श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ७३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततोऽधिवासयेत्तोये धूपदीपसमन्विते।<br>पञ्चाहं वा त्र्यहं वाथ एकरात्रमथापि वा॥ १९<br><br>वेदाध्ययनसम्पन्नो नृत्यगीतादिमङ्गलैः।<br>किङ्किणीरवकोपेतं तालवीणारवैरपि॥ २०<br><br>ईक्षयेत्कालमव्यग्रो यजमानः समाहितः।<br>उत्थाप्य स्वस्तिकं ध्यायेन्मण्डपे लक्ष्णान्विते॥ २१<br><br>संस्कृते वेदिसंयुक्ते नवकुण्डेन संवृते।<br>पूर्वोक्तविधिना युक्ते सर्वलक्षणसंयुते॥ २२<br><br>अष्टमण्डलसंयुक्ते दिग्ध्वजाष्टकसंयुते।<br>पूर्वोक्तलक्षणोपेतैः कुण्डैः प्रागादितः क्रमात्॥ २३<br><br>प्रधानं कुण्डमीशान्यां चतुरस्रं विधीयते।<br>अथवा पञ्चकुण्डैकं स्थण्डिलं चैकमेव च॥ २४ | तदनन्तर उस शिवलिङ्गको पाँच रात अथवा तीन रात अथवा एक रात ही धूप-दीपसे समन्वित जलमें अधिवासित करना चाहिये। यजमानको चाहिये कि वेदाध्ययनपरायण रहते हुए नृत्य, गीत आदि मंगलोंसे, किंकिणीकी ध्वनिसे तथा तालवीणाके स्वरोंसे मण्डपको युक्त रखे और अव्यग्र भावसे समय व्यतीत करे। प्रतिष्ठाके समय जलमेंसे शिवलिङ्गको निकालकर समाहितचित्त होकर पुण्याहवाचन करे और लिङ्गको मण्डपमें रखे, जो लक्षणोंसे युक्त हो; भलीभाँति परिष्कृत हो; वेदीसे युक्त हो; नौ कुण्डोंसे आवृत हो; पूर्वोक्त विधिसे सभी लक्षणोंसे समन्वित हो; आठों दिग्पालोंके निमित्त आठ मण्डलोंसे सम्पन्न हो और आठों दिशाओंमें लगायी गयी ध्वजाओंसे सुशोभित हो। पूर्व दिशासे क्रमसे प्रारम्भ करके पूर्वोक्त लक्षणोंसे सम्पन्न कुण्डोंसे यह मण्डप युक्त हो। ईशान दिशामें प्रधान कुण्ड बनाया जाता है, जो चौकोर होता है अथवा पाँच कुण्ड एक ओर हों और एक स्थण्डिल हो॥ १९-२४॥ |
| यज्ञोपकरणैः सर्वैः शिवाचार्यायं हि भूषणैः।<br>वेदिमध्ये महाशय्यां पञ्चतूलीप्रकल्पिताम्॥ २५<br><br>कल्पयेत्काञ्चनोपेतां सितवस्त्रावगुण्ठिताम्।<br>प्रकल्प्यैवं शिवं चैव स्थापयेत्परमेश्वरम्॥ २६ | शिवकी अर्चामें समस्त यज्ञोपकरणों तथा भूषणोंसे युक्त महाशय्या वेदीके मध्य व्यवस्थित करनी चाहिये, जो पासमें रखे हुए पाँच बत्तियोंवाले दीपकसे सुशोभित हो, सुवर्ण-पट्टियोंसे युक्त हो और श्वेत वस्त्रसे आच्छादित हो—ऐसी व्यवस्था करके परमेश्वर शिवको स्थापित करना चाहिये॥ २५-२६॥ |
| प्राक्शिरस्कं न्यसेल्लिङ्गमीशानेन यथाविधि।<br>रत्नन्यासे कृते पूर्वं केवलं कलशं न्यसेत्॥ २७<br><br>लिङ्गमाच्छाद्य वस्त्राभ्यां कूर्चेन च समन्ततः।<br>रत्नन्यासे प्रसक्तेऽथ वामाद्या नव शक्तयः॥ २८<br><br>नवरत्नं हिरण्याद्यैः पञ्चगव्येन संयुतैः।<br>सर्वधान्यसमोपेतं शिलायामपि विन्यसेत्॥ २९ | लिङ्गके शिरोभागको पूर्वकी ओर ईशान मन्त्रके द्वारा विधिपूर्वक स्थापित करना चाहिये। रत्नन्यास करनेके बाद मुख्य कलशको स्थापित करना चाहिये। तत्पश्चात् लिङ्गको दो वस्त्रोंद्वारा कुशसहित चारों ओरसे लपेटकर उसपर रखना चाहिये। रत्नन्यास हो जानेके अनन्तर वाम आदि नौ शक्तियोंको स्थापित करना चाहिये। पंचगव्यसे युक्त हिरण्य (सुवर्ण)-सहित नौ रत्नों, पंचगव्य तथा सब प्रकारके धान्य भी आधारशिलापर रखना चाहिये॥ २७-२९॥ |
| स्थापयेद्ब्रह्मलिङ्गं हि शिवगायत्रिसंयुतम्।<br>केवलं प्रणवेनापि स्थापयेच्छिवमव्ययम्॥ ३० | भक्तको चाहिये कि शिवगायत्रीमन्त्रका उच्चारण करते हुए ब्रह्मलिङ्गको स्थापित करे अथवा केवल |