्त कर लिया है। पूर्वकालमें त्रिपुरशत्रु [शिव]-के द्वारा जलन्धरका संहार करनेके लिये एक भयानक तथा तेज धारवाले चक्रका निर्माण किया गया था; उसीसे आप उन [दानवों]-का वध कर सकते हैं। उसी अस्त्रसे ये दानव मारे जा सकते हैं, अन्य सैकड़ों अस्त्रोंसे नहीं ॥ ११—१५ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर उनका वचन सुनकर कमलके समान नेत्रवाले चक्रधारी वे विष्णु वाचस्पति आदि प्रधान देवताओंसे स्वयं कहने लगे ॥ १६ १/२ ॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>भो भो देवा महादेवं सर्वैर्देवैः सनातनैः ॥ १७<br>सम्प्राप्य साम्प्रतं सर्वं करिष्यामि दिवौकसाम्।<br>देवा जलन्धरं हन्तुं निर्मितं हि पुरारिणा ॥ १८<br>लब्ध्वा रथाङ्गं तेनैव निहत्य च महासुरान्।<br>सर्वान् धुन्धुमुखान् दैत्यानष्टषष्टिशतान् सुरान् ॥ १९<br>सबान्धवान् क्षणादेव युष्मान् सन्तारयाम्यहम्। | श्रीविष्णु बोले— हे देवताओ ! मैं इस समय सभी सनातन देवताओंके साथ महादेवके पास पहुँचकर [ आप ] देवताओंका सम्पूर्ण कार्य करूँगा। हे देवताओं ! जलन्धरका वध करनेके लिये शिवजीके द्वारा बनाये गये चक्रको प्राप्त करके उसीके द्वारा सभी महान् असुरों, धुन्धु आदि दैत्यों तथा अरसठ सौ अन्य असुरोंको बान्धवोंसहित क्षणभरमें मारकर मैं आप देवताओंका उद्धार करूँगा ॥ १७—१९ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा सुरश्रेष्ठान् सुरश्रेष्ठमनुस्मरन् ॥ २०<br>सुरश्रेष्ठस्तदा श्रेष्ठं पूजयामास शङ्करम्।<br>लिङ्गं स्थाप्य यथान्यायं हिमवच्छिखरे शुभे ॥ २१<br>मेरुपर्वतसङ्काशं निर्मितं विश्वकर्मणा।<br>त्वरिताख्येन रुद्रेण रौद्रेण च जनार्दनः ॥ २२<br>स्नाप्य सम्पूज्य गन्धाद्यैर्ज्वालाकारं मनोरमम्।<br>तुष्टाव च तदा रुद्रं सम्पूज्याग्नौ प्रणम्य च ॥ २३<br>देवं नाम्नां सहस्रेण भवाद्येन यथाक्रमम्।<br>पूजयामास च शिवं प्रणवाद्यं नमोऽन्तकम् ॥ २४<br>देवं नाम्नां सहस्रेण भवाद्येन महेश्वरम्।<br>प्रतिनाम सपद्मेन पूजयामास शङ्करम् ॥ २५<br>अग्नौ च नामभिर्देवं भवाद्यैः समिदादिभिः।<br>स्वाहान्तैर्विधिवद्धुत्वा प्रत्येकमयुतं प्रभुम् ॥ २६ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो ! ] श्रेष्ठ देवताओंसे यह कहकर देवताओंमें श्रेष्ठ विष्णुने सुरश्रेष्ठ शिवका स्मरण करते हुए उन श्रेष्ठ शंकरकी पूजा की। विश्वकर्माद्वारा निर्मित मेरुपर्वत-सदृश लिङ्गको हिमवान्के उत्तम शिखरपर विधिपूर्वक स्थापित करके त्वरितरुद्र तथा रुद्रसूक्तके द्वारा अभिषेक करके गन्ध आदिके द्वारा पूजा करके जनार्दनने ज्योतिरूप मनोरम शिवकी स्तुति की। पुनः अग्निमें देव रुद्रकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके आदिमें भव नामवाले सहस्रनामके द्वारा क्रमसे आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः लगाकर शिवकी पूजा की। प्रारम्भमें भव नामवाले सहस्रनामके द्वारा प्रत्येक नामका उच्चारण करते हुए उन्होंने कमलपुष्पसे महेश्वर भगवान् शंकरकी पूजा की। तदनन्तर उन्होंने अन्तमें स्वाहावाले भव आदि नामोंसे समिधा आदिके द्वारा विधिपूर्वक अग्निमें प्रत्येक नामकी दस हजार आहुति |