श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ४७ ] | लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि | ७३७ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| तयोः सम्पूजनादेव देवी देवश्च पूजितौ।<br>प्रतिष्ठया च देवेशो देव्या सार्धं प्रतिष्ठितः॥ ९<br><br>तस्मात्सवेदिकं लिङ्गं स्थापयेत्स्थापकोत्तमः॥ १० | लिङ्गकी वेदी भगवती उमा हैं और लिङ्ग साक्षात् महेश्वर हैं। उन दोनों (वेदी तथा लिङ्ग)-की प्रतिष्ठासे देवी पार्वतीसहित देवेश्वर शिव प्रतिष्ठित हो जाते हैं और उन दोनोंके पूजनसे देवी पार्वती तथा भगवान् शिव स्वयं पूजित हो जाते हैं। अतः श्रेष्ठ स्थापकको वेदीसहित लिङ्गकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥ ५—१०॥ |
| मूले ब्रह्मा वसति भगवान् मध्यभागे च विष्णुः<br>सर्वेशानः पशुपतिरजो रुद्रमूर्तिर्वरेण्यः।<br>तस्माल्लिङ्गं गुरुतरतरं पूजयेत्स्थापयेद्वा<br>यस्मात्पूज्यो गणपतरिसौ देवमुख्यैः समस्तैः॥ ११<br><br>गन्धैः स्रग्धूपदीपैः स्नपनहुतबलिस्तोत्रमन्त्रोपहारैर्नित्यं<br>येऽभ्यर्चयन्ति त्रिदशवरतनुं लिङ्गमूर्तिं महेशम्। गर्भा-<br>धानादिनाशक्षयभयरहिता देवगन्धर्वमुख्यैः सिद्धै-<br>र्वन्द्याश्च पूज्या गणवरनमितास्ते भवन्त्यप्रमेयाः॥ १२<br><br>तस्माद्भक्त्योपचारेण स्थापयेत्परमेश्वरम्।<br>पूजयेच्च विशेषेण लिङ्गं सर्वार्थसिद्धये॥ १३ | शिवलिङ्गके मूलमें ब्रह्मा, मध्यभागमें भगवान् विष्णु और अग्रभागमें सर्वेश्वर रुद्रमूर्ति वरेण्य पशुपति शिव निवास करते हैं। अतः यदि कोई अतिश्रेष्ठ शिवलिङ्गकी स्थापना अथवा पूजा करे, तो वह सभी प्रधान देवताओंका पूज्य और शिवजीका प्रधान गण हो जाता है। जो लोग गन्ध, माल्य, धूप, दीप, स्नान, हवन, नैवेद्य-समर्पण, स्तोत्र, मन्त्र तथा उपहारोंसे देवताओंमें श्रेष्ठ विग्रहवाले लिङ्गमूर्ति महेश्वरका अर्चन करते हैं, वे जन्म-मरण, नाश, क्षय आदिके भयसे रहित हो जाते हैं; प्रधान देवताओं तथा गन्धर्वों और सिद्धोंके वन्दनीय तथा पूजनीय हो जाते हैं; श्रेष्ठ शिवगणोंके नमस्कारयोग्य हो जाते हैं और अपरिमित प्रभाववाले हो जाते हैं। अतः सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये सभी उपचारोंसे भक्तिपूर्वक महेश्वरकी और विशेषरूपसे लिङ्गमूर्तिकी स्थापना तथा पूजा करनी चाहिये॥ ११—१३॥ |
| समर्च्य स्थापयेल्लिङ्गं तीर्थमध्ये शिवासने।<br>कूर्चवस्त्रादिभिर्लिङ्गमाच्छाद्य कलशैः पुनः॥ १४<br><br>लोकपालादिदैवत्यैः सकूर्चैः साक्षतैः शुभैः।<br>उत्कूर्चैः स्वस्तिकाद्यैश्च चित्रतन्तुकवेष्टितैः॥ १५<br><br>वज्रादिकायुधोपेतैः सवस्त्रैः सपिधानकैः।<br>लक्षयेत्परितो लिङ्गमीशानेन प्रतिष्ठितम्॥ १६ | सम्यक् अर्चन करके तीर्थमें शिवासनपर लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। कूर्च-वस्त्र आदिसे लिङ्गको आच्छादित करके कूर्चयुक्त, अक्षतयुक्त, स्वस्तिक आदिसे सुशोभित, सुन्दर तन्तुसे वेष्टित, वज्र आदि आयुधोंसे संयुक्त, वस्त्रयुक्त तथा पिधानसमन्वित लोकपाल आदि देवोंके कलशोंसे, ईशानमन्त्रसे प्रतिष्ठित शिवलिङ्गका चारों ओरसे रक्षण करे॥ १४—१६॥ |
| धूपदीपसमोपेतं वितानवितताम्बरम्।<br>लोकपालध्वजैश्चैव गजादिमहिषादिभिः॥ १७<br><br>चित्रितैः पूजितैश्चैव दर्भमाला च शोभना।<br>सर्वलक्षणसम्पूर्णा तया बाह्ये च वेष्टयेत्॥ १८ | एक विशाल मण्डपका निर्माण कराये, जो धूप-दीप आदिसे सदा युक्त रहे, पूजित गज-महिष आदिके चित्रोंसे युक्त रहे, लोकपाल आदिके ध्वजोंसे सुशोभित रहे। उस मण्डपके बाहर चारों ओरसे सभी लक्षणोंसे सम्पन्न सुन्दर दर्भमाला वेष्टित कर देनी चाहिये॥ १७-१८॥ |