श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४७ ] लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि [ ७३९
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
|---|---|
| ब्रह्मज्ञानमन्त्रेण ब्रह्मभागं प्रभोस्तथा।<br>विष्णुगायत्रिया भागं वैष्णवं त्वथ विन्यसेत्॥ ३१<br><br>सूत्रे तत्त्वत्रयोपेते प्रणवेन प्रविन्यसेत्।<br>सर्वं नमः शिवायेति नमो हंसः शिवाय च॥ ३२<br><br>रुद्राध्यायेन वा सर्वं परिमृज्य च विन्यसेत्।<br>स्थापयेद्ब्रह्मभिश्चैव कलशान् वै समन्ततः॥ ३३ | प्रणवके द्वारा भी अव्यय शिवको स्थापित करे। प्रभुकी वेदिकाके अधोभागको ब्रह्म जज्ञानं० (यजु० १३।३) मन्त्रके द्वारा तथा मध्य भागको विष्णुगायत्रीमन्त्रके द्वारा विन्यास करे। वेदिकाके ऊर्ध्व-पूर्व-पश्चिम भागका विन्यास प्रणवमन्त्रके द्वारा करे। नमः शिवाय तथा नमो हंसः शिवाय अथवा रुद्राध्याय मन्त्रके द्वारा शिवलिङ्गको शोधित करके स्थापित करे। कलशोंको चारों ओर पंचब्रह्म-मन्त्रोंसे स्थापित करना चाहिये॥ ३०—३३॥ |
| वेदिमध्ये न्यसेत्सर्वान् पूर्वोक्तविधिसंयुतान्।<br>मध्यकुम्भे शिवं देवीं दक्षिणे परमेश्वरीम्॥ ३४<br><br>स्कन्दं तयोश्च मध्ये तु स्कन्दकुम्भे सुचित्रिते।<br>ब्रह्माणं स्कन्दकुम्भे वा ईशकुम्भे हरिं तथा॥ ३५<br><br>अथवा शिवकुम्भे च ब्रह्माङ्गानि च विन्यसेत्।<br>शिवो महेश्वरश्चैव रुद्रो विष्णुः पितामहः॥ ३६<br><br>ब्रह्माण्येवं समासेन हृदयादीनि चाम्बिका।<br>वेदिमध्ये न्यसेत्सर्वान् पूर्वोक्तविधिसंयुतान्॥ ३७ | [अब प्रतिमाके स्थापनकी विधि कही जा रही है—] पूर्वोक्त विधिसे वेदीके मध्यमें उन सबको स्थापित करना चाहिये। मध्य कुम्भपर शिवको और दक्षिण कुम्भपर परमेश्वरी देवी शिवाको रखना चाहिये। उन दोनोंके बीचमें अतिसुन्दर स्कन्दकुम्भपर स्कन्द (कार्तिकेय)-को रखे अथवा ब्रह्माको स्कन्दकुम्भपर रखे अथवा विष्णुको ईशकुम्भपर रखे अथवा ब्रह्मांगको शिवकुम्भपर रखे; शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु और पितामह—ये ही ब्रह्मांग हैं, हृदय आदि तथा अम्बिका—इन सबको वेदीके मध्यमें पूर्वोक्त रीतिसे स्थापित करे॥ ३४—३७॥ |
| वर्धन्यां स्थापयेद्देवीं गन्धतोयेन पूर्य च।<br>हिरण्यं रजतं रत्नं शिवकुम्भे प्रविन्यसेत्॥ ३८<br><br>वर्धन्यामपि यत्नेन गायत्र्यङ्गैश्च सुव्रताः।<br>विद्येश्वरान् दिशां कुम्भे ब्रह्मकूर्चेन पूरिते॥ ३९<br><br>अनन्तेशादिदेवांश्च प्रणवादिन्मोऽन्तकम्।<br>नववस्त्रं प्रतिघटमष्टकुम्भेषु दापयेत्॥ ४०<br><br>विद्येश्वराणां कुम्भेषु हेमरत्नादि विन्यसेत्।<br>वक्त्रक्रमेण होतव्यं गायत्र्यङ्गक्रमेण च॥ ४१<br><br>जयादिस्विष्टपर्यन्तं सर्वं पूर्ववदाचरेत्।<br>सेचयेच्छिवकुम्भेन वर्धन्या वैष्णवेन च॥ ४२<br><br>पैतामहेन कुम्भेन ब्रह्मभागं विशेषतः।<br>विद्येश्वराणां कुम्भैश्च सेचयेत्परमेश्वरम्॥ ४३ | सुगन्धित जलसे वर्धनीकुम्भको भरकर उसमें देवीको स्थापित करे। शिवकुम्भमें स्वर्ण, चाँदी और रत्न डालने चाहिये। हे सुव्रतो! वर्धनीकुम्भमें भी यत्नपूर्वक गायत्री और अंगमन्त्रोंद्वारा विद्येश्वरों तथा अष्ट दिक्पालोंको स्थापित करना चाहिये। अनन्त, ईश आदि अन्य देवताओंके नामके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः लगाकर ब्रह्मकूर्चसे पूरित दिशा-कुम्भमें स्थापित करे। आठ कुम्भोंमेंसे प्रत्येक कुम्भको नवीन वस्त्रसे ढक दे। विद्येश्वरोंके कुम्भोंमें सुवर्ण, रत्न आदि डाल दे। गायत्रीके अंगन्यास मन्त्रोंद्वारा ईशान आदिके मुख क्रमसे जया आदिसे लेकर स्विष्टपर्यन्त हवन आदि सभी कर्म पूर्वकी भाँति करना चाहिये। शिवकुम्भसे, वर्धनीकुम्भसे, विष्णुकुम्भसे, पितामह-कुम्भसे तथा विद्येश्वरोंके कुम्भोंसे परमेश्वर शिवका अभिषेक करना चाहिये; ब्रह्मकुम्भसे विशेषकर ब्रह्मभागका अभिषेक करना चाहिये॥ ३८—४३॥ |