श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११- भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य
| ६२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| वर्तमानानि सर्वाणि ब्रह्माण्डानि तदाज्ञया।<br>वर्तन्ते सर्वभूतौधैः समेतानि समन्ततः॥ ४५<br>अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि तदाज्ञया।<br>प्रवृत्तानि पदार्थौधैः सहितानि समन्ततः॥ ४६<br>ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मकैः।<br>करिष्यन्ति शिवस्याज्ञां सर्वैरावरर्णैः सह॥ ४७ | ब्रह्माण्ड सब प्रकारसे उन्हींकी आज्ञासे स्थित हैं; उन्हींकी आज्ञासे असंख्य ब्रह्माण्ड अनेक पदार्थोंसहित उत्पन्न हुए और समाप्त भी हो गये। इसी प्रकार आगे होनेवाले अनेक ब्रह्माण्ड होंगे और वे अपने सभी पदार्थों तथा आवरणोंके साथ शिवकी आज्ञाका पालन करेंगे॥ ४४-४७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे उमापतेर्महिमवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'उमापतिमहिमावर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य
| सनत्कुमार उवाच<br>विभूतीः शिवयोर्मह्यमाचक्ष्व त्वं गणाधिप।<br>परापरविदां श्रेष्ठ परमेश्वरभावित॥ १ | सनत्कुमार बोले—परापरवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा परमेश्वर शिवको प्राप्त कर लेनेवाले हे गणाधिप! अब आप मुझसे शिव तथा पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन करें॥ १॥ |
|---|---|
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि विभूतीः शिवयोरहम्।<br>सनत्कुमार योगीन्द्र ब्रह्मणस्तनयोत्तम॥ २ | नन्दिकेश्वर बोले—ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ तथा योगिप्रवर हे सनत्कुमार! मैं शिव तथा पार्वतीकी विभूतियोंको आपको अवश्य बताऊँगा [वे इस प्रकार हैं—]॥ २॥ |
| परमात्मा शिवः प्रोक्तः शिवा सा च प्रकीर्तिता।<br>शिवमेवेश्वरं प्राहुर्मायां गौरीं विदुर्बुधाः॥ ३<br>पुरुषं शङ्करं प्राहुर्गौरीं च प्रकृतिं द्विजाः।<br>अर्थः शम्भुः शिवा वाणी दिवसोजः शिवा निशा॥ ४<br>सप्ततन्तुर्महादेवो रुद्राणी दक्षिणा स्मृता।<br>आकाशं शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया॥ ५<br>समुद्रो भगवान् रुद्रो वेला शैलेन्द्रकन्यका।<br>वृक्षः शूलायुधो देवः शूलपाणिप्रिया लता॥ ६ | वे परमात्मा शिव (कल्याणरूप) कहे गये हैं तथा वे पार्वती शिवा (कल्याणरूपिणी) कही गयी हैं। विद्वानोंने शिवको ही ईश्वर कहा है तथा पार्वतीको माया कहा है। द्विजोंने शंकरको पुरुष तथा गौरीको प्रकृति बताया है। शिव अर्थस्वरूप हैं तो पार्वती वाणी हैं और शिव दिन हैं तो पार्वती रात हैं। महादेव सप्ततन्तुरूप यज्ञ हैं और रुद्राणीको दक्षिणा कहा गया है। भगवान् शंकर आकाश हैं तथा शंकरप्रिया पार्वती पृथ्वी हैं। भगवान् रुद्र समुद्र हैं और गिरिराजकुमारी उसकी लहरें हैं। शूलको आयुधरूपमें धारण करनेवाले भगवान् शिव वृक्ष हैं तो हाथमें शूल धारण करनेवाले शिवकी प्रिया पार्वती उसकी लता हैं॥ ३—६॥ |
| ब्रह्मा हरोऽपि सावित्री शङ्करार्धशरीरिणी।<br>विष्णुर्महेश्वरो लक्ष्मीर्भवानी परमेश्वरी॥ ७<br>वज्रपाणिर्महादेवः शची शैलेन्द्रकन्यका।<br>जातवेदाः स्वयं रुद्रः स्वाहा शवार्थकायिनी॥ ८ | शिव ब्रह्मा हैं तो शंकरकी अर्धांगिनी पार्वती सावित्री हैं। महेश्वर शिव विष्णु हैं तो परमेश्वरी भवानी लक्ष्मी हैं। महादेव हाथमें वज्र धारण करनेवाले इन्द्र हैं तो पर्वतराजकी |
अध्याय ११ ] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यमस्त्रियम्बको देवस्तत्प्रिया गिरिकन्यका।<br>वरुणो भगवान् रुद्रो गौरी सर्वार्थदायिनी ॥ ९<br><br>बालेन्दुशेखरो वायुः शिवा शिवमनोरमा।<br>चन्द्रार्धमौलियक्षेन्द्रः स्वयमृद्धिः शिवा स्मृता ॥ १०<br><br>चन्द्रार्धशेखरश्चन्द्रो रोहिणी रुद्रवल्लभा।<br>सप्तसप्तिः शिवः कान्ता उमादेवी सुवर्चला ॥ ११ | पुत्री उमा शची हैं। स्वयं रुद्र ही अग्नि हैं तो शिवकी अर्धाङ्गिनी पार्वती स्वाहा हैं। त्रिनेत्र शिव यम हैं तो गिरिपुत्री पार्वती उनकी प्रिया हैं। भगवान् रुद्र वरुण हैं तो समस्त अभीष्ट प्रदान करनेवाली पार्वती उनकी भार्या हैं। बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले शिव वायु हैं तो शिववल्लभा पार्वती उनकी भार्या हैं। मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित होनेवाले शिव कुबेर हैं तो साक्षात् शिवा कुबेरपत्नी ऋद्धि कही गयी हैं। अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले शिव चन्द्रमा हैं तो रुद्रप्रिया शिवा रोहिणी हैं। भगवान् शिव सूर्यदेव हैं तो उनकी प्रिया भगवती उमा [ सूर्यपत्नी ] सुवर्चला हैं ॥ ७—११॥ |
| षण्मुखस्त्रिपुरध्वंसी देवसेना हरप्रिया।<br>उमा प्रसूतिर्वै ज्ञेया दक्षो देवो महेश्वरः ॥ १२<br><br>पुरुषाख्यो मनुः शम्भुः शतरूपा शिवप्रिया।<br>विदुर्भवानीमाकूतिं रुचिं च परमेश्वरम् ॥ १३<br><br>भृगुर्भगाक्षिहा देवः ख्यातिस्त्रिनयनप्रिया।<br>मरीचिर्भगवान् रुद्रः सम्भूतिर्वल्लभा विभोः ॥ १४<br><br>विदुर्भवानीं रुचिरां कविं च परमेश्वरम्।<br>गङ्गाधरोऽङ्गिरा ज्ञेयः स्मृतिः साक्षादुमा स्मृता ॥ १५<br><br>पुलस्त्यः शशभृन्मौलिः प्रीतिः कान्ता पिनाकिनः।<br>पुलहस्त्रिपुरध्वंसी दया कालरिपुप्रिया ॥ १६<br><br>क्रतुर्दक्षकतुध्वंसी सन्नतिर्दयिता विभोः।<br>त्रिनेत्रोऽत्रिरुमा साक्षादनुसूया स्मृता बुधैः ॥ १७<br><br>ऊर्जामाहुरुमां वृद्धां वसिष्ठं च महेश्वरम्।<br>शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी ॥ १८ | त्रिपुरका नाश करनेवाले शिव कार्तिकेय हैं तो शिवप्रिया पार्वती [ कार्तिकेयभार्या ] देवसेना हैं। भगवान् महेश्वर दक्षप्रजापति हैं तो उमाको प्रसूति जानना चाहिये। शम्भु पुरुष नामक मनु हैं तो शिवप्रिया पार्वती शतरूपा हैं। परमेश्वर शिवको रुचिप्रजापति तथा भवानीको आकूति कहा गया है। भगके नेत्रको विनष्ट करनेवाले शिव भृगु हैं तो त्रिनेत्र शिवकी प्रिया पार्वती ख्याति हैं। भगवान् रुद्र मरीचि हैं तो प्रभु शिवकी प्रिया पार्वती सम्भूति हैं। परमेश्वरको कवि (शुक्र) तथा भवानीको रुचिरा कहा गया है। गङ्गाधर शिवको अंगिराके रूपमें जानना चाहिये और साक्षात् उमाको स्मृतिके रूपमें समझना चाहिये। चन्द्रशेखर शंकरजी पुलस्त्य हैं तो पिनाकधारी शिवकी प्रिया पार्वती प्रीति हैं। त्रिपुरका विध्वंस करनेवाले शिव ऋषि पुलह हैं तो कालरिपु शिवकी प्रिया उमा दया हैं। दक्षके यज्ञको नष्ट करनेवाले शिव क्रतु हैं तो सर्वव्यापी शिवकी भार्या पार्वती सन्नति हैं। विद्वानोंने तीन नेत्रोंवाले शिवको अत्रि तथा साक्षात् उमाको अनसूया कहा है। महेश्वर शिवको वसिष्ठ तथा श्रेष्ठ उमाको ऊर्जा कहा गया है। [ संसारके ] सभी पुरुष शिवरूप हैं और सभी स्त्रियाँ महेश्वरी पार्वतीरूपा हैं ॥ १२–१८॥ |
| पुल्लिङ्गशब्दवाच्या ये ते च रुद्राः प्रकीर्तिताः।<br>स्त्रीलिङ्गशब्दवाच्या याः सर्वा गौर्या विभूतयः ॥ १९<br><br>सर्वे स्त्रीपुरुषाः प्रोक्तास्तयोरेव विभूतयः।<br>पदार्थशक्तयो या यास्ता गौरीति विदुर्बुधाः ॥ २०<br><br>सा सा विश्वेश्वरी देवी स च सर्वो महेश्वरः।<br>शक्तिमन्तः पदार्था ये स च सर्वो महेश्वरः ॥ २१ | पुल्लिंगशब्दवाची जो भी पदार्थ हैं, वे सब रुद्र कहे गये हैं; स्त्रीलिङ्गशब्दवाची जो भी हैं, वे सब गौरीकी विभूतियाँ हैं। सभी स्त्री-पुरुष उन्हीं दोनोंकी ही विभूतियाँ कही गयी हैं। पदार्थोंकी जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब गौरी |
| ६२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टौ प्रकृतयो देव्या मूर्त्तयः परिकीर्त्तिताः।<br>तथा विकृतयस्तस्या देहबद्धविभूतयः ॥ २२<br><br>विस्फुलिङ्गा यथा तावदग्नौ च बहुधा स्मृताः।<br>जीवाः सर्वे तथा शर्वे द्वन्द्वसत्त्वमुपागताः ॥ २३<br><br>गौरीरूपाणि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्।<br>शरीरिणस्तथा सर्वे शङ्करांशा व्यवस्थिताः ॥ २४<br><br>श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता देवो महेश्वरः।<br>विषयित्वं विभुर्धत्ते विषयात्मकतामुमा ॥ २५<br><br>स्रष्टव्यं वस्तुजातं तु धत्ते शङ्करवल्लभा।<br>स्रष्टा स एव विश्वात्मा बालचन्द्रार्धशेखरः ॥ २६<br><br>दृश्यवस्तु प्रजारूपं बिभर्ति भुवनेश्वरी।<br>द्रष्टा विश्वेश्वरो देवः शशिखण्डशिखामणिः ॥ २७ | हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। वह शक्ति विश्वेश्वरी देवी उमा ही हैं और वह समस्त पदार्थ भगवान् महेश्वर ही हैं। शक्तिसे युक्त जो भी पदार्थ हैं, वे सब महेश्वर शिवरूप हैं। आठों प्रकृतियाँ देवीकी मूर्तियाँ हैं और सभी विकृतियाँ उनकी देहबद्ध विभूतियाँ कही गयी हैं। जैसे अग्निमें अनेक विस्फुलिङ्ग बताये गये हैं, वैसे ही द्वन्द्वसत्त्वको प्राप्त शिवमें सभी जीव स्थित हैं। जीवोंके समस्त शरीर गौरीरूप हैं और समस्त जीव शंकरके अंशरूपसे उनमें व्यवस्थित हैं। श्रवणके योग्य सब कुछ उमाका रूप है और उसके श्रोता भगवान् महेश्वर हैं। शिव विषयका आस्वादकत्व धारण करते हैं और पार्वती विषयात्मकता धारण करती हैं। शंकरप्रिया पार्वती सृजन करनेयोग्य सभी वस्तुओंको धारण करती हैं और अर्धबालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे विश्वात्मा ही उनके स्रष्टा हैं। भुवनेश्वरी उमा समस्त प्रजारूप दृश्य वस्तुओंको धारण करती हैं और चन्द्रखण्डको सिरपर धारण करनेवाले भगवान् विश्वेश्वर उनके द्रष्टा हैं॥ १९–२७॥ |
| रसजातमुमारूपं घ्रेयजातं च सर्वशः।<br>देवो रसयिता शम्भुर्घाता च भुवनेश्वरः ॥ २८<br><br>मन्तव्यवस्तुतां धत्ते महादेवी महेश्वरी।<br>मन्ता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः ॥ २९<br><br>बोद्धव्यं वस्तुरूपं च बिभर्ति भववल्लभा।<br>देवः स एव भगवान् बोद्धा बालेन्दुशेखरः ॥ ३०<br><br>पीठाकृतिरुमा देवी लिङ्गरूपश्च शङ्करः।<br>प्रतिष्ठाप्य प्रयत्नेन पूजयन्ति सुरासुराः ॥ ३१<br><br>ये ये पदार्था लिङ्गाङ्कास्ते ते शर्वविभूतयः।<br>अर्था भगाङ्किता ये ये ते ते गौर्या विभूतयः ॥ ३२<br><br>स्वर्गपाताललोकान्तब्रह्माण्डावरणाष्टकम् ।<br>ज्ञेयं सर्वमुमारूपं ज्ञाता देवो महेश्वरः ॥ ३३<br><br>बिभर्ति क्षेत्रतां देवी त्रिपुरान्तकवल्लभा।<br>क्षेत्रज्ञत्वमथो धत्ते भगवानन्धकान्तकः ॥ ३४ | सम्पूर्ण रस उमारूप है और शम्भु रस ग्रहण करनेवाले हैं; सूँघनेयोग्य वस्तुसमूह उमारूप है और शिव उसके घ्राता हैं। महादेवी महेश्वरी माननेयोग्य वस्तुता (भाव)-को धारण करती हैं और वे विश्वात्मा महादेव महेश्वर उसका मनन करनेवाले हैं। शिवप्रिया पार्वती बोध करनेयोग्य वस्तुओंको धारण करती हैं और बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे भगवान् शिव उनके बोद्धा हैं। उमा पीठाकृति (जलहरी) हैं और शिव [उसमें स्थित] लिङ्गरूप हैं। देवता तथा दानव लिङ्ग तथा वेदीके रूपमें स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करते हैं। जो-जो पदार्थ पुरुषचिह्नोंवाले हैं, वे शिवकी विभूतियाँ हैं और जो-जो पदार्थ स्त्रीचिह्नोंवाले हैं, वे गौरीकी विभूतियाँ हैं। स्वर्गसे पाताललोकपर्यन्त आठ आवरणोंवाले ब्रह्माण्डमें जो भी जाननेयोग्य है, वह सब उमारूप है और उसके ज्ञाता भगवान् महेश्वर हैं। त्रिपुराका नाश करनेवाले शिवकी प्रिया देवी [पार्वती] क्षेत्रता (लिङ्गशरीररूपता)-को धारण करती हैं और अन्धकका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] क्षेत्रज्ञत्व (जीवरूपत्व)-को धारण करते हैं॥ २८–३४॥ |
अध्याय ११] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२३
| श्लोक | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| शिवलिङ्गं समुत्सृज्य यजन्ते चान्यदेवताः।<br>स नृपः सह देशेन रौरवं नरकं व्रजेत्॥ ३५<br><br>शिवभक्तो न यो राजा भक्तोऽन्येषु सुरेषु यः।<br>स्वपतिं युवतिस्त्यक्त्वा यथा जारेषु राजते॥ ३६<br><br>ब्रह्मादयः सुराः सर्वे राजानश्च महर्द्धिकाः।<br>मानवा मुनयश्चैव सर्वे लिङ्गं यजन्ति च॥ ३७<br><br>विष्णुना रावणं हत्वा ससैन्यं ब्रह्मणः सुतम्।<br>स्थापितं विधिवद्भक्त्या लिङ्गं तीरे नदीपतेः॥ ३८ | [जिस राजाके राज्यमें] लोग शिवलिङ्गको छोड़कर अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वह राजा अपने देशसहित रौरव नरकमें जाता है। जो राजा शिवभक्त नहीं है और अन्य देवताओंके प्रति भक्तिपरायण रहता है, वह वैसे ही है, जैसे कोई युवती अपने पतिको छोड़कर परपुरुषोंमें आसक्ति रखती है। ब्रह्मा आदि सभी देवता, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली राजा, मनुष्य तथा मुनिगण शिवलिङ्गकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने [रामावतारमें] सेनासहित ब्राह्मणपुत्र रावणका संहार करके समुद्रके तटपर विधिपूर्वक शिवलिङ्गकी स्थापना की थी॥ ३५—३८॥ |
| कृत्वा पापसहस्त्राणि हत्वा विप्रशतं तथा।<br>भावात्समाश्रितो रुद्रं मुच्यते नात्र संशयः॥ ३९<br><br>सर्वे लिङ्गमया लोकाः सर्वे लिङ्गे प्रतिष्ठिताः।<br>तस्मादभ्यर्चयेल्लिङ्गं यदिच्छेच्छाश्वतं पदम्॥ ४०<br><br>सर्वाकारौ स्थितावेतौ नरैः श्रेयोऽर्थिभिः शिवौ।<br>पूजनीयौ नमस्कार्यौ चिन्तनीयौ च सर्वदा॥ ४१ | हजारों पाप करके तथा सैकड़ों विप्रोंका वध करके भी जो भक्तिपूर्वक रुद्रका आश्रय ग्रहण करता है, वह मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। समस्त लोक लिङ्गमय है और सभी लिङ्गमें ही स्थित हैं; अतः यदि कोई शाश्वत पदकी इच्छा रखता हो, तो उसे शिवलिङ्गका पूजन अवश्य करना चाहिये। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको सर्वरूपमें स्थित इन दोनों (शिव-पार्वती)-का सर्वदा पूजन, नमस्कार और चिन्तन करना चाहिये॥ ३९—४१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविभूतिमहिमवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविभूतिमहिमावर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥
१२- भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता
| ६२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
बारहवाँ अध्याय
भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>मूर्तयोऽष्टौ समाचक्ष्व शङ्करस्य महात्मनः।<br>विश्वरूपस्य देवस्य गणेश्वर महामते॥ १ | सनत्कुमार बोले— हे गणेश्वर! हे महामते! विश्वरूप महात्मा भगवान् शंकरकी आठ मूर्तियोंको आप मुझे बतायें॥ १॥ |
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि महिमानमुमापतेः।<br>विश्वरूपस्य देवस्य सरोजभवसम्भव॥ २<br><br>भूरापोऽग्निर्मरुद् व्योम भास्करो दीक्षितः शशी।<br>भवस्य मूर्तयः प्रोक्ताः शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ३<br><br>खात्मेन्दुवह्निसूर्याम्भोधराः पवन इत्यपि।<br>तस्याष्टमूर्तयः प्रोक्ता देवदेवस्य धीमतः॥ ४<br><br>अग्निहोत्रेऽर्पिते तेन सूर्यात्मनि महात्मनि।<br>तद्विभूतीस्तथा सर्वे देवास्तृप्यन्ति सर्वदा॥ ५<br><br>वृक्षस्य मूलसेकेन यथा शाखोपशाखिकाः।<br>तथा तस्यार्चया देवास्तथा स्युस्तद्विभूतयः॥ ६ | नन्दिकेश्वर बोले— हे कमलयोनि (ब्रह्मा)-के पुत्र! मैं उमापति विश्वरूप महादेवकी महिमाका वर्णन आपसे अवश्य करूँगा। भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, भास्कर, यजमान तथा चन्द्र—ये परमेष्ठी भगवान् शिवकी आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। आकाश, आत्मा (जीव), चन्द्र, अग्नि, सूर्य, जल, पृथ्वी, पवन—ये भी उन बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेवकी आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसीलिये अग्निमें विधिपूर्वक दी गयी आहुति, सूर्यको प्रदत्त अर्घ्य आदि तथा परमात्माके प्रति समर्पित पदार्थसे उनकी समस्त विभूतियाँ और सभी देवता सदैव तृप्त होते हैं। जिस प्रकार वृक्षके मूलको सींचनेसे उसकी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ स्वयं पोषित होती हैं, उसी प्रकार उन शिवकी पूजासे देवगण तथा उनकी विभूतियाँ स्वयं सन्तुष्ट हो जाती हैं॥ २—६॥ |
| तस्य द्वादशधा भिन्नं रूपं सूर्यात्मकं प्रभोः।<br>सर्वदेवात्मकं याज्यं यजन्ति मुनिपुङ्गवाः॥ ७ | उन प्रभु शिवके बारह प्रकारके भिन्न सूर्यात्मक रूप हैं; श्रेष्ठ मुनिगण उसी सर्वदेवात्मक पूज्य रूपका यजन करते हैं॥ ७॥ |
| अमृताख्या कला तस्य सर्वस्यादित्यरूपिणः।<br>भूतसञ्जीवनी चेष्टा लोकेऽस्मिन् पीयते सदा॥ ८ | उन आदित्यरूप भगवान् शिवकी अमृता नामक कला प्राणियोंको जीवन प्रदान करती है; इस लोकमें सभीके लिये प्रिय इस कलाका सदा पान किया जाता है॥ ८॥ |
| चन्द्राख्यकिरणास्तस्य धूर्जटेर्भास्करात्मनः।<br>ओषधीनां विवृद्ध्यर्थं हिमवृष्टिं वितन्वते॥ ९ | सूर्यरूप उन भगवान् शिवकी चन्द्र नामक किरणें औषधियोंकी वृद्धिके लिये हिमवृष्टिका विस्तार करती हैं॥ ९॥ |
| शुक्लाख्या रश्मयस्तस्य शम्भोर्मार्तण्डरूपिणः।<br>घर्मं वितन्वते लोके सस्यपाकादिकारणम्॥ १० | मार्तण्डरूपी उन शिवकी शुक्ल नामक किरणें फसलोंके पाक आदिकी कारणरूप ऊष्माका लोकमें विस्तार करती हैं॥ १०॥ |
| दिवाकरात्मनस्तस्य हरिकेशाह्वयः करः।<br>नक्षत्रपोषकश्चैव प्रसिद्धः परमेष्ठिनः॥ ११ | उन सूर्यरूप परमेष्ठी शिवकी हरिकेश नामसे |
अध्याय १२] भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता ६२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विश्वकर्माह्वयस्तस्य किरणो बुधपोषकः।<br>सर्वेश्वरस्य देवस्य सप्तसप्तिस्वरूपिणः॥ १२<br>विश्वव्यच इति ख्यातः किरणस्तस्य शूलिनः।<br>शुक्रपोषकभावेन प्रतीतः सूर्यरूपिणः॥ १३<br>संयद्वसुरिति ख्यातो यस्य रश्मिस्त्रिशूलिनः।<br>लोहिताङ्गं प्रपुष्णाति सहस्रकिरणात्मनः॥ १४<br>अर्वावसूरिति ख्यातो रश्मिस्तस्य पिनाकिनः।<br>बृहस्पतिं प्रपुष्णाति सर्वदा तपनात्मनः॥ १५<br>स्वराडिति समाख्यातः शिवस्यांशः शनैश्चरम्।<br>हरिदश्वात्मनस्तस्य प्रपुष्णाति दिवानिशम्॥ १६<br>सूर्यात्मकस्य देवस्य विश्वयोनेरुमापतेः।<br>सुषुम्णाख्यः सदा रश्मिः पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥ १७ | प्रसिद्ध किरण नक्षत्रोंको दीप्ति प्रदान करती है। उन सूर्यरूप सर्वेश्वर प्रभुकी विश्वकर्मा नामक किरण बुधका पोषण करती है। उन शूलधारी सूर्यरूप शिवकी विश्वव्यच—इस नामसे प्रसिद्ध किरण शुक्रके पोषकभावसे प्रतिष्ठित है। उन सूर्यरूप त्रिशूलधारी शिवकी संयद्वसु—इस नामसे प्रसिद्ध किरण मंगलका पोषण करती है। उन सूर्यरूप पिनाकी शिवकी अर्वावसु—इस नामवाली किरण सर्वदा बृहस्पतिका पोषण करती है। सूर्यरूप उन शिवकी स्वराट्—इस नामसे प्रसिद्ध किरण दिन-रात शनैश्चरका पोषण करती है। विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले उमापति सूर्यरूप महादेवकी सुषुम्णा नामक किरण सदा चन्द्रमाका पोषण करती है॥ ११—१७॥ |
| सौम्यानां वसुजातानां प्रकृतित्वमुपागता।<br>तस्य सोमाह्वया मूर्तिः शङ्करस्य जगद्गुरोः॥ १८<br>तस्य सोमात्मकं रूपं शुक्रत्वेन व्यवस्थितम्।<br>शरीरभाजां सर्वेषां देवस्यान्तकशासिनः॥ १९<br>शरीरिणामशेषाणां मनस्येव व्यवस्थितम्।<br>वपुः सोमात्मकं शम्भोस्तस्य सर्वजगद्गुरोः॥ २० | उन जगद्गुरु शंकरकी सोम (चन्द्र) नामक मूर्ति समस्त शान्त किरणोंकी प्रकृतिको प्राप्त है। कालपर शासन करनेवाले उन शिवका सोमात्मकरूप सभी देहधारियोंमें शुक्र (वीर्य)-रूपसे व्यवस्थित है। समस्त जगत्के गुरु उन शिवका चन्द्ररूप शरीर ही सभी जीवोंके मनमें प्रतिष्ठित है॥ १८—२०॥ |
| शम्भोः षोडशधा भिन्ना स्थितामृतकलात्मनः।<br>सर्वभूतशरीरेषु सोमाख्या मूर्तिरुत्तमा॥ २१ | चन्द्ररूप शिवकी सोम नामक उत्तम मूर्ति सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें सोलह प्रकारके विभिन्न रूपोंमें स्थित है॥ २१॥ |
| देवान् पितॄंश्च पुष्णाति सुधयामृतया सदा।<br>मूर्तिः सोमाह्वया तस्य देवदेवस्य शासितुः॥ २२ | उन देवाधिदेव प्रभुकी 'चन्द्र' नामक मूर्ति अपनी अविनाशी सुधासे देवताओं और पितरोंको सदा तृप्त करती रहती है॥ २२॥ |
| पुष्णात्योषधिजातानि देहिनामात्मशुद्धये।<br>सोमाह्वया तनुस्तस्य भवानीमिति निर्दिशेत्॥ २३ | उन शिवकी सोम नामक मूर्ति प्राणियोंकी देहशुद्धिके लिये समस्त औषधियोंको पोषित करती है; उस मूर्तिको भवानीरूप ही समझना चाहिये॥ २३॥ |
| यज्ञानां पतिभावेन जीवानां तपसामपि।<br>प्रसिद्धरूपमेतद्वै सोमात्मकमुमापतेः॥ २४<br>जलानामोषधीनां च पतिभावेन विश्रुतम्।<br>सोमात्मकं वपुस्तस्य शम्भोर्भगवतः प्रभोः॥ २५ | उमापति शिवकी यह चन्द्ररूप मूर्ति यज्ञों, जीवों और तपोंके स्वामीके रूपमें प्रसिद्ध है। उन सर्वशक्तिमान् भगवान् शम्भुका चन्द्ररूप विग्रह जल और औषधियोंके स्वामीके रूपमें विख्यात है॥ २४-२५॥ |
| देवो हिरण्मयो मृष्टः परस्परविवेकिभिः।<br>करणानामशेषाणां देवतानां निराकृतिः॥ २६ | आत्मा और अनात्मा-सम्बन्धी विचारसम्पन्न जनोंसे सुविचारित जो सदाशिव हैं, वे समस्त इन्द्रियों तथा उनके देवताओंसे अग्राह्य हैं तथा विशुद्ध अमृतरूप हैं॥ २६॥ |
| ६२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जीवत्वेन स्थिते तस्मिन् शिवे सोमात्मके प्रभौ।<br>मधुरा विलयं याति सर्वलोकैकरक्षिणी॥ २७ | उन चन्द्ररूप भगवान् शिवके जीवरूपमें आत्मामें निश्चल हो जानेपर समस्त लोकोंपर एकमात्र शासन करनेवाली माया तिरोहित हो जाती है॥ २७॥ |
| यजमानाह्वया मूर्तिः शैवी हव्यैरहर्निशम्।<br>पुष्णाति देवताः सर्वाः कव्यैः पितृगणानपि॥ २८ | शिवकी यजमान नामक मूर्ति हव्य द्रव्योंसे सभी देवताओं तथा कव्य द्रव्योंसे पितरोंको भी निरन्तर सन्तृप्त करती है॥ २८॥ |
| यजमानाह्वया या सा तनुश्चाहुतिजा तया।<br>वृष्ट्या भावयति स्पष्टं सर्वमेव परापरम्॥ २९ | यजमान नामक जो [शिवकी] मूर्ति है, वह आहुतिजन्य वृष्टिसे सभी परापर पदार्थोंको उत्पन्न करती है—यह प्रसिद्ध ही है॥ २९॥ |
| अन्तःस्थं च बहिःस्थं च ब्रह्माण्डानां स्थितं जलम्।<br>भूतानां च शरीरस्थं शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ३० | ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर व्याप्त जल तथा प्राणियोंके शरीरमें स्थित जल उन्हीं शिवकी श्रेष्ठ मूर्ति है॥ ३०॥ |
| नदीनाममृतं साक्षान्नदानामपि सर्वदा।<br>समुद्राणां च सर्वत्र व्यापी सर्वमुमापतिः॥ ३१<br><br>सञ्जीविनी समस्तानां भूतानामेव पाविनी।<br>अम्बिका प्राणसंस्था या मूर्तिरम्बुमयी परा॥ ३२ | नदियों, नदों और समुद्रोंके अमृतमय सारे जलके रूपमें सर्वत्र उमापति शिव ही सर्वदा व्याप्त हैं। यह मूर्ति समस्त जीवोंको जीवन प्रदान करनेवाली तथा उन्हें पवित्र करनेवाली है। चन्द्ररूपा उमाके हृदयमें जो मूर्ति स्थित है, वह भगवान् शिवकी जलमयी परामूर्ति ही है॥ ३१-३२॥ |
| अन्तःस्थश्च बहिःस्थश्च ब्रह्माण्डानां विभावसुः।<br>यज्ञानां च शरीरस्थः शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ३३<br><br>शरीरस्था च भूतानां श्रेयसी मूर्तिरैश्वरी।<br>मूर्तिः पावकसंस्था या शम्भोरत्यन्तपूजिता॥ ३४<br><br>भेदा एकोनपञ्चाशद्वेदविद्भिरुदाहृताः।<br>हव्यं वहति देवानां शम्भोर्यज्ञात्मकं वपुः॥ ३५<br><br>कव्यं पितृगणानां च हूयमानं द्विजातिभिः।<br>सर्वदेवमयं शम्भोः श्रेष्ठमग्न्यात्मकं वपुः॥ ३६<br><br>वदन्ति वेदशास्त्रज्ञा यजन्ति च यथाविधि।<br>अन्तःस्थो जगदण्डानां बहिःस्थश्च समीरणः॥ ३७ | ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर व्याप्त और यज्ञविग्रहमें स्थित अग्नि भगवान् शिवकी श्रेष्ठ [अग्निरूप] मूर्ति ही है। जीवोंके शरीरमें भी जठराग्निरूपसे ईश्वर शिवकी कल्याणमयी मूर्ति ही विराजमान है। भगवान् शिवकी जो अग्निरूप मूर्ति है, वह अत्यन्त पूजित है। वेदवेत्ताओंने इसके उनचास भेद बताये हैं। भगवान् शिवका यह अग्निरूप विग्रह द्विजातियोंके द्वारा आहुति प्रदान किये जानेपर देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करता है। वेद तथा शास्त्रोंको जाननेवाले भगवान् शिवकी अग्निरूप मूर्तिको सर्वदेवमय तथा श्रेष्ठ कहते हैं और विधिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं॥ ३३-३६ १/२॥ |
| शरीरस्थश्च भूतानां शैवी मूर्तिः पटीयसी।<br>प्राणाद्या नागकूर्माद्या आवहाद्याश्च वायवः॥ ३८<br><br>ईशानमूर्तेरेकस्य भेदाः सर्वे प्रकीर्तिताः।<br>अन्तःस्थं जगदण्डानां बहिःस्थं च वियद्विभोः॥ ३९ | ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर स्थित और जीवोंके शरीरमें स्थित जो वायु है, वह शिवकी महिमामयी मूर्ति ही है। प्राण आदि, नाग-कूर्म आदि और आवह आदि वायु हैं; वे सब उसी एकमात्र शिवकी मूर्तिके भेद कहे गये हैं॥ ३७-३८ १/२॥ |
१३- भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन
अध्याय १३] भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपोंका वर्णन ६२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शरीरस्थं च भूतानां शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी।<br>शम्भोर्विश्वम्भरा मूर्तिः सर्वब्रह्माधिदेवता ॥ ४०<br><br>चराचराणां भूतानां सर्वेषां धारणे मता।<br>चराचराणां भूतानां शरीराणि विदुर्बुधाः ॥ ४१<br><br>पञ्चकेनेशमूर्तीनां समारब्धानि सर्वथा।<br>पञ्चभूतानि चन्द्राकार्वात्मेति मुनिपुङ्गवाः ॥ ४२<br><br>मूर्तयोऽष्टौ शिवस्याहुर्देवदेवस्य धीमतः।<br>आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिर्यजमानाह्वया परा ॥ ४३<br><br>चराचरशरीरेषु सर्वेष्वेव स्थिता तदा।<br>दीक्षितं ब्राह्मणं प्राहूरात्मानं च मुनीश्वराः ॥ ४४<br><br>यजमानाह्वया मूर्तिः शिवस्य शिवदायिनः।<br>मूर्तयोऽष्टौ शिवस्यैता वन्दनीयाः प्रयत्नतः ॥ ४५<br><br>श्रेयोऽर्थिभिर्नरैर्नित्यं श्रेयसामेकहेतवः ॥ ४६ | ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर स्थित और प्राणियोंके देहमें स्थित जो आकाश है, वह सर्वव्यापी शम्भुकी ही महिमायुक्त मूर्ति है। भगवान् शिवकी धरारूप मूर्ति सभी ब्राह्मणोंकी मुख्य देवता है तथा समस्त चराचर प्राणियोंको धारण करनेवाली कही गयी है ॥ ३९-४० १/२ ॥<br><br>स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर भगवान् शिवकी मूर्तियोंके [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूत समुदायसे सम्यक् उत्पन्न किये गये हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। श्रेष्ठ मुनियोंने बताया है कि पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश), चन्द्र, सूर्य और आत्मा—ये ही देवदेव धीमान्की आठ मूर्तियाँ हैं। उन शिवकी जो आठवीं श्रेष्ठ मूर्ति आत्मा है, वह यजमान नामवाली भी है; यह सभी चराचर प्राणियोंके शरीरोंमें सदा स्थित रहती है। मुनीश्वरोंने दीक्षित ब्राह्मणको भी आत्मा कहा है। इसे ही कल्याणकारी शिवकी यजमान नामक मूर्ति कहा गया है। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको शिवकी इन कल्याणकी साधनभूता अष्टमूर्तियोंकी प्रयत्नपूर्वक नित्य वन्दना करनी चाहिये ॥ ४१-४६ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविश्वरूपवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविश्वरूपवर्णन' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयोऽपि वद मे नन्दिन् महिमानमुमापते।<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ॥ १<br><br>नन्दिकेश्वर उवाच<br>वक्ष्यामि ते महेशस्य महिमानमुमापतेः।<br>अष्टमूर्तेर्जगद्व्याप्य स्थितस्य परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>चराचराणां भूतानां धाता विश्वम्भरात्मकः।<br>शर्व इत्युच्यते देवः सर्वशास्त्रार्थपारगैः ॥ ३<br><br>विश्वम्भरात्मनस्तस्य सर्वस्य परमेष्ठिनः।<br>विकेशी कथ्यते पत्नी तनयोऽङ्गारकः स्मृतः ॥ ४ | सनत्कुमार बोले—हे नन्दिन्! उमापति परमेष्ठी अष्टमूर्ति महेश्वर शिवकी और भी महिमा मुझे बताइये ॥ १ ॥<br><br>नन्दिकेश्वर बोले—मैं जगत्को व्याप्त करके स्थित रहनेवाले परमेष्ठी उमापति महेशकी अष्टमूर्तिकी महिमा आपको बताऊँगा। चराचर प्राणियोंको धारण करनेवाले उन पृथ्वीरूप शिवको सभी शास्त्रोंके पारगामी विद्वान् शर्व—ऐसा कहते हैं ॥ २-३ ॥<br><br>उन पृथ्वीरूप परमेष्ठी शर्वकी पत्नी विकेशी कही जाती हैं और पुत्रको अंगारक (मंगल) कहा गया है ॥ ४ ॥ |
| ६२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भव इत्युच्यते देवो भगवान् वेदवादिभिः ।<br>सञ्जीवनस्य लोकानां भवस्य परमात्मनः ॥ ५<br>उमा सङ्कीर्तिता देवी सुतः शुक्रश्च सूरिभिः ।<br>सप्तलोकाण्डकव्यापी सर्वलोकैकरक्षिता ॥ ६ | वेदवेत्ता लोग जलमूर्ति शिवको भव—ऐसा कहते हैं। विद्वानोंके द्वारा लोगोंको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्मा भवकी भार्या देवी उमा कही गयी हैं और उनके पुत्र शुक्र कहे गये हैं॥ ५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| वह्र्यात्मा भगवान् देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः ।<br>स्वाहा पत्यात्मनस्तस्य प्रोक्ता पशुपतेः प्रिया ॥ ७<br>षण्मुखो भगवान् देवो बुधैः पुत्र उदाहृतः ।<br>समस्तभुवनव्यापी भर्ता सर्वशरीरिणाम् ॥ ८ | सभी लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले तथा सभी लोकोंके एकमात्र रक्षक अग्निरूप भगवान् शिवको विद्वानोंने पशुपति कहा है। उन परमात्मा पशुपतिकी प्रिय भार्या स्वाहा कही गयी हैं। विद्वानोंके द्वारा भगवान् कार्तिकेय उनके पुत्र कहे गये हैं॥ ६-७<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| पवनात्मा बुधैर्देव ईशान इति कीर्त्यते ।<br>ईशानस्य जगत्कर्तुर्देवस्य पवनात्मनः ॥ ९<br>शिवा देवी बुधैरुक्ता पुत्रश्चास्य मनोजवः ।<br>चराचराणां भूतानां सर्वेषां सर्वकामदः ॥ १० | समस्त भुवनोंमें व्याप्त रहनेवाले तथा सभी जीवोंका भरण-पोषण करनेवाले पवनरूप शिवको विद्वानोंके द्वारा ईशान—ऐसा कहा जाता है। विद्वानोंके द्वारा पवनात्मा जगत्कर्ता भगवान् ईशानकी पत्नी भगवती शिवा कही गयी हैं और इनके पुत्र मनोजव कहे गये हैं॥ ८-९<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| व्योमात्मा भगवान् देवो भीम इत्युच्यते बुधैः ।<br>महामहिम्नो देवस्य भीमस्य गगनात्मनः ॥ ११<br>दिशो दश स्मृता देव्यः सुतः सर्गश्च सूरिभिः ।<br>सूर्यात्मा भगवान् देवः सर्वेषां च विभूतिदः ॥ १२ | सभी स्थावर-जंगम प्राणियोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले आकाशरूप भगवान् शिवको विद्वान् भीम—ऐसा कहते हैं। विद्वान् पुरुषोंने दसों दिशाओंको उन महामहिम व्योमात्मा प्रभु भीमकी पत्नियाँ तथा सर्गको उनका पुत्र कहा है॥ १०-११<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| रुद्र इत्युच्यते देवैर्भगवान् भुक्तिमुक्तिदः ।<br>सूर्यात्मकस्य रुद्रस्य भक्तानां भक्तिदायिनः ॥ १३<br>सुवर्चला स्मृता देवी सुतश्चास्य शनैश्चरः ।<br>समस्तसौम्यवस्तूनां प्रकृतित्वेन विश्रुतः ॥ १४ | सभीको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले सूर्यरूप भगवान् शिवको देवता लोग भुक्तिमुक्तिदाता भगवान् रुद्र कहते हैं। भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेवाले उन सूर्यात्मा रुद्रकी भार्या सुवर्चला कही गयी हैं और शनैश्चर इनके पुत्र कहे गये हैं॥ १२-१३<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| सोमात्मको बुधैर्देवो महादेव इति स्मृतः ।<br>सोमात्मकस्य देवस्य महादेवस्य सूरिभिः ॥ १५<br>दयिता रोहिणी प्रोक्ता बुधश्चैव शरीरजः ।<br>हव्यकव्यस्थितिं कुर्वन् हव्यकव्याशिनां तदा ॥ १६ | समस्त सौम्य वस्तुओंकी प्रकृतिके रूपमें प्रसिद्ध सोमरूप शिवको विद्वानोंने महादेव—ऐसा कहा है। मनीषियोंने रोहिणीको उन सोमात्मक प्रभु महादेवकी पत्नी और बुधको उनका पुत्र बताया है॥ १४-१५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| यजमानात्मको देवो महादेवो बुधैः प्रभुः ।<br>उग्र इत्युच्यते सद्भििरीशानश्चेति चापरैः ॥ १७<br>उग्राह्वयस्य देवस्य यजमानात्मनः प्रभोः ।<br>दीक्षापत्नी बुधैरुक्ता सन्तानाख्यः सुतस्तथा ॥ १८ | हव्य-कव्य ग्रहण करनेवाले देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य-कव्यकी व्यवस्था करनेवाले यजमानरूप प्रभु शिवको विद्वानोंने उग्र—ऐसा कहा है तथा दूसरे श्रेष्ठ जनोंने उन्हें ईशान भी कहा है। विद्वानोंने दीक्षाको उन यजमानरूप उग्र नामक शिवकी पत्नी बताया है। उनका पुत्र सन्तान नामवाला है॥ १६-१८॥ |
अध्याय १३] भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपोंका वर्णन ६२९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शरीरिणां शरीरेषु कठिनं कोङ्कणादिवत्।<br>पार्थिवं तद्वपुर्ज्ञेयं शर्वतत्त्वं बुभुत्सुभिः॥ १९<br>देहे देहे तु देवेशो देहभाजां यदव्ययम्।<br>वस्तुद्रव्यात्मकं तस्य भवस्य परमात्मनः॥ २०<br>ज्ञेयं च तत्त्वविद्भिर्वै सर्ववेदार्थपारगैः। | जीवोंके शरीरोंमें कोंकण आदि स्थलोंकी भाँति जो कठोर पार्थिव भाग है, उसे जिज्ञासुओंको शर्व-तत्त्व समझना चाहिये। प्राणियोंके शरीरमें जो शाश्वत द्रवरूप वस्तु है, वह उन परमात्मा भवका अंश है—ऐसा सभी वेदार्थोंके पारगामी विद्वानों तथा तत्त्वज्ञोंको जानना चाहिये॥ १९-२०१/२॥ |
| आग्नेयः परिणामो यो विग्रहेषु शरीरिणाम्॥ २१<br>मूर्तिः पशुपतिर्ज्ञेया सा तत्त्वं वेत्तुमिच्छुभिः।<br>वायव्यः परिणामो यः शरीरेषु शरीरिणाम्॥ २२<br>बुधैरीशेति सा तस्य तनुर्ज्ञेया न संशयः। | प्राणियोंके शरीरोंमें जो तेजोरूप अग्निभाग है, उसे तत्त्वज्ञानकी इच्छावालोंको पशुपतिमूर्ति जाननी चाहिये। जीवोंके शरीरोंमें जो प्राण आदि वायुरूप है, उसे विद्वानोंको उन परमेश्वरकी ईशानमूर्ति समझनी चाहिये; इसमें संशय नहीं है॥ २१-२२१/२॥ |
| सुषिरं यच्छरीरस्थमशेषाणां शरीरिणाम्॥ २३<br>भीमस्य सा तनुर्ज्ञेया तत्त्वविज्ञानकाङ्क्षिभिः।<br>चक्षुरादिगतं तेजो यच्छरीरस्थमङ्गिनाम्॥ २४ | सभी जीवोंके शरीरोंमें जो छिद्ररूप [आकाश] भाग है, उसे तत्त्वविज्ञानकी आकांक्षा रखनेवालोंको भीमकी मूर्ति समझनी चाहिये। सभी प्राणियोंके शरीरोंमें चक्षु आदिमें जो सूर्यरूप तेज है, उसे परमार्थके जिज्ञासुओंको रुद्रमूर्ति जाननी चाहिये॥ २३-२४१/२॥ |
| रुद्रस्यापि तनुर्ज्ञेया परमार्थं बुभुत्सुभिः।<br>सर्वभूतशरीरेषु मनश्चन्द्रात्मकं हि यत्॥ २५<br>महादेवस्य सा मूर्तिर्बोद्धव्या तत्त्वचिन्तकैः।<br>आत्मा यो यजमानाख्यः सर्वभूतशरीरगः॥ २६ | सभी प्राणियोंके शरीरोंमें चन्द्ररूप जो मन है, उसे तत्त्वचिन्तकोंको महादेवकी मूर्ति जाननी चाहिये। सभी जीवोंके शरीरोंमें यजमान नामक जो आत्मा है, उसे परमात्मज्ञानकी कामनावाले लोगोंको उग्र नामक मूर्ति जाननी चाहिये॥ २५-२६१/२॥ |
| मूर्तिरुग्रस्य सा ज्ञेया परमात्मबुभुत्सुभिः।<br>जातानां सर्वभूतानां चतुर्दशसु योनिषु॥ २७<br>अष्टमूर्तेरनन्यत्वं वदन्ति परमर्षयः।<br>सप्तमूर्तिमयान्याहुरीशस्याङ्गानि देहिनाम्॥ २८ | महर्षिगण चौदहों योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले समस्त जीवोंमें अष्टमूर्तिकी अभिन्नता बताते हैं और उन्होंने प्राणियोंके शरीरोंको शिवकी सात मूर्तियोंसे समन्वित कहा है। सभी जीवोंके शरीरमें स्थित आत्मा उस शिवकी आठवीं मूर्ति है॥ २७-२८१/२॥ |
| आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिः सर्वभूतशरीरगा।<br>अष्टमूर्तिममुं देवं सर्वलोकात्मकं विभुम्॥ २९<br>भजस्व सर्वभावेन श्रेयः प्राप्तुं यदीच्छसि।<br>प्राणिनो यस्य कस्यापि क्रियते यद्यनुग्रहः॥ ३०<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य कृतमाराधनं भवेत्।<br>निग्रहश्चेत् कृतो लोके देहिनो यस्य कस्यचित्॥ ३१ | [हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो इन सर्वलोकस्वरूप तथा सर्वव्यापी अष्टमूर्ति भगवान् शिवकी सब प्रकारसे आराधना कीजिये। जिस किसी भी प्राणीके प्रति जो अनुग्रह किया जाता है, वह अष्टमूर्ति महेश्वरकी ही आराधना की गयी होती है। यदि लोकमें जिस किसी भी जीवको क्लेश दिया जाता है, तो वह मानो अष्टमूर्ति महेशको ही दिया गया। लोकमें यदि जिस किसी भी प्राणीका अनादर किया गया, तो वह मानो सर्वव्यापी अष्टमूर्ति |
१४- भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन
| ६३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| अष्टमूर्तेर्महेशस्य स एव विहितो भवेत्।<br>यद्यवज्ञा कृता लोके यस्य कस्यचिदङ्गिनः॥ ३२<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य विहिता सा भवेद्विभोः।<br>अभयं यत् प्रदत्तं स्यादङ्गिनो यस्य कस्यचित्॥ ३३<br>आराधनं कृतं तस्मादष्टमूर्तेर्न संशयः।<br>सर्वोपकारकरणं प्रदानमभयस्य च॥ ३४<br>आराधनं तु देवस्य अष्टमूर्तेर्न संशयः।<br>सर्वोपकारकरणं सर्वानुग्रह एव च॥ ३५<br>तदर्चनं परं प्राहुरष्टमूर्तेर्मुनीश्वराः।<br>अनुग्रहणमन्येषां विधातव्यं त्वयाङ्गिनाम्॥ ३६<br>सर्वभयप्रदानं च शिवाराधनमिच्छता॥ ३७ | महेशका ही अनादर किया गया है। जिस किसी भी प्राणीको जो अभय प्रदान किया जाता है, उससे मानो अष्टमूर्ति शिवकी आराधना कर ली गयी; इसमें सन्देह नहीं है॥ २९-३३१/२ ॥<br>सभीका उपकार करना तथा सबको अभय प्रदान करना अष्टमूर्ति शिवकी ही आराधना है; इसमें संशय नहीं है। सबका उपकार करना तथा सबपर कृपा करना—इसे मुनीश्वरोंने अष्टमूर्तिकी ही परम पूजा बतायी है। अतः [हे सनत्कुमार!] शिवकी प्रसन्नताकी कामना करनेवाले आपको अन्य सभी प्राणियोंपर अनुग्रह तथा उन्हें सर्वविध अभय प्रदान करना चाहिये॥ ३४-३७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाष्टमूर्तिवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवाष्टमूर्तिवर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच<br>पञ्च ब्रह्माणि मे नन्दिन्नाचक्ष्व गणसत्तम।<br>श्रेयःकरणभूतानि पवित्राणि शरीरिणाम्॥ १<br><br>नन्दिकेश्वर उवाच<br>शिवस्यैव स्वरूपाणि पञ्च ब्रह्माह्वयानि ते।<br>कथयामि यथातत्त्वं पद्मयोनेः सुतोत्तम॥ २<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकनिर्माता पञ्चब्रह्मात्मकः शिवः॥ ३<br>सर्वेषामेव लोकानां यदुपादानकारणम्।<br>निमित्तकारणं चाहुस्स शिवः पञ्चधा स्मृतः॥ ४<br>मूर्तयः पञ्च विख्याताः पञ्च ब्रह्माह्वयाः पराः।<br>सर्वलोकशरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः॥ ५<br>क्षेत्रज्ञः प्रथमा मूर्तिः शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>भोक्ता प्रकृतिवर्गस्य भोग्यस्येशानसंज्ञितः॥ ६<br>स्थाणोस्तत् पुरुषाख्या च द्वितीया मूर्तिरुच्यते।<br>प्रकृतिः सा हि विज्ञेया परमात्मगुहात्मिका॥ ७ | सनत्कुमार बोले—हे गणोंमें श्रेष्ठ नन्दिन्! जीवोंके लिये कल्याणकारी तथा परम पवित्र पंचब्रह्मोंके विषयमें मुझे बताइये॥ १॥<br><br>नन्दिकेश्वर बोले—हे ब्रह्माजीके उत्तम पुत्र! मैं आपसे शिवजीके पंचब्रह्म नामक स्वरूपोंका यथार्थरूपमें वर्णन कर रहा हूँ। समस्त लोकोंके एकमात्र संहारक, सभी लोकोंके एकमात्र रक्षक तथा समग्र जगत्के एकमात्र स्रष्टा पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं॥ २-३॥<br>जिन्हें सभी लोकोंका उपादानकारण तथा निमित्तकारण कहा गया है, वे शिव पाँच भेदोंवाले बताये गये हैं। सभी लोकोंको शरण प्रदान करनेवाले परमात्मा शिवकी पंचब्रह्म नामक पाँच श्रेष्ठ मूर्तियाँ विख्यात हैं॥ ४-५॥<br>परमेष्ठी शिवकी पहली मूर्ति क्षेत्रज्ञ है, भोगके योग्य समस्त प्रकृतिवर्गका भोग करनेवाली वह मूर्ति 'ईशान' नामवाली है॥ ६॥<br>भगवान् शिवकी दूसरी मूर्तिको 'तत्पुरुष' नामसे कहा जाता है। उसे परमात्माकी गुहास्वरूपिणी प्रकृति ही समझना चाहिये॥ ७॥ |
अध्याय १४ ] भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन ६३१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अघोराख्या तृतीया च शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी।<br>बुद्धेः सा मूर्तिरित्युक्ता धर्माद्यष्टाङ्गसंयुता ॥ ८ | शिवकी ‘अघोर’ नामक तीसरी महिमामयी मूर्ति है; धर्म आदि आठ अंगोंसे युक्त वह बुद्धिकी मूर्ति कही गयी है ॥ ८ ॥ |
| चतुर्थी वामदेवाख्या मूर्तिः शम्भोगरीयसी।<br>अहङ्कारात्मकत्वेन व्याप्य सर्वं व्यवस्थिता ॥ ९ | शम्भुकी ‘वामदेव’ नामक चौथी श्रेष्ठ मूर्ति है; वह अहंकाररूपसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित है ॥ ९ ॥ |
| सद्योजाताह्वया शम्भोः पञ्चमी मूर्तिरुच्यते।<br>मनस्तत्त्वात्मकत्वेन स्थिता सर्वशरीरिषु ॥ १० | शिवकी ‘सद्योजात’ नामक पाँचवीं मूर्ति कही जाती है, वह सभी प्राणियोंमें मनतत्त्वके रूपमें विराजमान है ॥ १० ॥ |
| ईशानः परमो देवः परमेष्ठी सनातनः।<br>श्रोत्रेन्द्रियात्मकत्वेन सर्वभूतेष्ववस्थितः ॥ ११ | परमेष्ठी शाश्वत परम प्रभु ईशान श्रोत्र-इन्द्रियरूपसे सभी प्राणियोंके भीतर स्थित हैं ॥ ११ ॥ |
| स्थितस्तत्पुरुषो देवः शरीरेषु शरीरिणाम्।<br>त्वगिन्द्रियात्मकत्वेन तत्त्वविद्भिरुदाहृतः ॥ १२ | तत्त्ववेत्ताओंने भगवान् तत्पुरुषको त्वक् (त्वचा)-रूपसे जीवोंके शरीरोंमें विराजमान बताया है ॥ १२ ॥ |
| अघोरोऽपि महादेवश्चक्षुरात्मतया बुधैः।<br>कीर्तितः सर्वभूतानां शरीरेषु व्यवस्थितः ॥ १३ | विद्वानोंने महादेव अघोरको भी चक्षुरूपसे सभी प्राणियोंके शरीरोंमें व्यवस्थित बताया है ॥ १३ ॥ |
| जिह्वेन्द्रियात्मकत्वेन वामदेवोऽपि विश्रुतः।<br>अङ्गभाजामशेषाणामङ्गेषु परिधिष्ठितः ॥ १४ | वामदेव भी समस्त देहधारियोंके शरीरोंमें जिह्वा-इन्द्रियरूपसे विराजमान कहे गये हैं ॥ १४ ॥ |
| घ्राणेन्द्रियात्मकत्वेन सद्योजातः स्मृतो बुधैः।<br>प्राणभाजां समस्तानां विग्रहेषु व्यवस्थितः ॥ १५ | विद्वानोंने सद्योजातको घ्राणेन्द्रियरूपसे समस्त प्राणधारियोंके शरीरोंमें विद्यमान बताया है ॥ १५ ॥ |
| सर्वेष्वेव शरीरेषु प्राणभाजां प्रतिष्ठितः।<br>वागिन्द्रियात्मकत्वेन बुधैरीशान उच्यते ॥ १६ | भगवान् ईशान विद्वानोंके द्वारा वाक् (वाणी)-इन्द्रियरूपसे सभी प्राणधारियोंके शरीरोंमें प्रतिष्ठित कहे गये हैं ॥ १६ ॥ |
| पाणीन्द्रियात्मकत्वेन स्थितस्तत्पुरुषो बुधैः।<br>उच्यते विग्रहेष्वेव सर्वविग्रहधारिणाम् ॥ १७ | भगवान् तत्पुरुष विद्वानोंके द्वारा पाणि-इन्द्रियरूपसे सभी जीवोंके शरीरोंमें विराजमान कहे जाते हैं ॥ १७ ॥ |
| सर्वविग्रहिणां देहे ह्यघोरोऽपि व्यवस्थितः।<br>पादेन्द्रियात्मकत्वेन कीर्तितस्तत्त्ववेदिभिः ॥ १८ | तत्त्ववेत्ताओंने भगवान् अघोरको सभी प्राणियोंके शरीरोंमें पाद-इन्द्रियरूपसे अवस्थित बताया है ॥ १८ ॥ |
| पाय्विन्द्रियात्मकत्वेन वामदेवो व्यवस्थितः।<br>सर्वभूतनिकायानां कायेषु मुनिभिः स्मृतः ॥ १९ | प्रभु वामदेव मुनियोंके द्वारा सभी प्राणिसमुदायके शरीरोंमें पायु (गुदा)-इन्द्रियरूपसे स्थित कहे गये हैं ॥ १९ ॥ |
| उपस्थात्मतया देवः सद्योजातः स्थितः प्रभुः।<br>इष्यते वेदशास्त्रज्ञैर्देहेषु प्राणधारिणाम् ॥ २० | वेद तथा शास्त्रोंको जाननेवाले लोग भगवान् सद्योजातको जननेन्द्रियरूपसे सभी प्राणधारियोंके शरीरोंमें प्रतिष्ठित बताते हैं ॥ २० ॥ |
| ईशानं प्राणिनां देवं शब्दतन्मात्ररूपिणम्।<br>आकाशजनकं प्राहुर्मुनिवृन्दारकप्रजाः ॥ २१ | प्रमुख मुनियोंने प्राणियोंके स्वामी प्रभु ईशानको शब्दतन्मात्रारूप कहा है और उन्हें आकाशका जनक बताया है ॥ २१ ॥ |
६३२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| प्राहुस्तत्पुरुषं देवं स्पर्शतन्मात्रकात्मकम्।<br>समीरजनकं प्राहुर्भगवन्तं मुनीश्वराः॥ २२ | मुनीश्वरोंने भगवान् तत्पुरुषको स्पर्शतन्मात्रारूप कहा है और उन्हें वायुको उत्पन्न करनेवाला बताया है॥ २२॥ |
| रूपतन्मात्रकं देवमघोरमपि घोरकम्।<br>प्राहुर्वेदविदो मुख्या जनकं जातवेदसः॥ २३ | प्रमुख वेदवेत्ताओंने भगवान् अघोरको रूपतन्मात्रात्मक कहा है और उन्हें अग्निका जनक बताया है॥ २३॥ |
| रसतन्मात्ररूपत्वात् प्रथितं तत्त्ववेदिनः।<br>वामदेवमपां प्राहुर्जनकत्वेन संस्थितम्॥ २४ | तत्त्वदर्शी लोगोंने रसतन्मात्रारूपसे विख्यात प्रभु वामदेवको जलके जनकरूपमें प्रतिष्ठित बताया है॥ २४॥ |
| सद्योजातं महादेवं गन्धतन्मात्ररूपिणम्।<br>भूम्यात्मानं प्रशंसन्ति सर्वतत्त्वार्थवेदिनः॥ २५ | समस्त रहस्योंको जाननेवाले [मनीषीगण] महादेव सद्योजातको गन्धतन्मात्रारूप बताते हैं और उन्हें भूमिका जनक कहते हैं॥ २५॥ |
| आकाशात्मानमीशानमादिदेवं मुनीश्वराः।<br>परमेण महत्वेन सम्भूतं प्राहुरद्भुतम्॥ २६ | मुनीश्वरोंने अत्यन्त विस्तारके साथ उत्पन्न होनेके कारण आकाशरूप अद्भुत आदिदेव शिवको 'ईशान' कहा है॥ २६॥ |
| प्रभुं तत्पुरुषं देवं पवनं पवनात्मकम्।<br>समस्तलोकव्यापित्वात्प्रथितं सूरयो विदुः॥ २७ | समस्त लोकोंमें व्याप्त रहनेके कारण पवनरूपसे प्रसिद्ध शिवको विद्वानोंने तत्पुरुष कहा है॥ २७॥ |
| अथार्चिततया ख्यातमघोरं दहनात्मकम्।<br>कथयन्ति महात्मानं वेदवाक्यार्थवेदिनः॥ २८ | वेदमन्त्रोंको जाननेवाले ज्योतिर्मय होनेके कारण अग्निरूपसे प्रसिद्ध महात्मा शिवको अघोर कहते हैं॥ २८॥ |
| तोयात्मकं महादेवं वामदेवं मनोरमम्।<br>जगत्सञ्जीवनत्वेन कथितं मुनयो विदुः॥ २९ | जगत्को जीवन प्रदान करनेके गुणसे युक्त कहे गये जलरूप महादेवको मुनियोंने मनोरम वामदेवकी संज्ञा प्रदान की है॥ २९॥ |
| विश्वम्भरात्मकं देवं सद्योजातं जगद्गुरुम्।<br>चराचरैकभर्तारं परं कविवरा विदुः॥ ३० | श्रेष्ठ कवियोंने चराचर जगत्के एकमात्र पालक विश्वम्भर (पृथ्वी)-रूप जगद्गुरु शिवको सद्योजात कहा है॥ ३०॥ |
| पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>शिवानन्दं तदित्याहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः॥ ३१ | जो [ईशान आदि मूर्तिरूप] पंचब्रह्मात्मक सम्पूर्ण चराचर जगत् है, वह भगवान् शिवका क्रीड़ा-विलास है—ऐसा तत्त्वदर्शी मुनियोंने कहा है॥ ३१॥ |
| पञ्चविंशतितत्त्वात्मा प्रपञ्चे यः प्रदृश्यते।<br>पञ्चब्रह्मात्मकत्वेन स शिवो नान्यतां गतः॥ ३२ | इस जगत्प्रपंचमें पचीस तत्त्वोंसे युक्त जो कुछ दिखायी पड़ता है, वह [ईशान आदि] पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं, उनसे अन्य कुछ भी नहीं॥ ३२॥ |
| पञ्चविंशतितत्त्वात्मा पञ्चब्रह्मात्मकः शिवः।<br>श्रेयोऽर्थिभिरतो नित्यं चिन्तनीयः प्रयत्नतः॥ ३३ | अतः अपने कल्याणकी कामना करनेवाले लोगोंको सदा प्रयत्नपूर्वक पचीस तत्त्वोंसे युक्त विग्रहवाले पंचब्रह्मात्मक शिवका चिन्तन करना चाहिये॥ ३३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पञ्चब्रह्मकथनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पंचब्रह्मकथन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
१५- शिवमाहात्म्यका वर्णन
अध्याय १५] शिवमाहात्म्यका वर्णन ६३३
पन्द्रहवाँ अध्याय
शिवमाहात्म्यका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयोऽपि शिवमाहात्म्यं समाचक्ष्व महामते।<br>सर्वज्ञो ह्यसि भूतानामधिनाथ महागुण॥ १ ॥ | सनत्कुमार बोले— हे महामते! आप और भी शिवमाहात्म्यका वर्णन करें, हे प्राणियोंके अधिनाथ! हे महान् गुणोंवाले! आप सर्वज्ञ हैं॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>शिवमाहात्म्यमेकाग्रः शृणु वक्ष्यामि ते मुने।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः कीर्तितं मुनिसत्तमैः॥ २ ॥ | शैलादि बोले— हे मुने! अनेक श्रेष्ठ मुनियोंने अनेक प्रकारसे अपने शब्दोंमें शिवमाहात्म्यका वर्णन किया है; उसे मैं आपको बताऊँगा, आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये॥ २॥ |
| सदसद्रूपमित्याहुः सदसत्पतिरित्यपि।<br>तं शिवं मुनयः केचित्प्रवदन्ति च सूरयः॥ ३ ॥ | कुछ [गौतम आदि] मुनियोंने उन शिवको सत्-असत् रूपवाला कहा है और कुछ विद्वान् उन्हें सत्-असत्का पति भी कहते हैं॥ ३॥ |
| भूतभावविकारेण द्वितीयेन स उच्यते।<br>व्यक्तं तेन विहीनत्वादव्यक्तमसदित्युपि॥ ४ ॥<br><br>उभे ते शिवरूपे हि शिवादन्यं न विद्यते।<br>तयोः पतित्वाच्च शिवः सदसत्पतिरुच्यते॥ ५ ॥ | भूतोंके भाव आदि विकारोंसे मुक्त रहनेपर वे शिव व्यक्त तथा सत् कहे जाते हैं और उस [भाव आदि विकार]-से विहीन रहनेपर अव्यक्त तथा असत् कहे जाते हैं। सत् तथा असत्—वे दोनों ही शिवके रूप हैं; शिवके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। उन दोनोंका पति होनेके कारण शिव सदसत्पति (सत् तथा असत्के पति) कहे जाते हैं॥ ४-५॥ |
| क्षराक्षरात्मकं प्राहुः क्षराक्षरपरं तथा।<br>शिवं महेश्वरं केचिन्मुनयस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ६ ॥<br><br>उक्तमक्षरमव्यक्तं व्यक्तं क्षरमुदाहृतम्।<br>रूपे ते शङ्करस्यैव तस्मान्न पर उच्यते॥ ७ ॥ | कुछ तत्त्वचिन्तक मुनियोंने महेश्वर शिवको क्षर-अक्षररूप तथा क्षर-अक्षरसे परे भी कहा है। अव्यक्तको अक्षर कहा गया है और व्यक्तको क्षर कहा गया है। वे दोनों रूप शिवके ही हैं, क्षराक्षररूप होनेके कारण वे शिव अपरस्वरूप कहे जाते हैं॥ ६-७॥ |
| तयोः परः शिवः शान्तः क्षराक्षरपरो बुधैः।<br>उच्यते परमार्थेन महादेवो महेश्वरः॥ ८ ॥<br><br>समस्तव्यक्तरूपं तु ततः स्मृत्वा स मुच्यते। | तत्त्वज्ञानी विद्वान् उन दोनों (व्यक्त तथा अव्यक्त)-से परे होनेके कारण उन शान्त महेश्वर महादेव शिवको क्षराक्षरपर (क्षर तथा अक्षरसे परे) कहते हैं। वह जीव समस्तप्राणिस्वरूप शिवका स्मरण करके मुक्त हो जाता है। |
| समष्टिव्यष्टिरूपं तु समष्टिव्यष्टिकारणम्॥ ९ ॥<br><br>वदन्ति केचिदाचार्याः शिवं परमकारणम्।<br>समष्टिं विदुरव्यक्तं व्यष्टिं व्यक्तं मुनीश्वराः॥ १० ॥<br><br>रूपे ते गदिते शम्भोर्नास्त्यन्यद्वस्तुसम्भवम्।<br>तयोः कारणभावेन शिवो हि परमेश्वरः॥ ११ ॥ | कुछ आचार्य परमकारण शिवको समष्टि-व्यष्टिरूप और समष्टि-व्यष्टिका कारण भी कहते हैं। मुनीश्वरोंने अव्यक्तको समष्टि तथा व्यक्तको व्यष्टि कहा है। वे दोनों रूप शिवके ही कहे गये हैं; इसके अतिरिक्त अन्य वस्तु सम्भव नहीं है। योगशास्त्रको जाननेवाले लोग [समष्टि-व्यष्टि] इन दोनोंका ही कारण होनेसे परमेश्वर |
| ६३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| उच्यते योगशास्त्रज्ञैः समष्टिव्यष्टिकारणम्। | शिवको समष्टिव्यष्टिकारण कहते हैं॥ ८—११ १/२॥ | | क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपी च शिवः कैश्चिदुदाहृतः॥ १२<br>परमात्मा परं ज्योतिर्भगवान् परमेश्वरः।<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि क्षेत्रशब्देन सूरयः॥ १३<br>प्राहुः क्षेत्रज्ञशब्देन भोक्तारं पुरुषं तथा।<br>क्षेत्रक्षेत्रविदावेते रूपे तस्य स्वयम्भुवः॥ १४<br>न किञ्चिच्च शिवादन्यदिति प्राहुर्मनीषिणः। | कुछ लोगोंने परमात्मा परमज्योतिस्वरूप परमेश्वर भगवान् शिवको क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपवाला बताया है। विद्वानोंने चौबीस तत्त्वोंको क्षेत्र शब्दसे तथा उनका भोग करनेवाले पुरुषको क्षेत्रज्ञ शब्दसे बोधित किया है। क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ—ये दोनों ही रूप उन्हीं स्वयं आविर्भूत शिवके हैं; शिवके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है—ऐसा मनीषियोंने कहा है॥ १२—१४ १/२॥ | | अपरब्रह्मरूपं तं परं ब्रह्मात्मकं शिवम्॥ १५<br>केचिदाहुर्महादेवमनादिनिधनं प्रभुम्।<br>भूतेन्द्रियान्तःकरणप्रधानविषयात्मकम् ॥ १६<br>अपरं ब्रह्म निर्दिष्टं परं ब्रह्म चिदात्मकम्।<br>ब्रह्मणी ते महेशस्य शिवस्यास्य स्वयम्भुवः॥ १७<br>शङ्करस्य परस्यैव शिवादन्यन्न विद्यते। | कुछ लोगोंने आदि तथा अन्तसे रहित महादेव भगवान् शिवको अपरब्रह्म (शब्दब्रह्म)-स्वरूप तथा परब्रह्मरूप भी कहा है। अपरब्रह्मको प्राणियोंके इन्द्रिय-अन्तःकरणके शब्द आदि प्रधान विषयोंके रूपवाला और परब्रह्मको चिदानन्दरूप निर्दिष्ट किया गया है। वे दोनों ही ब्रह्म इन्हीं महेश्वर परमात्मा शंकरके रूप हैं; शिवके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है॥ १५—१७ १/२॥ | | विद्याविद्यास्वरूपी च शङ्करः कैश्चिदुच्यते ॥ १८<br>धाता विधाता लोकानामादिदेवो महेश्वरः।<br>विद्येति च तमेवाहुरविद्येति मुनीश्वराः॥ १९<br>प्रपञ्चजातमखिलं ते स्वरूपे स्वयम्भुवः। | कुछ लोग लोकोंका विधान तथा पालन करनेवाले आदिदेव महेश्वर शिवको विद्या तथा अविद्याके स्वरूपवाला भी कहते हैं। मुनीश्वर लोग उन्हें विद्या कहते हैं और सम्पूर्ण जगत्प्रपंचको अविद्या कहते हैं, स्वयम्भू शिवके ही वे दोनों रूप हैं॥ १८—१९ १/२॥ | | भ्रान्तिर्विद्या परं चेति शिवरूपमनुत्तमम्॥ २०<br>अवापुर्मुनयो योगात्केचिदागमवेदिनः।<br>अर्थेषु बहुरूपेषु विज्ञानं भ्रान्तिरुच्यते॥ २१<br>आत्माकारेण संवित्तिर्बुद्धेर्विद्येति कीर्त्यते।<br>विकल्परहितं तत्त्वं परमित्यभिधीयते॥ २२<br>तृतीयं रूपमीशस्य नान्यत्किञ्चन सर्वतः। | भ्रान्ति, विद्या तथा पर—ये भी शिवके श्रेष्ठ रूप हैं, कुछ वेदवेत्ता मुनियोंने योगके द्वारा इसे प्राप्त किया है। बहुत प्रकारके अर्थोंमें विज्ञानको भ्रान्ति कहा जाता है। विद्वान् लोग सबको आत्मरूपसे जान लेनेको विद्या कहते हैं। विकल्परहित तत्त्वको 'परम' कहा जाता है। ईश्वर शिवका तीसरा अन्य कोई भी रूप नहीं है॥ २०—२२ १/२॥ | | व्यक्ताव्यक्तज्ञरूपेति शिवः कैश्चिन्निगद्यते॥ २३<br>विधाता सर्वलोकानां धाता च परमेश्वरः।<br>त्रयोविंशतितत्त्वानि व्यक्तशब्देन सूरयः॥ २४<br>वदन्त्यव्यक्तशब्देन प्रकृतिं च परां तथा।<br>कथयन्ति ज्ञशब्देन पुरुषं गुणभोगिनम्॥ २५<br>तत्त्रयं शाङ्करं रूपं नान्यत्किञ्चिदशाङ्करम्॥ २६ | कुछ लोग सभी लोकोंके रचयिता तथा पोषक परमेश्वर शिवको 'व्यक्त-अव्यक्त-ज्ञ' रूपवाला भी कहते हैं। विद्वान् लोग तेईस तत्त्वोंको 'व्यक्त' शब्दसे, परा प्रकृतिको 'अव्यक्त' शब्दसे तथा गुणोंका भोग करनेवाले पुरुषको 'ज्ञ' शब्दसे अभिहित करते हैं। इन तीनोंका समूह शंकरका ही है। शंकरसे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है॥ २३—२६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शङ्करस्य त्रिगुणरूपवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शंकरके त्रिगुणरूपका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥
१६- विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा
अध्याय १६ ] | विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा | ६३५
सोलहवाँ अध्याय
विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>पुनरेव महाबुद्धे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः शब्दितानि मुनीश्वरैः॥ १ | सनत्कुमार बोले—हे महाबुद्धे! मुनीश्वरोंके द्वारा बहुत-से नामोंमें अनेक प्रकारसे कहे गये शिवके रूपोंको मैं यथार्थ रूपमें पुनः सुनना चाहता हूँ॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>पुनः पुनः प्रवक्ष्यामि शिवरूपाणि ते मुने।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः शब्दितानि मुनीश्वरैः॥ २ | शैलादि बोले—हे मुने! मैं मुनीश्वरोंके द्वारा बहुत-से नामोंसे अनेक प्रकारसे कहे गये शिवके रूपोंका वर्णन आपसे पुनः-पुनः करूँगा॥ २॥ |
| क्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्व्यक्तं कालात्मेति मुनीश्वरैः।<br>उच्यते कैश्चिदाचार्यैरागमार्णवपारगैः॥ ३ | वेदरूपी समुद्रके पारगामी कुछ आचार्य तथा मुनीश्वर उन शिवको क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, व्यक्त तथा कालात्मा—ऐसा कहते हैं॥ ३॥ |
| क्षेत्रज्ञं पुरुषं प्राहुः प्रधानं प्रकृतिं बुधाः।<br>विकारजातं निःशेषं प्रकृतेर्व्यक्तमित्यपि॥ ४<br>प्रधानव्यक्तयोः कालः परिणामैककारणम्।<br>तच्चतुष्टयमीशस्य रूपाणां हि चतुष्टयम्॥ ५ | विद्वज्जनोंने पुरुषको क्षेत्रज्ञ, प्रधानको प्रकृति और प्रकृतिके सम्पूर्ण विकारसमूहको व्यक्त कहा है; प्रधान तथा व्यक्तके विस्तारमें एकमात्र कारण काल ही है। ये चारों ही ईश्वरके रूपचतुष्टय हैं॥ ४-५॥ |
| हिरण्यगर्भं पुरुषं प्रधानं व्यक्तरूपिणम्।<br>कथयन्ति शिवं केचिदाचार्याः परमेश्वरम्॥ ६<br>हिरण्यगर्भः कर्तास्य भोक्ता विश्वस्य पूरुषः।<br>विकारजातं व्यक्ताख्यं प्रधानं कारणं परम्॥ ७<br>तेषां चतुष्टयं बुद्धेः शिवरूपचतुष्टयम्।<br>प्रोच्यते शङ्करादन्यदस्ति वस्तु न किञ्चन॥ ८ | कुछ आचार्य परमेश्वर शिवको हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान तथा व्यक्तरूपवाला भी कहते हैं। इस जगत्का कर्ता हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) है, भोक्ता पुरुष (विष्णु) है, समस्त प्रपंच 'व्यक्त' नामवाला है और मुख्य कारण प्रधान है। उन हिरण्यगर्भ आदिका तथा बुद्धि आदिका चतुष्टय भगवान् शिवका रूपचतुष्टय कहा जाता है, शंकरसे भिन्न अन्य कोई भी वस्तु नहीं है॥ ६–८॥ |
| पिण्डजातिस्वरूपी तु कथ्यते कैश्चिदीश्वरः।<br>चराचरशरीराणि पिण्डाख्यान्यखिलान्यपि॥ ९<br>सामान्यानि समस्तानि महासामान्यमेव च।<br>कथ्यन्ते जातिशब्देन तानि रूपाणि धीमतः॥ १० | कुछ लोग ईश्वर शिवको पिण्ड तथा जातिरूपवाला कहते हैं। चर तथा अचर समस्त शरीर ही पिण्डपदवाच्य है। उन बुद्धिसम्पन्न शिवके वे जाति, व्यक्ति और द्रव्योंके समस्त रूप ही जातिशब्दवाच्य हैं॥ ९-१०॥ |
| विराट् हिरण्यगर्भात्मा कैश्चिदीशो निगद्यते।<br>हिरण्यगर्भो लोकानां हेतुर्लोकात्मको विराट्॥ ११<br>सूत्राव्याकृतरूपं तं शिवं शंसन्ति केचन।<br>अव्याकृतं प्रधानं हि तद्रूपं परमेष्ठिनः॥ १२<br>लोका येनैव तिष्ठन्ति सूत्रे मणिगणा इव।<br>तत्सूत्रमिति विज्ञेयं रूपमद्भुतविक्रमम्॥ १३ | कुछ लोग शिवको विराट् तथा हिरण्यगर्भरूप कहते हैं। हिरण्यगर्भ समस्त लोकोंका कारण है और विराट् लोकस्वरूप है। कुछ लोग उन शिवको सूत्राव्याकृतरूप कहते हैं। परमेष्ठी शिवका वह रूप अव्याकृत तथा प्रधान है। समस्त लोक उनमें उसी भाँति ओतप्रोत हैं, जैसे सूत्रमें मणियाँ, अतः उनके अद्भुत पराक्रमी स्वरूपको सूत्ररूप समझना चाहिये॥ ११–१३॥ |
| ६३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्तर्यामी परः कैश्चित्कैश्चिदीशः प्रकीर्त्यते।<br>स्वयंज्योतिः स्वयंवेद्यः शिवः शम्भुर्महेश्वरः॥ १४<br>सर्वेषामेव भूतानामन्तर्यामी शिवः स्मृतः।<br>सर्वेषामेव भूतानां परत्वात्पर उच्यते॥ १५ | कोई-कोई लोग स्वयंज्योतिरूप तथा स्वयंवेद्य ईश परमेश्वर शंकर शम्भुको अन्तर्यामी तथा पर कहते हैं। वे शिव सम्पूर्ण प्राणियोंमें विराजमान हैं, अतः अन्तर्यामी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ होनेके कारण वे परमात्मा परमेश्वर शम्भु शंकर शिव 'पर' कहे जाते हैं॥ १४-१५ १/२ ॥ |
| परमात्मा शिवः शम्भुः शङ्करः परमेश्वरः।<br>प्राज्ञतैजसविश्वाख्यं तस्य रूपत्रयं विदुः॥ १६<br>सुषुप्ति स्वप्नजाग्रन्तमवस्थात्रयमेव तत्।<br>विराट् हिरण्यगर्भाख्यमव्याकृतपदाह्वयम्॥ १७<br>तुरीयस्य शिवस्यास्य अवस्थात्रयगामिनः।<br>हिरण्यगर्भः पुरुषः काल इत्येव कीर्तिताः॥ १८<br>तिस्रोऽवस्था जगत्सृष्टिस्थितिसंहारहेतवः।<br>भवविष्णुविरिञ्चाख्यमवस्थात्रयमीशितुः॥ १९<br>आराध्य भक्त्या मुक्तिं च प्राप्नुवन्ति शरीरिणः। | प्राज्ञ, तैजस और विश्व नामक उनके तीन रूप कहे गये हैं। इन्हें ही सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत्—तीन अवस्थाएँ भी कहते हैं और ये ही विराट्, हिरण्यगर्भ और अव्याकृत पदके भी वाचक हैं। तीनों अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले उन तुरीयस्वरूप शिवके हिरण्यगर्भ, पुरुष और काल—ये तीनों ही जगत्की सृष्टि, स्थिति और संहारकी कारणरूपा तीन अवस्थाएँ कही गयी हैं। भव, विष्णु, विरिंचि (ब्रह्मा) नामक तीनों अवस्थाएँ महेश्वरकी ही हैं; भक्तिपूर्वक इनकी आराधना करके प्राणी मुक्ति प्राप्त करते हैं॥ १६-१९ १/२ ॥ |
| कर्ता क्रिया च कार्यं च करणं चेति सूरिभिः॥ २०<br>शम्भोश्चत्वारि रूपाणि कीर्त्यन्ते परमेष्ठिनः।<br>प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं प्रमितिस्तथा॥ २१<br>चत्वार्येतानि रूपाणि शिवस्यैव न संशयः।<br>ईश्वराव्याकृतप्राणविराड्भूतेन्द्रियात्मकम् ॥ २२<br>शिवस्यैव विकारोऽयं समुद्रस्येव वीचयः। | कर्ता, क्रिया, कार्य तथा करण—ये विद्वानोंके द्वारा परमेष्ठी शिवके चार रूप कहे गये हैं। प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय तथा प्रमिति—ये चारों भी शिवके ही रूप हैं; इसमें संशय नहीं है। ईश्वर, अव्याकृत, प्राण, विराट्, भूत, इन्द्रिय और आत्मा—ये सब समुद्रकी तरंगोंकी भाँति शिवके ही विकार हैं॥ २०-२२ १/२ ॥ |
| ईश्वरं जगतामाहुर्निमित्तं कारणं तथा॥ २३<br>अव्याकृतं प्रधानं हि तदुक्तं वेदवादिभिः।<br>हिरण्यगर्भः प्राणाख्यो विराट् लोकात्मकः स्मृतः॥ २४<br>महाभूतानि भूतानि कार्याणि इन्द्रियाणि च।<br>शिवस्यैतानि रूपाणि शंसन्ति मुनिसत्तमाः॥ २५ | ईश्वरको जगत्का निमित्त कारण कहा गया है। वेदवेत्ताओंने अव्याकृतको प्रधान कहा है। हिरण्यगर्भको ही प्राण नामवाला तथा विराट्को लोकरूप कहा गया है। महाभूत, भूत, कार्य तथा इन्द्रियाँ—श्रेष्ठ मुनिगण इन्हें शिवके रूप कहते हैं॥ २३-२५॥ |
| परमात्मा शिवादन्यो नास्तीति कवयो विदुः।<br>शिवजातानि तत्त्वानि पञ्चविंशन्मनीषिभिः॥ २६<br>उक्तानि न तदन्यानि सलिलादूर्भिवृन्दवत्।<br>पञ्चविंशत्पदार्थेभ्यः शिवतत्त्वं परं विदुः॥ २७<br>तानि तस्मादनन्यानि सुवर्णकटकादिवत्।<br>सदाशिवेश्वराद्यानि तत्त्वानि शिवतत्त्वतः॥ २८ | परमात्मा शिवसे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है—ऐसा कवियोंने कहा है। मनीषियोंने [समस्त] पचीस तत्त्वोंको शिवसे ही उत्पन्न बताया है, वे जलसे तरंगकी भाँति उन [शिव]-से अभिन्न हैं। किंतु शिवतत्त्वको पचीस तत्त्वोंसे भी पर कहा गया है। वे [सब तत्त्व] सुवर्णसे कुण्डल आदिकी तरह उनसे अभिन्न हैं। सदाशिव आदि सगुण तत्त्व भी उन्हीं शिवतत्त्वसे |
१७- भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन
अध्याय १७] भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन ६३७
| जातानि न तदन्यानि मृद्द्रव्यं कुम्भभेदवत्।<br>माया विद्या क्रिया शक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियामयी॥ २९<br><br>जाताः शिवान्न सन्देहः किरणा इव सूर्यतः।<br>सर्वात्मकं शिवं देवं सर्वाश्रयविधायिनम्॥ ३०<br><br>भजस्व सर्वभावेन श्रेयश्चेत्प्राप्तुमिच्छसि॥ ३१ | प्रादुर्भूत हैं, वे सब भी मिट्टी तथा घड़ेकी ही भाँति उनसे भिन्न नहीं हैं। माया, विद्या, क्रिया, शक्ति तथा क्रियामयी ज्ञानशक्ति—ये पंचरूप गौरी भी शिवसे ही उसी प्रकार उत्पन्न हुई हैं—जैसे सूर्यसे किरणें। अतः [हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो सबको आश्रय प्रदान करनेवाले सर्वात्मा भगवान् शिवकी सब प्रकारसे आराधना कीजिये॥ २६—३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवतत्त्वमाहात्म्यवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवतत्त्वमाहात्म्यवर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयो देवगणश्रेष्ठ शिवमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिस्त्वद्वाक्यामृतपानतः॥ १<br><br>कथं शरीरी भगवान् कस्माद्रुद्रः प्रतापवान्।<br>सर्वात्मा च कथं शम्भुः कथं पाशुपतं व्रतम्॥ २<br><br>कथं वा देवमुख्यैश्च श्रुतो दृष्टश्च शङ्करः।<br><br>शैलादिरुवाच<br>अव्यक्तादभवत्स्थाणुः शिवः परमकारणम्॥ ३<br><br>स सर्वकारणोपेत ऋषिर्विश्वाधिकः प्रभुः।<br>देवानां प्रथमं देवं जायमानं मुखाम्बुजात्॥ ४<br><br>ददर्श चाग्रे ब्रह्माणं चाज्ञया तमवैक्षत।<br>दृष्टो रुद्रेण देवेशः ससर्ज सकलं च सः॥ ५<br><br>वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च स्थापयामास वै विराट्।<br>सोमं ससर्ज यज्ञार्थं सोमादिदमजायत॥ ६<br><br>चरुश्च वह्निर्यज्ञश्च वज्रपाणिः शचीपतिः।<br>विष्णुर्नारायणः श्रीमान् सर्वं सोममयं जगत्॥ ७<br><br>रुद्राध्यायेन ते देवा रुद्रं तुष्टुवुरीश्वरम्।<br>प्रसन्नवदनस्तस्थौ देवानां मध्यतः प्रभुः॥ ८ | **सनत्कुमार बोले—**हे देवगणोंमें श्रेष्ठ! आपके वचनामृतका बार-बार पान करके भी उसे सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। भगवान् रुद्र शरीरवान् कैसे हुए, वे प्रतापी कैसे हुए, शिवजी सर्वात्मा कैसे हैं, पाशुपतव्रत कैसा है और प्रमुख देवताओंने शंकरजीके विषयमें श्रवण तथा उनका दर्शन कैसे किया?॥ १-२ १/२॥<br><br>**शैलादि बोले—**अव्यक्त परमात्मासे संसारमण्डपके स्तम्भ तथा जगत्के परम कारण शिव उत्पन्न हुए। सर्वकारणमय, सर्वोपरि तथा ऋषिरूप उन प्रभुने अपने मुखकमलसे प्रकट हुए देवताओंके आदिदेव ब्रह्माको अपने सम्मुख देखा और सृष्टि करनेकी आज्ञासे उनकी ओर दृष्टिपात किया॥ ३-४ १/२॥<br><br>रुद्रके द्वारा देखे गये उन ब्रह्माने सम्पूर्ण जगत्का सृजन किया और तदुपरान्त वर्णाश्रमव्यवस्था स्थापित की। इसके बाद उन विराटने यज्ञहेतु सोमकी सृष्टि की। पुनः उस सोमसे ये सब—चरु, अग्नि, यज्ञ, वज्रपाणि इन्द्र, श्रीयुक्त नारायण विष्णु आदि उत्पन्न हुए; इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् सोममय हो गया॥ ५-७॥<br><br>तब वे समस्त देवगण रुद्राध्यायसे भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे। वे प्रभु महेश्वर इन देवताओंका ज्ञान अपहृत करके प्रसन्नमुख होकर इनके मध्य स्थित हो गये। |
६३८ ·श्रीलिङ्गमहापुराण· [ उत्तरभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपहृत्य च विज्ञानमेषामेव महेश्वरः।<br>देवा ह्यपृच्छंस्तं देवं को भवानिति शङ्करम्॥ ९<br><br>अब्रवीद्भगवान् रुद्रो ह्यहमेकः पुरातनः।<br>आसं प्रथम एवाहं वर्तामि च सुरोत्तमाः॥ १०<br><br>भविष्यामि च लोकेऽस्मिन् मत्तो नान्यः कुतश्चन।<br>व्यतिरिक्तं न मत्तोऽस्ति नान्यत्किञ्चित्सुरोत्तमाः॥ ११ | तत्पश्चात् देवताओंने भगवान् शंकरसे पूछा—आप कौन हैं? तब भगवान् रुद्रने कहा—हे श्रेष्ठ देवगण! मैं एक पुरातन पुरुष हूँ। सर्वप्रथम मैं ही था, अब भी हूँ और भविष्यमें भी रहूँगा, इस लोकमें मुझसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! अन्य कुछ भी मुझसे भिन्न नहीं है॥ ८–११॥ |
| नित्योऽनित्योऽहमनघो ब्रह्माहं ब्रह्मणस्पतिः।<br>दिशश्च विदिशश्चाहं प्रकृतिश्च पुमानहम्॥ १२<br><br>त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप् च च्छन्दोऽहं तन्मयः शिवः।<br>सत्योऽहं सर्वगः शान्तस्त्रेताग्निर्गौरवं गुरुः॥ १३<br><br>गौरहं गह्वरश्चाहं नित्यं गहनगोचरः।<br>ज्येष्ठोऽहं सर्वतत्त्वानां वरिष्ठोऽहमपां पतिः॥ १४ | मैं नित्य हूँ तथा अनित्य भी हूँ। मैं पापशून्य, ब्रह्मा तथा ब्रह्मणस्पति (वेदोंका पालक) हूँ। मैं [पूर्व आदि] दिशाएँ तथा [आग्नेय आदि] विदिशाएँ भी हूँ। मैं प्रकृति हूँ और पुरुष भी हूँ। मैं त्रिष्टुप्, जगती और अनुष्टुप् छन्द हूँ, मैं छन्दराशिसे परिपूर्ण हूँ। मैं कल्याणस्वरूप, सत्यरूप, सर्वगामी, शान्त, त्रेताग्नि (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय)-रूप गौरव और हितोपदेशक हूँ। मैं पृथ्वीरूप हूँ। मैं गह्वर (गुहारूप) तथा आनन्दवन आदिमें सदा प्रत्यक्ष रहनेवाला हूँ। मैं समस्त तत्त्वोंमें ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ हूँ, मैं समुद्ररूप हूँ॥ १२–१४॥ |
| आपोऽहं भगवानीशस्तेजोऽहं वेदिरप्यहम्।<br>ऋग्वेदोऽहं यजुर्वेदः सामवेदोऽहमात्मभूः॥ १५<br><br>अथर्वणोऽहं मन्त्रोऽहं तथा चाङ्गिरसां वरः।<br>इतिहासपुराणानि कल्पोऽहं कल्पनाप्यहम्॥ १६<br><br>अक्षरं च क्षरं चाहं क्षान्तिः शान्तिरहं क्षमा।<br>गुह्योऽहं सर्ववेदेषु वरेण्योऽहमजोऽप्यहम्॥ १७ | भगवान् शिव कहते हैं—मैं जल हूँ, मैं तेज हूँ और मैं परिष्कृत यज्ञभूमिरूप भी हूँ। मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद हूँ। मैं आकाशरूप हूँ। मैं अंगिरसोंमें श्रेष्ठ अथर्वणमन्त्र (चतुर्थ वेदरूप) हूँ। मैं [महाभारत आदि] इतिहास, पुराण तथा कल्प (कर्मप्रयोगरचना) हूँ। मैं कल्पना भी हूँ। मैं अक्षर (कूटस्थरूप) तथा क्षर (नाशवान्) हूँ। मैं क्षान्ति (धैर्य), शान्ति तथा क्षमा हूँ। मैं सभी वेदोंमें गुह्य (संवृतरूप) हूँ। मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ। मैं अजन्मा भी हूँ॥ १५–१७॥ |
| पुष्करं च पवित्रं च मध्यं चाहं ततः परम्।<br>बहिश्चाहं तथा चान्तःपुरस्तादहमव्ययः॥ १८<br><br>ज्योतिश्चाहं तमश्चाहं ब्रह्माविष्णुर्महेश्वरः।<br>बुद्धिश्चाहमहङ्कारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १९<br><br>एवं सर्वं च मामेव यो वेद सुरसत्तमाः।<br>स एव सर्ववित्सर्वं सर्वात्मा परमेश्वरः॥ २० | मैं पवित्र हृदयकमलरूप हूँ, मैं उसका मध्यभाग हूँ तथा उससे पर भी हूँ। मैं बाहर हूँ, भीतर हूँ तथा समक्ष भी हूँ। मैं शाश्वत हूँ। मैं ज्योति हूँ तथा अन्धकार भी हूँ। मैं ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हूँ। बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ तथा इन्द्रियाँ मैं ही हूँ। हे श्रेष्ठ देवगण! इस प्रकार जो मुझ विश्वरूपको जानता है, वही सर्वज्ञ है, सर्वात्मा है और वह परमेश्वररूप हो जाता है॥ १८–२०॥ |
१८- देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति
अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६३९
| गां गोभिर्ब्राह्मणान् सर्वान् ब्राह्मण्येन हवींषि च।<br>आयुषायुस्तथा सत्यं सत्येन सुरसत्तमाः ॥ २१<br>धर्मं धर्मेण सर्वांश्च तर्पयामि स्वतेजसा।<br>इत्यादौ भगवानुक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ २२<br>नापश्यन्त ततो देवं रुद्रं परमकारणम्।<br>ते देवाः परमात्मानं रुद्रं ध्यायन्ति शङ्करम् ॥ २३<br>सनारायणका देवाः सेन्द्राश्च मुनयस्तथा।<br>तथोध्र्वबाहवो देवा रुद्रं स्तुवन्ति शङ्करम् ॥ २४ | हे श्रेष्ठ देवगण ! मैं वाणीको वेदोंसे, सभी ब्राह्मणों तथा हवियोंको ब्राह्मण्यसे, आयुको आयुसे, सत्यको सत्यसे, धर्मको धर्मसे और अन्य सबको अपने तेजसे तृप्त करता हूँ—ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर जब उन देवताओंने परमकारणरूप रुद्रको नहीं देखा, तब वे उन परमात्मा शंकरका ध्यान करने लगे। नारायण विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता और मुनिगण ऊपरकी ओर हाथ उठाकर कल्याणकारी रुद्रकी स्तुति करने लगे ॥ २१–२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवमाहात्म्यवर्णन' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय
देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति
| देवा ऊचुः | देवता बोले— |
|---|---|
| य एष भगवान् रुद्रो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>स्कन्दश्चापि तथा चेन्द्रो भुवनानि चतुर्दश।<br>अश्विनौ ग्रहताराश्च नक्षत्राणि च खं दिशः ॥ १<br>भूतानि च तथा सूर्यः सोमश्चाष्टौ ग्रहास्तथा।<br>प्राणः कालो यमो मृत्युरमृतः परमेश्वरः ॥ २<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च वर्तमानं महेश्वरः।<br>विश्वं कृत्स्नं जगत्सर्वं सत्यं तस्मै नमो नमः ॥ ३ | जो ये भगवान् रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, कार्तिकेय, इन्द्र, चौदहों भुवन, दोनों अश्विनीकुमार, सभी ग्रह, तारा, नक्षत्र, आकाश तथा दिशाएँ हैं। समस्त प्राणी, सूर्य, चन्द्रमा, आठों ग्रह, प्राण, काल, यम, मृत्यु तथा मोक्षरूप वे परमेश्वर ही हैं। पूर्वकालिक विश्व, उत्पद्यमान सम्पूर्ण संसार, आगे होनेवाले जगत् और वर्तमानकालिक सभी पदार्थ—ये सब वास्तवमें महेश्वर ही हैं। उन्हें बार-बार नमस्कार है ॥ १–३ ॥ |
| त्वमादौ च तथा भूतो भूर्भुवः स्वस्तथैव च।<br>अन्ते त्वं विश्वरूपोऽसि शीर्षं तु जगतः सदा ॥ ४<br>ब्रह्मैकस्त्वं द्वित्रिधार्थमधश्च त्वं सुरेश्वरः।<br>शान्तिश्च त्वं तथा पुष्टिस्तुष्टिश्चाप्यहुतं हुतम् ॥ ५<br>विश्वं चैव तथाविश्वं दत्तं वादत्तमेश्वरम्।<br>कृतं चाप्यकृतं देवं परमप्यपरं ध्रुवम्।<br>परायणं सतां चैव ह्यसतामपि शङ्करम् ॥ ६ | आदि तथा अन्तमें आप ही प्रादुर्भूत हुए। आप भूर्भुवः स्वः (तीनों व्याहृतियाँ)-स्वरूप हैं। आप विश्वरूप हैं तथा सदा जगत्के शीर्ष हैं। आप अद्वितीय हैं, आप प्रकृतिपुरुष द्विधारूप हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिधारूप ब्रह्म हैं। आप सबके आधार तथा देवताओंके ईश्वर हैं। शान्ति, पुष्टि तथा तुष्टि आप ही हैं। हुत, अहुत, विश्व, अविश्व, दत्त, अदत्त, कृत, अकृत, पर, अपर, प्रभु, ईश्वर आप ही हैं। आप शंकर ही साधुओं तथा असाधुओंके आश्रयरूप ब्रह्म हैं ॥ ४–६ ॥ |
| अपामसोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्।<br>किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृतं मर्त्यस्य ॥ ७ | हम उमासहित सदाशिवके सौन्दर्यामृतका अपने |