भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 742

७४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

| विन्यसेत्सर्वमन्त्राणि पूर्ववत्सुसमाहितः ।<br>पूजयेत्स्नपनं कृत्वा सहस्रादिषु सम्भवैः ॥ ४४<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या सहस्त्रपणमुत्तमम् ।<br>इतरेषां तदर्थं स्यात्तदर्धं वा विधीयते ॥ ४५<br><br>वस्त्राणि च प्रधानस्य क्षेत्रभूषणगोधनम्।<br>उत्सवश्च प्रकर्तव्यो होमयागबलिः क्रमात् ॥ ४६<br><br>नवाहं वापि सप्ताहमेकाहं च त्र्यहं तथा ।<br>होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो नित्यमभ्यर्च्य शङ्करम् ॥ ४७<br><br>देवानां भास्करादीनां होमं पूर्ववदेव तु ।<br>अभ्यन्तरे तथा बाह्ये वह्नौ नित्यं समर्चयेत् ॥ ४८<br><br>य एवं स्थापयेल्लिङ्गं स एव परमेश्वरः।<br>तेन देवगणा रुद्रा ऋषयोऽप्सरसस्तथा ॥ ४९<br><br>स्थापिताः पूजिताश्चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ५० | स्वस्थचित्त होकर ईशान आदि मन्त्रोंका पूर्वकी भाँति क्रमसे विन्यास करना चाहिये और हजार कुम्भोंसे स्नान कराकर पूजन करना चाहिये। तदनन्तर आचार्यको एक हजार पणोंकी उत्तम दक्षिणा देनी चाहिये; अन्य लोगोंको उसकी आधी अथवा उसकी भी आधी दक्षिणा देनेका विधान है। शिवका प्रतिनिधित्व करनेवाले प्रधान ऋत्विज्‌को वस्त्र, भूमि, आभूषण, धेनु आदि देना चाहिये। इसमें महान् उत्सव करना चाहिये और होम, याग तथा बलि क्रमसे नौ दिन अथवा सात दिन अथवा तीन दिन अथवा एक दिन करना चाहिये। प्रतिदिन शिवका पूजन करके पूर्वकी भाँति होम करना बताया गया है। सूर्य आदि देवताओंके निमित्त होम पूर्ववत् करना चाहिये। आभ्यन्तर अग्नि (हृदयाग्नि) तथा बाह्य अग्निमें नित्य शिवका हवन करना चाहिये। जो व्यक्ति इस प्रकार लिङ्गस्थापन करता है, वह साक्षात् परमेश्वर ही है। ऐसा करके उसने मानो सभी देवताओं, रुद्रों, ऋषियों तथा अप्सराओंकी स्थापना तथा पूजा कर ली और चराचरसहित तीनों लोकोंका पूजन कर लिया॥ ४४-५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गस्थापनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गस्थापन' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥


अड़तालीसवाँ अध्याय

देवताओंकी प्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवताओंके गायत्रीमन्त्र

| सूत उवाच<br>सर्वेषामपि देवानां प्रतिष्ठामपि विस्तरात्।<br>स्वैर्मन्त्रैर्यागकुण्डानि विन्यस्यैकैकमेव च ॥ १<br><br>स्थापयेदुत्सवं कृत्वा पूजयेच्च विधानतः।<br>भानोः पञ्चाग्निना कार्यं द्वादशाग्निक्रमेण वा ॥ २<br><br>सर्वकुण्डानि वृत्तानि पद्माकाराणि सुव्रताः ।<br>अम्बाया योनिकुण्डं स्याद्वर्ध्न्येका विधीयते ॥ ३<br><br>शक्तीनां सर्वकार्येषु योनिकुण्डं विधीयते।<br>गायत्रीं कल्पयेच्छम्भोः सर्वेषामपि यत्नतः। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं अन्य देवताओंकी भी प्रतिष्ठाका विस्तारसे वर्णन करता हूँ। देवताओंके अपने-अपने मन्त्रोंसे यागकुण्डका निर्माण करके प्रत्येक देवताकी स्थापना करनी चाहिये और उत्सव मनाकर विधानपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। सूर्यका स्थापन पंचाग्नि अथवा द्वादश-अग्निक्रमसे करना चाहिये। हे सुव्रतो! सूर्यस्थापनमें सभी कुण्ड गोल तथा पद्मके आकारके बनाने चाहिये ॥ १-२¹/₂ ॥<br><br>भगवतीके स्थापनमें योनिकुण्ड होना चाहिये और इसमें एक वर्धनी भी स्थापित करनी चाहिये। |