भारतकोश
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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८५


| तस्य तां परमां मूर्तिमास्थितस्य जगत्प्रभोः।<br>न शशाक पुनर्द्रष्टुं हृष्टरोमा गिरीन्द्रजा ॥ ११४<br>ततस्त्वदृष्टमाकारं बुद्ध्वा सा प्रकृतिस्थितम्।<br>प्रकृतेर्मूर्तिमास्थाय योगेन परमेश्वरी ॥ ११५<br>तं शशाक पुनर्द्रष्टुं हरस्य च महात्मनः।<br>ततस्ते लयमाधाय योगिनः पुरुषस्य तु ॥ ११६<br>विविशुर्हृदयं सर्वे दग्धसंसारबीजिनः।<br>पञ्चाक्षरस्य वै बीजं संस्मरन्तः सुशोभनम् ॥ ११७<br>सर्वपापहरं दिव्यं पुरा चैव प्रकाशितम्।<br>नीललोहितमूर्तिस्थं पुनश्चक्रे वपुः शुभम् ॥ ११८<br>तं दृष्ट्वा शैलजा प्राह हृष्टसर्वतनूरुहा।<br>स्तुवती चरणौ नत्वा क इमे भगवन्निति ॥ ११९<br>तामुवाच सुरश्रेष्ठस्तदा देवीं गिरीन्द्रजाम्।<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>मदीयं व्रतमाश्रित्य भक्तिमद्भिर्द्विजोत्तमैः ॥ १२०<br>यैर्यैर्योग इहाभ्यस्तास्तेषामेकेन जन्मना।<br>क्षेत्रस्यास्य प्रभावेन भक्त्या च मम भामिनि ॥ १२१<br>अनुग्रहो मया ह्येवं क्रियते मूर्तितः स्वयम्।<br>तस्मादेतन्महत्क्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेवितं तथा ॥ १२२<br>श्रुतिमद्भिश्च विप्रेन्द्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः।<br>प्रतिमासं तथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम् ॥ १२३<br>उभयोः पक्षयोर्देवि वाराणस्यामुपास्यते।<br>शशिभानूपरागे च कार्तिका्यां च विशेषतः ॥ १२४<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु विषुवेष्वयनेषु च।<br>पृथिव्यां सर्वतीर्थानि वाराणस्यां तु जाह्नवीम् ॥ १२५<br>उत्तरप्रवहां पुण्यां मम मौलिविनिःसृताम्।<br>पितुस्ते गिरिराजस्य शुभां हिमवतः सुताम् ॥ १२६<br>पुण्यस्थानस्थितां पुण्यां पुण्यदिक्प्रवहां सदा।<br>भजन्ते सर्वतोऽभ्येत्य ये ताञ्छृणु वरानने ॥ १२७ | लिये प्रलयकालके समान खड़े हो गये॥ १०८–११३॥<br><br>तब पुलकित रोमोंवाली पार्वती वहाँ स्थित उन जगत्प्रभुकी उस परम मूर्तिको पुनः देखनेमें समर्थ न हो सकीं। तदनन्तर पहले कभी न देखे गये उस स्वरूपको प्रकृतिमें स्थित समझकर वे परमेश्वरी योगके द्वारा प्रकृतिका रूप धारणकर महात्मा शिवके उस स्वरूपको पुनः देखनेमें समर्थ हो गयीं॥ ११४-११५ १/२॥<br><br>तब अत्यन्त सुन्दर पंचाक्षर मन्त्रका स्मरण करते हुए दग्ध लिङ्गवाले वे सभी योगी शिवके ध्यानमें लीन होकर उन [विराट्] पुरुषके हृदयमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर शिवजीने सभी पापोंका हरण करनेवाले, दिव्य तथा पूर्वमें प्रकट किये गये नीललोहितमूर्तिस्थ रूपको पुनः धारण किया॥ ११६–११८॥<br><br>उस रूपको देखकर पुलकित समस्त रोमोंवाली पार्वती स्तुति करते हुए तथा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—‘हे भगवन्! ये कौन हैं?’ तब सुरश्रेष्ठ [शिव] पर्वतराजकी उन पुत्रीसे कहने लगे॥ ११९ १/२॥<br><br>श्रीभगवान् बोले—हे भामिनि! मेरे व्रतका आश्रय लेकर जिन-जिन भक्तियुक्त श्रेष्ठ द्विजोंने यहाँ योगका अभ्यास किया है, उनके एक जन्ममें ही इस क्षेत्रके प्रभाव तथा उनकी भक्तिके कारण मैं स्वयं विग्रहरूपसे इस प्रकारका अनुग्रह करता हूँ। अतः यह महान् क्षेत्र ब्रह्मा आदि [देवताओं], वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों, सिद्धों तथा तपस्वियोंके द्वारा सेवित है। हे देवि! प्रत्येक महीनेमें दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको वाराणसीमें शिवकी पूजा की जाती है। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर, विशेषकर कार्तिक महीनेमें, पुण्यप्रद सभी पर्वोंमें, विषुवत् एवं अयन संक्रान्तियोंमें पृथ्वीपर स्थित सभी तीर्थ वाराणसीमें विद्यमान उत्तरवाहिनी, पुण्यमयी, मेरे सिरसे निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमालयकी पुत्री, पुण्यमयस्थानमें विराजमान और सदा पुण्य दिशाकी ओर प्रवाहित होनेवाली पवित्र गंगाका सेवन करते हैं। हे वरानने! सभी ओरसे आकर जो उन भागीरथीका सेवन करते हैं, उन्हें सुनो॥ १२०–१२७॥ |

| ४८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| सन्निहत्य कुरुक्षेत्रं सार्धं तीर्थशतैस्तथा।<br>पुष्करं निमिषं चैव प्रयागं च पृथूदकम्॥ १२८<br>द्रुमक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं नैमिषं तीर्थसंयुतम्।<br>क्षेत्राणि सर्वतो देवि देवता ऋषयस्तथा॥ १२९<br>सन्ध्या च ऋतवश्चैव सर्वा नद्यः सरांसि च।<br>समुद्राः सप्त चैवात्र देवतीर्थानि कृत्स्नशः॥ १३०<br>भागीरथीं समेष्यन्ति सर्वपर्वसु सुव्रते।<br>अविमुक्तेश्वरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा चैव त्रिविष्टपम्॥ १३१<br>कालभैरवमासाद्य धूतपापानि सर्वशः।<br>भवन्ति हि सुरेशानि सर्वपर्वसु पर्वसु॥ १३२<br>पृथिव्यां यानि पुण्यानि महत्यायतनानि च।<br>प्रविशन्ति सदाभ्येत्य पुण्यं पर्वसु पर्वसु।<br>अविमुक्तं क्षेत्रवरं महापापनिबर्हणम्॥ १३३ | हे देवि! हे सुव्रते! कुरुक्षेत्र, पुष्कर, निमिष, प्रयाग, पृथूदक, द्रुमक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, तीर्थमय नैमिष, सभी क्षेत्र, देवता, ऋषिगण, सन्ध्या, ऋतुएँ, सभी नदियाँ, सभी सरोवर, सातों समुद्र तथा समस्त देवतीर्थ एकीभूत होकर सैकड़ों तीर्थोंसहित सभी पर्वोंके अवसरपर भागीरथीमें आकर मिल जाते हैं और हे सुरेशानि! सभी पर्वोंपर अविमुक्तेश्वर तथा त्रिविष्टपका दर्शन करके पुनः कालभैरव पहुँचकर पूर्णरूपसे पापमुक्त हो जाते हैं। पृथिवीपर जो भी पवित्र तथा महान् आयतन (देवालय) हैं, वे समस्त पर्वोंके अवसरपर महापापोंका नाश करनेवाले क्षेत्रश्रेष्ठ पुण्यमय अविमुक्तमें आकर प्रविष्ट हो जाते हैं॥ १२८-१३३॥ | | केदारे चैव यल्लिङ्गं यच्च लिङ्गं महालये॥ १३४<br>मध्यमेश्वरसंज्ञं च तथा पाशुपतेश्वरम्।<br>शङ्कुकर्णेश्वरं चैव गोकर्णौ च तथा ह्युभौ॥ १३५<br>द्रुमचण्डेश्वरं नाम भद्रेश्वरमनुत्तमम्।<br>स्थानेश्वरं तथैकाग्रं कालेश्वरमजेश्वरम्॥ १३६<br>भैरवेश्वरमीशानं तथोङ्कारकसञ्ज्ञितम्।<br>अमरेशं महाकालं ज्योतिषं भस्मगात्रकम्॥ १३७<br>यानि चान्यानि पुण्यानि स्थानानि मम भूतले।<br>अष्टषष्टिसमाख्यानि रूढान्यान्यानि कृत्स्नशः॥ १३८<br>तानि सर्वाण्यशेषाणि वाराणस्यां विशन्ति माम्।<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु गुह्यं चैतदुदाहृतम्॥ १३९<br>तेनेह लभते जन्तुर्मृतो दिव्यामृतं पदम्। | केदार [खण्ड]-में स्थित लिङ्ग, महालयमें स्थित लिङ्ग, मध्यमेश्वर नामक लिङ्ग, पाशुपतेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, दोनों गोकर्णेश्वर, द्रुमचण्डेश्वर, अत्युत्तम भद्रेश्वर, स्थानेश्वर, एकाग्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशान, ओंकारेश्वर, अमरेश्वर, महाकालेश्वर, ज्योतिष, भस्मगात्र आदि तथा अन्य जो प्रसिद्ध अड़सठ मेरे पवित्र स्थान इस भूतलपर हैं एवं जो अन्य सभी लोकप्रसिद्ध स्थान हैं; वे सब वाराणसीमें मेरे पास सभी पुण्यप्रद पर्वोंपर आ जाते हैं। [हे देवि!] इसी कारणसे यहाँपर मृत्युको प्राप्त प्राणी दिव्य अमृत (अमर) पद प्राप्त करता है; मैंने यह रहस्यमय बात कही है॥ १३४-१३९ १/२॥ | | स्नातस्य चैव गङ्गायां दृष्टेन च मया शुभे॥ १४०<br>सर्वयज्ञफलैस्तुल्यमिष्टैः शतसहस्रशः।<br>सद्य एव समाप्नोति किं ततः परमाद्भुतम्॥ १४१<br>सर्वायतनमुख्यानि दिवि भूमौ गिरिष्वपि।<br>परात्परतरं देवि बुध्यस्वेति मयोदितम्॥ १४२<br>अविशब्देन पापस्तु वेदोक्तः कथ्यते द्विजैः।<br>तेन मुक्तं मया जुष्टमविमुक्तमतोच्यते॥ १४३ | हे शुभे! [वाराणसीमें] गंगामें स्नान करके मेरा दर्शन करनेसे मनुष्य सैकड़ों-हजारों समस्त यज्ञोंके अभीष्ट फलोंके समान फल शीघ्र ही प्राप्त करता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है? हे देवि! स्वर्गमें, पृथ्वीपर तथा पर्वतोंपर जो भी सभी प्रधान देवस्थान हैं, उनमें मेरे द्वारा बताये गये इस वाराणसीक्षेत्रको सबसे श्रेष्ठ जानो। ब्राह्मणोंने वेदोंमें वर्णित पापको 'अवि' शब्दसे कहा है; यह क्षेत्र उस [पाप]-से मुक्त है तथा मेरे द्वारा सेवित है, अतः इसे 'अविमुक्त' कहा जाता है॥ १४०-१४३॥ |

अध्याय १२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रः सर्वलोकमहेश्वरः।<br>सुदृष्टं कुरु देवेशि अविमुक्तं गृहं मम॥ १४४<br>इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तया सार्धमुमापतिः।<br>दर्शयामास भगवान् श्रीपर्वतमनुत्तमम्॥ १४५<br>अविमुक्तेश्वरं नित्यमवसच्च सदा तया।<br>सर्वगत्वाच्च सर्वत्वात्सर्वात्मा सदसन्मयः॥ १४६<br>श्रीपर्वतमनुप्राप्य देव्या देवेश्वरो हरः।<br>क्षेत्राणि दर्शयामास सर्वभूतपतिर्भवः॥ १४७ऐसा कहकर सभी लोकोंके स्वामी भगवान् रुद्र पुनः बोले—‘देवेशि! मेरे इस अविमुक्त निवास-स्थानको भली-भाँति देखो।’ ऐसा कहनेके बाद उन देवीको साथ लेकर भगवान् उमापतिने उन्हें अत्युत्तम श्रीपर्वत दिखाया और वे वहाँ अविमुक्तेश्वरमें उनके साथ नित्य रहने लगे। सर्वत्र गमनकी शक्तिसे युक्त होने तथा सर्वव्यापी होनेके कारण सर्वात्मा, सत्-असत्स्वरूपवाले, देवताओंके स्वामी तथा सभी प्राणियोंके स्वामी भगवान् शिव उन देवीके साथ श्रीपर्वतपर पहुँचकर वहाँके [पवित्र] क्षेत्र दिखाने लगे॥ १४४-१४७॥
कुण्डिप्रभं च परमं दिव्यं वैश्रवणेश्वरम्।<br>आशालिङ्गं च देवेशं दिव्यं यच्च बिलेश्वरम्॥ १४८<br>रामेश्वरं च परमं विष्णुना यत्प्रतिष्ठितम्।<br>दक्षिणद्वारपार्श्वे तु कुण्डलेश्वरमीश्वरम्॥ १४९<br>पूर्वद्वारसमीपस्थं त्रिपुरान्तकमुत्तमम्।<br>विवृद्धं गिरिणा सार्धं देवदेवनमस्कृतम्॥ १५०<br>मध्यमेश्वरमित्युक्तं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>अमरेश्वरं च वरदं देवैः पूर्वं प्रतिष्ठितम्॥ १५१<br>गोचर्मेश्वरमीशानं तथेन्द्रेश्वरमद्भुतम्।<br>कर्मेश्वरं च विपुलं कार्यार्थं ब्रह्मणा कृतम्॥ १५२<br>श्रीमत्सिद्धवटं चैव सदावासो ममाव्यये।<br>अजेन निर्मितं दिव्यं साक्षादजबिलं शुभम्॥ १५३<br>तत्रैव पादुके दिव्ये मदीये च बिलेश्वरे।<br>तत्र शृङ्गाटकाकारं शृङ्गाटाचलमध्यमे॥ १५४<br>शृङ्गाटकेश्वरं नाम श्रीदेव्या तु प्रतिष्ठितम्।<br>मल्लिकार्जुनकं चैव मम वासमिदं शुभम्॥ १५५<br>राजेश्वरं च पर्याये रजसा सुप्रतिष्ठितम्।<br>गजेश्वरं च वैशाखं कपोतेश्वरमव्ययम्॥ १५६<br>कोटीश्वरं महातीर्थं रुद्रकोटिगणैः पुरा।<br>सेवितं देवि पश्याद्य सर्वस्मादधिकं शुभम्॥ १५७यहाँ कुण्डिप्रभ, परम दिव्य वैश्रवणेश्वर, आशालिङ्ग, देवेश्वर, दिव्य बिलेश्वर, विष्णुके द्वारा स्थापित महान् रामेश्वर, दक्षिण द्वारके पार्श्वभागमें भगवान् कुण्डलेश्वर, पूर्व द्वारके समीप स्थित और पर्वतके साथ वृद्धिको प्राप्त सर्वदेवनमस्कृत उत्तम त्रिपुरान्तक, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मध्यमेश्वर, पूर्वकालमें देवताओंके द्वारा स्थापित वरप्रद अमरेश्वर, गोचर्मेश्वर, ईशान, अद्भुत इन्द्रेश्वर और अपने कार्यके लिये ब्रह्माके द्वारा स्थापित विशाल कर्मेश्वर लिङ्ग हैं। हे अव्यये! श्रीमत्सिद्धवट सदा मेरा निवासस्थान है। साक्षात् ब्रह्माके द्वारा निर्मित यह दिव्य तथा पवित्र अजबिल नामक स्थान है; वहीं बिलेश्वरमें मेरी दिव्य पादुकाएँ भी हैं। वहाँ शृङ्गाटक पर्वतके मध्य शिखरपर शृङ्गाटकके आकारवाला (त्रिकोण) शृङ्गाटकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो श्रीदेवी (लक्ष्मी)-के द्वारा स्थापित किया गया है। यह मल्लिकार्जुन [लिङ्ग] मेरा शुभ निवासस्थान है। हे देवि! युगादिके परिवर्तित होनेपर ब्रह्माके द्वारा स्थापित राजेश्वरको, स्कन्दके द्वारा स्थापित गजेश्वरको, अविनाशी कपोतेश्वरको तथा सबसे अधिक शुभ और करोड़ों रुद्रगणोंके द्वारा सेवित कोटीश्वर नामक महातीर्थको इस समय देखो॥ १४८-१५७॥
द्विदेवकुलसंज्ञं च ब्रह्मणा दक्षिणे शुभम्।<br>उत्तरे स्थापितं चैव विष्णुना चैव शैलजम्॥ १५८<br>महाप्रमाणलिङ्गं च मया पूर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमे पर्वते पश्य ब्रह्मोश्वरमलेश्वरम्॥ १५९दक्षिणमें ब्रह्माके द्वारा तथा उत्तरमें विष्णुके द्वारा स्थापित किये गये पाषाणनिर्मित सुन्दर द्विदेवकुल नामक लिङ्गको, पूर्वमें मेरे द्वारा स्थापित महाप्रमाण लिङ्ग तथा पश्चिममें पर्वतपर स्थित ब्रह्मोश्वर अलेश्वर नामक

| ४८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

Sanskrit ShlokaHindi Translation
अलङ्कृतं त्वया ब्रह्मन् पुरस्तान्मुनिभिः सह।<br>इत्युक्त्वा तद्गृहेऽतिष्ठदलङ्गृहमिति स्मृतम्॥ १६०लिङ्गको देखो। महादेवने ब्रह्मासे कहा था—‘हे ब्रह्मन्! आपने मुनियोंके साथ इसे अलंकृत किया है’—ऐसा कहकर वे रुद्र उस गृहमें स्थित हो गये, अतः उसे अलंगृह कहा गया है॥ १५८–१६०॥
तत्रापि तीर्थं तीर्थज्ञे व्योमलिङ्गं च पश्य मे।<br>कदम्बेश्वरमेतद्धि स्कन्देनैव प्रतिष्ठितम्॥ १६१<br><br>गोमण्डलेश्वरं चैव नन्दाद्यैः सुप्रतिष्ठितम्।<br>देवैः सर्वैस्तु शक्राद्यैः स्थापितानि वरानने॥ १६२<br><br>श्रीमद्देवह्रदप्रान्ते स्थानानीमानि पश्य मे।<br>तथा हारपुरे देवि तव हारे निपातिते॥ १६३<br><br>त्वया हिताय जगतां हारकुण्डमिदं कृतम्।<br>शिवरुद्रपुरे चैव तत्कायोपरि सुव्रते॥ १६४<br><br>तत्र पित्रा सुशैलेन स्थापितं त्वचलेश्वरम्।<br>अलङ्कृतं मया ब्रह्मपुरस्तान्मुनिभिः सह॥ १६५<br><br>चण्डिकेश्वरकं देवि चण्डिकेशा तवात्मजा।<br>चण्डिकानिर्मितं स्थानमम्बिकातीर्थमुत्तमम्॥ १६६<br><br>रुचिकेश्वरकं चैव धारैषा कपिला शुभा।<br>एतेषु देवि स्थानेषु तीर्थेषु विविधेषु च॥ १६७हे तीर्थज्ञे! वहाँपर स्थित मेरे व्योमलिङ्ग तीर्थको भी देखो; कदम्बेश्वर नामवाला यह तीर्थ स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है। नन्द आदिके द्वारा विधिवत् स्थापित गोमण्डलेश्वरको भी देखो। हे वरानने! शोभासम्पन्न देव-ह्रद (सरोवर)-के तटपर इन्द्र आदि सभी देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये मेरे इन स्थानोंका अवलोकन करो। हे देवि! हारपुरमें तुम्हारे हारके गिर जानेपर तुमने जगत्के हितके लिये इसे हारकुण्ड बना दिया था। हे सुव्रते! शिवरुद्रपुरमें उस पर्वतपर तुम्हारे पिता सुशैलने अचलेश्वरकी स्थापना की थी, जिसे मैंने ब्रह्मा आदि ऋषियोंके साथ सुशोभित किया था। हे देवि! तुम्हारी पुत्री चण्डिकेशाने चण्डिकेश्वरको स्थापित किया है; चण्डिकाके द्वारा स्थापित यह स्थान उत्तम अम्बिकातीर्थ है। यह रुचिकेश्वर तीर्थ है; यह पवित्र कपिलधारा [तीर्थ] है॥ १६१–१६६ १/२॥
पूजयेन्मां सदा भक्त्या मया सार्धं हि मोदते।<br>श्रीशैले सन्त्यजेद्देहं ब्राह्मणो दग्धकिल्बिषः॥ १६८<br><br>मुच्यते नात्र सन्देहो ह्यविमुक्ते यथा शुभम्।<br>महास्नानं च यः कुर्याद् घृतेन विधिनैव तु॥ १६९<br><br>स याति मम सायुज्यं स्थानेष्वेतेषु सुव्रते।<br>स्नानं पलशतं ज्ञेयमभ्यङ्गं पञ्चविंशति॥ १७०<br><br>पलानां द्वे सहस्रे तु महास्नानं प्रकीर्तितम्।<br>स्नाप्य लिङ्गं मदीयं तु गव्येनैव घृतेन च॥ १७१हे देवि! जो इन विविध स्थानों तथा तीर्थोंमें भक्तिपूर्वक सदा मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ आनन्द करता है। जो ब्राह्मण श्रीशैलपर शरीरत्याग करता है, वह पापरहित होकर मुक्त हो जाता है, जिस प्रकार अविमुक्तक्षेत्रमें शुभ फल होता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रते! जो इन स्थानोंमें विधिपूर्वक घृतसे महास्नान कराता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त करता है। पचीस पल [घृत]-का ‘अभ्यंग’ तथा सौ पलका ‘स्नान’ जानना चाहिये। दो हजार पलोंसे स्नान करानेको ‘महास्नान’ कहा गया है॥ १६७–१७० १/२॥
विशोध्य सर्वद्रव्यैस्तु वारिभिरभिषिञ्चति।<br>सम्मार्ज्य शतयज्ञानां स्नानेन प्रयुतं तथा॥ १७२<br><br>पूजया शतसाहस्रमनन्तं गीतवादिनाम्।<br>महास्नाने प्रसक्ते तु स्नानमष्टगुणं स्मृतम्॥ १७३<br><br>जलेन केवलेनैव गन्धतोयेन भक्तितः।<br>अनुलेपनं तु तत्सर्वं पञ्चविंशतपलेन वै॥ १७४जो मेरे लिङ्गको गायके घीसे स्नान कराकर सभी पूजाद्रव्योंसे विशुद्ध करके जलसे मेरा अभिषेक करता है—इस प्रकार मार्जन करनेसे सौ यज्ञोंका, स्नान करानेसे तथा पूजा करानेसे लाख-लाख यज्ञोंका, गीतवाद्य आदिसे अर्चन करनेपर अनन्त यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। महास्नानमें रुचि रखनेवाले भक्तोंको स्नानका आठ गुना (आठ लाख यज्ञोंका) फल बताया गया है। केवल जलसे अथवा भक्ति-

अध्याय १२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८९

| शमीपुष्पं च विधिना बिल्वपत्रं च पङ्कजम्।<br>अन्यान्यपि च पुष्पाणि बिल्वपत्रं न सन्त्यजेत्॥ १७५<br><br>चतुर्द्रोणैर्महादेवमष्टद्रोणैरथापि वा।<br>दशद्रोणैस्तु नैवेद्यमष्टद्रोणैरथापि वा॥ १७६<br><br>शतद्रोणसमं पुण्यमाढकेऽपि विधीयते।<br>वित्तहीनस्य विप्रस्य नात्र कार्या विचारणा॥ १७७ | पूर्वक गन्धयुक्त जलसे अभ्यंग पचीस पलसे करना चाहिये॥ १७१–१७४॥<br><br>विधिपूर्वक शमीपुष्प, बिल्वपत्र, कमल तथा अन्य पुष्प अर्पित करना चाहिये; बिल्वपत्रका त्याग [कभी नहीं] करना चाहिये। महादेवकी पूजा चार अथवा आठ द्रोण पुष्पोंसे करनी चाहिये और दस अथवा आठ द्रोण नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। धनहीन ब्राह्मणके लिये एक आढक नैवेद्यका पुण्य सौ द्रोण नैवेद्यके पुण्यके समान बताया गया है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७५–१७७॥ | | भेरीमृदङ्गमुरजतिमिरापटहादिभिः ।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैर्निनादैर्विविधैरपि ॥ १७८<br><br>जागरं कारयेद्यस्तु प्रार्थयेच्च यथाक्रमम्।<br>स भृत्यपुत्रदारैश्च तथा सम्बन्धिबान्धवैः॥ १७९<br><br>सार्धं प्रदक्षिणं कृत्वा प्रार्थयेल्लिङ्गमूत्तमम्।<br>द्रव्यहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनं सुरेश्वर॥ १८०<br><br>कृतं वा न कृतं वापि क्षन्तुमर्हसि शङ्कर।<br>इत्युक्त्वा वै जपेद्रुद्रं त्वरितं शान्तिमेव च॥ १८१<br><br>जपित्वैवं महाबीजं तथा पञ्चाक्षरस्य वै।<br>स एवं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्॥ १८२<br><br>तत्फलं समवाप्नोति वाराणस्यां यथा मृतः।<br>तथैव मम सायुज्यं लभते नात्र संशयः॥ १८३<br><br>मत्प्रियार्थमिदं कार्यं मद्भक्तैर्विधिपूर्वकम्।<br>ये न कुर्वन्ति ते भक्ता न भवन्ति न संशयः॥ १८४ | भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिर, पटह आदि विविध वाद्य यन्त्रों और अन्य प्रकारके निनादोंके द्वारा [रात्रिमें] जो जागरण करे, उसे अपने सेवकों, पुत्रों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा बन्धुओंके साथ प्रदक्षिणा करके उत्तम लिङ्गसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—'हे सुरेश्वर! हे शंकर! मैंने जो भी द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा श्रद्धाहीन [पूजन] किया है अथवा जो नहीं भी किया गया है, उसे आप कृपा करके क्षमा करें'—यह प्रार्थना करके त्वरित रुद्र तथा शान्तिमन्त्रका जप करना चाहिये। पंचाक्षरके महाबीजका जप करके वह सभी तीर्थोंमें जाने तथा सभी यज्ञोंको करनेसे जो फल होता है, उस फलको प्राप्त कर लेता है और वाराणसीमें मरनेपर जो सायुज्य गति होती है, मेरे उस सायुज्यको प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है। [हे देवि!] मेरे भक्तोंको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक यह सब करें। जो ऐसा नहीं करते, वे मेरे भक्त नहीं होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ १७८–१८४॥ | | सूत उवाच<br>निशम्य वचनं देवी गत्वा वाराणसीं पुरीम्।<br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं पयसा च घृतेन च॥ १८५<br><br>अर्चयामास देवेशं रुद्रं भुवननायकम्।<br>अविमुक्ते च तपसा मन्दरस्य महात्मनः॥ १८६<br><br>कल्पयामास वै क्षेत्रं मन्दरे चारुकन्दरे।<br>तत्रान्धकं महादैत्यं हिरण्याक्षसुतं प्रभुः॥ १८७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] यह वचन सुनकर वाराणसीपुरी जाकर देवीने दूध तथा घीसे अविमुक्तेश्वर लिङ्गको स्नान कराकर भुवननायक देवेश रुद्रका अर्चन किया और अविमुक्त [काशी]-में तपस्याके द्वारा मन्दर-पर्वतपर एक सुन्दर कन्दरामें महात्मा मन्दरका क्षेत्र निर्मित किया; वहाँ प्रभु [शिव]-ने हिरण्याक्षके |

९३- हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति

४९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| अनुगृह्य गणत्वं च प्रापयामास लीलया।<br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमादरात्॥ १८८<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु यत्पुण्यं तत्सर्वं सहसा लभेत्॥ १८९<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् कृतशौचान् जितेन्द्रियान्।<br>स एव सर्वयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ १९० | पुत्र महादैत्य अन्धकपर अनुग्रह करके लीलापूर्वक उसे गणत्व प्राप्त कराया था। [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे आदरपूर्वक सम्पूर्ण कथासार कहा। जो मनुष्य इस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी क्षेत्रोंमें वासका जो पुण्य होता है, वह सब तत्काल प्राप्त कर लेता है अथवा जो सभी पवित्र तथा जितेन्द्रिय द्विजोंको सुनाता है, वह भी समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है॥ १८५-१९०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराणसीश्रीशैलमाहात्म्यकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः॥ ९२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वाराणसीश्रीशैलमाहात्म्यकथन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥


तिरानबेवाँ अध्याय

हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति

ऋषय ऊचुः<br>अन्धको नाम दैत्येन्द्रो मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दमितस्तु कथं लेभे गाणपत्यं महेश्वरात्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथावृत्तं यथाश्रुतम्।ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] अन्धक नामक दैत्यराजने मन्दरपर्वतकी सुन्दर गुफामें दमित होकर किस प्रकार महेश्वरसे गाणपत्य (गणपतिपद) प्राप्त किया; जिस प्रकार यह घटित हुआ और जैसा आपने सुना है, वह कृपापूर्वक हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥
सूत उवाच<br>अन्धकानुग्रहं चैव मन्दरे शोषणं तथा॥ २<br>वरलाभमशेषं च प्रवदामि समासतः।<br>हिरण्याक्षस्य तनयो हिरणयनयनोपमः॥ ३<br>पुरान्धक इति ख्यातस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>प्रसादाद् ब्रह्मणः साक्षादवध्यत्वमवाप्य च॥ ४<br>त्रैलोक्यमखिलं भुक्त्वा जित्वा चेन्द्रपुरं पुरा।<br>लीलया चाप्रयत्नेन त्रासयामास वासवम्॥ ५सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] मैं अन्धकपर [शिवजीके] अनुग्रह, मन्दरपर उसके दमन तथा वरप्राप्ति—यह सब संक्षेपमें बता रहा हूँ। प्राचीनकालमें हिरण्याक्षका एक पुत्र था; हिरण्याक्षके समान शक्तिशाली वह अन्धक—इस नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने तपस्यासे महान् पराक्रम प्राप्त कर लिया। वह साक्षात् ब्रह्माकी कृपासे [किसीसे] न मारे जानेका वर प्राप्त करके सम्पूर्ण त्रिलोकोंका उपभोग करके इन्द्रलोकको लीलापूर्वक बिना प्रयासके ही जीतकर इन्द्रको पीड़ित करने लगा॥ २-५॥
बाधितास्ताडिता बद्धाः पातितास्तेन ते सुराः।<br>विविशुर्मन्दरं भीता नारायणपुरोगमाः॥ ६उसके द्वारा कष्ट पहुँचाये गये, पीटे गये, बाँधे गये, गिराये गये नारायण आदि वे देवता डरकर मन्दरपर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हो गये॥ ६॥
एवं सम्पीड्य वै देवानन्धकोऽपि महासुरः।<br>यदृच्छया गिरिं प्राप्तो मन्दरं चारुकन्दरम्॥ ७इस प्रकार देवताओंको बहुत पीड़ित करके

अध्याय ९३] हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति | ४९१

श्लोकअर्थ
ततस्ते समस्ताः सुरेन्द्राः ससाध्याः<br>सुरेशं महेशं पुरेत्याहुरेवम्।<br>द्रुतं चाल्पवीर्यप्रभिन्नाङ्गभिन्ना<br>वयं दैत्यराजस्य शस्त्रैर्निकृत्ताः॥ ८महादैत्य अन्धक भी अपनी इच्छासे सुन्दर गुफावाले मन्दरपर्वतपर पहुँच गया॥ ७॥<br><br>तब साध्योंसहित वे सभी देवगण शीघ्र ही सुरेश्वर महेशके सामने पहुँचकर इस प्रकार बोले—'दैत्यराज [अन्धक]-के शस्त्रोंसे काटे गये हमलोग छिन्न-भिन्न अंगोंवाले हो गये हैं और अल्प पराक्रमवाले हो गये हैं'॥ ८॥
इतीदमखिलं श्रुत्वा दैत्यागमनमौपमम्।<br>गणेश्वरैश्च भगवानन्धकाभिमुखं ययौ॥ ९तब दैत्यका अद्भुत आगमन-सम्बन्धी यह सब वृत्तान्त सुनकर भगवान् शिव अपने गणेश्वरोंके साथ अन्धकके समक्ष पहुँचे॥ ९॥
तत्रेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः<br>सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे।<br>जयेति वाचा भगवन्तमूचुः<br>किरीटबद्धाञ्जलयः समन्तात्॥ १०उस समय इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रधान सुरेश्वर तथा श्रेष्ठ विप्र—ये सब बद्ध अञ्जलियोंको सिरसे लगाकर चारों ओरसे भगवान् शिवकी जय बोलने लगे॥ १०॥
अथाशेषासुरांस्तस्य कोटिकोटिशतैस्ततः।<br>भस्मीकृत्य महादेवो निर्बिभेदान्धकं तदा॥ ११तब महादेवने सैकड़ों-करोड़ों सैनिकोंके साथ उस अन्धकके समस्त राक्षसोंको भस्म करके अन्धकको [अपने त्रिशूलसे] बींध डाला॥ ११॥
शूलेन शूलिना प्रोतं दग्धकल्मषकञ्चुकम्।<br>दृष्ट्वान्धकं ननादेशं प्रणम्य स पितामहः॥ १२शिवके द्वारा त्रिशूलसे बींधे गये उस दग्धपापरूपी कंचुकवाले अन्धकको देखकर ब्रह्माजी ईश्वर (शिव)-को प्रणाम करके [प्रसन्नतासे] निनाद करने लगे॥ १२॥
तन्नादश्रवणान्नेदुर्देवा देवं प्रणम्य तम्।<br>ननृतुर्मुनयः सर्वे मुमुदुर्गणपुङ्गवाः॥ १३<br><br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवाः शाम्भोस्तदोपरि।<br>त्रैलोक्यमखिलं हर्षान्ननन्द च ननाद च॥ १४उस ध्वनिको सुनकर सभी देवता, मुनि तथा श्रेष्ठ गण भी उन्हें प्रणाम करके हर्षध्वनि करने लगे, नाचने लगे और आनन्द मनाने लगे। देवताओंने उस समय शिवजीके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की और सम्पूर्ण त्रैलोक्य हर्षके कारण आनन्दित हो उठा तथा ध्वनि करने लगा॥ १३-१४॥
दग्धोऽग्निना च शूलेन प्रोतः प्रेत इवान्धकः।<br>सात्त्विकं भावमास्थाय चिन्तयामास चेतसा॥ १५प्रज्वलित अग्निवाले त्रिशूलसे बींधा हुआ प्रेततुल्य वह अन्धक सात्त्विक भावमें स्थित होकर मनमें सोचने लगा—
जन्मान्तरेऽपि देवेन दग्धो यस्माच्छिवेन वै।<br>आराधितो मया शम्भुः पुरा साक्षान्महेश्वरः॥ १६<br><br>तस्मादेतन्मया लब्धमन्यथा नोपपद्यते।<br>यः स्मरेन्मनसा रुद्रं प्राणान्ते सकृदेव वा॥ १७'पूर्वजन्ममें भी शिवने मुझे दग्ध किया था, मैंने पहले साक्षात् महेश्वर शिवकी आराधना की थी, इसीलिये मैंने ऐसी गति प्राप्त की, अन्यथा ऐसा कभी न होता। जो [व्यक्ति] मृत्युकालके समय एक बार भी मनसे शिवका स्मरण करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त
स याति शिवसायुज्यं किं पुनर्बहुशः स्मरन्।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः॥ १८करता है, तो फिर जो बहुत बार स्मरण करे, उसका कहना ही क्या! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और इन्द्रसहित सभी

९४- भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति

४९२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| शरणं प्राप्य तिष्ठन्ति तमेव शरणं व्रजेत्।<br>एवं सञ्चिन्त्य तुष्टात्मा सोऽन्धकश्चान्धकार्दनम्॥ १९<br><br>सगणं शिवमीशानमस्तुवत्पुण्यगौरवात्।<br>प्रार्थितस्तेन भगवान् परमार्तिहरो हरः॥ २०<br><br>हिरण्यनेत्रतनयं शूलाग्रस्थं सुरेश्वरः।<br>प्रोवाच दानवं प्रेक्ष्य घृणया नीललोहितः॥ २१<br><br>तुष्टोऽस्मि वत्स भद्रं ते कामं किं करवाणि ते।<br>वरान् वरय दैत्येन्द्र वरदोऽहं तवान्धक॥ २२<br><br>श्रुत्वा वाक्यं तदा शम्भोर्हिरण्यनयनात्मजः।<br>हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाचेदं महेश्वरम्॥ २३<br><br>भगवन् देवदेवेश भक्तार्तिहर शङ्कर।<br>त्वयि भक्तिः प्रसीदेश यदि देयो वरश्च मे॥ २४<br><br>श्रुत्वा भवोऽपि वचनमन्धकस्य महात्मनः।<br>प्रददौ दुर्लभां श्रद्धां दैत्येन्द्राय महाद्युतिः॥ २५<br><br>गाणपत्यं च दैत्याय प्रददौ चावरोप्य तम्।<br>प्रणेमुस्तं सुरेन्द्राद्या गाणपत्ये प्रतिष्ठितम्॥ २६ | देवता उन्हींकी शरण ग्रहण करके स्थित हैं, अतः उन्हीं [शिव]-की शरणमें जाना चाहिये'॥ १५-१८<sup>१/२</sup><br><br>इस प्रकार विचार करके वह अन्धक अपने पुण्यगौरवके कारण गणोंसहित अन्धकका संहार करनेवाले उन ईशान शिवकी स्तुति करने लगा। तब उसके द्वारा प्रार्थित होकर बड़े-से-बड़े दुःखका हरण करनेवाले नीललोहित सुरेश्वर भगवान् हर [अपने] त्रिशूलके अग्रभागपर स्थित हिरण्याक्षपुत्र [अन्धक]-की ओर दयापूर्वक देखकर उससे बोले—'हे वत्स! मैं [तुमपर] प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? हे दैत्येन्द्र! वर माँगो। हे अन्धक! मैं तुम्हें वर देनेवाला हूँ'॥ १९-२२॥<br><br>तब शम्भुका वचन सुनकर हिरण्याक्षपुत्रने हर्षके कारण गद्गद वाणीमें महेश्वरसे यह कहा—'हे भगवन्! हे देवदेवेश! भक्तोंका कष्ट हरनेवाले हे शंकर! मुझपर प्रसन्न होइये। हे ईश! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यही वर प्रदान करें कि आपमें [सदा] मेरी भक्ति हो'॥ २३-२४॥<br><br>महान् आत्मावाले अन्धकका वचन सुनकर परम कान्तिवाले शिवने [उस] दैत्येन्द्रको [अपनी] दुर्लभ भक्ति प्रदान की और उस दैत्यको त्रिशूलपरसे उतारकर उसे गणाधिप पद प्रदान किया। तब इन्द्र आदि देवताओंने गाणपत्य पदपर प्रतिष्ठित उस अन्धकको प्रणाम किया॥ २५-२६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अन्धकगाणपत्यात्मको नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अन्धकगाणपत्यात्मक' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९३॥


चौरानबेवाँ अध्याय

भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति

| ऋषय ऊचुः<br>कथमस्य पिता दैत्यो हिरण्याक्षः सुदारुणः।<br>विष्णुना सूदतो विष्णुर्वाराहत्वं कथं गतः॥ १<br>तस्य शृङ्गं महेशस्य भूषणत्वं कथं गतम्।<br>एतत्सर्वं विशेषेण सूत वक्तुमिहार्हसि॥ २ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! [भगवान्] विष्णुके द्वारा इस [अन्धक]-का पिता महाभयंकर दैत्य हिरण्याक्ष कैसे मारा गया, विष्णुने वाराहका रूप क्यों धारण किया और उनकी सींगने महेश्वरका भूषणत्व कैसे प्राप्त किया? यह सब आप विशेषरूपसे बताइये॥ १-२॥ |

अध्याय ९४] भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध... भगवान् वराहकी स्तुति ४९३

सूत उवाचसूतजी बोले—
हिरण्यकशिपोर्भ्राता हिरण्याक्ष इति स्मृतः।<br>पुरान्धकासुरेशस्य पिता कालान्तकोपमः॥ ३<br>देवाञ्जित्वाथ दैत्येन्द्रो बद्ध्वा च धरणीमिमाम्।<br>नीत्वा रसातलं चक्रे बन्दीमिन्दीवरप्रभाम्॥ ४—[हे ऋषियो!] हिरण्याक्ष हिरण्य-कशिपुका भाई कहा गया है। पूर्वकालमें असुरेन्द्र अन्धकके पिता दैत्येन्द्र हिरण्याक्षने, जो कालान्तकके समान था, देवताओंको जीतकर कमलके समान प्रभावृाली इस पृथ्वीको बाँधकर रसातलमें ले जाकर उसे बन्दी बना लिया॥ ३-४॥
ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः।<br>बाधितास्ताडिता बद्धा हिरण्याक्षेण तेन वै॥ ५<br>बलिना दैत्यमुख्येन क्रूरेण सुदुरात्मना।<br>प्रणम्य शिरसा विष्णुं दैत्यकोटिविमर्दनम्॥ ६<br>सर्वे विज्ञापयामासुर्धरणीबन्धनं हरेः।<br>श्रुत्वैतद्भगवान् विष्णुर्धरणीबन्धनं हरिः॥ ७तदनन्तर बलशाली, क्रूर तथा अति दुरात्मा उस महादैत्य हिरण्याक्षके द्वारा सताये गये, पीटे गये तथा बाँधे गये ब्रह्मासहित मुरझाये मुखश्रीवाले सभी देवताओंने करोड़ों दैत्योंका संहार करनेवाले विष्णुको प्रणाम करके पृथ्वीके बन्धनका वृत्तान्त उन हरिको बताया॥ ५-६ १/२॥
भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ यथा लिङ्गोद्भवे तथा।<br>दैत्यैश्च सार्धं दैत्येन्द्रं हिरण्याक्षं महाबलम्॥ ८<br>दंष्ट्राग्रकोट्या हत्वैनं रेजे दैत्यान्तकृत्प्रभुः।<br>कल्पादिषु यथापूर्वं प्रविश्य च रसातलम्॥ ९<br>आनीय वसुधां देवीमङ्कस्थामकरोद् बहिः।<br>ततस्तुष्टाव देवेशं देवदेवः पितामहः॥ १०इस पृथ्वीबन्धनको सुनकर उन भगवान् श्रीहरि विष्णुने लिङ्ग-प्रादुर्भावके समय जैसा रूप धारण किया था, वैसा ही यज्ञवराहका रूप धारणकर वे अपने दाँतोंके आगेके नुकीले भागसे [सभी] दैत्योंसहित महाबली दैत्यराज हिरण्याक्षका वध करके सुशोभित हुए। दैत्योंका अन्त करनेवाले उन प्रभुने जैसे पूर्व कल्पोंमें रसातलमें प्रवेश किया था, वैसे ही रसातलमें प्रवेश करके पृथ्वीदेवीको अपनी गोदमें रखकर वहाँसे लाकर पुनः बाहर स्थापित कर दिया॥ ७-९ १/२॥
शक्राद्यैः सहितो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा।<br>शाश्वताय वराहाय दंष्ट्रिणे दण्डिने नमः॥ ११<br>नारायणाय सर्वाय ब्रह्मणे परमात्मने।<br>कर्त्रे धर्त्रे धरायास्तु हर्त्रे देवारिणां स्वयम्।<br>कर्त्रे नेत्रे सुरेन्द्राणां शास्त्रे च सकलस्य च॥ १२तत्पश्चात् देवदेव ब्रह्मा हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें इन्द्र आदि [देवताओं]-के साथ मिलकर [उन] देवेशकी स्तुति करने लगे—शाश्वत, दंष्ट्र (दाढ़)-वाले, दण्डधारी, नारायण, सर्वमय, ब्रह्मस्वरूप, परमात्मा, पृथ्वीकी रचना तथा रक्षा करनेवाले, देवताओंके शत्रुओंका नाश करनेवाले, सुरेन्द्रोंके जनक एवं नायक और सबके नियन्ता [भगवान्] वराहको नमस्कार है॥ १०-१२॥
त्वमष्टमूर्तिस्त्वमनन्तमूर्ति-<br>स्त्वमादिदेवस्त्वमनन्तवेदितः।<br>त्वया कृतं सर्वमिदं प्रसीद<br>सुरेश लोकेश वराह विष्णो॥ १३हे सुरेश! हे लोकेश! हे वराह! हे विष्णो! आप अष्टमूर्ति हैं, आप अनन्तमूर्ति हैं, आप आदिदेव हैं, आप सर्वज्ञ हैं; आपने ही इस सम्पूर्ण जगत्‌की रचना की है; आप प्रसन्न होइये॥ १३॥
तथैकदंष्ट्राग्रमुखाग्रकोटि-<br>भागैकभागार्धतमेन विष्णो।<br>हताः क्षणात्कामददैत्यमुख्याः<br>स्वदंष्ट्रकोट्या सह पुत्रभृत्यैः॥ १४हे विष्णो! आपने एक दाढ़के अग्र भागकी कोटिके एक भागके आधे भागके बराबर अपनी दाढ़की कोटिसे ही पुत्रों तथा सेवकोंसमेत कामद आदि प्रधान दैत्योंको क्षणभरमें मार डाला॥ १४॥
श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग ]
४९४

श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वयोद्धृता देव धरा धरेश<br>धराधराकार धृताग्रदंष्ट्रे।<br>धराधरैः सर्वजनैः समुद्रैः<br>सुरासुरैः सेवितचन्द्रवक्त्र ॥ १५हे देव! हे धरेश! हे पर्वताकार! हे सेवितचन्द्रवक्त्र!<br>आपने दिग्गजों, सभी प्राणियों, समुद्रों, देवताओं तथा असुरोंसहित पृथ्वीको उठा लिया और उसे अपनी दाढ़के अग्र भागपर रख लिया ॥ १५ ॥
त्वयैव देवेश विभो कृतश्च<br>जयः सुराणामसुरेश्वराणाम्।<br>अहो प्रदत्तस्तु वरः प्रसीद<br>वाग्देवतावारिजसम्भवाय ॥ १६हे देवेश! हे विभो! आपने ही असुरोंपर देवताओंकी विजय दिलायी है। अहो, आपने ही सरस्वतीयुक्त ब्रह्माको वर दिया था; आप प्रसन्न हो जाइये ॥ १६ ॥
तव रोम्णि सकलाम्रेश्वरा<br>नयनद्वये शशिरवी पदद्वये।<br>निहिता रसातलगता वसुन्धरा<br>तव पृष्ठतः सकलतारकादयः ॥ १७सभी देवता आपके रोममें स्थित हैं, चन्द्रमा तथा सूर्य आपके दोनों नेत्रोंमें विराजमान हैं, रसातलमें गयी हुई पृथ्वी आपके दोनों चरणोंमें निहित है, सम्पूर्ण तारे आदि आपकी पीठपर स्थित हैं ॥ १७ ॥
जगतां हिताय भवता वसुन्धरा<br>भगवन् रसातलपुटं गता तदा।<br>अबलोद्धृता च भगवंस्त्वयैव<br>सकलं त्वयैव हि धृतं जगद्गुरो ॥ १८हे भगवन्! आपने रसातलमें गयी हुई अबला पृथ्वीका उद्धार जगत्के हितके लिये किया है। हे भगवन्! हे जगद्गुरो! आपने ही सबको धारण किया है ॥ १८ ॥
इति वाक्पतिर्बहुविधैस्तवार्त्चनैः<br>प्रणिपत्य विष्णुममरैः प्रजापतिः।<br>विविधान् वरान् हरिमुखात्तु लब्धवान्<br>हरिनाभिवारिजदेहभृत्स्वयम् ॥ १९इस प्रकार श्रीहरिके नाभिकमलसे उत्पन्न होनेवाले प्रजापति ब्रह्माने देवताओंके साथ अनेक प्रकारके स्तुतिवचनोंसे [वाराहरूपधारी] विष्णुको प्रणाम करके उन [भगवान्] विष्णुके मुखसे अनेक वर प्राप्त किये ॥ १९ ॥
अथ तामुद्धृतां तेन धरां देवा मुनीश्वराः।<br>मूर्ध्न्यारोप्य नमश्चक्रुश्चक्रिणः सन्निधौ तदा ॥ २०इसके बाद सभी देवताओं तथा मुनीश्वरोंनै उन विष्णुके द्वारा लायी गयी पृथ्वीको [अपने] सिरसे

अध्याय ९४] भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध... भगवान् वराहकी स्तुति | ४९५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनेनैव वराहेण चोद्धृतासि वरप्रदे।<br>कृष्णेनाक्लिष्टकार्येण शतहस्तेन विष्णुना॥ २१<br><br>धरणि त्वं महाभोगे भूमिस्त्वं धेनुरव्यये।<br>लोकानां धारणी त्वं हि मृत्तिके हर पातकम्॥ २२<br><br>मनसा कर्मणा वाचा वरदे वारिजेक्षणे।<br>त्वया हतेन पापेन जीवामस्त्वत्प्रसादतः॥ २३लगाकर चक्रधारी विष्णुके सामने ही उसे नमस्कार किया। [वे बोले—] हे वरप्रदे! सहज क्रिया-कलापोंवाले तथा सैकड़ों हाथोंवाले वाराहरूपधारी इन विष्णुने ही आपका उद्धार किया है। हे धरणि! हे महाभोगे! आप भूमि हैं। हे अव्यये! आप धेनु हैं। हे मृत्तिके! आप लोकोंको धारण करनेवाली हैं; [हमारे] पापको दूर कीजिये। हे वरदे! हे कमलनयने! हमलोगोंद्वारा मन-वचन-कर्मसे किये गये पाप आपके द्वारा नष्ट किये जानेपर ही हमलोग आपकी कृपासे जीते हैं॥ २०–२३॥
इत्युक्ता सा तदा देवी धरा देवैरथाब्रवीत्।<br>वराहदंष्ट्राभिन्नायां धरायां मृत्तिकां द्विजाः॥ २४<br><br>मन्त्रेणानेन योऽबिभ्रत् मूर्ध्नि पापात्प्रमुच्यते।<br>आयुष्मान् बलवान् धन्यः पुत्रपौत्रसमन्वितः॥ २५<br><br>क्रमाद्भुवि दिवं प्राप्य कर्मान्ते मोदते सुरैः।देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन पृथ्वीदेवीने कहा—'हे द्विजो! जो [व्यक्ति] वराहके दंष्ट्रासे खोदी गयी पृथ्वीकी मिट्टीको [पूर्वोक्त] इस मन्त्रसे अपने सिरपर धारण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है; वह क्रमसे पृथ्वीलोकमें दीर्घजीवी, बलवान्, धन्य और पुत्र-पौत्रसे युक्त होता है, पुनः प्रारब्ध कर्मके क्षीण होनेपर स्वर्ग प्राप्त करके देवताओंके साथ आनन्द मनाता है'॥ २४-२५ १/२॥
अथ देवे गते त्यक्त्वा वराहे क्षीरसागरम्॥ २६<br><br>वाराहरूपमनघं चचाल च धरा पुनः।<br>तस्य दंष्ट्राभराक्रान्ता देवदेवस्य धीमतः॥ २७<br><br>यदृच्छया भवः पश्यन् जगाम जगदीश्वरः।<br>दंष्ट्रां जग्राह दृष्ट्वा तां भूषणार्थमथात्मनः॥ २८<br><br>दधार च महादेवः कूर्चान्ते वै महोरसि।इसके बाद निष्पाप वाराहरूपको त्यागकर भगवान् वराहके क्षीरसागर चले जानेपर उन बुद्धिमान् देवदेवके दाढ़ोंके भारसे आक्रान्त पृथ्वी एक बार पुनः हिल गयी। संयोगवश यह सब देखते हुए जगत्के स्वामी शिव वहाँ पहुँच गये और उन्होंने उस दंष्ट्राको देखकर उसे अपने भूषणके लिये ग्रहण कर लिया। महादेवने उसे अपने श्मश्रु (दाढ़ी)-के केशके समीप विशाल वक्षःस्थलपर धारण कर लिया॥ २६–२८ १/२॥
देवाश्च तुष्टुवुः सेन्द्रा देवदेवस्य वैभवम्॥ २९<br><br>धरा प्रतिष्ठिता ह्येवं देवदेवेन लीलया।<br>भूतानां सम्प्लवे चापि विष्णोश्चैव कलेवरम्॥ ३०<br><br>ब्रह्मणश्च तथान्येषां देवानापि लीलया।<br>विभुरङ्गविभागेन भूषितो न यदि प्रभुः॥ ३१<br><br>कथं विमुक्तिर्विप्राणां तस्माद्दंष्ट्री महेश्वरः॥ ३२तब इन्द्रसहित सभी देवगण देवदेव [शिव]-के ऐश्वर्यकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार देवदेवने लीलापूर्वक पृथ्वीको प्रतिष्ठित किया। महाप्रलयकालमें भी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके कलेवरको देखकर यदि सर्वव्यापक प्रभु [शिव] भक्तवात्सल्यके कारण [विष्णुके] अंगके अंश [उस द्रंष्ट्रा]-से विभूषित न होते, तो विप्रोंकी मुक्ति कैसे होती; अतः महेश्वर दंष्ट्री हैं॥ २९–३२॥

॥ इति श्रीमल्लिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराहप्रादुर्भावो नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वाराहप्रादुर्भाव' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९४॥

९५- नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्य-कशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य

४९६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

पंचानबेवाँ अध्याय

नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्यकशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य

संस्कृतहिन्दी
ऋषय ऊचुः<br>नृसिंहेन हतः पूर्वं हिरण्याक्षाग्रजः श्रुतम्।<br>कथं निष्षूदितस्तेन हिरण्यकशिपुर्वद॥ १ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] यह सुना गया है कि पूर्वकालमें हिरण्याक्षका ज्येष्ठ भ्राता हिरण्यकशिपु भगवान् नृसिंहद्वारा मारा गया था; आप [हमलोगोंको] बतायें कि उनके द्वारा उसका वध कैसे किया गया?॥ १॥
सूत उवाच<br>हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लाद इति विश्रुतः।<br>धर्मज्ञः सत्यसम्पन्नस्तपस्वी चाभवत्सुधीः॥ २<br><br>जन्मप्रभृति देवेशं पूजयामास चाव्ययम्।<br>सर्वज्ञं सर्वगं विष्णुं सर्वदेवभवोद्भवम्॥ ३<br><br>तमादिपुरुषं भक्त्या परब्रह्मस्वरूपिणम्।<br>ब्रह्मणोऽधिपतिं सृष्टिस्थितिसंहारकारणम्॥ ४सूतजी बोले— हिरण्यकशिपुका पुत्र 'प्रह्लाद' इस नामसे विख्यात था। वह धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ, तपस्वी तथा बुद्धिमान् था। वह जन्मसे ही अविनाशी, सर्वज्ञ, सभी देवताओंकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप, आदिपुरुष, परब्रह्मरूप, ब्रह्माके अधिपति और सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले उन देवेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करता था॥ २-४॥
सोऽपि विष्णोस्तथाभूतं दृष्ट्वा पुत्रं समाहितम्।<br>नमो नारायणायेति गोविन्देति मुहुर्मुहुः॥ ५<br><br>स्तुवन्तं प्राह दैवारिः प्रहसन्निव पापधीः।<br>न मां जानासि दुर्बुद्धे सर्वदैत्यामरेश्वरम्॥ ६<br><br>प्रह्लाद वीर दुष्पुत्र द्विजदेवार्तिकारणम्।<br>को विष्णुः पद्मजो वापि शक्रश्च वरुणोऽथ वा॥ ७<br><br>वायुः सोमस्तथेशानः पावको मम यः समः।<br>मामेवार्चय भक्त्या च त्यक्त्वा नारायणं सदा॥ ८<br><br>प्रह्लाद जीविते वाञ्छा तवैषा शृणु चास्ति चेत्।<br>श्रुत्वापि तस्य वचनं हिरण्यकशिपोः सुधीः॥ ९अपने पुत्रको एकाग्रचित्त होकर विष्णुकी उस प्रकारकी भक्तिमें तत्पर और बार-बार 'नमो नारायणाय, नमो गोविन्दाय'—इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर उस पापबुद्धि तथा देवशत्रु हिरण्यकशिपुने हँसते हुए कहा—हे दुर्बुद्धे! हे प्रह्लाद! हे वीर! हे दुष्पुत्र! सभी दैत्यों तथा देवताओंके स्वामी और ब्राह्मणों तथा देवताओंको दुःख देनेवाले मुझ [हिरण्यकशिपु]-को नहीं जानते हो। विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, वायु, चन्द्र, ईशान अथवा अग्नि—इनमें ऐसा कौन है, जो मेरे समान है; अतः तुम नारायणको पूर्णरूपसे छोड़कर सदा भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो। हे प्रह्लाद! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो, तो [ध्यान देकर] इस बातको सुन लो॥ ५-८ १/२॥
प्रह्लादः पूजयामास नमो नारायणेति च।<br>नमो नारायणायेति सर्वदैत्यकुमारकान्॥ १०<br><br>अध्यापयामास च तां ब्रह्मविद्यां सुशोभनाम्।<br>दुर्लङ्घ्यां चात्मनो दृष्ट्वा शक्रादिभिरपि स्वयम्॥ ११उस हिरण्यकशिपुका वचन सुनकर भी बुद्धिमान् प्रह्लाद [विष्णुकी] पूजा करता रहा और 'नमो नारायणाय, नमो नारायणाय'—ऐसा उच्चारण करता रहा। उसने सभी दैत्यकुमारोंको [नारदोपदिष्ट] वह उत्तम ब्रह्मविद्या भी सिखायी। तब इन्द्र आदिके द्वारा भी दुर्लंघ्य अपनी

अध्याय १५] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ४९७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुत्रेण लङ्घितामाज्ञां हिरण्यः प्राह दानवान्।<br>एतं नानाविधैर्वध्यं दुष्पुत्रं हन्तुमर्हथ ॥ १२आज्ञाको स्वयं अपने पुत्रके द्वारा उल्लंघित देखकर हिरण्यकशिपुने दानवोंसे कहा—इस वधयोग्य कुपुत्रको अनेकविध उपायोंसे मार डालो ॥ ९–१२ ॥
एवमुक्तास्तदा तेन दैत्येन सुदुरात्मना।<br>निजघ्नुर्देवदेवस्य भृत्यं प्रह्लादमव्ययम् ॥ १३तब उस दुरात्मा दैत्यके कहनेपर वे दानव देवदेव [विष्णु]-के नाशरहित भक्त प्रह्लादको मारने लगे ॥ १३ ॥
तत्र तत्प्रतिकृतं तदा सुरै-<br>दैत्यराजतनयं द्विजोत्तमाः।<br>क्षीरवारिनिधिशायिनः प्रभो-<br>र्निष्फलं त्वथ बभूव तेजसा ॥ १४हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस समय असुरोंके द्वारा दैत्यराज [हिरण्यकशिपु]-के पुत्रके प्रति किया गया समस्त उपाय क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णुके तेजसे निष्फल (व्यर्थ) हो गया ॥ १४ ॥
तदाथ गर्वभिन्नस्य हिरण्यकशिपोः प्रभुः।<br>तत्रैवाविरभूद्धन्तुं नृसिंहाकृतिमास्थितः ॥ १५तत्पश्चात् अभिमानके मदमें चूर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये विष्णुजी नृसिंहरूप धारण करके वहींपर प्रकट हुए और उन्होंने पुत्र [प्रह्लाद]-की ओर देखकर उसके पिता दानवाधम हिरण्यकशिपुका वध कर दिया। उन्होंने उसी क्षण अपने तीक्ष्ण सैकड़ों नाखूनोंसे उसे विदीर्ण कर दिया। इसके बाद पापोंका नाश करनेवाले वे विष्णु बान्धवोंसहित उस दैत्यका वध करके पुनः उस दैत्येन्द्रको पीसने लगे; वे उस समय प्रलयकालीन दूसरी अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे। हे सुव्रतो! हे विप्रो! उस समय ब्रह्मलोकपर्यन्त
जघान च सुतं प्रेक्ष्य पितरं दानवाधमम्।<br>बिभेद तत्क्षणादेव करजैर्निशितैः शतैः ॥ १६
ततो निहत्य तं दैत्यं सबान्धवमघापहः।<br>पीडयामास दैत्येन्द्रं युगान्ताग्निरिवापरः ॥ १७
नादैस्तस्य नृसिंहस्य घोरैर्वित्रासितं जगत्।<br>आब्रह्मभुवनाद्विप्राः प्रचचाल च सुव्रताः ॥ १८

४९८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण जगत् उन नृसिंहके गर्जनसे भयभीत हो गया और काँपने लगा॥ १५-१८॥
दृष्ट्वा सुरासुरमहोरगसिद्धसाध्या-<br>स्तस्मिन् क्षणे हरिविरिञ्चिमुखा नृसिंहम्।<br>धैर्यं बलं च समवाप्य ययुर्विसृज्य<br>आदिङ्मुखान्तमसुरक्षणतत्पराश्च ॥ १९उस समय नृसिंहको देखकर अपने प्राणकी रक्षामें तत्पर सभी देवता, दानव, नाग, सिद्ध, साध्य, ब्रह्मा-विष्णु आदि भी किसी तरह धैर्य तथा बल धारणकर उस स्थानको छोड़कर सभी दिशाओंमें भाग गये॥ १९॥
ततस्तैर्गतेः सैष देवो नृसिंहः<br>सहस्राकृतिः सर्वपातसर्वबाहुः।<br>सहस्रेक्षणः सोमसूर्याग्निनेत्र-<br>स्तदा संस्थितः सर्वमावृत्य मायी॥ २०तदनन्तर उनके चले जानेपर मायामय ये भगवान् नृसिंह हजाररूपवाले, सभी ओर पैरोंवाले, सभी ओर भुजाओंवाले, हजार नेत्रोंवाले, चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित हो गये॥ २०॥
तं तुष्टुवुः सुरश्रेष्ठा लोकालोकाचले स्थिताः।<br>सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सयमाः समरुद्गणाः ॥ २१तब लोकालोक [मर्यादा] पर्वतपर एकत्र हुए श्रेष्ठ देवता ब्रह्मा, साध्यगण, यम तथा मरुद्गणोंके साथ उनकी स्तुति करने लगे—
परात्परतरं ब्रह्म तत्त्वात्तत्त्वतमं भवान्।<br>ज्योतिषां तु परं ज्योतिः परमात्मा जगन्मयः ॥ २२आप परसे भी परतर ब्रह्म हैं, तत्त्वसे भी तत्त्वतम हैं, नक्षत्रोंकी परम ज्योति हैं, परमात्मा हैं, जगन्मय हैं,
स्थूलं सूक्ष्मं सुसूक्ष्मं च शब्दब्रह्ममयः शुभः।<br>वागतीतो निरालम्बो निर्द्वन्द्वो निरुपप्लवः ॥ २३स्थूल-सूक्ष्म तथा अत्यन्त सूक्ष्म हैं, शब्दब्रह्ममय हैं, परम पवित्र हैं, वाणीसे परे हैं, आश्रयरहित हैं, [सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि] द्वन्द्वोंसे रहित हैं और उपद्रवशून्य हैं।
यज्ञभुग्यज्ञमूर्तिस्त्वं यज्ञिनां फलदः प्रभुः।<br>भवान् मत्स्याकृतिः कौर्ममास्थाय जगति स्थितः ॥ २४आप प्रभु यज्ञभोक्ता हैं, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, आप यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले हैं, आपने मत्स्यरूप धारण किया, आप कूर्म (कच्छप)-का रूप धारण करके जगत्में स्थित हैं।
वाराहीं चैव तां सैंहीमास्थायेह व्यवस्थितः।<br>देवानां देवरक्षार्थं निहत्य दितिजेश्वरम् ॥ २५देवताओंकी रक्षाके लिये वाराह तथा नृसिंहका रूप धारणकर दैत्येन्द्रका वध करके आप इस लोकमें प्रतिष्ठित हुए।
द्विजशापच्छलेनैवमवतीर्णोऽसि लीलया।<br>न दृष्टं यत्त्वदन्यं हि भवान् सर्वं चराचरम् ॥ २६इसी प्रकार भृगुमुनिके शापके बहाने अपनी लीलासे आपने अवतार ग्रहण किया। आपसे पृथक् अन्य कुछ भी नहीं देखा गया है; आप चर-अचर सब कुछ हैं।
भवान् विष्णुर्भवान् रुद्रो भवानेव पितामहः।<br>भवानादिर्भवानन्तो भवानेव वयं विभो ॥ २७हे विभो! आप ही विष्णु हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही आदि हैं, आप ही अन्त हैं और आप ही हम सब हैं।
भवानेव जगत्सर्वं प्रलापेन किमीश्वर।<br>मायया बहुधा संस्थमद्वितीयमयं प्रभो ॥ २८आप [स्वयं] सम्पूर्ण जगत् हैं; हे ईश्वर! अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन? हे प्रभो! अद्वितीय (एक) होते हुए भी [अपनी] मायासे अनेक रूपोंमें स्थित आप [प्रभु]-

अध्याय ९५] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ४९१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्तोष्यामस्त्वां कथं भासि देवदेव मृगाधिप।<br>स्तुतोऽपि विविधैः स्तुत्यैर्भावैर्नानाविधैः प्रभुः॥ २९की स्तुति हम लोग कैसे करें? हे देवदेव! हे नृसिंह! आप बहुत देदीप्यमान हो रहे हैं॥ २१–२८¹/२॥
न जगाम द्विजाः शान्तिं मानयन् योनिमात्मनः।<br>यो नृसिंहस्तवं भक्त्या पठेद्धार्थं विचारयेत्॥ ३०<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् विष्णुलोके महीयते।<br>तदन्तरे शिवं देवाः सेन्द्राः सब्रह्मकाः प्रभुम्॥ ३१हे द्विजो! विविध भावोंसे युक्त नानाविध स्तुतियोंसे प्रार्थना किये जानेपर भी वे प्रभु अपने सिंहरूपका सम्मान करते हुए शान्त नहीं हुए। जो नृसिंह-स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा इसके अर्थका चिन्तन करता है अथवा सभी द्विजोंने सुनाता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २९–३०¹/२॥
सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वं विज्ञाप्य मृगरूपिणः।<br>ततो ब्रह्मादयस्तूर्णं संस्तूय परमेश्वरम्॥ ३२<br><br>आत्मत्राणाय शरणं जग्मुः परमकारणम्।<br>मन्दरस्थं महादेवं क्रीडमानं सहोमया॥ ३३<br><br>सेवितं गणगन्धर्वैः सिद्धैरप्सरसां गणैः।<br>देवताभिः सह ब्रह्मा भीतभीतः सगद्गदम्।<br>प्रणम्य दण्डवद्भूतौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३४तत्पश्चात् इन्द्र तथा ब्रह्मसहित सभी देवता प्रभु शिवका ध्यान करके नृसंहरूपधारी विष्णुके विषयमें सब कुछ कहकर उनकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर परमेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्मा आदि [देवता] अपनी रक्षाके लिये मन्दर पर्वतपर स्थित, उमाके साथ विहार करते हुए और गन्धर्वों, सिद्धों-अप्सराओंसे सेवित परमकारण महादेवकी शरणमें गये। भयभीत ब्रह्माजी देवताओंके साथ दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर गद्गद वाणीमें परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ३१–३४॥
ब्रह्मोवाच<br>नमस्ते कालकालाय नमस्ते रुद्र मन्यवे।<br>नमः शिवाय रुद्राय शङ्कराय शिवाय ते॥ ३५<br><br>उग्रोऽसि सर्वभूतानां नियन्तासि शिवोऽसि नः।<br>नमः शिवाय शर्वाय शङ्करायार्तिहारिणे॥ ३६ब्रह्माजी बोले—[हे शिव!] आप कालान्तकको नमस्कार है। हे रुद्र! आप क्रोधरूपको नमस्कार है। आप मोक्षरूप रुद्र, शंकर तथा शिवको नमस्कार है। आप उग्र हैं, सभी प्राणियोंके नियन्ता हैं और हम भक्तोंके लिये कल्याणकारक हैं। दुःखका नाश करनेवाले शिव, शर्व तथा शंकरको नमस्कार है॥ ३५–३६॥
मयस्कराय विश्वाय विष्णवे ब्रह्मणे नमः।<br>अन्तकाय नमस्तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥ ३७<br><br>हिरण्यबाहवे साक्षाद्धिरण्यरूपतये नमः।<br>शर्वाय सर्वरूपाय पुरुषाय नमो नमः॥ ३८<br><br>सदसद्व्यक्तिहीनाय महतः कारणाय ते।<br>नित्याय विश्वरूपाय जायमानाय ते नमः॥ ३९<br><br>जाताय बहुधा लोके प्रभूताय नमो नमः।<br>रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे॥ ४०आप सुखकर, विश्वरूप, विष्णु, ब्रह्माको नमस्कार है। आप अन्तक (संहारकर्ता)-को नमस्कार है; उमापतिको नमस्कार है। सुवर्णमय बाहुवाले तथा साक्षात् हिरण्यपतिको बार-बार नमस्कार है; शर्व, सर्वरूप तथा पुरुषको बार-बार नमस्कार है। सत्-असत्रूपसे रहित और महत्तत्त्वके उत्पादक आपको नमस्कार है; आप नित्य, विश्वरूप तथा उत्पन्न होनेवालेको नमस्कार है। संसारमें अनेक रूपोंमें अवतार लेनेवाले और प्रभूतको नमस्कार है; आप रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र नामक मन्त्ररूप तथा प्रचेताको नमस्कार है॥ ३७–४०॥

५०० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग


श्लोकअर्थ
कालाय कालरूपाय नमः कालाङ्गहारिणे।<br>मीढुष्टमाय देवाय शितिकण्ठाय ते नमः॥ ४१<br><br>महीयसे नमस्तुभ्यं हन्त्रे देवारिणां सदा।<br>ताराय च सुताराय तारणाय नमो नमः॥ ४२<br><br>हरिकेशाय देवाय शम्भवे परमात्मने।<br>देवानां शम्भवे तुभ्यं भूतानां शम्भवे नमः॥ ४३आप काल तथा कालरूपको नमस्कार है; आप कालविनाशक, मीढुष्टम तथा भगवान् शितिकण्ठको नमस्कार है। आप महान्‌को तथा सदा देवशत्रुओंके संहार-कर्ताको नमस्कार है; तार (प्रणवरूप), सुतार तथा उद्धारकर्ताको नमस्कार है। हरितवर्णके केशवाले, परमात्मस्वरूप, देवताओंके कल्याणकारक तथा [समस्त] प्राणियोंके कल्याणकारक आप भगवान् शम्भुको नमस्कार है॥ ४१-४३॥
शम्भवे हैमवत्याश्च मन्यवे रुद्ररूपिणे।<br>कपर्दिने नमस्तुभ्यं कालकण्ठाय ते नमः॥ ४४<br><br>हिरण्याय महेशाय श्रीकण्ठाय नमो नमः।<br>भस्मदिग्धशरीराय दण्डमुण्डीश्वराय च॥ ४५<br><br>नमो ह्रस्वाय दीर्घाय वामनाय नमो नमः।<br>नम उग्रत्रिशूलाय उग्राय च नमो नमः॥ ४६<br><br>भीमाय भीमरूपाय भीमकर्मरताय ते।<br>अग्रेवधाय वै भूत्वा नमो दूरेवधाय च॥ ४७आप पार्वतीके कल्याणकारक, यज्ञरूप, रुद्ररूप तथा कपर्दीको नमस्कार है; आप कालकण्ठको नमस्कार है। सुवर्णमय वर्णवाले महेशको तथा श्रीकण्ठको नमस्कार है। भस्मसे लिप्त शरीरवाले तथा दण्ड मुण्डीश्वरको नमस्कार है। ह्रस्व (लघु), दीर्घ तथा वामनको नमस्कार है। भयानक त्रिशूल धारण करनेवाले तथा उग्र स्वभाववालेको बार-बार नमस्कार है। आप भयंकर स्वरूपवाले तथा भयानक कर्ममें रत रहनेवाले भीमको नमस्कार है। सबसे आगे होकर [शत्रुओंका] वध करनेवाले और दूर स्थानसे भी वध करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है॥ ४४-४७॥
धन्विने शूलिने तुभ्यं गदिने हलिने नमः।<br>चक्रिणे वर्मिणे नित्यं दैत्यानां कर्मभेदिने॥ ४८<br><br>सद्याय सद्यरूपाय सद्योजाताय ते नमः।<br>वामाय वामरूपाय वामनेत्राय ते नमः॥ ४९<br><br>अघोररूपाय विकटाय विकटशरीराय ते नमः।<br>पुरुषरूपाय पुरुषैकतत्पुरुषाय वै नमः॥ ५०<br><br>पुरुषार्थप्रदानाय पतये परमेष्ठिने।<br>ईशानाय नमस्तुभ्यमीश्वराय नमो नमः॥ ५१<br><br>ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमः साक्षाच्छिवाय ते।आप धनुर्धारी, शूलधारी, गदाधारी, हलधारी, चक्रधारी, कवचधारी तथा [गजाननरूपसे] सदा दैत्योंके कर्मका नाश करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है। आप सद्यमन्त्ररूप, सद्यरूप, सद्योजात अवतार स्वरूपको नमस्कार है। वाम-मन्त्ररूप, सुन्दररूपवाले तथा सुन्दर नेत्रवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। अघोरमन्त्ररूप, विकट रूपवाले तथा विकट शरीरवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। पुरुषरूपवाले तथा पुरुषोंमें एकमात्र तत्पुरुष (उत्तम पुरुष) आपको नमस्कार है। पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले, सबके स्वामी, परमेष्ठी तथा ईशानमन्त्ररूप आप शिवको नमस्कार है। आप ईश्वरको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मरूपवाले तथा साक्षात् सगुण शिवरूपवाले आप ब्रह्मको नमस्कार है॥ ४८-५१ १/२॥
सर्वविष्णुर्नृसिंहस्य रूपमास्थाय विश्वकृत्॥ ५२विश्वकी सृष्टि करनेवाले तथा सर्वरूप प्रभु विष्णु नृसिंहका रूप धारण करके जगत्‌के कल्याणके

अध्याय ९५ ] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ५०१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हिरण्यकशिपुं हत्वा करजैर्निशितैः स्वयम्।<br>दैत्येन्द्रैर्बहुभिः सार्धं हितार्थं जगतां प्रभुः॥ ५३<br><br>सैंहीं समानयन् योनिं बाधते निखिलं जगत्।<br>यत्कृत्यमत्र देवेश तत्कुरुष्व भवानिह॥ ५४लिये अनेक प्रमुख दैत्योंसहित हिरण्यकशिपुको अपने तीक्ष्ण नखोंसे स्वयं मारकर सिंहरूपका सम्मान करते हुए सम्पूर्ण जगत्‌को सन्तस्त कर रहे हैं; हे देवेश! अब इस विषयमें जो उचित कार्य हो, उसे आप करें॥ ५२–५४॥
उग्रोऽसि सर्वदुष्टानां नियन्तासि शिवोऽसि नः।<br>कालकूटादिवपुषा त्राहि नः शरणागतान्॥ ५५<br><br>शुक्रं तु वृत्तं विश्वेश क्रीडा वै केवलं वयम्।<br>तवोन्मेषनिमेषाभ्यामस्माकं प्रलयोदयौ॥ ५६<br><br>उन्मीलये त्वयि ब्रह्मन् विनाशोऽस्ति न ते शिव।<br>सन्तप्ताः स्मो वयं देव हरिणामिततेजसा॥ ५७<br><br>सर्वलोकहितायैनं तत्त्वं संहर्तुमिच्छसि।आप उग्र हैं, सभी दुष्टोंको नियन्त्रणमें रखनेवाले हैं और हम लोगोंके लिये कल्याणकारक हैं। कालकूट आदि शरीरसे हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये। हे विश्वेश! आपका आचरण शुद्ध है और हम लोग आपके क्रीड़ामात्र हैं। आपके उन्मेष तथा निमेषसे हम लोगोंके प्रलय तथा उदय होते हैं। हे ब्रह्मन्! हे शिव! आपके उन्मीलन करनेपर भी आपका विनाश नहीं होता है। हे देव! अमित तेजवाले नृसिंहरूपधारी विष्णुके द्वारा हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं; अतः सभी लोकोंके हितके लिये आप इस [नृसिंहरूप]–को समाप्त करनेका विचार करें॥ ५५–५७१/२॥
सूत उवाच<br>विज्ञापितस्तथा देवः प्रहसन् प्राह तान् सुरान्॥ ५८<br><br>अभयं च ददौ तेषां हनिष्यामीति तं प्रभुः।<br>सोऽपि शक्रः सुरैः सार्धं प्रणिपत्य यथागतम्॥ ५९सूतजी बोले— इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर प्रभु महादेवने उन देवताओंको अभयदान दिया और मुसकराते हुए उनसे कहा—'मैं उनका संहार करूँगा।' इसके बाद शिवको प्रणाम करके इन्द्र सभी देवताओंके साथ जैसे आये थे, वैसे ही चले गये और भगवान् ब्रह्मा तथा अन्य श्रेष्ठ देवता भी चले गये॥ ५८-५९१/२॥
जगाम भगवान् ब्रह्मा तथान्ये च सुरोत्तमाः।<br>अथोत्थाय महादेवः शारभं रूपमास्थितः॥ ६०<br><br>ययौ प्रान्ते नृसिंहस्य गर्वितस्य मृगाशिनः।<br>अपहृत्य तदा प्राणान् शरभः सुरपूजितः॥ ६१<br><br>सिंहात्ततो नरो भूत्वा जगाम च यथाक्रमम्।<br>एवं स्तुतस्तदा देवैर्जगाम स यथाक्रमम्॥ ६२तदनन्तर [वहाँसे] उठकर शरभका रूप धारणकर महादेवजी असुरभक्षक गर्वयुक्त नृसिंहके पास पहुँचे। तब प्राणोंका हरण करके वे शरभरूपधारी शिव देवताओंद्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् नृसिंहरूपसे मानवरूप होकर वे विष्णु [वहाँसे] चले गये। इस प्रकार उस समय देवताओंसे स्तुत होकर शिवजी भी [अपने स्थानको] चले गये॥ ६०–६२॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि संस्तवं शार्वमुत्तमम्।<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रेण सह मोदते॥ ६३जो [व्यक्ति] शिवजीकी इस उत्तम स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रलोक प्राप्त करके [भगवान्] रुद्रके साथ आनन्दित रहता है॥ ६३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नृसिंहलीलावर्णनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नृसिंहलीलावर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९५॥

९६- भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति

५०२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

छानबेवाँ अध्याय

भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं देवो महादेवो विश्वसंहारकारकः।<br>शरभाख्यं महाघोरं विकृतं रूपमास्थितः ॥ १<br>किं किं धैर्यं कृतं तेन ब्रूहि सर्वमशेषतः।ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] विश्वका संहार करनेवाले भगवान् महादेवने अत्यन्त भयंकर तथा विकृत शरभनामक रूप कैसे धारण किया और उन्होंने कौन-सा साहसपूर्ण कृत्य किया; यह सब पूर्णरूपसे बताइये ॥ १ १/२ ॥
सूत उवाच<br>एवमभ्यर्थितो देवैर्मतिं चक्रे कृपालयः॥ २<br>यत्तेजस्तु नृसिंहाख्यं संहर्तुं परमेश्वरः।<br>तदर्थं स्मृतवान् रुद्रो वीरभद्रं महाबलम् ॥ ३सूतजी बोले— इस प्रकार देवताओंके प्रार्थना करनेपर कृपानिधान शिवने नृसिंहसंज्ञक तेजको नष्ट करनेका निश्चय किया और इसके लिये रुद्रने महाप्रलय करनेवाले अपने भैरवरूप महाबली वीरभद्रका स्मरण किया ॥ २-३ १/२ ॥
आत्मनो भैरवं रूपं महाप्रलयकारकम्।<br>आजगाम पुरा सद्यो गणानामग्रतो हसन् ॥ ४<br>साट्टहासैर्गणवरैरुत्पतद्भिरितस्ततः।<br>नृसिंहरूपैरत्युग्रैः कोटिभिः परिवारितः ॥ ५<br>तावद्भिरभितो वीरैर्नृत्यद्भिश्च मुदान्वितैः।<br>क्रीडद्भिश्च महाधीरैर्ब्रह्माद्यैः कन्दुकैरिव ॥ ६<br>अदृष्टपूर्वैर्न्यैश्च वेष्टितो वीरवन्दितः।<br>कल्पान्तज्वलनज्वालो विलसल्लोचनत्रयः ॥ ७<br>आत्तशस्त्रो जटाजूटे ज्वलद्बालेन्दुमण्डितः।<br>बालेन्दुद्वितयाकारतीक्ष्णदंष्ट्राङ्कुरद्वयः ॥ ८<br>आखण्डलधनुः खण्डसन्निभभ्रूलतायुतः।<br>महाप्रचण्डहुङ्कारबधिरीकृतदिङ्मुखः ॥ ९<br>नीलमेघाञ्जनाकारभीषणश्मश्रुरद्भुतः।<br>वादखण्डमखण्डाभ्यां भ्रामयंस्त्रिशिखं मुहुः ॥ १०<br>वीरभद्रोऽपि भगवान् वीरशक्तिविजृम्भितः।<br>स्वयं विज्ञापयामास किमत्र स्मृतिकारणम् ॥ ११<br>आज्ञापय जगत्स्वामिन् प्रसादः क्रियतां मयि।तब वे [वीरभद्र] गणोंके आगे होकर हँसते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे करोड़ों श्रेष्ठ गणोंसे घिरे हुए थे, जो अट्टहास कर रहे थे, इधर-उधर उछल रहे थे, नृसिंहके रूपवाले थे तथा अत्यन्त उग्र थे। वे नृत्य करते हुए तथा महाधीर ब्रह्मा आदिके साथ गेंदकी भाँति खेलते हुए प्रसन्न वीरोंसे घिरे हुए थे। वे वीरवन्द्य [वीरभद्र] कभी न देखे गये अन्य वीरोंसे भी आवृत थे। वे [वीरभद्र] प्रलयाग्निकी ज्वालाके समान थे, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थे, वे शस्त्र धारण किये हुए थे, उनके जटाजूटमें देदीप्यमान बालचन्द्रमा शोभा दे रहा था, वे बालचन्द्रके समान आकारवाले अति शुभ्र तथा तीक्ष्ण दो दाँतोंसे सुशोभित थे, वे इन्द्रधनुषके समान भौंहोंसे युक्त थे, वे अपने महाप्रचण्ड हुंकारसे दिशाओंको वधिर बना दे रहे थे, वे नील मेघ तथा अंजनके समान आकारवाले भयंकर श्मश्रु (दाढ़ी)-से युक्त थे, वे अद्भुत रूपवाले थे और अपनी अपराजित भुजाओंसे विवादका शमन करनेवाले त्रिशूलको बार-बार घुमा रहे थे। इस प्रकारकी वीरताकी शक्तिसे परिपूर्ण भगवान् वीरभद्रने स्वयं निवेदन किया—‘हे जगत्स्वामिन्! यहाँपर मुझको स्मरण करनेका क्या कारण है? आज्ञा प्रदान

अध्याय ९६ ] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०३


श्लोक (मूल संस्कृत)हिन्दी अनुवाद
कीजिये और मुझपर कृपा कीजिये॥ ४-११ १/२॥
श्रीभगवानुवाच<br>अकाले भयमुत्पन्नं देवानापि भैरव॥ १२<br>ज्वलितः स नृसिंहाग्निः शमयैनं दुरासदम्।<br>सान्त्वयन् बोधयादौ तं तेन किं नोपशाम्यति॥ १३<br>ततो मत्परमं भावं भैरवं सम्प्रदर्शय।<br>सूक्ष्मं सूक्ष्मेण संहृत्य स्थूलं स्थूलेन तेजसा॥ १४<br>वक्त्रमानय कृत्तिं च वीरभद्र ममाज्ञया।श्रीभगवान् बोले—हे भैरव! असमयमें देवताओंके समक्ष भय उत्पन्न हो गया है; वह नृसंहरूपी अग्नि प्रज्वलित हो रही है; इस अति भयंकर अग्निको शान्त करो। उसे सान्त्वना देते हुए पहले समझाओ, यदि उससे वह शान्त नहीं होती है, तब मेरे महाभयंकर भैरवरूपको दिखाओ। हे वीरभद्र! मेरी आज्ञासे सूक्ष्मरूपको सूक्ष्म तेजसे तथा स्थूलरूपको स्थूल तेजसे विनष्ट करके उसके मुख तथा उसकी त्वचाको [मेरे पास] ले आओ॥ १२-१४ १/२॥
इत्यादिष्टो गणाध्यक्षः प्रशान्तवपुरास्थितः॥ १५<br>जगाम रंहसा तत्र यत्रास्ते नरकेसरी।<br>ततस्तं बोधयामास वीरभद्रो हरो हरिम्॥ १६<br>उवाच वाक्यमीशानः पितापुत्रमिवौरसम्।इस प्रकार आज्ञा प्राप्त किये हुए गणेश्वर वीरभद्र शान्तस्वरूप धारण करके वेगपूर्वक वहाँ पहुँच गये, जहाँ नृसिंह विराजमान थे। तदनन्तर भगवान् वीरभद्रने नृसंहरूपधारी उन विष्णुको समझाया और जैसे पिता औरस पुत्रसे कहता है, उसी प्रकार ईशान [वीरभद्र] उनसे यह वचन कहने लगे॥ १५-१६ १/२॥
श्रीवीरभद्र उवाच<br>जगत्सुखाय भगवन्नवतीर्णोऽसि माधव॥ १७<br>स्थित्यर्थेन च युक्तोऽसि परेण परमेष्ठिना।<br>जन्तुचक्रं भगवता रक्षितं मत्स्यरूपिणा॥ १८<br>पुच्छेनैव समाबध्य भ्रमन्नेकार्णवे पुरा।<br>बिभर्षि कूर्मरूपेण वाराहेणोद्धृता मही॥ १९<br>अनेन हरिरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>वामनेन बलिर्बद्धस्त्वया विक्रमता पुनः॥ २०श्रीवीरभद्र बोले—हे भगवन्! हे माधव! आप तो जगत्के सुखके लिये अवतीर्ण हुए हैं; श्रेष्ठ ब्रह्माने [संसारकी] स्थितिके कार्यमें आपको लगाया है। पूर्वकालमें अपनी पूँछमें [नावको] बाँधकर विशाल सागरमें भ्रमण करते हुए मत्स्यरूपधारी आप भगवान् [विष्णु]-ने जीव-समुदायकी रक्षा की थी। आप कूर्मके रूपसे जगत्को धारण करते हैं और वाराहरूपके द्वारा आपने पृथ्वीका उद्धार किया है। आपने इस सिंहरूपसे हिरण्यकशिपुका वध किया है। आपने वामनरूप धारणकर तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको मापकर बलिको बाँध लिया था॥ १७-२०॥
त्वमेव सर्वभूतानां प्रभवः प्रभुरव्ययः।<br>यदा यदा हि लोकस्य दुःखं किञ्चित्प्रजायते॥ २१<br>तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम्।<br>नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायण॥ २२<br>त्वया धर्माश्च वेदाश्च शुभे मार्गे प्रतिष्ठिताः।<br>यदर्थमवतारोऽयं निहतः सोऽपि केशव॥ २३आप ही सभी प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, सबके स्वामी और अविनाशी हैं। जब-जब संसारपर कोई विपत्ति पड़ी है, तब-तब आपने अवतार लेकर उसे दुःखरहित किया है। हे हरे! हे शिवपरायण! आपसे बढ़कर अन्य कोई भी नहीं है। आपने [समस्त] धर्मों तथा वेदोंको उत्तम मार्गपर प्रतिष्ठित किया है। हे केशव! जिसके लिये आपने यह अवतार लिया है, वह [हिरण्यकशिपु भी] आपके द्वारा मारा जा चुका है।
५०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| अत्यन्तघोरं भगवन्नरसिंहवपुस्तव।<br>उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ॥ २४ | अतः हे भगवन्! हे विश्वात्मन्! हे नरसिंह! आप मेरी उपस्थितिमें अपने इस अत्यन्त भयानक रूपको समेट लीजिये॥ २१-२४॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः शान्तया गिरा।<br>ततोऽधिकं महाघोरं कोपं प्रज्वालयद्धरिः॥ २५ | **सूतजी बोले—**वीरभद्रके द्वारा शान्त वाणीमें इस प्रकार कहे जानेपर नृसिंहरूपधारी विष्णुने पहलेसे भी अधिक तथा महाभयानक कोपको प्रज्वलित किया॥ २५॥ | | श्रीनृसिंह उवाच<br>आगतोऽसि यतस्तत्र गच्छ त्वं मा हितं वद।<br>इदानीं संहरिष्यामि जगदेतच्चराचरम्॥ २६<br>संहर्तुर्न हि संहारः स्वतो वा परतोऽपि वा।<br>शासितं मम सर्वत्र शास्ता कोऽपि न विद्यते॥ २७<br>मत्प्रसादेन सकलं समर्यादं प्रवर्त्तते।<br>अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्त्तकनिवर्त्तकः॥ २८ | श्रीनृसिंह बोले—[हे वीरभद्र!] तुम जहाँसे आये हो, वहाँ चले जाओ; हितकी बात मत बोलो। मैं इस समय इस चराचर जगत्का संहार कर डालूँगा। संहारकर्ताका संहार अपनेसे अथवा दूसरेसे भी नहीं हो सकता है। सभी जगह मेरा ही शासन है; अन्य कोई भी शासन करनेवाला नहीं है। मेरी कृपासे सम्पूर्ण जगत् मर्यादायुक होकर क्रियाशील है; मैं ही सभी शक्तियोंका प्रवर्त्तक तथा निवर्त्तक हूँ॥ २६-२८॥ | | यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।<br>तत्तद्विद्धि गणाध्यक्ष मम तेजोविजृम्भितम्॥ २९<br>देवतापरमार्थज्ञा ममैव परमं विदुः।<br>मदंशाः शक्तिसम्पन्ना ब्रह्मांशक्रादयः सुराः॥ ३०<br>मन्नाभिपङ्कजाज्जातः पुरा ब्रह्मा चतुर्मुखः।<br>तल्ललाटसमुत्पन्नो भगवान् वृषभध्वजः॥ ३१ | हे गणाध्यक्ष! जो-जो विभूतिसम्पन्न, सत्त्वमय, श्रीयुक्त तथा ऊर्जासे परिपूर्ण है, उसे मेरे ही तेजसे परिवर्धित जानो। देवताओंके परम अर्थको जाननेवाले मेरे महान् सामर्थ्यको जानते हैं। शक्तिसम्पन्न ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता मेरे ही अंश हैं। पूर्वकालमें चतुर्मुख ब्रह्मा मेरे नाभिकमलसे उत्पन्न हुए थे और उनके ललाटसे भगवान् वृषभध्वज (शिव) उत्पन्न हुए थे॥ २९-३१॥ | | रजसाधिष्ठितः स्रष्टा रुद्रस्तामस उच्यते।<br>अहं नियन्ता सर्वस्य मत्परं नास्ति दैवतम्॥ ३२<br>विश्वाधिकः स्वतन्त्रश्च कर्ता हर्ताखिलेश्वरः।<br>इदं तु मत्परं तेजः कः पुनः श्रोतुमिच्छति॥ ३३<br>अतो मां शरणं प्राप्य गच्छ त्वं विगतज्वरः।<br>अवेहि परमं भावमिदं भूतमहेश्वरः॥ ३४ | ब्रह्मा रजोगुणसे अधिष्ठित हैं। रुद्र तमोगुणसे युक्त कहे जाते हैं। मैं सबका नियन्ता हूँ; मुझसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। मैं सबसे बढ़कर हूँ, स्वतन्त्र हूँ, सबका स्रष्टा हूँ, संहार करनेवाला हूँ तथा सबका स्वामी हूँ। मेरे इस [नृसिंह नामक] परम तेजके विषयमें कौन सुनना चाहता है? अतः मेरी शरण प्राप्त करके तुम संतापरहित होकर [यहाँसे] जाओ; भूतोंके महेश्वर तुम मेरे इस परम भावको समझो॥ ३२-३४॥ | | कालोऽस्म्यहं कालविनाशहेतु-<br>र्लोकान् समाहर्तुमहं प्रवृत्तः।<br>मृत्योर्मृत्युं विद्धि मां वीरभद्र<br>जीवन्त्येते मत्प्रसादेन देवाः॥ ३५ | मैं काल हूँ, मैं कालके भी विनाशका कारण हूँ। मैं लोकोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हूँ। हे वीरभद्र! तुम मुझको मृत्युकी भी मृत्यु जानो; ये देवता भी मेरी कृपासे जी रहे हैं॥ ३५॥ | | सूत उवाच<br>साहङ्कारमिदं श्रुत्वा हरेरमितविक्रमः।<br>विहस्योवाच सावज्ञं ततो विस्फुरिताधरः॥ ३६ | **सूतजी बोले—**विष्णुका यह अहंकारपूर्ण वचन सुनकर असीम पराक्रमवाले वीरभद्र स्फुरित ओठोंवाले |