भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 733

अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३१


मूल संस्कृत (श्लोक एवं मन्त्र)हिन्दी अनुवाद एवं मन्त्र-निर्देश
मध्यतो हस्तमात्रेण कुण्डं चैवायतं शुभम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यमिषुमात्रं पुनः पुनः॥ ९<br>उपलिप्य विधानेन चालिप्याग्निं विधाय च।<br>अन्वाधाय यथाशास्त्रं परिगृह्य च सर्वतः॥ १०<br>परिस्तीर्य स्वशाखोक्तं पारम्पर्यक्रमागतम्।<br>समाप्याग्निमुखं सर्वं मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ ११<br>सम्पूज्य स्थण्डिले वह्नौ होमयेत्समिदादिभिः।<br>आदौ कृत्वा समिद्धोमं चरुणा च पृथक्पृथक्॥ १२<br>घृतेन च पृथक्पात्रे शोधितेन पृथक्पृथक्।<br>जुहुयादात्मनोद्धृत्य तत्त्वभूतानि सर्वतः॥ १३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः॥ १४॥ ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा॥ १५॥ ॐ भुवः विष्णवे नमः॥ १६॥ ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा॥ १७॥ ॐ स्वः रुद्राय नमः॥ १८॥ ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा॥ १९॥ ॐ महः ईश्वराय नमः॥ २०॥ ॐ महः ईश्वराय स्वाहा॥ २१॥ ॐ जनः प्रकृतये नमः॥ २२॥ ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा॥ २३॥ ॐ तपः मुद्गलाय नमः॥ २४॥ ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा॥ २५॥ ॐ ऋतं पुरुषाय नमः॥ २६॥ ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा॥ २७॥ ॐ सत्यं शिवाय नमः॥ २८॥ ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा॥ २९॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः॥ ३०॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा॥ ३१॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः॥ ३२॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा॥ ३३॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः॥ ३४॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा॥ ३५॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः॥ ३६॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा॥ ३७॥ ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः॥ ३८॥बालूकी वेदी बनाये और उस वेदीके मध्य एक हाथ-प्रमाणका लम्बा-चौड़ा सुन्दर कुण्ड अथवा अरत्नि (कुहनीसे कनिष्ठिका अँगुलीतककी दूरी)-प्रमाणवाला स्थण्डिल बनाये। उसे बार-बार अत्यन्त स्निग्ध (चिकना) करके गोमयसे लीपकर अपने-अपने वेदोंकी शाखाओंके परम्परागत मन्त्रोंसे अग्निस्थापन करके तीन समिधाएँ लेकर हूयमान सभी देवताओंका आवाहनकर पुनः कुशास्तरण करे। विधिवत् पूजन करके स्थण्डिलपर अग्निमें यज्ञकी समिधाओंके द्वारा होम करे; पहले समिधासे हवन करके बादमें चरुसे तथा घृतसे पृथक्-पृथक् हवन करे। आज्यस्थालीमें शुद्ध किये हुए घृतसे तत्त्वभूतोंको मनसे विचार करके चारों ओर अलग-अलग हवन करना चाहिये॥ ८–१३॥<br><br>[पूजन-हवनमन्त्रोंको क्रमशः बताया जाता है—]<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः। ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ भुवः विष्णवे नमः। ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा। ॐ स्वः रुद्राय नमः। ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा। ॐ महः ईश्वराय नमः। ॐ महः ईश्वराय स्वाहा। ॐ जनः प्रकृतये नमः। ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा। ॐ तपः मुद्गलाय नमः। ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा। ॐ ऋतं पुरुषाय नमः। ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा। ॐ सत्यं शिवाय नमः। ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय
श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 733, कुल 834 में से · BharatKosha