श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३७- तिलधेनुदानविधिनिरूपण
| ७२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| तस्यास्तु दक्षिणे भागे स्थण्डिले विष्णुमर्चयेत्।<br>अर्चयित्वा विधानेन श्रीसूक्तेन सुरेश्वरीम्॥ ४<br><br>अर्चयेद्विष्णुगायत्र्या विष्णुं विश्वगुरुं हरिम्।<br>आराध्य विधिना देवीं पूर्ववद्धोममाचरेत्॥ ५<br><br>समिद्धुत्वा विधानेन आज्याहुतिमथाचरेत्।<br>पृथगष्टोत्तरशतं होमयेद्ब्राह्मणोत्तमैः॥ ६ | उनके दक्षिण भागमें स्थण्डिलके ऊपर श्रीविष्णुका पूजन करना चाहिये। श्रीसूक्तसे विधानपूर्वक सुरेश्वरीकी पूजा करके विष्णुगायत्रीसे विश्वगुरु भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। देवीकी विधिपूर्वक आराधना करके पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये। सर्वप्रथम विधिपूर्वक समिधासे हवन करके बादमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको घृतकी पृथक् एक सौ आठ आहुति प्रदान करनी चाहिये॥ ४–६॥ | | आहूय यजमानं तु तस्याः पूर्वदिशि स्थले।<br>तस्मै तां दर्शयेद्देवीं दण्डवत्प्रणमेत्क्षितौ॥ ७<br><br>प्रणम्य विष्णुं तत्रस्थं शिवं पूर्ववदर्चयेत्।<br>तस्या विंशतिभागं तु दक्षिणा परिकीर्तिता॥ ८<br><br>तदर्द्धांशं तु दातव्यमितरेषां यथार्हतः।<br>ततस्तु होमयेच्छम्भुं भक्तो योगी विशेषतः॥ ९ | तत्पश्चात् यजमानको बुलाकर उन देवीके पूर्वदिशाभागमें उसे बिठाकर उन देवीका दर्शन कराना चाहिये। वह यजमान भी पृथ्वीपर देवीको दण्डवत् प्रणाम करे। इसके बाद वहाँ प्रतिष्ठित विष्णुको प्रणाम करके पूर्वकी भाँति शिवकी पूजा करनी चाहिये। आचार्यके लिये उस मूर्तिके बीसवें भागके तुल्य दक्षिणा बतायी गयी है। उसका आधा अर्थात् बीसवें भागका आधा यथायोग्य अन्य [शिवभक्तों]-को दान करना चाहिये। तदनन्तर भक्त-योगी आचार्यको विशेष-रूपसे भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये होम कराना चाहिये॥ ७–९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लक्ष्मीदानविधिनिरूपणं नाम षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥ ३६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लक्ष्मीदानविधिनिरूपण' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
तिलधेनुदानविधिनिरूपण
| सनत्कुमार उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि तिलधेनुविधिक्रमम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कुर्याच्छिवपूजां तु पश्चिमे॥ १ | सनत्कुमार बोले— अब मैं तिलधेनुदानके विधिक्रमका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बताये गये नियमसे निर्मित मण्डपमें पश्चिम भागमें शिवपूजा करनी चाहिये। | | तस्याग्रे मध्यतो भूमौ पद्ममालिख्य शोभनम्।<br>वस्त्रैराच्छादितं पद्मं तन्मध्ये विन्यसेच्छुभम्॥ २ | उसके आगे मध्यमें भूमिपर सुन्दर कमल बनाकर उसे वस्त्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये। उसके मध्यमें उत्तम तिलपुष्प स्थापित करना चाहिये। | | तिलपुष्पं तु कृत्वाथ हेमपद्मं विनिक्षिपेत्।<br>त्रिंशन्निष्केण कर्तव्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३ | हेमपद्म (सुवर्णकमल) बनाकर उसे मध्यमें रख देना चाहिये। यह हेमपद्म तीस निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे अर्थात् पन्द्रह निष्क अथवा उसके भी आधे अर्थात् |
अध्याय ३७] तिलधेनुदानविधिनिरूपण ७२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पञ्चनिष्केण कर्तव्यं तदर्द्धार्धेन वा पुनः।<br>तमाराध्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ४<br><br>पद्मस्योत्तरदिग्भागे विप्रानेकादश न्यसेत्।<br>तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ५<br><br>आच्छादनोत्तरासङ्गं विप्रेभ्यो दापयेत्क्रमात्।<br>उष्णीषं च प्रदातव्यं कुण्डले च विभूषिते॥ ६<br><br>हेमाङ्गुलीयकं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो विधानतः।<br>एकं दश च वस्त्राणि तेषामग्रे प्रकीर्य च॥ ७<br><br>तेषु वस्त्रेषु निःक्षिप्य तिलाद्यानि पृथक्पृथक्।<br>कांस्यपात्रं शतपलं विभिद्यैकादशांशकम्॥ ८<br><br>इक्षुदण्डं च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः।<br>गोशृङ्गे तु हिरण्येन द्विनिष्केण तु कारयेत्॥ ९<br><br>रजतेन तु कर्तव्याः खुरा निष्कद्वयेन तु।<br>एवं पृथक्पृथक् दत्त्वा तत्तिलेषु विनिक्षिपेत्॥ १०<br><br>रुद्रैकादशमन्त्रैस्तु रुद्रेभ्यो दापयेत्तदा।<br>पद्मस्य पूर्वदिग्भागे विप्रान् द्वादश पूजितान्॥ ११<br><br>एतेनैव तु मार्गेण तेषु श्रद्धासमन्वितः।<br>द्वादशादित्यमन्त्रैश्च दापयेदेवमेव च॥ १२<br><br>पूर्ववद्दक्षिणे भागे विप्रान् षोडश संस्थितान्।<br>मूर्तिं विघ्नेशमन्त्रैश्च दापयेत्पूर्ववत्पुनः॥ १३<br><br>यजमानेन कर्तव्यं सर्वमेतद्यथाक्रमम्।<br>केवलं रुद्रदानं वा आदित्येभ्योऽथ वा पुनः॥ १४<br><br>मूर्त्यादीनां च वा देयं यथाविभवविस्तरम्।<br>पद्मं विन्यस्य राजासौ शेषं वा कारयेन्नृपः॥ १५<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या पञ्चनिष्केण भूषणम्॥ १६ | साढ़े सात निष्क सुवर्णसे बनाना चाहिये, अथवा पाँच निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे भागसे अथवा उसके भी आधे भागसे उस कमलका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् उस हेमपद्मके विग्रहका ध्यान करके गन्ध, पुष्प आदिसे क्रमपूर्वक उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥१-४॥<br><br>उस पद्मके उत्तर दिग्भागमें ग्यारह ब्राह्मणोंको बैठाना चाहिये और क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे विधिपूर्वक उनका पूजन करके उन विप्रोंको क्रमसे वस्त्र तथा उत्तरीय प्रदान करना चाहिये; उन्हें पगड़ी भी देनी चाहिये। तत्पश्चात् दो रत्नमय कुण्डल और सुवर्णकी अँगूठी ब्राह्मणोंको विधानपूर्वक प्रदान करके उनके आगे ग्यारह वस्त्र फैलाकर उन वस्त्रोंपर अलग-अलग तिल आदि, सौ पलके बनाये हुए ग्यारह कांस्यपात्र और इक्षुदण्ड रखकर ब्राह्मणोंको प्रदान करना चाहिये॥५-८ १/२॥<br><br>दो निष्क सुवर्णसे गायकी दो सींगें बनाये तथा दो निष्क परिमाणकी चाँदीसे उसके खुर बनाये और सबको पृथक्-पृथक् उन तिलोंपर रख दे। इसके बाद रुद्रके ग्यारह मन्त्रोंसे ग्यारह रुद्रोंको तिलधेनु अर्पण कर दे। इसी प्रकार उस पद्मकी पूर्व दिशामें बारह विप्रोंकी पूजा करके श्रद्धायुक्त होकर द्वादश आदित्यके मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु अर्पण करे। दक्षिण दिशामें स्थित सोलह विप्रोंकी पूजा करके पूर्वकी भाँति विघ्नेश-मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु प्रदान करे। यह समस्त कार्य यजमानके द्वारा यथाक्रम सम्पन्न किया जाना चाहिये। रुद्रोंको अथवा आदित्योंको दानकर अपने सामर्थ्यके अनुसार मूर्ति आदिकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार राजाको चाहिये कि पद्म-स्थापन करके शेष कार्य आचार्यद्वारा करवाये। अन्तमें पाँच निष्क सुवर्णका भूषण अर्पण करके आचार्यको दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये॥ ९-१६॥ |
॥ इति श्रीमल्लिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलधेनुदानविधिनिरूपणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीमल्लिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तिलधेनुदानविधिनिरूपण' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥
३८- महादानोंमें परिगणित गोसहस्रदानकी विधि
| ७२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
अड़तीसवाँ अध्याय
महादानोंमें परिगणित गोसहस्रदानकी विधि
| सनत्कुमार उवाच | |
|---|---|
| गोसहस्रप्रदानं च वदामि शृणु सुव्रत।<br>गवां सहस्रमादाय सवत्सं सगुणं शुभम्॥ १<br><br>तास्त्वभ्यर्च्य यथाशास्त्रमष्टौ सम्यक्प्रयत्नतः।<br>तासां शृङ्गाणि हेम्नाथ प्रतिनिष्केण बन्धयेत्॥ २<br><br>खुरांश्च रजतेनैव बन्धयेत्कण्ठदेशतः।<br>प्रतिनिष्केण कर्तव्यं कर्णे वज्रं च शोभनम्॥ ३ | **सनत्कुमार बोले—**हे सुव्रत! अब मैं गोसहस्रदानकी विधि बताता हूँ; इसे सुनिये। उत्तम लक्षणोंसे युक्त, मंगलमयी तथा बछड़ोंसहित एक हजार गायें लाकर उनकी पूजा करके उनमेंसे आठ गायोंकी शास्त्रविधिसे प्रयत्नपूर्वक सम्यक् पूजा करे। तत्पश्चात् उनकी सींगोंमें एक निष्क सुवर्ण बाँध दे और खुरोंमें भी एक-एक निष्क सुवर्ण बाँध दे। उनके कण्ठमें एक निष्क सुवर्णका कण्ठाभूषण पहनाये तथा कानोंको सुन्दर हीरेसे अलंकृत करे॥ १—३॥ |
| शिवाय दद्याद्विप्रेभ्यो दक्षिणां च पृथक्पृथक्।<br>दशनिष्कं तदर्धं वा तस्यार्धार्धमथापि वा॥ ४<br><br>यथाविभवविस्तारं निष्कमात्रमथापि वा।<br>वस्त्रयुग्मं च दातव्यं पृथग्विप्रेषु शोभनम्॥ ५ | तत्पश्चात् इन्हें शिवको अर्पण कर दे। ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् दस निष्क अथवा उसका आधा अथवा उसके आधेका आधा अथवा एक निष्क सुवर्ण अपने सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये और प्रत्येक ब्राह्मणको एक जोड़ा सुन्दर वस्त्र प्रदान करना चाहिये। दत्तचित्त होकर आराधना करके उन्हें उत्तम गौएँ प्रदान करनी चाहिये॥ ४-५ १/२॥ |
| गावश्चाराध्य यत्नेन दातव्याः सुमनोरमाः।<br>एवं दत्त्वा विधानेन शिवमभ्यर्च्य शङ्करम्॥ ६<br><br>जपेदग्रे यथान्यायं गवां स्तवमनुत्तमम्।<br>गावो ममाग्रतो नित्यं गावो नः पृष्ठतस्तथा॥ ७<br><br>हृदये मे सदा गावो गवां मध्ये वसाम्यहम्।<br>इति कृत्वा द्विजाग्र्येभ्यो दत्त्वा गत्वा प्रदक्षिणम्॥ ८<br><br>तद्रोमवर्षसंख्यानि स्वर्गलोके महीयते॥ ९ | इस प्रकार विधानपूर्वक दान करके कल्याणकारी भगवान् शिवका अर्चनकर गौओंके आगे इस उत्तम स्तवनका सम्यक् प्रकारसे पाठ करना चाहिये—'गावो ममाग्रतो नित्यं गावो नः पृष्ठतस्तथा। हृदये मे सदा गावो गवां मध्ये वसाम्यहम्।।' अर्थात् गायें नित्य मेरे आगे रहें, गायें हमारे पीछेकी ओर रहें, गायें सदा मेरे हृदयमें रहें और मैं गायोंके मध्य निवास करूँ—ऐसा पाठ करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गायें प्रदानकर उनकी प्रदक्षिणा करे। इस प्रकारसे दान करनेवाला मनुष्य उन गायोंके शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ६—९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गोसहस्रप्रदानं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गोसहस्रप्रदान' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥
३९- हिरण्याश्वदानविधि
अध्याय ३९] हिरण्याश्वदानविधि ७२५
उनतालीसवाँ अध्याय
हिरण्याश्वदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br><br>हिरण्याश्वप्रदानं च वदामि विजयावहम्।<br>अश्वमेधात्पुनः श्रेष्ठं वदामि शृणु सुव्रत॥ १ | सनत्कुमार बोले— अब मैं विजयकी प्राप्ति करानेवाले हिरण्याश्वदानकी विधि बताता हूँ; हे सुव्रत! अश्वमेधयज्ञसे भी श्रेष्ठ इस दानका वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनें॥ १॥ |
| अष्टोत्तरसहस्रेण अष्टोत्तरशतेन वा।<br>कृत्वाश्वं लक्षणैर्युक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम्॥ २<br><br>पञ्चकल्याणसम्पन्नं दिव्याकारं तु कारयेत्।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वाङ्गैश्च समन्वितम्॥ ३<br><br>सर्वायुधसमोपेतमिन्द्रवाहनमुत्तमम् ।<br>तन्मध्यदेशे संस्थाप्य तुरङ्गं स्वगुणान्वितम्॥ ४<br><br>उच्चैःश्रवसकं मत्वा भक्त्या चैव समर्चयेत्।<br>तस्य पूर्वदिशाभागे ब्राह्मणं वेदपारगम्॥ ५ | एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ निष्क सुवर्णसे एक अश्वका निर्माण करके उसे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त अलंकारोंसे सुशोभित, पंचकल्याणसम्पन्न (श्वेतवर्णके चारों पाद तथा श्वेतवर्णके मुखवाला) और दिव्य आकृतिवाला बनाना चाहिये। साथ ही सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त, समस्त अंगोंवाला तथा सभी प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित एक उत्तम इन्द्ररथ बनाकर उसके अग्रभागके मध्यस्थानमें सुन्दर गुणोंवाले उस अश्वको स्थापित करके उसे 'उच्चैःश्रवा' अश्व मानकर भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये॥ २-४ १/२॥ |
| सुरेन्द्रबुद्ध्या सम्पूज्य पञ्चनिष्कं प्रदापयेत्।<br>स चाश्वः शिवभक्ताय दातव्यो विधिनैव तु॥ ६<br><br>सुवर्णाश्वं प्रदत्त्वा तु आचार्यमपि पूजयेत्।<br>यथाविभवविस्तारं पञ्चनिष्कमथापि वा॥ ७<br><br>दीनान्धकृपणानाथबालवृद्धकृशातुरान् ।<br>तोषयेदन्नदानेन ब्राह्मणांश्च विशेषतः॥ ८ | उसके पूर्व दिशा भागमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको आसीन करके उन्हें इन्द्र मानकर उनकी पूजाकर पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे और वह सुवर्ण-अश्व विधिपूर्वक शिवभक्त विप्रको दे दे। अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्ण-अश्व प्रदान करके आचार्यकी पूजा करे अथवा पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे। तत्पश्चात् दीनों, अन्धों, असहायों, बालकों, वृद्धों, दुर्बलों तथा रोगियों और विशेषकर ब्राह्मणोंको अन्नदानके द्वारा सन्तुष्ट करे॥ ५-८॥ |
| एतद्यः कुरुते भक्त्या दानमश्वस्य मानवः।<br>ऐन्द्रान् भोगांश्चिरं भुक्त्वा रुचिरैश्वर्यवान् भवेत्॥ ९ | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस सुवर्ण-अश्वका दान करता है, वह दीर्घकालतक इन्द्रतुल्य सुखोंका भोग करके महान् ऐश्वर्यशाली हो जाता है॥ ९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्याश्वदानं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हिरण्याश्वदान' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
४०- कन्यादानविधि
| ७२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
चालीसवाँ अध्याय
कन्यादानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| कन्यादानं प्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम्।<br>कन्यां लक्षणसम्पन्नां सर्वदोषविवर्जिताम्॥ १<br><br>मातापित्रोस्तु संवादं कृत्वा दत्त्वा धनं महत्।<br>आत्मीकृत्याथ संस्नाप्य वस्त्रं दत्त्वा शुभं नवम्॥ २<br><br>भूषणैर्भूषयित्वाथ गन्धमाल्यैरथार्चयेत्।<br>निमित्तानि समीक्ष्याथ गोत्रनक्षत्रकादिकान्॥ ३ | अब मैं सभी दानोंमें अतिश्रेष्ठ कन्यादानका वर्णन करूँगा। किसी कन्याके माता-पितासे बात-चीत करके उन्हें अत्यधिक धन देकर समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सभी दोषोंसे रहित उस कन्याको अपनी पुत्री बना ले। इसके बाद उसे स्नान कराकर सुन्दर तथा नवीन वस्त्र प्रदान करके आभूषणोंसे अलंकृतकर गन्ध, पुष्प आदिसे उसकी पूजा करे॥ १-२ १/२॥ |
| उभयोश्चित्तमालोक्य उभौ सम्पूज्य यत्नतः।<br>दातव्या श्रोत्रियायैव ब्राह्मणाय तपस्विने॥ ४<br><br>साक्षादधीतवेदाय विधिना ब्रह्मचारिणे।<br>दासदासीधनाढ्यं च भूषणानि विशेषतः॥ ५<br><br>क्षेत्राणि च धनं धान्यं वासांसि च प्रदापयेत्।<br>यावन्ति देहे रोमाणि कन्यायाः सन्ततौ पुनः॥ ६<br><br>तावद्वर्षसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ७ | तत्पश्चात् शकुन, गोत्र, नक्षत्र आदिका सम्यक् विचार करके कन्या तथा वरके अन्तःकरणकी अनुकूलता देखकर उन दोनोंकी प्रयत्नपूर्वक विधिवत् पूजाकर उस श्रोत्रिय, तपस्वी, वेदपारंगत तथा ब्रह्मचारी ब्राह्मणको विधानपूर्वक वह कन्या अर्पित कर दे। साथ ही दास, दासी, आभूषण, भूमि, धन, धान्य तथा वस्त्र भी प्रदान करे। इस दानको करनेवाला मनुष्य उस कन्याके तथा उसकी संतानोंके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३-७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कन्यादानविधिर्नाम चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कन्यादानविधि' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
इकतालीसवाँ अध्याय
हिरण्यवृषमहादानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| हिरण्यवृषदानं च कथयामि समासतः।<br>वृषरूपं हिरण्येन सहस्रेणाथ कारयेत्॥ १<br><br>तदर्धार्धेन वा धीमांस्तदर्धार्धेन वा पुनः।<br>अष्टोत्तरशतेनापि वृषभं धर्मरूपिणम्॥ २ | अब मैं हिरण्यवृषके दानका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ। एक हजार सुवर्णमुद्रासे वृषभकी एक प्रतिमा बनानी चाहिये अथवा बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उसके आधेके आधे भागसे अथवा उसके भी आधेके आधे भागसे अथवा एक सौ आठ सुवर्णमुद्रासे धर्मरूपी वृषभका निर्माण करे॥ १-२॥ |
| ललाटे कारयेत्पुण्ड्रमर्धचन्द्रकलाकृतिम्।<br>स्फटिकेन तु कर्त्तव्यं खुरं तु रजतेन वै॥ ३<br><br>ग्रीवां तु पद्मरागेण ककुद्गोमेदकेन च।<br>ग्रीवायां घण्टवलयं रत्नचित्रं तु कारयेत्॥ ४ | उसके ललाटपर स्फटिकमणिका अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र सुशोभित करे। उसका खुर चाँदीसे, ग्रीवा पद्मरागमणिसे और ककुद् गोमेदसे बनाये। तदनन्तर |
४२- सुवर्णगजदानविधि
अध्याय ४१ ] सुवर्णगजदानविधि [ ७२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वृषाङ्कं कारयेत्तत्र किङ्किणीवलयावृतम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले॥ ५<br><br>वृषेन्द्रं स्थापयेत्तत्र पश्चिमामुखमग्रतः।<br>ईश्वरं पूजयेद्भक्त्या वृषारूढं वृषध्वजम्॥ ६ | उसकी ग्रीवामें रत्नजटित घण्टियोंकी माला पहनाये। इसके बाद छोटी-छोटी घण्टियोंकी मालासे आवृत करके शिवकी एक मूर्ति बनाये। तत्पश्चात् पूर्वमें कही गयी रीतिसे स्थान तथा कालमें वेदिकाके ऊपर मण्डलमें उस वृषेन्द्रको पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करे॥ ३-५ १/२॥ |
| वृषेन्द्रं पूज्य गायत्र्या नमस्कृत्य समाहितः।<br>तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि।<br>तन्नो वृषः प्रचोदयात्॥ ७<br><br>मन्त्रेणानेन सम्पूज्य वृषं धर्मविवृद्धये।<br>होमयेच्च घृचान्नाद्यैर्यथाविभवविस्तरम्॥ ८<br><br>वृषभः पूज्य दातव्यो ब्राह्मणेभ्यः शिवाय वा।<br>दक्षिणा चैव दातव्या यथावित्तानुसारतः॥ ९<br><br>एतद्यः कुरुते भक्त्या वृषदानमनुत्तमम्।<br>शिवस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते॥ १० | तदनन्तर उस वृषभपर आरूढ़ उन वृषध्वज शिवजीकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः नमस्कार करके समाहितचित्त होकर वृषगायत्रीमन्त्रसे वृषेन्द्रकी पूजा करे। 'तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि। तन्नो वृषः प्रचोदयात्'—इस मन्त्रसे वृषभकी विधिपूर्वक पूजा करके धर्मकी अभिवृद्धिके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार घृत-अन्न आदिसे हवन करे। इस प्रकार सम्यक् पूजन करके उस वृषभको शिवजीको अथवा ब्राह्मणोंको अर्पित कर दे। अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अत्युत्तम वृषदानको करता है, वह शिवका अनुचर होकर उन्हींके साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ६-१०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सुवर्णवृषदानं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सुवर्णवृषदान' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
सुवर्णगजदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>गजदानं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः।<br>द्विजाय वा शिवायाथ दातव्यः पूज्य पूर्ववत्॥ १ | सनत्कुमार बोले—अब मैं क्रमके अनुसार सुवर्णगजदानका यथावत् वर्णन करूँगा। पूर्वकी भाँति उसका विधिवत् पूजन करके उसे शिवजीको अथवा ब्राह्मणको अर्पित कर देना चाहिये॥ १॥ |
| गजं सुलक्षणोपेतं हैमं वा रजतं तु वा।<br>सहस्रनिष्कमाश्रेण तदर्धेनापि कारयेत्॥ २<br><br>तदर्धार्धेन वा कुर्यात्सर्वलक्षणभूषितम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले च देवाय विनिवेदयेत्॥ ३ | शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुवर्ण अथवा चाँदीका गज एक हजार निष्क परिमाणसे अथवा उसके आधे अर्थात् पाँच सौ निष्कसे बनवाना चाहिये; अथवा उसके आधेके भी आधे परिमाणसे सभी लक्षणोंसे युक्त गजका निर्माण कराना चाहिये और पूर्वोक्त देश तथा कालमें उसे महादेवको अर्पित करना चाहिये। |
| अष्टम्यां वा प्रदातव्यं शिवाय परमेष्ठिने।<br>ब्राह्मणाय दरिद्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये॥ ४ | [पूर्वोक्त देशकालके अभावमें] उसे परमेष्ठी शिवको अष्टमी तिथिमें अर्पण |
४३- लोकपालाष्टकमहादानविधि
| ७२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| शिवमुद्दिश्य दातव्यं शिवं सम्पूज्य पूर्ववत्।<br>एतद्यः कुरुते दानं शिवभक्तिसमाहितम्॥ ५<br><br>स्थित्वा स्वर्गे चिरं कालं राजा गजपतिर्भवेत्॥ ६ | करना चाहिये अथवा शिवको उद्देश्य करके किसी धनहीन श्रोत्रिय अग्निहोत्री ब्राह्मणको इसे प्रदान करना चाहिये; पूर्वकी भाँति भगवान् शिवका सम्यक् पूजन करके इसे प्रदान करना चाहिये। जो मनुष्य शिवभक्तिसे युक्त होकर इस गजदानको करता है, वह स्वर्गमें दीर्घकालतक निवास करके [अगले जन्ममें] गजपति (सार्वभौम) राजा होता है॥ २-६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गजदानविधानवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गजदानविधानवर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
लोकपालाष्टकमहादानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| लोकपालाष्टकं दिव्यं साक्षात्परमदुर्लभम्।<br>सर्वसम्पत्करं गुह्यं परचक्रविनाशनम्॥ १<br><br>स्वदेशरक्षणं दिव्यं गजवाजिविवर्धनम्।<br>पुत्रवृद्धिकरं पुण्यं गोब्राह्मणहितावहम॥ २ | अब मैं लोकपालाष्टकदानका वर्णन करता हूँ; जो दिव्य, परम दुर्लभ, समस्त सम्पदाओंको प्रदान करनेवाला, गोपनीय, शत्रुके राज्यका विनाश करनेवाला, अपने देशकी रक्षा करनेवाला, प्रशस्त, हाथी-घोड़े आदिकी वृद्धि करनेवाला, पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाला, पुण्यदायक तथा गो-ब्राह्मणका कल्याण करनेवाला है॥ १-२॥ |
| पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले।<br>मध्ये शिवं समभ्यर्च्य यथान्यायं यथाक्रमम्॥ ३<br><br>दिग्वि दिक्षु प्रकर्तव्यं स्थण्डिलं वालुकामयम्।<br>अष्टौ विप्रान् समभ्यर्च्य वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ४<br><br>जितेन्द्रियान् कुलोद्भूतान् सर्वलक्षणसंयुतान्।<br>शिवाभिमुखमासीनानाहतेष्वम्बरेषु च॥ ५<br><br>वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैर्लोकपालकमन्त्रकैः ।<br>गन्धपुष्पैः सुधूपैश्च ब्राह्मणानर्चयेत्क्रमात्॥ ६ | पूर्वोक्त देशकालमें वेदीके ऊपर मण्डलका निर्माण करके उसके मध्यमें शिवको स्थापित करके उनकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनेके अनन्तर आठों दिशाओंमें बालुकामय स्थण्डिल बनाना चाहिये। तत्पश्चात् उन आठों वेदियोंपर नवीन वस्त्रके आसनोंपर वेदवेदांगमें पारंगत, जितेन्द्रिय, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न आठ विप्रोंको शिवाभिमुख आसीन करके उनका पूजन करे। दिव्य वस्त्रों तथा आभूषणोंसे अलंकृत करके गन्ध, पुष्प एवं उत्तम धूप—इन उपचारोंसे लोकपाल-मन्त्रोंके द्वारा उन ब्राह्मणोंकी क्रमसे पूजा करनी चाहिये॥ ३—६॥ |
| पूर्वतो होमयेदग्नौ लोकपालकमन्त्रकैः।<br>समिद्धृताभ्यां होतव्यमग्निकार्यं क्रमेण वा॥ ७<br><br>एवं हुत्वा विधानेन आचार्यः शिववत्सलः।<br>यजमानं समाहूय सर्वाभरणभूषितान्॥ ८ | तदनन्तर पूर्वकी भाँति अग्निमें होम करना चाहिये; लोकपालमन्त्रोंके द्वारा घृत तथा समिधासे क्रमपूर्वक अग्निकार्य (हवन) करना चाहिये। इस प्रकार विधानपूर्वक हवन करके शिवभक्त आचार्यको चाहिये कि यजमानको बुलाकर उसके द्वारा सभी आभरणोंसे भूषित विप्रोंकी |
४४- त्रिमूर्तिदानविधि
| अध्याय ४४ ] | त्रिमूर्तिदानविधि | ७२१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेन तान् पूजयित्वा द्विजेभ्यो दापयेद्धनम्।<br>पृथक्पृथक् तन्मन्त्रैश्च दशनिष्कं च भूषणम्॥ ९<br><br>दशनिष्केण कर्तव्यमासनं केवलं पृथक्।<br>स्नपनं तत्र कर्तव्यं शिवस्य विधिपूर्वकम्॥ १०<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या यथाविभवविस्तरम्।<br>एवं यः कुरुते दानं लोकेशानां तु भक्तितः।<br>लोकेशानां चिरं स्थित्वा सार्वभौमो भवेद्बुधः॥ ११ | पूजा करवाकर उन लोकपालमन्त्रोंके द्वारा उन्हें पृथक्-पृथक् द्रव्य तथा दस निष्क सुवर्णका आभूषण दिलाये। साथ ही दस निष्क परिमाणका आसन भी प्रदान करे। वहाँ विधिपूर्वक शिवजीको स्नान कराये। तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार आचार्यको दक्षिणा प्रदान करे। जो मनुष्य इस विधिसे भक्ति-पूर्वक लोकपालोंका दान करता है, वह दीर्घकालतक लोकपालोंके समीप निवास करके बुद्धिमान् तथा चक्रवर्ती राजा होता है॥ ७–११॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लोकपालाष्टकदानविधानवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लोकपालाष्टकदानविधानवर्णन' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
त्रिमूर्तिदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले च मण्डपे च विधानतः॥ १<br><br>प्रणयात्कुण्डमध्ये च स्थण्डिले शिवसन्निधौ।<br>पूर्वं विष्णुं समासाद्य पद्मयोनिमतः परम्॥ २<br><br>मन्त्राभ्यां विधिनोक्ताभ्यां प्रणवादिसमन्त्रकम्।<br>नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।<br>तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ ३<br><br>ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे।<br>शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट् वषट् तथा॥ ४<br><br>पूजयित्वा विधानेन पश्चाद्धोमं समाचरेत्।<br>सर्वद्रव्यं हि होतव्यं द्वाभ्यां कुण्डविधानतः॥ ५<br><br>ऋत्विजौ द्वौ प्रकर्तव्यौ गुरुणा वेदपारगौ।<br>तानुद्दिश्य यथान्यायं विप्रेभ्यो दापयेद्धनम्॥ ६<br><br>शतमष्टोत्तरं तेभ्यः पृथक्पृथगनुत्तमम्।<br>वस्त्राभरणसंयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम्॥ ७ | सनत्कुमार बोले—अब मैं समस्त दानोंमें अत्युत्तम अन्य [त्रिमूर्ति] दानका वर्णन करूँगा। पूर्वोक्त काल और स्थानमें भलीभाँति मण्डप तथा वेदिका निर्माण करे। इसके बाद भक्तिपूर्वक शिवकुण्डके समीप स्थण्डिलपर शिवजीको स्थापित करके उनके पार्श्वभागमें पहले विष्णुको, बादमें पद्मयोनि ब्रह्माको स्थापित करके सप्रणव शिवमन्त्रसहित विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे। शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट् वषट् तथा॥ १–४॥<br><br>इस प्रकार विधानपूर्वक पूजन करके बादमें होम करना चाहिये। ब्रह्मा तथा विष्णु—इन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् कुण्डकी व्यवस्था करके सम्पूर्ण होम-द्रव्यका हवन करना चाहिये। आचार्यको चाहिये कि वेदके पारगामी दो ऋत्विजोंको नियुक्त करे। उन ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवको उद्देश्य करके ब्राह्मणोंको समुचित दक्षिणा-द्रव्य दिलाना चाहिये। वस्त्राभूषण और सभी अलंकारोंके साथ एक सौ आठ उत्तम स्वर्ण-मुद्राएँ पृथक्-पृथक् उन विप्रोंको प्रदान करनी |
४५- जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान
| ७३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| गुरुरेको हि वै श्रीमान् ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः।<br>तेषां पृथक्पृथग्देयं भोजयेद्ब्राह्मणानपि॥ ८<br><br>शिवार्चना च कर्तव्या स्नपनादि यथाक्रमम्॥ ९ | चाहिये। श्रीमान् गुरु (आचार्य) एक हैं, फिर भी उन्हें साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव मानकर पृथक्-पृथक् तीनों मूर्तियोंका दान करना चाहिये और अन्य ब्राह्मणों एवं दीन-दुःखियोंको भोजन कराना चाहिये। इसके अनन्तर अभिषेक आदि शिवार्चन यथाक्रम करना चाहिये॥ ५-९॥ |
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॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे विष्णुदानविधानवर्णनं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'विष्णुदानविधानवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान *
| ऋषय ऊचुः<br>एवं षोडश दानानि कथितानि शुभानि च।<br>जीवच्छ्राद्धक्रमोऽस्माकं वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] इस प्रकार आपने कल्याणकारी सोलह दानोंके विषयमें बता दिया, अब आप हमें जीवच्छ्राद्धकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>जीवच्छ्राद्धविधिं वक्ष्ये समासात्सर्वसम्मतम्।<br>मनवे देवदेवेन कथितं ब्रह्मणा पुरा॥ २<br>वसिष्ठाय च शिष्टाय भृगवे भार्गवाय च।<br>शृण्वन्तु सर्वभावेन सर्वसिद्धिकरं परम्॥ ३<br>श्राद्धमार्गक्रमं साक्षाच्छ्राद्धार्हाणामपि क्रमम्।<br>विशेषमपि वक्ष्यामि जीवच्छ्राद्धस्य सुव्रताः॥ ४ | **सूतजी बोले—**मैं सर्वसम्मत जीवच्छ्राद्ध-विधिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। इसे पूर्वकालमें देवदेव ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु, पूज्य वसिष्ठ, भृगु तथा भार्गवको बताया था। आपलोग पूर्ण मनोयोगसे समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उस श्राद्धके विषयमें सुनें। हे सुव्रतो! मैं अतिश्रेष्ठ श्राद्धमार्गकी विधि, साक्षात् श्राद्धके योग्य पुरुषोंका क्रम और जीवच्छ्राद्धकी विशेष विधिका भी वर्णन कर रहा हूँ॥ २–४॥ |
| पर्वते वा नदीतीरे वने वायतनेऽपि वा।<br>जीवच्छ्राद्धं प्रकर्तव्यं मृतकाले प्रयत्नतः॥ ५<br>जीवच्छ्राद्धे कृते जीवो जीवन्नेव विमुच्यते।<br>कर्म कुर्वन्नकुर्वन् वा ज्ञानी वाज्ञानवानपि॥ ६<br>श्रोत्रियोऽश्रोत्रियो वापि ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा।<br>वैश्यो वा नात्र सन्देहो योगमार्गगतो यथा॥ ७ | मनुष्यको वृद्धावस्थामें पर्वतपर, नदीके तटपर, वनमें अथवा देवालयमें प्रयत्नपूर्वक जीवच्छ्राद्ध करना चाहिये। जीवच्छ्राद्ध कर लेनेपर प्राणी जीवित रहते ही मुक्त हो जाता है; वह कर्म करे अथवा न करे, ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी, श्रोत्रिय हो अथवा अश्रोत्रिय, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य कोई भी हो—वह योगमार्गको प्राप्त योगीकी भाँति मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥ |
| परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः।<br>शल्यमुद्धृत्य यत्नेन स्थण्डिलं सैकतं भुवि॥ ८ | [जीवच्छ्राद्धकी विधि बतायी जाती है—] गन्ध, वर्ण, रस आदिके द्वारा भूमिकी विधिवत् परीक्षा करके यत्नपूर्वक शल्य (दोष) निकालकर उस भूमिपर |
* इस अध्यायमें जीवच्छ्राद्धका माहात्म्य एवं संक्षेपमें श्राद्धकी विधि आयी है, किंतु वर्तमानमें जीवच्छ्राद्धकी जो प्रक्रिया उपलब्ध होती है, वह इससे भिन्न है। गीताप्रेससे 'जीवच्छ्राद्धपद्धति' नामसे एक पुस्तक प्रकाशित है, जिसमें जीवच्छ्राद्ध-सम्बन्धी समस्त प्रक्रिया पूर्णरूपसे उपलब्ध है, जिज्ञासुजनोंको उसका अवलोकन करना चाहिये।
अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३१
| मूल संस्कृत (श्लोक एवं मन्त्र) | हिन्दी अनुवाद एवं मन्त्र-निर्देश |
|---|---|
| मध्यतो हस्तमात्रेण कुण्डं चैवायतं शुभम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यमिषुमात्रं पुनः पुनः॥ ९<br>उपलिप्य विधानेन चालिप्याग्निं विधाय च।<br>अन्वाधाय यथाशास्त्रं परिगृह्य च सर्वतः॥ १०<br>परिस्तीर्य स्वशाखोक्तं पारम्पर्यक्रमागतम्।<br>समाप्याग्निमुखं सर्वं मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ ११<br>सम्पूज्य स्थण्डिले वह्नौ होमयेत्समिदादिभिः।<br>आदौ कृत्वा समिद्धोमं चरुणा च पृथक्पृथक्॥ १२<br>घृतेन च पृथक्पात्रे शोधितेन पृथक्पृथक्।<br>जुहुयादात्मनोद्धृत्य तत्त्वभूतानि सर्वतः॥ १३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः॥ १४॥ ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा॥ १५॥ ॐ भुवः विष्णवे नमः॥ १६॥ ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा॥ १७॥ ॐ स्वः रुद्राय नमः॥ १८॥ ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा॥ १९॥ ॐ महः ईश्वराय नमः॥ २०॥ ॐ महः ईश्वराय स्वाहा॥ २१॥ ॐ जनः प्रकृतये नमः॥ २२॥ ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा॥ २३॥ ॐ तपः मुद्गलाय नमः॥ २४॥ ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा॥ २५॥ ॐ ऋतं पुरुषाय नमः॥ २६॥ ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा॥ २७॥ ॐ सत्यं शिवाय नमः॥ २८॥ ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा॥ २९॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः॥ ३०॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा॥ ३१॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः॥ ३२॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा॥ ३३॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः॥ ३४॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा॥ ३५॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः॥ ३६॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा॥ ३७॥ ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः॥ ३८॥ | बालूकी वेदी बनाये और उस वेदीके मध्य एक हाथ-प्रमाणका लम्बा-चौड़ा सुन्दर कुण्ड अथवा अरत्नि (कुहनीसे कनिष्ठिका अँगुलीतककी दूरी)-प्रमाणवाला स्थण्डिल बनाये। उसे बार-बार अत्यन्त स्निग्ध (चिकना) करके गोमयसे लीपकर अपने-अपने वेदोंकी शाखाओंके परम्परागत मन्त्रोंसे अग्निस्थापन करके तीन समिधाएँ लेकर हूयमान सभी देवताओंका आवाहनकर पुनः कुशास्तरण करे। विधिवत् पूजन करके स्थण्डिलपर अग्निमें यज्ञकी समिधाओंके द्वारा होम करे; पहले समिधासे हवन करके बादमें चरुसे तथा घृतसे पृथक्-पृथक् हवन करे। आज्यस्थालीमें शुद्ध किये हुए घृतसे तत्त्वभूतोंको मनसे विचार करके चारों ओर अलग-अलग हवन करना चाहिये॥ ८–१३॥<br><br>[पूजन-हवनमन्त्रोंको क्रमशः बताया जाता है—]<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः। ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ भुवः विष्णवे नमः। ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा। ॐ स्वः रुद्राय नमः। ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा। ॐ महः ईश्वराय नमः। ॐ महः ईश्वराय स्वाहा। ॐ जनः प्रकृतये नमः। ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा। ॐ तपः मुद्गलाय नमः। ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा। ॐ ऋतं पुरुषाय नमः। ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा। ॐ सत्यं शिवाय नमः। ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय |
| ७३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा॥ ३९॥ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः॥ ४०॥ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा॥ ४१॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः॥ ४२॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा॥ ४३॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः॥ ४४॥ ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा॥ ४५॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः॥ ४६॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा॥ ४७॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः॥ ४८॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा॥ ४९॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः॥ ५०॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा॥ ५१॥ रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः॥ ५२॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा॥ ५३॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः॥ ५४॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा॥ ५५॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः॥ ५६॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा॥ ५७॥ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः॥ ५८॥ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा॥ ५९॥ ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः॥ ६०॥ ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा॥ ६१॥ ॐ शिवाय नमः॥ ६२॥ ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा॥ ६३॥ | नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः। ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा। रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा। ॐ शिवाय नमः। ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा॥ १४–६३॥ | | एवं शिवाय होतव्यं विरिञ्च्याद्यं च पूर्ववत्।<br>विरिञ्चाद्यं च पूर्वोक्तं सृष्टिमार्गेषु सुव्रताः॥ ६४<br>पुनः पशुपतेः पत्नीं तथा पशुपतिं क्रमात्।<br>सम्पूज्य पूर्ववन्मन्त्रैर्होतव्यं च क्रमेण वै॥ ६५ | इस प्रकार सर्वप्रथम विरिंचि (ब्रह्मा) आदि [पचीस] देवताओंका पूजन करके पूर्वोक्त क्रमसे मोक्षके लिये हवन करना चाहिये। हे सुव्रतो! विरिंचि आदिका पूजन-हवन सृष्टिक्रमसे करनेके अनन्तर क्रमसे पूर्वकी भाँति पशुपतिकी पत्नी तथा पशुपतिका सम्यक् पूजन |
अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चर्वन्तमाज्यपूर्वं च समिदन्तं समाहितः॥ ६६ | करके समाहितचित्त होकर मन्त्रोंके द्वारा चरु, आज्य और समिधासे हवन करना चाहिये॥ ६४—६६॥ |
| ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि<br>भूः स्वाहा॥ ६७॥ भुवः स्वाहा॥ ६८<br>स्वः स्वाहा॥ ६९॥ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७०<br>एवं पृथक्पृथग्हुत्वा केवलेन घृतेन वा।<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ७१<br>विरजा च घृतेनैव शतमष्टोत्तरं पृथक्।<br>प्राणादिभिश्च जुहुयाद्घृतेनैव तु केवलम्॥ ७२<br>ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा<br>विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा॥ ७३<br>प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा॥ ७४<br>ॐ भूः स्वाहा॥ ७५॥ ॐ भुवः स्वाहा॥ ७६<br>ॐ स्वः स्वाहा॥ ७७॥ ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७८ | [हवनके मन्त्र इस प्रकार हैं—] ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि भूः स्वाहा। भुवः स्वाहा। स्वः स्वाहा। भूर्भुवः स्वः स्वाहा—इन मन्त्रोंके द्वारा समिधा आदिसे अथवा केवल घृतसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ पृथक्-पृथक् आहुतियाँ प्रदान करके विरजासंज्ञक दीक्षामन्त्रोंके द्वारा घृतसे आहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्राणादि मन्त्रोंके द्वारा केवल घृतसे एक सौ आठ आहुति डालनी चाहिये। [प्राणादि मन्त्र ये हैं—] ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा। प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा। ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ६७—७८॥ |
| एवं क्रमेण जुहुयाच्छाद्धोक्तं च यथाक्रमम्।<br>सप्तमेऽहनि योगीन्द्राञ्छ्राद्धार्हानपि भोजयेत्॥ ७९<br>शर्वादीनां च विप्राणां वस्त्राभरणकम्बलान्।<br>वाहनं शयनं यानं कांस्यताम्रादिभाजनम्॥ ८०<br>हैमं च रजतं धेनुं तिलान् क्षेत्रं च वैभवम्।<br>दासीदासगणश्चैव दातव्यो दक्षिणामपि॥ ८१<br>पिण्डं च पूर्ववद्दद्यात्पृथगष्टप्रकारतः।<br>ब्राह्मणानां सहस्रं च भोजयेच्च सदक्षिणम्॥ ८२<br>एकं वा योगनिरतं भस्मनिष्ठं जितेन्द्रियम्।<br>त्र्यहं चैव तु रुद्रस्य महाचरुनिवेदनम्॥ ८३<br>विशेष एवं कथित अशेषश्राद्धचोदितः। | इस प्रकार श्राद्धोक्त रीतिसे यथाक्रम हवन करे। तदनन्तर सातवें दिन योगियों तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराये। शर्व आदि अष्ट देवताओंके नामोंसे आठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें वस्त्र, आभूषण, कम्बल, वाहन, शय्या, यान, कांस्य-ताम्र आदिके पात्र, सोना, चाँदी, गो, तिल, भूमि, धन और दासीदाससमूह—यह सब प्रदान करना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये। शर्व आदि अष्टमूर्तियोंके प्रकारसे आठ पिण्ड भी प्रदान करे। हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे अथवा एक ही योगपरायण, भस्मनिष्ठ तथा जितेन्द्रिय [शिवभक्त]-को ही भोजन कराये। तीन दिनतक भगवान् रुद्रको महाचरु निवेदित करे। जीवच्छ्राद्धके विषयमें शास्त्रवर्णित विशेष बातें मैंने बता दीं—॥ ७९—८३ १/२॥ |
| मृते कुर्यान्न कुर्याद्वा जीवन्मुक्तो यतः स्वयम्॥ ८४<br>नित्यनैमित्तिकादीनि कुर्याद्वा सन्त्यजेत्तु वा।<br>बान्धवेऽपि मृते तस्य शौचाशौचं न विद्यते॥ ८५<br>सूतकं च न सन्देहः स्नानमात्रेण शुद्ध्यति।<br>पश्चाज्जाते कुमारे च स्वे क्षेत्रे चात्मनो यदि॥ ८६ | जीवच्छ्राद्ध करनेवाला व्यक्ति नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करे अथवा त्याग दे और उसके मृत हो जानेपर कोई उसका श्राद्ध करे अथवा न करे; क्योंकि वह तो स्वयं जीवन्मुक्त है। बन्धु-बान्धवके मर जानेपर उसे शौचाशौच तथा सूतक नहीं लगता, वह स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाता है; |
४६- लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण
| ७३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| तस्य सर्वं प्रकर्तव्यं पुत्रोऽपि ब्रह्मविद्भवेत् ।<br>कन्यका यदि सञ्जाता पश्चात्त्तस्य महात्मनः ॥ ८७<br><br>एकपर्णा इव ज्ञेया अपर्णा इव सुव्रता ।<br>भवत्येव न सन्देहस्तस्याश्चान्वयजा अपि ॥ ८८<br><br>मुच्यन्ते नात्र सन्देहः पितरो नरकादपि ।<br>मुच्यन्ते कर्मणानेन मातृतः पितृतस्तथा ॥ ८९<br><br>कालं गते द्विजे भूमौ खनेच्चापि दहेत्तु वा ।<br>पुत्रकृत्यमशेषं च कृत्वा दोषो न विद्यते ॥ ९०<br><br>कर्मणा चोत्तरेणैव गतिरस्य न विद्यते ।<br>ब्रह्मणा कथितं सर्वं मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ९१<br><br>पुनः सनत्कुमाराय कथितं तेन धीमता ।<br>कृष्णद्वैपायनायैव कथितं ब्रह्मसूनुना ॥ ९२<br><br>प्रसादात्तस्य देवस्य वेदव्यासस्य धीमतः ।<br>ज्ञातं मया कृतं चैव नियोगादेव तस्य तु ॥ ९३<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं रहस्यं ब्रह्मसिद्धिदम् ।<br>मुनिपुत्राय दातव्यं न चाभक्ताय सुव्रताः ॥ ९४ । | इसमें सन्देह नहीं है। अपनी पत्नीसे बादमें यदि अपना पुत्र उत्पन्न हो जाय, तो उसका सम्पूर्ण संस्कार करना चाहिये; वह पुत्र भी ब्रह्मवेत्ता होता है। हे सुव्रतो! यदि बादमें उस महात्माके कन्या उत्पन्न हुई, तो उस कन्याको एकपर्णा अथवा अपर्णा (पार्वती)-के समान जानना चाहिये। उस कन्याके वंशमें उत्पन्न होनेवाले भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। उस व्यक्तिके इस [जीवच्छ्राद्ध] कर्मके द्वारा उसके मातृपक्ष तथा पितृपक्षके पितर भी नरकसे मुक्त हो जाते हैं। [जीवच्छ्राद्ध कर चुके] ऐसे द्विजके मर जानेपर उसे भूमिमें गाड़ दिया जाय अथवा उसका दाह-संस्कार कर दिया जाय; पुत्रके द्वारा उसका सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कृत्य करनेसे उसे कोई दोष नहीं लगता है। मृत्युके अनन्तर उसके लिये कोई क्रिया आवश्यक नहीं है॥ ८४—९० १/२ ॥<br><br>[ सूतजीने कहा—हे ऋषियो! ] ब्रह्माजीने पुण्यात्मा मुनियोंसे यह सब कहा था; फिर उन बुद्धिमान् ब्रह्माने इसे सनत्कुमारको बताया। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र उन सनत्कुमारने कृष्णद्वैपायन व्यासजीसे इसका कथन किया। इसके अनन्तर उन बुद्धिसम्पन्न भगवान् वेदव्यासकी कृपासे मैंने इसे जाना और उन्हींके आदेशसे ब्रह्मसिद्धि प्रदान करनेवाला यह सम्पूर्ण रहस्य मैंने आप लोगोंको बताया। हे सुव्रतो! इसे किसी मुनिपुत्रको ही प्रदान करना चाहिये, अभक्तको नहीं॥ ९१—९४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे जीवच्छ्राद्धविधिर्नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'जीवच्छ्राद्धविधि' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>जीवच्छ्राद्धविधिः प्रोक्तस्त्वया सूत महामते ।<br>मूर्खाणामपि मोक्षार्थमस्माकं रोमहर्षण ॥ १<br><br>रुद्रादित्यवसूनां च शक्रादीनां च सुव्रत ।<br>प्रतिष्ठा कीदृशी शम्भोलिङ्गमूर्तेश्च शोभना ॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे विशाल बुद्धिवाले सूतजी, हे रोमहर्षण! आपने अज्ञानियोंके भी मोक्षके लिये हमलोगोंसे जीवच्छ्राद्धकी विधिका वर्णन किया। हे सुव्रत! रुद्र, आदित्य, वसु, इन्द्र आदि देवता तथा शिवजीकी लिङ्गमूर्तिकी सुन्दर प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है; |
अध्याय ४६ ] लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन ७३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विष्णोः शक्रस्य देवस्य ब्रह्मणश्च महात्मनः।<br>अग्नेर्यमस्य निर्ऋतेर्वरुणस्य महाद्युतेः॥ ३<br>वायोः सोमस्य यक्षस्य कुबेरस्यामितात्मनः।<br>ईशानस्य धरायाश्च श्रीप्रतिष्ठाथ वा कथम्॥ ४<br>दुर्गाशिवाप्रतिष्ठा च हैमवत्याश्च शोभना।<br>स्कन्दस्य गणराजस्य नन्दिनश्च विशेषतः॥ ५<br>तथान्येषां च देवानां गणानामपि वा पुनः।<br>प्रतिष्ठालक्षणं सर्वं विस्तराद्वक्तुमर्हसि॥ ६ | विष्णु, इन्द्रदेव, भगवान् ब्रह्मा, अग्नि, यम, निर्ऋति, महातेजस्वी वरुण, वायु, सोम, यक्ष, अमित आत्मावाले कुबेर, ईशान तथा पृथ्वीकी उत्तम प्रतिष्ठा कैसे की जाती है; दुर्गा, शिवा, हैमवती, कार्तिकेय, गणनाथ नन्दी तथा अन्य देवताओं और गणोंकी शोभन प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है, इनकी प्रतिष्ठा-विधिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १-६॥ |
| भवान् सर्वार्थतत्त्वज्ञो रुद्रभक्तश्च सुव्रत।<br>कृष्णद्वैपायनस्यासि साक्षात्त्वमपरा तनुः॥ ७<br>सुमन्तुजैमिनिश्चैव पैलश्च परमर्षयः।<br>गुरुभक्तिं तथा कर्तुं समर्थो रोमहर्षणः॥ ८<br>इति व्यासस्य विपुला गाथा भागीरथीतीटे।<br>एकः समो वा भिन्नो वा शिष्यस्तस्य महाद्युतेः॥ ९<br>वैशम्पायनतुल्योऽसि व्यासशिष्येषु भूतले।<br>तस्मादस्माकमखिलं वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १० | हे सुव्रत! आप समस्त अर्थतत्त्वके ज्ञाता और रुद्रभक्त हैं। आप कृष्णद्वैपायन व्यासकी साक्षात् दूसरी मूर्ति हैं। 'सुमन्तु, जैमिनि तथा पैल परम ऋषिके रूपमें प्रतिष्ठित हैं; रोमहर्षण उन्हींके सदृश गुरुभक्ति करनेमें समर्थ हैं—इस प्रकारकी विशद वाणी गङ्गातटपर व्यासजीने स्वयं प्रकट की थी।' उन महातेजस्वीके समान अथवा उन्हींके रूपवाले आप उनके शिष्य हैं। पृथ्वीतलपर व्यासजीके शिष्योंमें आप वैशम्पायनके समान हैं, अतः इस समय आप हमलोगोंको सम्पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें॥ ७-१०॥ |
| एवमुक्त्वा स्थितेष्वेव तेषु सर्वेषु तत्र च।<br>बभूव विस्मयोऽतीव मुनीनां तस्य चाग्रतः॥ ११<br>अथान्तरिक्षे विपुला साक्षाद्देवी सरस्वती।<br>अलं मुनीनां प्रश्नोऽयमिति वाचा बभूव ह॥ १२<br>सर्वं लिङ्गमयं लोकं सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य स्थापयेत्पूजयेच्च तत्॥ १३<br>लिङ्गस्थापनसन्मार्गनिहितस्वायतासिना ।<br>आशु ब्रह्माण्डमुद्भिद्य निर्गच्छेदविशङ्कया॥ १४ | ऐसा कहकर उन सभीके शान्त हो जानेपर मुनियों तथा उन सूतजीके समक्ष विस्मयकारी घटना हुई, अन्तरिक्षमें साक्षात् महादेवी सरस्वती इस वाणीके साथ प्रकट हुईं कि 'मुनियोंका यह प्रश्न समीचीन है, सम्पूर्ण लोक लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें ही प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर उसीका स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। लिङ्गस्थापनरूप पुण्यकर्ममें स्थापित अत्यन्त विस्तृत खड्गके द्वारा शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके [वह लिङ्गस्थापक] निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है'॥ ११-१४॥ |
| उपेन्द्राम्भोजगर्भेन्द्रयमाम्बुधनदेश्वराः ।<br>तथान्ये च शिवं स्थाप्य लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्॥ १५<br>स्वेषु स्वेषु च पक्षेषु प्रधानास्ते यथा द्विजाः।<br>ब्रह्मा हरश्च भगवान् विष्णुर्देवी रमा धरा॥ १६<br>लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः प्रज्ञा धरा दुर्गा शची तथा।<br>रुद्राश्च वसवः स्कन्दो विशाखः शाख एव च॥ १७ | हे द्विजो! लिङ्गमूर्ति महेश्वर शिवकी स्थापना करके जैसे विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, वरुण तथा कुबेर ईश्वर (स्वामी) हो गये, वैसे ही अन्य लोग भी अपने-अपने पक्षोंमें प्रधान हुए हैं। ब्रह्मा, शम्भु, भगवान् विष्णु, देवी रमा, धरा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, प्रज्ञा, धरा, दुर्गा, शची, सभी रुद्र, सभी वसु, कार्तिकेय, विशाख, शाख, |
४७- लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि
| ७३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |
| नैगमेशश्च भगवाँल्लोकपाला ग्रहास्तथा।<br>सर्वे नन्दिपुरोगाश्च गणा गणपतिः प्रभुः॥ १८<br>पितरो मुनयः सर्वे कुबेराद्याश्च सुप्रभाः।<br>आदित्या वसवः सांख्या अश्विनौ च भिषग्वरौ॥ १९<br>विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पशवः पक्षिणो मृगाः।<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तं च सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्॥ २०<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य स्थापयेल्लिङ्गमव्ययम्।<br>यत्नेन स्थापितं सर्वं पूजितं पूजयेद्यदि॥ २१ | भगवान् नैगमेश, समस्त लोकपाल, ग्रह, नन्दी आदि गण, प्रभु गणपति, पितर, मुनिगण, कान्तिमान् कुबेर आदि यक्ष, सभी आदित्य, वसु, सांख्य, वैद्यश्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, साध्यगण, पशु, पक्षी और मृग—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर यत्नपूर्वक यदि शाश्वत लिङ्गकी स्थापना करे, तो सबकी स्थापना हो जाती है और यदि पूजन करे, तो सबकी पूजा हो जाती है॥ १५-२१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गपूजनवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गपूजनवर्णन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि
| सूत उवाच<br>इति निशम्य कृताञ्जलयस्तदा<br>दिवि महामुनयः कृतनिश्चयाः।<br>शिवतरं शिवमेश्वरमव्ययं<br>मनसि लिङ्गमयं प्रणिपत्य ते॥ १<br>सकलदेवपतिर्भगवानजो<br>हरिरशेषपतिर्गुरुणा स्वयम्।<br>मुनिवराश्च गणाश्च सुरासुरा<br>नरवराः शिवलिङ्गमयाः पुनः॥ २<br>श्रुत्वैवं मुनयः सर्वे षट्कुलीयाः समाहिताः।<br>सन्त्यज्य सर्वं देवस्य प्रतिष्ठां कर्तुमुद्यताः॥ ३<br>अपृच्छन् सूतमनघं हर्षगद्गदया गिरा।<br>लिङ्गप्रतिष्ठां विपुलां सर्वे ते शंसितव्रताः॥ ४<br><br>सूत उवाच<br>प्रतिष्ठां लिङ्गमूर्तेर्वो यथावदनुपूर्वशः।<br>प्रवक्ष्यामि समासेन धर्मकामार्थमुक्तये॥ ५<br>कृत्वैव लिङ्गं विधिना भुवि लिङ्गेषु यत्नतः।<br>लिङ्गमेकतमं शैलं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्॥ ६<br>हेमरत्नमयं वापि राजतं ताम्रजं तु वा।<br>सवेदिकं ससूत्रं च सम्यग्विस्तृतमस्तकम्॥ ७<br>विशोध्य स्थापयेद्भक्त्या सवेदिकमनुत्तमम्।<br>लिङ्गवेदी उमा देवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः॥ ८ | सूतजी बोले—यह आकाशवाणी सुनकर दृढ़ संकल्पवाले उन मुनियोंने दोनों हाथ जोड़ लिये। परम कल्याणमय, लिङ्गमय तथा अविनाशी भगवान् शिवको मनमें प्रणाम करके सभी देवताओंके पति इन्द्र, ब्रह्मा, सबके स्वामी भगवान् विष्णु, देवगुरु बृहस्पतिसहित सभी श्रेष्ठ मुनि, सभी गण, देवता, असुर और श्रेष्ठ मनुष्य—इन सभीने अपनेको शिवलिङ्गमय अनुभव किया॥ १-२॥<br><br>यह सुनकर छहों कुलोंके सभी मुनि सब कुछ छोड़कर समाहितचित्त हो लिङ्गप्रतिष्ठा करनेके लिये उद्यत हुए। संयत व्रतवाले उन सभी मुनियोंने हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें पुण्यात्मा सूतजीसे महती लिङ्गप्रतिष्ठाकी विधि पूछी॥ ३-४॥<br><br>सूतजी बोले—[हे मुनियो!] धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधिका अनुक्रमसे यथावत् वर्णन करूँगा। पृथ्वीलोकमें कहे जानेवाले शैल आदि लिङ्गोंमें पाषाणका, हेमरत्नमय अथवा ताम्रका एक जलहरीसमेत और पंचसूत्र आदिसे युक्त तथा विस्तृत मस्तकवाला ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक उत्तम लिङ्ग बनाकर उसे भलीभाँति शोधित करके वेदीसमेत भक्तिपूर्वक स्थापित करे। |
| अध्याय ४७ ] | लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि | ७३७ |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तयोः सम्पूजनादेव देवी देवश्च पूजितौ।<br>प्रतिष्ठया च देवेशो देव्या सार्धं प्रतिष्ठितः॥ ९<br><br>तस्मात्सवेदिकं लिङ्गं स्थापयेत्स्थापकोत्तमः॥ १० | लिङ्गकी वेदी भगवती उमा हैं और लिङ्ग साक्षात् महेश्वर हैं। उन दोनों (वेदी तथा लिङ्ग)-की प्रतिष्ठासे देवी पार्वतीसहित देवेश्वर शिव प्रतिष्ठित हो जाते हैं और उन दोनोंके पूजनसे देवी पार्वती तथा भगवान् शिव स्वयं पूजित हो जाते हैं। अतः श्रेष्ठ स्थापकको वेदीसहित लिङ्गकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥ ५—१०॥ |
| मूले ब्रह्मा वसति भगवान् मध्यभागे च विष्णुः<br>सर्वेशानः पशुपतिरजो रुद्रमूर्तिर्वरेण्यः।<br>तस्माल्लिङ्गं गुरुतरतरं पूजयेत्स्थापयेद्वा<br>यस्मात्पूज्यो गणपतरिसौ देवमुख्यैः समस्तैः॥ ११<br><br>गन्धैः स्रग्धूपदीपैः स्नपनहुतबलिस्तोत्रमन्त्रोपहारैर्नित्यं<br>येऽभ्यर्चयन्ति त्रिदशवरतनुं लिङ्गमूर्तिं महेशम्। गर्भा-<br>धानादिनाशक्षयभयरहिता देवगन्धर्वमुख्यैः सिद्धै-<br>र्वन्द्याश्च पूज्या गणवरनमितास्ते भवन्त्यप्रमेयाः॥ १२<br><br>तस्माद्भक्त्योपचारेण स्थापयेत्परमेश्वरम्।<br>पूजयेच्च विशेषेण लिङ्गं सर्वार्थसिद्धये॥ १३ | शिवलिङ्गके मूलमें ब्रह्मा, मध्यभागमें भगवान् विष्णु और अग्रभागमें सर्वेश्वर रुद्रमूर्ति वरेण्य पशुपति शिव निवास करते हैं। अतः यदि कोई अतिश्रेष्ठ शिवलिङ्गकी स्थापना अथवा पूजा करे, तो वह सभी प्रधान देवताओंका पूज्य और शिवजीका प्रधान गण हो जाता है। जो लोग गन्ध, माल्य, धूप, दीप, स्नान, हवन, नैवेद्य-समर्पण, स्तोत्र, मन्त्र तथा उपहारोंसे देवताओंमें श्रेष्ठ विग्रहवाले लिङ्गमूर्ति महेश्वरका अर्चन करते हैं, वे जन्म-मरण, नाश, क्षय आदिके भयसे रहित हो जाते हैं; प्रधान देवताओं तथा गन्धर्वों और सिद्धोंके वन्दनीय तथा पूजनीय हो जाते हैं; श्रेष्ठ शिवगणोंके नमस्कारयोग्य हो जाते हैं और अपरिमित प्रभाववाले हो जाते हैं। अतः सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये सभी उपचारोंसे भक्तिपूर्वक महेश्वरकी और विशेषरूपसे लिङ्गमूर्तिकी स्थापना तथा पूजा करनी चाहिये॥ ११—१३॥ |
| समर्च्य स्थापयेल्लिङ्गं तीर्थमध्ये शिवासने।<br>कूर्चवस्त्रादिभिर्लिङ्गमाच्छाद्य कलशैः पुनः॥ १४<br><br>लोकपालादिदैवत्यैः सकूर्चैः साक्षतैः शुभैः।<br>उत्कूर्चैः स्वस्तिकाद्यैश्च चित्रतन्तुकवेष्टितैः॥ १५<br><br>वज्रादिकायुधोपेतैः सवस्त्रैः सपिधानकैः।<br>लक्षयेत्परितो लिङ्गमीशानेन प्रतिष्ठितम्॥ १६ | सम्यक् अर्चन करके तीर्थमें शिवासनपर लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। कूर्च-वस्त्र आदिसे लिङ्गको आच्छादित करके कूर्चयुक्त, अक्षतयुक्त, स्वस्तिक आदिसे सुशोभित, सुन्दर तन्तुसे वेष्टित, वज्र आदि आयुधोंसे संयुक्त, वस्त्रयुक्त तथा पिधानसमन्वित लोकपाल आदि देवोंके कलशोंसे, ईशानमन्त्रसे प्रतिष्ठित शिवलिङ्गका चारों ओरसे रक्षण करे॥ १४—१६॥ |
| धूपदीपसमोपेतं वितानवितताम्बरम्।<br>लोकपालध्वजैश्चैव गजादिमहिषादिभिः॥ १७<br><br>चित्रितैः पूजितैश्चैव दर्भमाला च शोभना।<br>सर्वलक्षणसम्पूर्णा तया बाह्ये च वेष्टयेत्॥ १८ | एक विशाल मण्डपका निर्माण कराये, जो धूप-दीप आदिसे सदा युक्त रहे, पूजित गज-महिष आदिके चित्रोंसे युक्त रहे, लोकपाल आदिके ध्वजोंसे सुशोभित रहे। उस मण्डपके बाहर चारों ओरसे सभी लक्षणोंसे सम्पन्न सुन्दर दर्भमाला वेष्टित कर देनी चाहिये॥ १७-१८॥ |
| ७३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽधिवासयेत्तोये धूपदीपसमन्विते।<br>पञ्चाहं वा त्र्यहं वाथ एकरात्रमथापि वा॥ १९<br><br>वेदाध्ययनसम्पन्नो नृत्यगीतादिमङ्गलैः।<br>किङ्किणीरवकोपेतं तालवीणारवैरपि॥ २०<br><br>ईक्षयेत्कालमव्यग्रो यजमानः समाहितः।<br>उत्थाप्य स्वस्तिकं ध्यायेन्मण्डपे लक्ष्णान्विते॥ २१<br><br>संस्कृते वेदिसंयुक्ते नवकुण्डेन संवृते।<br>पूर्वोक्तविधिना युक्ते सर्वलक्षणसंयुते॥ २२<br><br>अष्टमण्डलसंयुक्ते दिग्ध्वजाष्टकसंयुते।<br>पूर्वोक्तलक्षणोपेतैः कुण्डैः प्रागादितः क्रमात्॥ २३<br><br>प्रधानं कुण्डमीशान्यां चतुरस्रं विधीयते।<br>अथवा पञ्चकुण्डैकं स्थण्डिलं चैकमेव च॥ २४ | तदनन्तर उस शिवलिङ्गको पाँच रात अथवा तीन रात अथवा एक रात ही धूप-दीपसे समन्वित जलमें अधिवासित करना चाहिये। यजमानको चाहिये कि वेदाध्ययनपरायण रहते हुए नृत्य, गीत आदि मंगलोंसे, किंकिणीकी ध्वनिसे तथा तालवीणाके स्वरोंसे मण्डपको युक्त रखे और अव्यग्र भावसे समय व्यतीत करे। प्रतिष्ठाके समय जलमेंसे शिवलिङ्गको निकालकर समाहितचित्त होकर पुण्याहवाचन करे और लिङ्गको मण्डपमें रखे, जो लक्षणोंसे युक्त हो; भलीभाँति परिष्कृत हो; वेदीसे युक्त हो; नौ कुण्डोंसे आवृत हो; पूर्वोक्त विधिसे सभी लक्षणोंसे समन्वित हो; आठों दिग्पालोंके निमित्त आठ मण्डलोंसे सम्पन्न हो और आठों दिशाओंमें लगायी गयी ध्वजाओंसे सुशोभित हो। पूर्व दिशासे क्रमसे प्रारम्भ करके पूर्वोक्त लक्षणोंसे सम्पन्न कुण्डोंसे यह मण्डप युक्त हो। ईशान दिशामें प्रधान कुण्ड बनाया जाता है, जो चौकोर होता है अथवा पाँच कुण्ड एक ओर हों और एक स्थण्डिल हो॥ १९-२४॥ |
| यज्ञोपकरणैः सर्वैः शिवाचार्यायं हि भूषणैः।<br>वेदिमध्ये महाशय्यां पञ्चतूलीप्रकल्पिताम्॥ २५<br><br>कल्पयेत्काञ्चनोपेतां सितवस्त्रावगुण्ठिताम्।<br>प्रकल्प्यैवं शिवं चैव स्थापयेत्परमेश्वरम्॥ २६ | शिवकी अर्चामें समस्त यज्ञोपकरणों तथा भूषणोंसे युक्त महाशय्या वेदीके मध्य व्यवस्थित करनी चाहिये, जो पासमें रखे हुए पाँच बत्तियोंवाले दीपकसे सुशोभित हो, सुवर्ण-पट्टियोंसे युक्त हो और श्वेत वस्त्रसे आच्छादित हो—ऐसी व्यवस्था करके परमेश्वर शिवको स्थापित करना चाहिये॥ २५-२६॥ |
| प्राक्शिरस्कं न्यसेल्लिङ्गमीशानेन यथाविधि।<br>रत्नन्यासे कृते पूर्वं केवलं कलशं न्यसेत्॥ २७<br><br>लिङ्गमाच्छाद्य वस्त्राभ्यां कूर्चेन च समन्ततः।<br>रत्नन्यासे प्रसक्तेऽथ वामाद्या नव शक्तयः॥ २८<br><br>नवरत्नं हिरण्याद्यैः पञ्चगव्येन संयुतैः।<br>सर्वधान्यसमोपेतं शिलायामपि विन्यसेत्॥ २९ | लिङ्गके शिरोभागको पूर्वकी ओर ईशान मन्त्रके द्वारा विधिपूर्वक स्थापित करना चाहिये। रत्नन्यास करनेके बाद मुख्य कलशको स्थापित करना चाहिये। तत्पश्चात् लिङ्गको दो वस्त्रोंद्वारा कुशसहित चारों ओरसे लपेटकर उसपर रखना चाहिये। रत्नन्यास हो जानेके अनन्तर वाम आदि नौ शक्तियोंको स्थापित करना चाहिये। पंचगव्यसे युक्त हिरण्य (सुवर्ण)-सहित नौ रत्नों, पंचगव्य तथा सब प्रकारके धान्य भी आधारशिलापर रखना चाहिये॥ २७-२९॥ |
| स्थापयेद्ब्रह्मलिङ्गं हि शिवगायत्रिसंयुतम्।<br>केवलं प्रणवेनापि स्थापयेच्छिवमव्ययम्॥ ३० | भक्तको चाहिये कि शिवगायत्रीमन्त्रका उच्चारण करते हुए ब्रह्मलिङ्गको स्थापित करे अथवा केवल |
अध्याय ४७ ] लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि [ ७३९
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
|---|---|
| ब्रह्मज्ञानमन्त्रेण ब्रह्मभागं प्रभोस्तथा।<br>विष्णुगायत्रिया भागं वैष्णवं त्वथ विन्यसेत्॥ ३१<br><br>सूत्रे तत्त्वत्रयोपेते प्रणवेन प्रविन्यसेत्।<br>सर्वं नमः शिवायेति नमो हंसः शिवाय च॥ ३२<br><br>रुद्राध्यायेन वा सर्वं परिमृज्य च विन्यसेत्।<br>स्थापयेद्ब्रह्मभिश्चैव कलशान् वै समन्ततः॥ ३३ | प्रणवके द्वारा भी अव्यय शिवको स्थापित करे। प्रभुकी वेदिकाके अधोभागको ब्रह्म जज्ञानं० (यजु० १३।३) मन्त्रके द्वारा तथा मध्य भागको विष्णुगायत्रीमन्त्रके द्वारा विन्यास करे। वेदिकाके ऊर्ध्व-पूर्व-पश्चिम भागका विन्यास प्रणवमन्त्रके द्वारा करे। नमः शिवाय तथा नमो हंसः शिवाय अथवा रुद्राध्याय मन्त्रके द्वारा शिवलिङ्गको शोधित करके स्थापित करे। कलशोंको चारों ओर पंचब्रह्म-मन्त्रोंसे स्थापित करना चाहिये॥ ३०—३३॥ |
| वेदिमध्ये न्यसेत्सर्वान् पूर्वोक्तविधिसंयुतान्।<br>मध्यकुम्भे शिवं देवीं दक्षिणे परमेश्वरीम्॥ ३४<br><br>स्कन्दं तयोश्च मध्ये तु स्कन्दकुम्भे सुचित्रिते।<br>ब्रह्माणं स्कन्दकुम्भे वा ईशकुम्भे हरिं तथा॥ ३५<br><br>अथवा शिवकुम्भे च ब्रह्माङ्गानि च विन्यसेत्।<br>शिवो महेश्वरश्चैव रुद्रो विष्णुः पितामहः॥ ३६<br><br>ब्रह्माण्येवं समासेन हृदयादीनि चाम्बिका।<br>वेदिमध्ये न्यसेत्सर्वान् पूर्वोक्तविधिसंयुतान्॥ ३७ | [अब प्रतिमाके स्थापनकी विधि कही जा रही है—] पूर्वोक्त विधिसे वेदीके मध्यमें उन सबको स्थापित करना चाहिये। मध्य कुम्भपर शिवको और दक्षिण कुम्भपर परमेश्वरी देवी शिवाको रखना चाहिये। उन दोनोंके बीचमें अतिसुन्दर स्कन्दकुम्भपर स्कन्द (कार्तिकेय)-को रखे अथवा ब्रह्माको स्कन्दकुम्भपर रखे अथवा विष्णुको ईशकुम्भपर रखे अथवा ब्रह्मांगको शिवकुम्भपर रखे; शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु और पितामह—ये ही ब्रह्मांग हैं, हृदय आदि तथा अम्बिका—इन सबको वेदीके मध्यमें पूर्वोक्त रीतिसे स्थापित करे॥ ३४—३७॥ |
| वर्धन्यां स्थापयेद्देवीं गन्धतोयेन पूर्य च।<br>हिरण्यं रजतं रत्नं शिवकुम्भे प्रविन्यसेत्॥ ३८<br><br>वर्धन्यामपि यत्नेन गायत्र्यङ्गैश्च सुव्रताः।<br>विद्येश्वरान् दिशां कुम्भे ब्रह्मकूर्चेन पूरिते॥ ३९<br><br>अनन्तेशादिदेवांश्च प्रणवादिन्मोऽन्तकम्।<br>नववस्त्रं प्रतिघटमष्टकुम्भेषु दापयेत्॥ ४०<br><br>विद्येश्वराणां कुम्भेषु हेमरत्नादि विन्यसेत्।<br>वक्त्रक्रमेण होतव्यं गायत्र्यङ्गक्रमेण च॥ ४१<br><br>जयादिस्विष्टपर्यन्तं सर्वं पूर्ववदाचरेत्।<br>सेचयेच्छिवकुम्भेन वर्धन्या वैष्णवेन च॥ ४२<br><br>पैतामहेन कुम्भेन ब्रह्मभागं विशेषतः।<br>विद्येश्वराणां कुम्भैश्च सेचयेत्परमेश्वरम्॥ ४३ | सुगन्धित जलसे वर्धनीकुम्भको भरकर उसमें देवीको स्थापित करे। शिवकुम्भमें स्वर्ण, चाँदी और रत्न डालने चाहिये। हे सुव्रतो! वर्धनीकुम्भमें भी यत्नपूर्वक गायत्री और अंगमन्त्रोंद्वारा विद्येश्वरों तथा अष्ट दिक्पालोंको स्थापित करना चाहिये। अनन्त, ईश आदि अन्य देवताओंके नामके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः लगाकर ब्रह्मकूर्चसे पूरित दिशा-कुम्भमें स्थापित करे। आठ कुम्भोंमेंसे प्रत्येक कुम्भको नवीन वस्त्रसे ढक दे। विद्येश्वरोंके कुम्भोंमें सुवर्ण, रत्न आदि डाल दे। गायत्रीके अंगन्यास मन्त्रोंद्वारा ईशान आदिके मुख क्रमसे जया आदिसे लेकर स्विष्टपर्यन्त हवन आदि सभी कर्म पूर्वकी भाँति करना चाहिये। शिवकुम्भसे, वर्धनीकुम्भसे, विष्णुकुम्भसे, पितामह-कुम्भसे तथा विद्येश्वरोंके कुम्भोंसे परमेश्वर शिवका अभिषेक करना चाहिये; ब्रह्मकुम्भसे विशेषकर ब्रह्मभागका अभिषेक करना चाहिये॥ ३८—४३॥ |
४८- देवताओंकी प्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवताओंके गायत्रीमन्त्र
७४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| विन्यसेत्सर्वमन्त्राणि पूर्ववत्सुसमाहितः ।<br>पूजयेत्स्नपनं कृत्वा सहस्रादिषु सम्भवैः ॥ ४४<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या सहस्त्रपणमुत्तमम् ।<br>इतरेषां तदर्थं स्यात्तदर्धं वा विधीयते ॥ ४५<br><br>वस्त्राणि च प्रधानस्य क्षेत्रभूषणगोधनम्।<br>उत्सवश्च प्रकर्तव्यो होमयागबलिः क्रमात् ॥ ४६<br><br>नवाहं वापि सप्ताहमेकाहं च त्र्यहं तथा ।<br>होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो नित्यमभ्यर्च्य शङ्करम् ॥ ४७<br><br>देवानां भास्करादीनां होमं पूर्ववदेव तु ।<br>अभ्यन्तरे तथा बाह्ये वह्नौ नित्यं समर्चयेत् ॥ ४८<br><br>य एवं स्थापयेल्लिङ्गं स एव परमेश्वरः।<br>तेन देवगणा रुद्रा ऋषयोऽप्सरसस्तथा ॥ ४९<br><br>स्थापिताः पूजिताश्चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ५० | स्वस्थचित्त होकर ईशान आदि मन्त्रोंका पूर्वकी भाँति क्रमसे विन्यास करना चाहिये और हजार कुम्भोंसे स्नान कराकर पूजन करना चाहिये। तदनन्तर आचार्यको एक हजार पणोंकी उत्तम दक्षिणा देनी चाहिये; अन्य लोगोंको उसकी आधी अथवा उसकी भी आधी दक्षिणा देनेका विधान है। शिवका प्रतिनिधित्व करनेवाले प्रधान ऋत्विज्को वस्त्र, भूमि, आभूषण, धेनु आदि देना चाहिये। इसमें महान् उत्सव करना चाहिये और होम, याग तथा बलि क्रमसे नौ दिन अथवा सात दिन अथवा तीन दिन अथवा एक दिन करना चाहिये। प्रतिदिन शिवका पूजन करके पूर्वकी भाँति होम करना बताया गया है। सूर्य आदि देवताओंके निमित्त होम पूर्ववत् करना चाहिये। आभ्यन्तर अग्नि (हृदयाग्नि) तथा बाह्य अग्निमें नित्य शिवका हवन करना चाहिये। जो व्यक्ति इस प्रकार लिङ्गस्थापन करता है, वह साक्षात् परमेश्वर ही है। ऐसा करके उसने मानो सभी देवताओं, रुद्रों, ऋषियों तथा अप्सराओंकी स्थापना तथा पूजा कर ली और चराचरसहित तीनों लोकोंका पूजन कर लिया॥ ४४-५०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गस्थापनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गस्थापन' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
देवताओंकी प्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवताओंके गायत्रीमन्त्र
| सूत उवाच<br>सर्वेषामपि देवानां प्रतिष्ठामपि विस्तरात्।<br>स्वैर्मन्त्रैर्यागकुण्डानि विन्यस्यैकैकमेव च ॥ १<br><br>स्थापयेदुत्सवं कृत्वा पूजयेच्च विधानतः।<br>भानोः पञ्चाग्निना कार्यं द्वादशाग्निक्रमेण वा ॥ २<br><br>सर्वकुण्डानि वृत्तानि पद्माकाराणि सुव्रताः ।<br>अम्बाया योनिकुण्डं स्याद्वर्ध्न्येका विधीयते ॥ ३<br><br>शक्तीनां सर्वकार्येषु योनिकुण्डं विधीयते।<br>गायत्रीं कल्पयेच्छम्भोः सर्वेषामपि यत्नतः। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं अन्य देवताओंकी भी प्रतिष्ठाका विस्तारसे वर्णन करता हूँ। देवताओंके अपने-अपने मन्त्रोंसे यागकुण्डका निर्माण करके प्रत्येक देवताकी स्थापना करनी चाहिये और उत्सव मनाकर विधानपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। सूर्यका स्थापन पंचाग्नि अथवा द्वादश-अग्निक्रमसे करना चाहिये। हे सुव्रतो! सूर्यस्थापनमें सभी कुण्ड गोल तथा पद्मके आकारके बनाने चाहिये ॥ १-२¹/₂ ॥<br><br>भगवतीके स्थापनमें योनिकुण्ड होना चाहिये और इसमें एक वर्धनी भी स्थापित करनी चाहिये। |
अध्याय ४८ ] देवप्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवोंके गायत्रीमन्त्र ७४१
सर्वे रुद्रांशजा यस्मात्सङ्क्षेपेण वदामि वः ॥ ४
तत्पुरुषाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि ।
तन्नः शिवः प्रचोदयात् ॥ ५
गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्धयै च धीमहि ।
तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥ ६
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि ।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ७
तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ ८
महासेनाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि ।
तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात् ॥ ९
तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे वेदपादाय धीमहि ।
तन्नो वृषः प्रचोदयात् ॥ १०
हरिवक्त्राय विद्महे रुद्रवक्त्राय धीमहि ।
तन्नो नन्दी प्रचोदयात् ॥ ११
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि ।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १२
महाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्धयै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥ १३
समुद्धृतायै विद्महे विष्णुनाैकेन धीमहि ।
तन्नो धरा प्रचोदयात् ॥ १४
वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि ।
तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥ १५
पद्मोद्भवाय विद्महे वेदवक्त्राय धीमहि ।
तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात् ॥ १६
शिवास्यजायै विद्महे देवरूपायै धीमहि ।
तन्नो वाचा प्रचोदयात् ॥ १७
देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि ।
तन्नः शक्रः प्रचोदयात् ॥ १८
रुद्रनेत्राय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि ।
तन्नो वह्निः प्रचोदयात् ॥ १९
देवियोंके सभी कार्योंमें योनिकुण्ड ही बनाया जाता है। शम्भुकी तथा सभी देवताओंकी गायत्रीको यत्नपूर्वक कल्पित करना चाहिये। सभी देवता रुद्रके ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं। अतः सभी देवताओंकी भिन्न-भिन्न गायत्री हैं; मैं उन्हें संक्षेपमें आप लोगोंको बताता हूँ—
तत्पुरुषाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥
गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्धयै च धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात्॥
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
महासेनाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि। तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात्॥
तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे वेदपादाय धीमहि। तन्नो वृषः प्रचोदयात्॥
हरिवक्त्राय विद्महे रुद्रवक्त्राय धीमहि। तन्नो नन्दी प्रचोदयात्॥
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
महाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्धयै च धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
समुद्धृतायै विद्महे विष्णुनैकेन धीमहि। तन्नो धरा प्रचोदयात्॥
वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि। तन्नो गरुडः प्रचोदयात्॥
पद्मोद्भवाय विद्महे वेदवक्त्राय धीमहि। तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात्॥
शिवास्यजायै विद्महे देवरूपायै धीमहि। तन्नो वाचा प्रचोदयात्॥
देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नः शक्रः प्रचोदयात्॥
रुद्रनेत्राय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि। तन्नो वह्निः प्रचोदयात्॥