भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ३९] हिरण्याश्वदानविधि ७२५

उनतालीसवाँ अध्याय

हिरण्याश्वदानविधि

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमार उवाच<br><br>हिरण्याश्वप्रदानं च वदामि विजयावहम्।<br>अश्वमेधात्पुनः श्रेष्ठं वदामि शृणु सुव्रत॥ १सनत्कुमार बोले— अब मैं विजयकी प्राप्ति करानेवाले हिरण्याश्वदानकी विधि बताता हूँ; हे सुव्रत! अश्वमेधयज्ञसे भी श्रेष्ठ इस दानका वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनें॥ १॥
अष्टोत्तरसहस्रेण अष्टोत्तरशतेन वा।<br>कृत्वाश्वं लक्षणैर्युक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम्॥ २<br><br>पञ्चकल्याणसम्पन्नं दिव्याकारं तु कारयेत्।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वाङ्गैश्च समन्वितम्॥ ३<br><br>सर्वायुधसमोपेतमिन्द्रवाहनमुत्तमम् ।<br>तन्मध्यदेशे संस्थाप्य तुरङ्गं स्वगुणान्वितम्॥ ४<br><br>उच्चैःश्रवसकं मत्वा भक्त्या चैव समर्चयेत्।<br>तस्य पूर्वदिशाभागे ब्राह्मणं वेदपारगम्॥ ५एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ निष्क सुवर्णसे एक अश्वका निर्माण करके उसे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त अलंकारोंसे सुशोभित, पंचकल्याणसम्पन्न (श्वेतवर्णके चारों पाद तथा श्वेतवर्णके मुखवाला) और दिव्य आकृतिवाला बनाना चाहिये। साथ ही सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त, समस्त अंगोंवाला तथा सभी प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित एक उत्तम इन्द्ररथ बनाकर उसके अग्रभागके मध्यस्थानमें सुन्दर गुणोंवाले उस अश्वको स्थापित करके उसे 'उच्चैःश्रवा' अश्व मानकर भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये॥ २-४ १/२॥
सुरेन्द्रबुद्ध्या सम्पूज्य पञ्चनिष्कं प्रदापयेत्।<br>स चाश्वः शिवभक्ताय दातव्यो विधिनैव तु॥ ६<br><br>सुवर्णाश्वं प्रदत्त्वा तु आचार्यमपि पूजयेत्।<br>यथाविभवविस्तारं पञ्चनिष्कमथापि वा॥ ७<br><br>दीनान्धकृपणानाथबालवृद्धकृशातुरान् ।<br>तोषयेदन्नदानेन ब्राह्मणांश्च विशेषतः॥ ८उसके पूर्व दिशा भागमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको आसीन करके उन्हें इन्द्र मानकर उनकी पूजाकर पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे और वह सुवर्ण-अश्व विधिपूर्वक शिवभक्त विप्रको दे दे। अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्ण-अश्व प्रदान करके आचार्यकी पूजा करे अथवा पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे। तत्पश्चात् दीनों, अन्धों, असहायों, बालकों, वृद्धों, दुर्बलों तथा रोगियों और विशेषकर ब्राह्मणोंको अन्नदानके द्वारा सन्तुष्ट करे॥ ५-८॥
एतद्यः कुरुते भक्त्या दानमश्वस्य मानवः।<br>ऐन्द्रान् भोगांश्चिरं भुक्त्वा रुचिरैश्वर्यवान् भवेत्॥ ९जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस सुवर्ण-अश्वका दान करता है, वह दीर्घकालतक इन्द्रतुल्य सुखोंका भोग करके महान् ऐश्वर्यशाली हो जाता है॥ ९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्याश्वदानं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हिरण्याश्वदान' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥