भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 736
७३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| तस्य सर्वं प्रकर्तव्यं पुत्रोऽपि ब्रह्मविद्भवेत् ।<br>कन्यका यदि सञ्जाता पश्चात्त्तस्य महात्मनः ॥ ८७<br><br>एकपर्णा इव ज्ञेया अपर्णा इव सुव्रता ।<br>भवत्येव न सन्देहस्तस्याश्चान्वयजा अपि ॥ ८८<br><br>मुच्यन्ते नात्र सन्देहः पितरो नरकादपि ।<br>मुच्यन्ते कर्मणानेन मातृतः पितृतस्तथा ॥ ८९<br><br>कालं गते द्विजे भूमौ खनेच्चापि दहेत्तु वा ।<br>पुत्रकृत्यमशेषं च कृत्वा दोषो न विद्यते ॥ ९०<br><br>कर्मणा चोत्तरेणैव गतिरस्य न विद्यते ।<br>ब्रह्मणा कथितं सर्वं मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ९१<br><br>पुनः सनत्कुमाराय कथितं तेन धीमता ।<br>कृष्णद्वैपायनायैव कथितं ब्रह्मसूनुना ॥ ९२<br><br>प्रसादात्तस्य देवस्य वेदव्यासस्य धीमतः ।<br>ज्ञातं मया कृतं चैव नियोगादेव तस्य तु ॥ ९३<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं रहस्यं ब्रह्मसिद्धिदम् ।<br>मुनिपुत्राय दातव्यं न चाभक्ताय सुव्रताः ॥ ९४ । | इसमें सन्देह नहीं है। अपनी पत्नीसे बादमें यदि अपना पुत्र उत्पन्न हो जाय, तो उसका सम्पूर्ण संस्कार करना चाहिये; वह पुत्र भी ब्रह्मवेत्ता होता है। हे सुव्रतो! यदि बादमें उस महात्माके कन्या उत्पन्न हुई, तो उस कन्याको एकपर्णा अथवा अपर्णा (पार्वती)-के समान जानना चाहिये। उस कन्याके वंशमें उत्पन्न होनेवाले भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। उस व्यक्तिके इस [जीवच्छ्राद्ध] कर्मके द्वारा उसके मातृपक्ष तथा पितृपक्षके पितर भी नरकसे मुक्त हो जाते हैं। [जीवच्छ्राद्ध कर चुके] ऐसे द्विजके मर जानेपर उसे भूमिमें गाड़ दिया जाय अथवा उसका दाह-संस्कार कर दिया जाय; पुत्रके द्वारा उसका सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कृत्य करनेसे उसे कोई दोष नहीं लगता है। मृत्युके अनन्तर उसके लिये कोई क्रिया आवश्यक नहीं है॥ ८४—९० १/२ ॥<br><br>[ सूतजीने कहा—हे ऋषियो! ] ब्रह्माजीने पुण्यात्मा मुनियोंसे यह सब कहा था; फिर उन बुद्धिमान् ब्रह्माने इसे सनत्कुमारको बताया। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र उन सनत्कुमारने कृष्णद्वैपायन व्यासजीसे इसका कथन किया। इसके अनन्तर उन बुद्धिसम्पन्न भगवान् वेदव्यासकी कृपासे मैंने इसे जाना और उन्हींके आदेशसे ब्रह्मसिद्धि प्रदान करनेवाला यह सम्पूर्ण रहस्य मैंने आप लोगोंको बताया। हे सुव्रतो! इसे किसी मुनिपुत्रको ही प्रदान करना चाहिये, अभक्तको नहीं॥ ९१—९४॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे जीवच्छ्राद्धविधिर्नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'जीवच्छ्राद्धविधि' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥


छियालीसवाँ अध्याय

लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण

| ऋषय ऊचुः<br>जीवच्छ्राद्धविधिः प्रोक्तस्त्वया सूत महामते ।<br>मूर्खाणामपि मोक्षार्थमस्माकं रोमहर्षण ॥ १<br><br>रुद्रादित्यवसूनां च शक्रादीनां च सुव्रत ।<br>प्रतिष्ठा कीदृशी शम्भोलिङ्गमूर्तेश्च शोभना ॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे विशाल बुद्धिवाले सूतजी, हे रोमहर्षण! आपने अज्ञानियोंके भी मोक्षके लिये हमलोगोंसे जीवच्छ्राद्धकी विधिका वर्णन किया। हे सुव्रत! रुद्र, आदित्य, वसु, इन्द्र आदि देवता तथा शिवजीकी लिङ्गमूर्तिकी सुन्दर प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है; |