भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 737

अध्याय ४६ ] लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन ७३५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विष्णोः शक्रस्य देवस्य ब्रह्मणश्च महात्मनः।<br>अग्नेर्यमस्य निर्ऋतेर्वरुणस्य महाद्युतेः॥ ३<br>वायोः सोमस्य यक्षस्य कुबेरस्यामितात्मनः।<br>ईशानस्य धरायाश्च श्रीप्रतिष्ठाथ वा कथम्॥ ४<br>दुर्गाशिवाप्रतिष्ठा च हैमवत्याश्च शोभना।<br>स्कन्दस्य गणराजस्य नन्दिनश्च विशेषतः॥ ५<br>तथान्येषां च देवानां गणानामपि वा पुनः।<br>प्रतिष्ठालक्षणं सर्वं विस्तराद्वक्तुमर्हसि॥ ६विष्णु, इन्द्रदेव, भगवान् ब्रह्मा, अग्नि, यम, निर्ऋति, महातेजस्वी वरुण, वायु, सोम, यक्ष, अमित आत्मावाले कुबेर, ईशान तथा पृथ्वीकी उत्तम प्रतिष्ठा कैसे की जाती है; दुर्गा, शिवा, हैमवती, कार्तिकेय, गणनाथ नन्दी तथा अन्य देवताओं और गणोंकी शोभन प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है, इनकी प्रतिष्ठा-विधिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १-६॥
भवान् सर्वार्थतत्त्वज्ञो रुद्रभक्तश्च सुव्रत।<br>कृष्णद्वैपायनस्यासि साक्षात्त्वमपरा तनुः॥ ७<br>सुमन्तुजैमिनिश्चैव पैलश्च परमर्षयः।<br>गुरुभक्तिं तथा कर्तुं समर्थो रोमहर्षणः॥ ८<br>इति व्यासस्य विपुला गाथा भागीरथीतीटे।<br>एकः समो वा भिन्नो वा शिष्यस्तस्य महाद्युतेः॥ ९<br>वैशम्पायनतुल्योऽसि व्यासशिष्येषु भूतले।<br>तस्मादस्माकमखिलं वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १०हे सुव्रत! आप समस्त अर्थतत्त्वके ज्ञाता और रुद्रभक्त हैं। आप कृष्णद्वैपायन व्यासकी साक्षात् दूसरी मूर्ति हैं। 'सुमन्तु, जैमिनि तथा पैल परम ऋषिके रूपमें प्रतिष्ठित हैं; रोमहर्षण उन्हींके सदृश गुरुभक्ति करनेमें समर्थ हैं—इस प्रकारकी विशद वाणी गङ्गातटपर व्यासजीने स्वयं प्रकट की थी।' उन महातेजस्वीके समान अथवा उन्हींके रूपवाले आप उनके शिष्य हैं। पृथ्वीतलपर व्यासजीके शिष्योंमें आप वैशम्पायनके समान हैं, अतः इस समय आप हमलोगोंको सम्पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें॥ ७-१०॥
एवमुक्त्वा स्थितेष्वेव तेषु सर्वेषु तत्र च।<br>बभूव विस्मयोऽतीव मुनीनां तस्य चाग्रतः॥ ११<br>अथान्तरिक्षे विपुला साक्षाद्देवी सरस्वती।<br>अलं मुनीनां प्रश्नोऽयमिति वाचा बभूव ह॥ १२<br>सर्वं लिङ्गमयं लोकं सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य स्थापयेत्पूजयेच्च तत्॥ १३<br>लिङ्गस्थापनसन्मार्गनिहितस्वायतासिना ।<br>आशु ब्रह्माण्डमुद्भिद्य निर्गच्छेदविशङ्कया॥ १४ऐसा कहकर उन सभीके शान्त हो जानेपर मुनियों तथा उन सूतजीके समक्ष विस्मयकारी घटना हुई, अन्तरिक्षमें साक्षात् महादेवी सरस्वती इस वाणीके साथ प्रकट हुईं कि 'मुनियोंका यह प्रश्न समीचीन है, सम्पूर्ण लोक लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें ही प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर उसीका स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। लिङ्गस्थापनरूप पुण्यकर्ममें स्थापित अत्यन्त विस्तृत खड्गके द्वारा शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके [वह लिङ्गस्थापक] निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है'॥ ११-१४॥
उपेन्द्राम्भोजगर्भेन्द्रयमाम्बुधनदेश्वराः ।<br>तथान्ये च शिवं स्थाप्य लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्॥ १५<br>स्वेषु स्वेषु च पक्षेषु प्रधानास्ते यथा द्विजाः।<br>ब्रह्मा हरश्च भगवान् विष्णुर्देवी रमा धरा॥ १६<br>लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः प्रज्ञा धरा दुर्गा शची तथा।<br>रुद्राश्च वसवः स्कन्दो विशाखः शाख एव च॥ १७हे द्विजो! लिङ्गमूर्ति महेश्वर शिवकी स्थापना करके जैसे विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, वरुण तथा कुबेर ईश्वर (स्वामी) हो गये, वैसे ही अन्य लोग भी अपने-अपने पक्षोंमें प्रधान हुए हैं। ब्रह्मा, शम्भु, भगवान् विष्णु, देवी रमा, धरा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, प्रज्ञा, धरा, दुर्गा, शची, सभी रुद्र, सभी वसु, कार्तिकेय, विशाख, शाख,