भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चर्वन्तमाज्यपूर्वं च समिदन्तं समाहितः॥ ६६करके समाहितचित्त होकर मन्त्रोंके द्वारा चरु, आज्य और समिधासे हवन करना चाहिये॥ ६४—६६॥
ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि<br>भूः स्वाहा॥ ६७॥ भुवः स्वाहा॥ ६८<br>स्वः स्वाहा॥ ६९॥ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७०<br>एवं पृथक्पृथग्हुत्वा केवलेन घृतेन वा।<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ७१<br>विरजा च घृतेनैव शतमष्टोत्तरं पृथक्।<br>प्राणादिभिश्च जुहुयाद्घृतेनैव तु केवलम्॥ ७२<br>ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा<br>विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा॥ ७३<br>प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा॥ ७४<br>ॐ भूः स्वाहा॥ ७५॥ ॐ भुवः स्वाहा॥ ७६<br>ॐ स्वः स्वाहा॥ ७७॥ ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७८[हवनके मन्त्र इस प्रकार हैं—] ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि भूः स्वाहा। भुवः स्वाहा। स्वः स्वाहा। भूर्भुवः स्वः स्वाहा—इन मन्त्रोंके द्वारा समिधा आदिसे अथवा केवल घृतसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ पृथक्-पृथक् आहुतियाँ प्रदान करके विरजासंज्ञक दीक्षामन्त्रोंके द्वारा घृतसे आहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्राणादि मन्त्रोंके द्वारा केवल घृतसे एक सौ आठ आहुति डालनी चाहिये। [प्राणादि मन्त्र ये हैं—] ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा। प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा। ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ६७—७८॥
एवं क्रमेण जुहुयाच्छाद्धोक्तं च यथाक्रमम्।<br>सप्तमेऽहनि योगीन्द्राञ्छ्राद्धार्हानपि भोजयेत्॥ ७९<br>शर्वादीनां च विप्राणां वस्त्राभरणकम्बलान्।<br>वाहनं शयनं यानं कांस्यताम्रादिभाजनम्॥ ८०<br>हैमं च रजतं धेनुं तिलान् क्षेत्रं च वैभवम्।<br>दासीदासगणश्चैव दातव्यो दक्षिणामपि॥ ८१<br>पिण्डं च पूर्ववद्दद्यात्पृथगष्टप्रकारतः।<br>ब्राह्मणानां सहस्रं च भोजयेच्च सदक्षिणम्॥ ८२<br>एकं वा योगनिरतं भस्मनिष्ठं जितेन्द्रियम्।<br>त्र्यहं चैव तु रुद्रस्य महाचरुनिवेदनम्॥ ८३<br>विशेष एवं कथित अशेषश्राद्धचोदितः।इस प्रकार श्राद्धोक्त रीतिसे यथाक्रम हवन करे। तदनन्तर सातवें दिन योगियों तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराये। शर्व आदि अष्ट देवताओंके नामोंसे आठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें वस्त्र, आभूषण, कम्बल, वाहन, शय्या, यान, कांस्य-ताम्र आदिके पात्र, सोना, चाँदी, गो, तिल, भूमि, धन और दासीदाससमूह—यह सब प्रदान करना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये। शर्व आदि अष्टमूर्तियोंके प्रकारसे आठ पिण्ड भी प्रदान करे। हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे अथवा एक ही योगपरायण, भस्मनिष्ठ तथा जितेन्द्रिय [शिवभक्त]-को ही भोजन कराये। तीन दिनतक भगवान् रुद्रको महाचरु निवेदित करे। जीवच्छ्राद्धके विषयमें शास्त्रवर्णित विशेष बातें मैंने बता दीं—॥ ७९—८३ १/२॥
मृते कुर्यान्न कुर्याद्वा जीवन्मुक्तो यतः स्वयम्॥ ८४<br>नित्यनैमित्तिकादीनि कुर्याद्वा सन्त्यजेत्तु वा।<br>बान्धवेऽपि मृते तस्य शौचाशौचं न विद्यते॥ ८५<br>सूतकं च न सन्देहः स्नानमात्रेण शुद्ध्यति।<br>पश्चाज्जाते कुमारे च स्वे क्षेत्रे चात्मनो यदि॥ ८६जीवच्छ्राद्ध करनेवाला व्यक्ति नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करे अथवा त्याग दे और उसके मृत हो जानेपर कोई उसका श्राद्ध करे अथवा न करे; क्योंकि वह तो स्वयं जीवन्मुक्त है। बन्धु-बान्धवके मर जानेपर उसे शौचाशौच तथा सूतक नहीं लगता, वह स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाता है;