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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

२२- शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन

अध्याय २२ ] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६५९


एवं दीक्षा प्रकर्तव्या पूजा चैव यथाक्रमम्।<br>त्रिकालमेककालं वा पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ७८(प्रातः, मध्याह्न, सायं) अथवा एक ही समय परमेश्वर शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ७६—७८॥
अग्निहोत्रं च वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।<br>शिवलिङ्गार्चनस्यैते कलांशेनापि नो समाः॥ ७९<br><br>सदा यजति यज्ञेन सदा दानं प्रयच्छति।<br>सदा च वायुभक्षश्च सकृद्योऽभ्यर्चयेच्छिवम्॥ ८०<br><br>एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।<br>येऽर्चयन्ति महादेवं ते रुद्रा नात्र संशयः॥ ८१<br><br>नारुद्रस्तु स्पृशेद्रुद्रं नारुद्रो रुद्रमर्चयेत्।<br>नारुद्रः कीर्तयेद्रुद्रं नारुद्रो रुद्रमाप्नुयात्॥ ८२<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो ह्यधिकारिविधिक्रमः।<br>शिवार्चनार्थं धर्मार्थकाममोक्षफलप्रदः॥ ८३अग्निहोत्र, समस्त वेद तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ—ये सब शिवलिङ्गके अर्चनकी कलाके अंशके भी तुल्य नहीं हैं। जो एक बार शिवका अर्चन कर लेता है, वह मानो सदा यज्ञ करता है, सदा दान देता है और सदा वायुभक्षणरूप तपस्या करता है। जो लोग प्रतिदिन एक काल, दोनों कालों अथवा तीनों कालोंमें महादेवका पूजन करते हैं, वे रुद्ररूप ही हैं, इसमें सन्देह नहीं है। जो रुद्ररूप नहीं है; उसे रुद्रका स्पर्श नहीं करना चाहिये; जो रुद्ररूप नहीं है, उसे रुद्रकी पूजा नहीं करनी चाहिये और जो रुद्ररूप नहीं है, उसे रुद्रका नामकीर्तन नहीं करना चाहिये। जो रुद्ररूप नहीं है, वह रुद्रको नहीं प्राप्त कर सकता। [हे सनत्कुमार!] इस प्रकार मैंने [आपसे] संक्षेपमें शिवकी पूजाके लिये अधिकारी होने तथा उसकी विधिका क्रम कह दिया, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्रदान करनेवाला है॥ ७९—८३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे दीक्षाविधिर्नामैकविंशतितमोऽध्यायः॥ २१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'दीक्षाविधि' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥


बाईसवाँ अध्याय

शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन

शैलादिरुवाच<br>स्नानयागादिकर्माणि कृत्वा वै भास्करस्य च।<br>शिवस्नानं ततः कुर्याद्भस्मस्नानं शिवार्चनम्॥ १शैलादि बोले—[हे सनत्कुमार!] सूर्यस्नान-याग आदि कर्म करके ही शिवस्नान तदनन्तर भस्मस्नान और शिवार्चन करना चाहिये॥ १॥
षष्ठेन मृदमादाय भक्त्या भूमौ न्यसेन्मृदम्।<br>द्वितीयेन तथाभ्युक्ष्य तृतीयेन च शोधयेत्॥ २<br><br>चतुर्थेनैव विभजेन्मलमेकेन शोधयेत्।<br>स्नात्वा षष्ठेन तच्छेषां मृदं हस्तगतां पुनः॥ ३<br><br>त्रिधा विभज्य सर्वं च चतुर्भिर्मध्यमं पुनः।<br>षष्ठेन सप्तवाराणि वामं मूलेन चालभेत्।<br>दशवारं च षष्ठेन दिशो बन्धः प्रकीर्तितः॥ ४छठे मन्त्र (ॐ तपः)—से मृत्तिका लेकर भक्तिपूर्वक भूमिपर स्थापित करे, दूसरे मन्त्र (ॐ भुवः)—से जलसे अभ्युक्षण करके तीसरे मन्त्र (ॐ स्वः)—से उसका शोधन करे। तत्पश्चात् चौथे मन्त्र (ॐ महः)—से मृत्तिकाका भाग करे और प्रथम मन्त्र (ॐ भूः)—से शरीरके मलका शोधन करे। तब छठे मन्त्र (ॐ तपः)—से स्नान करके पुनः शेष मृत्तिकाको हाथमें लेकर (ॐ भूः) आदि चारों मन्त्रोंसे उसके तीन भाग करके पुनः मध्य भागको छठें मन्त्रसे सात बार
६६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| | अभिमन्त्रित करके मूल मन्त्रसे बायें हाथका स्पर्श करे। दस बार छठे मन्त्रके उच्चारणसे दिग्बन्ध करना बताया गया है॥ २–४॥ | | वामेन तीर्थं सव्येन शरीरमनुलिप्य च।<br>स्नात्वा सर्वैः स्मरन् भानुमभिषेकं समाचरेत्॥ ५<br><br>शृङ्गेण पर्णपुटकैः पालाशेन दलेन वा।<br>सौरैरेभिश्च विविधैः सर्वसिद्धिकरैः शुभैः॥ ६<br><br>सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाष्कलाद्यानि सुव्रत।<br>अङ्गानि सर्वदेवेषु सारभूतानि सर्वतः॥ ७ | बायें हाथसे तीर्थ (जल)-का स्पर्श करके दायें हाथसे शरीरका अनुलेप करके सभी मन्त्रोंसे पुनः स्नान करनेके बाद सूर्यका स्मरण करते हुए शृंगसे, पत्तोंकी दोनियोंसे अथवा पलाशके पत्तेसे समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले तथा मंगलकारी विविध सौरमन्त्रोंसे अभिषेक करना चाहिये। हे सुव्रत! अब मैं सभी देवमन्त्रोंमें सारस्वरूप सूर्यसम्बन्धी बाष्कल आदि तथा अंगमन्त्रोंको सम्यक् प्रकारसे बताऊँगा॥ ५–७॥ | | ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म नवाक्षरमयं मन्त्रं बाष्कलं परिकीर्तितम्।<br>न क्षरतीति लोकानि ऋतमक्षरमुच्यते।<br>सत्यमक्षरमित्युक्तं प्रणवादिन्नमोऽन्तकम्॥ ८ | ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म—यह नवाक्षरमय मन्त्र बाष्कल मन्त्र कहा गया है। भूः आदि सातों लोक प्रलयपर्यन्त नष्ट नहीं होते, अतः उन्हें ऋत [अक्षर] कहा जाता है। सत्य (ब्रह्म) अक्षर (नाशशून्य) है, इस प्रकार प्रणवादि नमःपर्यन्त बाष्कल मन्त्र है॥ ८॥ | | ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्।<br>ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः॥ ९<br><br>मूलमन्त्रमिदं प्रोक्तं भास्करस्य महात्मनः।<br>नवाक्षरेण दीप्तास्यं मूलमन्त्रेण भास्करम्॥ १०<br><br>पूजयेदङ्गमन्त्राणि कथयामि यथाक्रमम्।<br>वेदादिभिः प्रभूताद्यं प्रणवेन च मध्यमम्॥ ११<br><br>ॐ भूः ब्रह्महृदयाय ॐ भुवः विष्णुशिरसे ॐ स्वः रुद्रशिखायै ॐ भूर्भुवः स्वःज्वालामालिनीशिखायै ॐ महः महेश्वराय कवचाय ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यः ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट्।<br><br>मन्त्राणि कथितान्येवं सौराणि विविधानि च।<br>एतैः शृङ्गादिभिः पात्रैः स्वात्मानमभिषेचयेत्॥ १२<br><br>ताम्रकुम्भेन वा विप्रः क्षत्रियो वैश्य एव च।<br>सकुशेन सपुष्पेण मन्त्रैः सर्वैः समाहितः॥ १३ | ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि॥ धियो यो नः प्रचोदयात्॥ ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः—यह मन्त्र परमात्मा सूर्यका मूल मन्त्र कहा गया है। नवाक्षर मन्त्रसे तथा मूल मन्त्रसे तेजोमुख सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। अब मैं क्रमसे अंगमन्त्र बता रहा हूँ। अंगमन्त्र आदिमें प्रणव तथा मध्यमें व्याहृतियोंसे युक्त है। ॐ भूः ब्रह्महृदयाय, ॐ भुवः विष्णुशिरसे, ॐ स्वः रुद्रशिखायै, ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिनीशिखायै, ॐ महः महेश्वराय कवचाय, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यः, ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट्—ये विविध सौरमन्त्र कहे गये हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यको समाहित होकर शृंग आदि पात्रोंसे अथवा कुश तथा पुष्पयुक्त ताम्रकुम्भसे इन सभी मन्त्रोंके द्वारा अपना अभिषेक करना चाहिये॥ ९–१३॥ | | रक्तवस्त्रपरीधानः स्वाचामेद्विधिपूर्वकम्।<br>सूर्यश्चेति दिवारात्रौ चाग्निश्चेति द्विजोत्तमः॥ १४ | इसके बाद श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि रक्तवर्णका |

अध्याय २२] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६६१


| आपः पुनन्तु मध्याह्ने मन्त्राचमनमुच्यते।<br>षष्ठेन शुद्धिं कृत्वैव जपेदाद्यमनुत्तमम्॥ १५<br>वौषडन्तं तथा मूलं नवाक्षरमनुत्तमम्।<br>करशाखां तथाङ्गुष्ठमध्यमानामिकां न्यसेत्॥ १६<br>तले च तर्जन्यङ्गुष्ठं मुष्टिभागानि विन्यसेत्।<br>नवाक्षरमयं देहं कृत्वाङ्गैरपि पावितम्॥ १७<br>सूर्योऽहमिति सञ्चिन्त्य मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्।<br>वामहस्तगतैरद्भिर्गन्धसिद्धार्थकान्वितैः ॥ १८<br>कुशपुञ्जेन चाभ्युक्ष्य मूलाग्रैरष्टधा स्थितैः।<br>आपो हिष्ठादिभिश्चैव शेषमाघ्राय वै जलम्॥ १९<br>वामनासापुटेनैव देहे सम्भावयेच्छिवम्।<br>अर्घ्यमादाय देहस्थं सव्यनासापुटेन च॥ २०<br>कृष्णवर्णेन बाह्यस्थं भावयेच्च शिलागतम्।<br>तर्पयेत्सर्वदेवेभ्य ऋषिभ्यश्च विशेषतः॥ २१<br>भूतेभ्यश्च पितृभ्यश्च विधिनार्घ्यं च दापयेत्।<br>व्यापिनीं च परां ज्योत्स्नां सन्ध्यां सम्यगुपासयेत्॥ २२<br>प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने अर्घ्यं चैव निवेदयेत्।<br>रक्तचन्दनतोयेन हस्तमात्रेण मण्डलम्॥ २३<br>सुवृत्तं कल्पयेद्भूतौ प्रार्थयेत द्विजोत्तमाः।<br>प्राङ्मुखस्ताम्रपात्रं च सगन्धं प्रस्थपूरितम्॥ २४<br>पूरयेद्गन्धतोयेन रक्तचन्दनेन च।<br>रक्तपुष्पैस्तिलैश्चैव कुशाक्षतसमन्वितैः॥ २५<br>दूर्वापामार्गगव्येन केवलेन घृतेन च।<br>आपूर्य मूलमन्त्रेण नवाक्षरमयेन च।<br>जानुभ्यां धरणीं गत्वा देवदेवं नमस्य च॥ २६ | वस्त्र धारणकर प्रातःकाल ‘सूर्यश्च०’^१ इस मन्त्रसे, सायंकाल ‘अग्निश्च०’^२—इस मन्त्रसे और मध्याह्नमें ‘आपः पुनन्तु०’^३—इस मन्त्रसे विधिपूर्वक आचमन करे, यह आचमनका मन्त्र कहा जाता है। छठे मन्त्र (ॐ तपः) इस मन्त्रसे शुद्धि करके ही अतिश्रेष्ठ आद्य वौषडन्त मूलमन्त्रका तथा अनुत्तम नवाक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये॥ १४-१५ १/२ ॥<br><br>अंगुष्ठ, मध्यमा, अनामिका तथा कनिष्ठिकाका न्यास करे और तर्जनीमें अंगुष्ठका न्यास करे एवं करतल तथा करपृष्ठमें न्यास करे। इस प्रकार पवित्र देहको अंगमन्त्रोंके द्वारा नवाक्षरमय करके ‘मैं सूर्य हूँ’—ऐसी भावनाकर यथाक्रम इन मन्त्रोंसे तथा ‘आपो हि ष्ठा०’ आदि मन्त्रोंके द्वारा बायें हाथपर स्थित गन्ध-श्वेतसर्षपयुक्त जलसे मूल तथा अग्रभागसहित आठ कुशाके कूर्चसे अपनी देहपर मार्जन करके शेष जल बायें नासापुटसे सूँघकर अपने शरीरमें शिवकी भावना करनी चाहिये। आघ्राण जल (सूँघनेवाले जल)-को अन्तस्थ काले रंगके पापपुरुषके साथ बायें नासिकाछिद्रसे बाहर निकालकर शिलातलपर गिरा हुआ अनुभव करे। तदनन्तर सभी देवताओं, ऋषियों, भूतगणों तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। इसके बाद प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकालव्यापिनी परा, ज्योत्स्ना, सन्ध्याकी उपासना करे और भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। हे श्रेष्ठ द्विजो! रक्तचन्दनके जलसे भूमिपर एक हाथ मापका सुन्दर तथा वृत्ताकार मण्डल बनाना चाहिये और प्रार्थना करनी चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर प्रस्थ (सेरभर) परिमाणवाले गन्धयुक्त जलसे पूर्ण होनेवाले ताम्रपात्रको नवाक्षरमय मूलमन्त्रसे गन्धयुक्त जलसे पूर्ण करे और उसे रक्तचन्दन, रक्तपुष्प, तिल, कुश, अक्षत, दूर्वा, अपामार्ग, पंचगव्य अथवा केवल गोघृतसे भरकर दोनों |


१. ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २५)
२. ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यदह्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २४)
३. ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्। पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम्। यदुच्छिष्टमभोज्यं यद्वा दुश्चरितं मम। सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहꣲ स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २३)

६६२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृत्वा शिरसि तत्पात्रमर्घ्यं मूलेन दापयेत्।<br>अश्वमेधायुतं कृत्वा यत्फलं परिकीर्तितम्॥ २७<br><br>तत्फलं लभते दत्त्वा सौरार्घ्यं सर्वसम्मतम्।<br>दत्त्वैवार्घ्यं यजेद्भक्त्या देवदेवं त्र्यम्बकम्॥ २८<br><br>अथवा भास्करं चेष्ट्वा आग्नेयं स्नानमाचरेत्।<br>पूर्ववद्वै शिवस्नानं मन्त्रमात्रेण भेदितम्॥ २९घुटने भूमिपर टेककर देवदेव सूर्यको नमस्कार करके उस ताम्रपात्रको सिरसे लगाकर मूलमन्त्रके द्वारा अर्घ्य प्रदान करे। दस हजार अश्वमेधयज्ञ करनेपर जो फल बताया गया है, वह फल इस सर्वसम्मत सूर्यार्घ्य देनेसे प्राप्त हो जाता है। अर्घ्य प्रदान करके देवदेव त्र्यम्बक शिवकी भक्तिपूर्वक उपासना करनी चाहिये; अथवा सूर्यका पूजन करके शिवयजनके लिये अग्निस्रान (भस्मस्नान) करना चाहिये। [शिवपूजाके लिये] पूर्वकी भाँति (सूर्यस्नानकी भाँति) शिवस्नान करना चाहिये, इसमें केवल मन्त्रकी भिन्नता है॥ १६—२९॥
दन्तधावनपूर्वं च स्नानं सौरं च शाङ्करम्।<br>विघ्नेशं वरुणं चैव गुरुं तीर्थे समर्च्चयेत्॥ ३०<br><br>बद्ध्वा पद्मासनं तीर्थे तथा तीर्थं समर्च्चयेत्।<br>तीर्थं सङ्गृह्य विधिना पूजास्थानं प्रविश्य च॥ ३१<br><br>मार्गेणार्घ्यपवित्रेण तदाक्रम्य च पादुकम्।<br>पूर्ववत्करविन्यासं देहविन्यासमाचरेत्॥ ३२सूर्यस्नान तथा शिवस्नानके पूर्व दन्तधावन कर लेना चाहिये। तीर्थमें स्नान करके विघ्नेश्वर गणेश, वरुण तथा गुरुकी अर्चना करनी चाहिये। पुनः तीर्थमें पद्मासन लगाकर तीर्थकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। इसके बाद तीर्थजल लेकर खड़ाऊ धारण करके जलसे सिक्त पवित्र मार्गेसे पूजास्थानमें प्रवेशकर [आसनपर विधिवत् बैठकर] पूर्वकी भाँति करन्यास तथा देहन्यास करना चाहिये॥ ३०—३२॥
अर्घ्यस्य सादनं चैव समासात्परिकीर्तितम्।<br>बद्ध्वा पद्मासनं योगी प्राणायामं समभ्यसेत्॥ ३३अर्घ्यस्थापन संक्षेपमें आगे बताया गया है। योगीको चाहिये कि पद्मासन लगाकर प्राणायाम करे॥ ३३॥
रक्तपुष्पाणि सङ्गृह्य कमलाद्यानि भावयेत्।<br>आत्मनो दक्षिणे स्थाप्य जलभाण्डं च वामतः॥ ३४<br><br>ताम्रपात्राणि सौराणि सर्वकामार्थसिद्धये।<br>अर्घ्यपात्रं समादाय प्रक्षाल्य च यथाविधि॥ ३५<br><br>पूर्वोक्तेनाम्बुना सार्धं जलभाण्डे तथैव च।<br>अस्त्रोदकेन चैवार्घ्यमर्घ्यद्रव्यसमन्वितम्॥ ३६<br><br>संहितामन्त्रितं कृत्वा सम्पूज्य प्रथमेन च।<br>तुरीयेणावगुण्ठ्यैव स्थापयेदात्मनोपरि॥ ३७<br><br>पाद्यमाचमनीयं च गन्धपुष्पसमन्वितम्।<br>अम्भसा शोधिते पात्रे स्थापयेत्पूर्ववत्पृथक्।<br>संहितां चैव विन्यस्य कवचेनावगुण्ठ्य च॥ ३८<br><br>अर्घ्याम्बुना समभ्युक्ष्य द्रव्याणि च विशेषतः।<br>आदित्यं च जपेद्देवं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ३९कमल आदि रक्तपुष्पोंका संग्रह करके अपने दक्षिणभागमें रखकर वामभागमें जलपात्र स्थापितकर सूर्यकी भावना करे। सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये सूर्यार्घ्य आदिमें ताम्रपात्र उपयोगी हैं। अर्घ्यपात्र लेकर विधिपूर्वक उसका प्रक्षालन करके पूर्वोक्त जलके साथ अर्घ्यद्रव्यसमन्वित अर्घ्यको अस्त्रोदक मन्त्रसे अन्य जलभाण्डमें प्रदान करे। संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके सद्योजात मन्त्रसे पूजन करके चतुर्थ मन्त्र (तत्पुरुषमन्त्र)-से अवगुण्ठनकर अपने ऊपर स्थापित करना चाहिये। जलसे शुद्ध किये गये पात्रमें गन्ध-पुष्पयुक्त पाद्य तथा आचमनीय जलको पूर्वकी भाँति पृथक्-पृथक् स्थापित करना चाहिये। संहितामन्त्रसे न्यास करके तथा कवचसे अवगुण्ठन करके अर्घ्यजलसे विशेषरूपसे सभी द्रव्योंका प्रोक्षण करके सभी देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले आदित्य देवका [इस प्रकार] जप करना चाहिये॥ ३४—३९॥

अध्याय २२] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६६३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आदित्यो वै तेज ऊर्जो बलं यशो विवर्धति।<br>इत्यादिना नमस्कृत्य कल्पयेदासनं प्रभोः॥ ४०<br><br>प्रभूतं विमलं सारमाराध्यं परमं सुखम्।<br>आग्नेय्यादिषु कोणेषु मध्यमान्तं हृदा न्यसेत्॥ ४१<br><br>अङ्गं प्रविन्यसेच्चैव बीजमङ्कुरमेव च।<br>नालं सुषिरसंयुक्तं सूत्रकण्टकसंयुतम्॥ ४२<br><br>दलं दलाग्रं सुश्वेतं हेमाभं रक्तमेव च।<br>कर्णिकाकेसरोपेतं दीप्ताद्यैः शक्तिभिर्वृतम्॥ ४३<br><br>दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला क्रमात्।<br>अघोरा विकृता चैव दीप्ताद्याश्चाष्टशक्तयः॥ ४४<br><br>भास्कराभिमुखाः सर्वाः कृताञ्जलिपुटाः शुभाः।<br>अथवा पद्महस्ता वा सर्वाभरणभूषिताः॥ ४५<br><br>मध्यतो वरदां देवीं स्थापयेत्सर्वतोमुखीम्।<br>आवाहयेत्ततो देवीं भास्करं परमेश्वरम्॥ ४६<br><br>नवाक्षरेण मन्त्रेण बाष्कलोक्तेन भास्करम्।<br>आवाहने च सान्निध्यमनेनैव विधीयते॥ ४७<br><br>मुद्रा च पद्ममुद्राख्या भास्करस्य महात्मनः।<br>मूलेनार्घ्यं ततो दद्यात्पाद्यमाचमनं पृथक्॥ ४८<br><br>पुनरर्घ्यप्रदानेन बाष्कलेन यथाविधि।<br>रक्तपद्मानि पुष्पाणि रक्तचन्दनमेव च॥ ४९<br><br>दीपधूपादिनैवेद्यं मुखवासादिरेव च।<br>ताम्बूलवर्तिदीपाद्यं बाष्कलेन विधीयते॥ ५०<br><br>आग्नेय्यां च तथैशान्यां नैर्ऋत्यां वायुगोचरे।<br>पूर्वस्यां पश्चिमे चैव षट्प्रकारं विधीयते॥ ५१<br><br>नेत्रान्तं विधिनाभ्यर्च्य प्रणवादिन्मोऽन्तकम्।<br>कर्णिकायां प्रविन्यस्य रूपकध्यानमाचरेत्॥ ५२<br><br>सर्वे विद्युत्प्रभाः शान्ता रौद्रमस्त्रं प्रकीर्तितम्।<br>दंष्ट्राकरालवदनं हृष्टमूर्तिं भयङ्करम्॥ ५३भगवान् सूर्य तेज, ऊर्जा, बल और यशकी वृद्धि करते हैं (आदित्यो वै तेज ऊर्जो बलं यशो विवर्धति) इत्यादि यजुर्वेदश्रुति* से भगवान् सूर्यको नमस्कारकर उन्हें विशाल, स्वच्छ, श्रेष्ठ, प्रशस्त तथा अत्यन्त सुखदायक आसन प्रदान करना चाहिये। आग्नेय आदि चारों कोणोंमें मध्यसे अन्ततककी [महः, जनः, तपः, सत्यम्—इन चार] व्याहृतियोंका हृदयमें न्यास करना चाहिये। इसी प्रकार पूर्वोक्त अंगन्यास भी करना चाहिये। तदनन्तर बीज, अंकुर, छिद्रसहित नाल, सूत्र-कण्टकमय दल, श्वेत-स्वर्णिम तथा रक्तवर्णके दलाग्र, कर्णिका-केसरसे समन्वित तथा दीप्ता आदि शक्तियोंसे युक्त कमलकी भावना करनी चाहिये। [कमलके आठों दलोंमें] दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अघोरा, विकृता—ये सब शुभ आठ शक्तियाँ सूर्यकी ओर मुख करके दोनों हाथ जोड़कर अथवा हाथोंमें कमल धारण करके सभी आभूषणोंसे भूषित होकर क्रमसे स्थित हैं—ऐसी भावना करे और उनके मध्यमें वरदायिनी भगवती गायत्रीको स्थापित करे। तदनन्तर देवीको तथा परमेश्वर भास्करको आवाहित करना चाहिये। भगवान् भास्करको बाष्कलोक्त नवाक्षरमन्त्रसे आवाहित करना चाहिये। आवाहनके समय सन्निधापन इसी मन्त्रसे किया जाता है। महात्मा भास्करको पद्म नामक मुद्रा दिखानी चाहिये। तत्पश्चात् मूलमन्त्रके द्वारा पृथक्-पृथक् अर्घ्य, पाद्य तथा आचमन प्रदान करना चाहिये॥ ४०—४८॥<br><br>इसके बाद पुनः बाष्कलमन्त्रसे अर्घ्यस्नान प्रदान करनेके साथ विधिके अनुसार रक्तकमल, रक्तपुष्प, रक्तचन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, मुखवास (एला, लवंग आदि), ताम्बूल, आरती आदि प्रदान किये जाते हैं। तत्पश्चात् अग्निकोण, ईशानकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, पूर्व तथा पश्चिम दिशामें छः प्रकारका यजन किया जाता है। आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः लगाकर अंगमन्त्रोंके द्वारा नेत्रपर्यन्त उन-उन अंगोंकी पूजा करके अपने हृदयकमलमें न्यास करके उनके प्रतिबिम्बका ध्यान करना चाहिये। उनके हृदय आदि

* यह मन्त्र कृष्ण यजुर्वेदके नारायणोपनिषदमें प्राप्त है।

६६४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग


श्लोकअनुवाद
वरदं दक्षिणं हस्तं वामं पद्मविभूषितम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्ना रक्तस्रगनुलेपनाः ॥ ५४<br><br>रक्ताम्बरधराः सर्वा मूर्तयस्तस्य संस्थिताः।<br>समण्डलो महादेवः सिन्दूरारुणविग्रहः ॥ ५५<br><br>पद्महस्तोऽमृतास्यश्च द्विहस्तनयनः प्रभुः।<br>रक्ताभरणसंयुक्तो रक्तस्रगनुलेपनः ॥ ५६<br><br>इत्थं रूपधरं ध्यायेद्भास्करं भुवनेश्वरम्।सभी अंग विद्युत्के समान कान्तिवाले तथा शान्त हैं, उनका अस्त्र रौद्र कहा गया है, बड़ी दाढ़ोंके कारण उनका मुख विकराल है, वे भयंकर आठ मूर्तियोंसे युक्त हैं, उनके दक्षिण हाथमें वरमुद्रा तथा बायें हाथमें पद्म सुशोभित है, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, रक्तवर्णकी माला तथा रक्त अनुलेपसे युक्त तथा रक्तवस्त्र धारण किये उनकी सभी मूर्तियाँ (शक्तियाँ) उनके साथ विराजमान हैं। मण्डलसहित वे महादेव सिन्दूरके समान अरुण विग्रहवाले हैं, हाथमें कमल धारण किये हुए हैं, अमृतमय मुखमण्डलवाले हैं, दो हाथों तथा नेत्रोंसे सम्पन्न हैं, रक्त आभरणोंसे भूषित हैं तथा रक्तवर्णकी माला एवं अनुलेपसे सुशोभित हैं—इस प्रकारका रूप धारण किये हुए भुवनेश्वर भास्करका ध्यान करना चाहिये॥ ४९–५६ १/२ ॥
पद्मबाह्ये शुभं चात्र मण्डलेषु समन्ततः ॥ ५७<br><br>सोममङ्गारकं चैव बुधं बुद्धिमतां वरम्।<br>बृहस्पतिं महाबुद्धिं रुद्रपुत्रं च भार्गवम् ॥ ५८<br><br>शनैश्चरं तथा राहुं केतुं धूम्रं प्रकीर्तितम्।<br>सर्वे द्विनेत्रा द्विभुजा राहुश्चोर्ध्वशरीरधृक् ॥ ५९<br><br>विवृतास्योऽञ्जलिं कृत्वा भृकुटीकुटिलेक्षणः।<br>शनैश्चरश्च दंष्ट्रास्यो वरदाभयहस्तधृक् ॥ ६०<br><br>स्वैःस्वैर्भावैः स्वनाम्ना च प्रणवादिनमोऽन्तकम्।<br>पूजनीयाः प्रयत्नेन धर्मकामार्थसिद्धये ॥ ६१कमलके बाह्य भागमें सभी ओर मण्डलोंमें शुभ चन्द्र, मंगल, बुध, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बृहस्पति, महान् बुद्धिवाले रुद्रपुत्र शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा धूम्रवर्ण कहे जानेवाले केतुका पूजन करना चाहिये। सभी दो नेत्रों एवं दो भुजाओंवाले हैं, राहु केवल ऊर्ध्व शरीर (सिर)-वाला है, वह मुख खोले हुए तथा टेढ़ी भौंहों और कुटिल दृष्टिवाला है, शनैश्चर भयंकर दाँतोंसे युक्त मुखवाला और हाथमें वरद तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। इनके नामके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः लगाकर धर्म, काम एवं अर्थकी सिद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये॥ ५७–६१॥
सप्तसप्तगणांश्चैव बहिर्देवस्य पूजयेत्।<br>ऋषयो देवगन्धर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः ॥ ६२<br><br>ग्रामण्यो यातुधानाश्च तथा यक्षाश्च मुख्यतः।<br>सप्ताश्वान् पूजयेदग्रे सप्तच्छन्दोमयान् विभोः ॥ ६३<br><br>बालखिल्यगणं चैव निर्माल्यग्रहणं विभोः।<br>पूजयेदासनं मूर्तेर्देवतामपि पूजयेत् ॥ ६४<br><br>अर्घ्यं च दापयेत्तेषां पृथगेव विधानतः।<br>आवाहने च पूजान्ते तेषामुद्वासने तथा ॥ ६५सूर्यदेवके मण्डलके बाहर उनचास मरुद्गणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। जो ऋषि, देव, गन्धर्व, नाग, अप्सराएँ, ग्रामणी, यातुधान (राक्षस) तथा यक्ष हैं, उनका भी पूजन करना चाहिये। भगवान् सूर्यके वेदमय सात अश्वोंकी पूजा पहले करनी चाहिये। प्रभु सूर्यके निर्माल्यग्राही बालखिल्य ऋषिगणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। मूर्तिके आसन तथा देवताकी भी पूजा करनी चाहिये। उन सूर्य आदि देवताओंके आवाहनमें, पूजाके अन्तमें तथा विसर्जनके अन्तमें विधानके अनुसार पृथक्-पृथक् अर्घ्य प्रदान करना चाहिये॥ ६२–६५॥
अध्याय २२ ]शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन६६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सहस्रं वा तदर्धं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।<br>बाष्कलं च जपेदग्रे दशांशेन च योजयेत्॥ ६६<br><br>कुण्डं च पश्चिमे कुर्याद्वर्तुलं चैव मेखलम्।<br>चतुरङ्गुलमानेन चोत्सेधाद्विस्तरादपि॥ ६७<br><br>एकहस्तप्रमाणे नित्ये नैमित्तिके तथा।<br>कृत्वाश्वत्थदलाकारं नाभिं कुण्डे दशाङ्गुलम्॥ ६८<br><br>तदर्धेन पुरस्तात्तु गजोष्ठसदृशं स्मृतम्।<br>गलमेकाङ्गुलं चैव शेषं द्विगुणविस्तरम्॥ ६९<br><br>तत्प्रमाणे कुण्डस्य त्यक्त्वा कुर्वीत मेखलाम्।<br>यत्नेन साधयित्वैव पश्चाद्धोमं च कारयेत्॥ ७०इसके बाद एक हजार, पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार बाष्कल मन्त्रका जप करना चाहिये और पुनः दशांश हवन करना चाहिये। [हवनके लिये] मण्डलके पश्चिमकी ओर वर्तुलाकार कुण्ड बनाना चाहिये और चार अंगुल मापकी ऊँचाई तथा चौड़ाईवाली मेखला बनानी चाहिये। नित्य एवं नैमित्तिक कर्ममें एक हाथ प्रमाणका कुण्ड उत्तम होता है। कुण्डमें अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी दस अँगल परिमाणकी नाभि बनानी चाहिये; उसके आधे (पाँच अंगुल) प्रमाणवाला और हाथीके ओष्ठके सदृश आकारका कुण्डका अगला भाग (योनि) बताया गया है। एक अंगुल प्रमाणका नाल बनाना चाहिये तथा कुण्डके बाहर दो अँगल भाग छोड़कर मेखला बनानी चाहिये। इस प्रकार यत्नपूर्वक कुण्ड बनाकर ही बादमें हवन करना चाहिये॥ ६६-७०॥
षष्ठेनोल्लेखनं कुर्यात्प्रोक्षयेद्वारिणा पुनः।<br>आसनं कल्पयेन्मध्ये प्रथमेन समाहितः॥ ७१<br><br>प्रभावतीं ततः शक्तिमाग्नेय्यां तु विन्यसेत्।<br>बाष्कलेनैव सम्पूज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ७२<br><br>बाष्कलेनैव मन्त्रेण क्रियां प्रति यजेत्पृथक्।<br>मूलमन्त्रेण विधिना पश्चात्पूर्णाहुतिर्भवेत्॥ ७३<br><br>क्रमादेवं विधानेन सूर्याग्निजनितो भवेत्।<br>पूर्वोक्तेन विधानेन प्रागुक्तं कमलं न्यसेत्॥ ७४<br><br>मुखोपरि समभ्यर्च्य पूर्ववद्भास्करं प्रभुम्।<br>दशैवाहुतयो देया बाष्कलेन महामुने॥ ७५<br><br>अङ्गानां च तथैकैकं संहिताभिः पृथक् पुनः।<br>जयादिस्विष्टपर्यन्तमिध्मप्रक्षेपमेव च॥ ७६छठे मन्त्रसे उल्लेखन करना चाहिये तथा जलसे कुण्डका प्रोक्षण करना चाहिये। तदनन्तर समाहित होकर प्रथम मन्त्रसे कुण्डके मध्यमें आसन कल्पित करना चाहिये और प्रथम मन्त्रसे ही प्रभावती [नामक] शक्तिकी स्थापना करनी चाहिये। क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे बाष्कलमन्त्रके द्वारा ही विधिवत् पूजन करके, बाष्कलमन्त्रसे ही प्रत्येक क्रियाका पृथक् यजन करना चाहिये। तत्पश्चात् मूलमन्त्रसे विधिपूर्वक पूर्णाहुति होनी चाहिये। क्रमशः इस विधानके द्वारा सूर्यरूपी अग्नि उत्पन्न हो, तब पहले कहे गये विधानके अनुसार अग्निमें पूर्वोक्त कमलका न्यास करना चाहिये। हे महामुने! उस कमलके मुखपर पूर्वकी भाँति प्रभु भास्करकी सम्यक् पूजा करके संहितामन्त्रोंसे एक-एक अंगोंके लिये बाष्कलमन्त्रके द्वारा पृथक्-पृथक् दस आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये॥ ७१-७५ १/२॥
सामान्यं सर्वमार्गेषु पारम्पर्यक्रमेण च।<br>निवेद्य देवदेवाय भास्करायामितात्मने॥ ७७<br><br>पूजाहोमादिकं सर्वं दत्त्वार्घ्यं च प्रदक्षिणम्।<br>अङ्गैः सम्पूज्य सङ्क्षिप्य हृद्युद्वास्य नमस्य च॥ ७८जयाहोमसे लेकर स्विष्टकृतहोमपर्यन्त पारम्पर्य क्रमसे सभी मार्गोमें यज्ञकाष्ठका प्रक्षेप करना चाहिये। अमित आत्मावाले देवदेव भास्करको समस्त पूजा, होम आदिका समर्पण करके उन्हें अर्घ्य प्रदानकर उनकी प्रदक्षिणा करके अंगमन्त्रोंसे उनकी पूजाकर कर्मोंका

२३- हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन

६६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| शिवपूजां ततः कुर्याद्धर्मकामार्थसिद्धये।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं यजनं भास्करस्य च॥ ७९ | उपसंहार करके अपने हृदयकमलमें विसर्जन करके तथा नमस्कार करनेके अनन्तर धर्म-कामकी सिद्धिके लिये शिवपूजा करनी चाहिये। इस प्रकार संक्षेपमें सूर्यपूजन कहा गया॥ ७६-७९॥ | | यः सकृद्वा यजेद्देवं देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>भास्करं परमात्मानं स याति परमां गतिम्॥ ८०<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वपापविवर्जितः।<br>सर्वैश्वर्यसमोपेतस्तेजसाप्रतिमश्च सः॥ ८१<br><br>पुत्रपौत्रादिमित्रैश्च बान्धवैश्च समन्ततः।<br>भुक्त्वाैव विपुलान् भोगानिहैव धनधान्यवान्॥ ८२<br><br>यानवाहनसम्पन्नो भूषणैर्विविधैरपि।<br>कालं गतोऽपि सूर्येण मोदते कालमक्षयम्॥ ८३<br><br>पुनस्तस्मादिहागत्य राजा भवति धार्मिकः।<br>वेदवेदाङ्गसम्पन्नो ब्राह्मणो वात्र जायते॥ ८४<br><br>पुनः प्राग्वासनायोगाद्धार्मिको वेदपारगः।<br>सूर्यमेव समभ्यर्च्य सूर्यसायुज्यमाप्नुयात्॥ ८५ | जो [मनुष्य] देवदेव जगद्गुरु परमात्मा भास्करका एक बार भी यजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। वह पूर्णरूपसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, सभी पापोंसे रहित हो जाता है, सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो जाता है और अप्रतिम तेजस्वी हो जाता है। वह पुत्र, पौत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धव, धन-धान्य, यान-वाहन, भूषण आदिसे सम्पन्न होकर इस लोकमें विपुल सुखोंका सम्यक् भोग करके मृत्युको प्राप्त होनेपर सूर्यके साथ अनन्त कालतक आनन्द प्राप्त करता है। पुनः वहाँसे इस लोकमें जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है अथवा वेदवेदांगसे सम्पन्न ब्राह्मण होता है। तत्पश्चात् पूर्वजन्मके दृढ़ संस्कारके कारण धर्मपरायण तथा वेदमें पारंगत वह मनुष्य भगवान् सूर्यकी ही भलीभाँति उपासना करके सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है॥ ८०-८५॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तत्त्वशुद्धिवर्णनं नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः॥ २२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तत्त्वशुद्धिवर्णन' नामक बाइसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥


तेईसवाँ अध्याय

हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन

शैलादिरुवाचशैलादि बोले—
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि शिवार्चनमनुत्तमम्।<br>त्रिसन्ध्यमर्चयेदीशमग्निकार्यं च शक्तितः॥ १हे सनत्कुमार! अब मैं आपको अत्युत्तम शिव-पूजनकी विधि बताऊँगा। तीनों कालोंमें भगवान् महेश्वरका पूजन करना चाहिये और सामर्थ्यानुसार हवन भी करना चाहिये॥ १॥
शिवस्नानं पुरा कृत्वा तत्त्वशुद्धिं च पूर्ववत्।<br>पुष्पहस्तः प्रविश्याथ पूजास्थानं समाहितः॥ २<br><br>प्राणायामत्रयं कृत्वा दाहनाप्लावनानि च।<br>गन्धादिवासितकरो महामुद्रां प्रविन्यसेत्॥ ३सर्वप्रथम शिवस्नान करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करे और हाथमें पुष्प आदि लेकर पूजास्थानमें प्रवेश करके समाहितचित्त हो तीन प्राणायाम करके दाहन, आप्लावन आदि शुद्धि करके गन्ध आदिसे हाथोंको सुगन्धित करके [योगशास्त्रमें कही गयी] महामुद्राकी रचना करनी चाहिये॥ २-३॥
विज्ञानेन तनुं कृत्वा ब्रह्माग्नेरपि यत्नतः।<br>अव्यक्तबुद्ध्यहङ्कारतन्मात्रासम्भवां तनुम्॥ ४अव्यक्त, बुद्धि, अहंकार तथा पंचतन्मात्राओंसे

अध्याय २३] हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन ६६७


| शिवामृतेन सम्पूर्तं शिवस्य च यथातथम्।<br>अधोनिष्ठ्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरि तिष्ठति॥ ५<br>हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्।<br>हृत्पद्मकर्णिकायां तु देवं साक्षात्सदाशिवम्॥ ६<br>पञ्चवक्त्रं दशभुजं सर्वाभरणभूषितम्।<br>प्रतिवक्त्रं त्रिनेत्रं च शशाङ्ककृतशेखरम्॥ ७<br>बद्धपद्मासनासीनं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>ऊर्ध्वं वक्त्रं सितं ध्यायेत्पूर्वं कुङ्कुमसन्निभम्॥ ८<br>नीलाभं दक्षिणं वक्त्रमतिरक्तं तथोत्तरम्।<br>गोक्षीरधवलं दिव्यं पश्चिमं परमेष्ठिनः॥ ९<br>शूलं परशुखड्गं च वज्रं शक्तिं च दक्षिणे।<br>वामे पाशाङ्कुशं घण्टां नागं नाराचमुत्तमम्॥ १०<br>वरदाभयहस्तं वा शेषं पूर्ववदेव तु।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं चित्राम्बरधरं शिवम्॥ ११<br>ब्रह्माङ्गविग्रहं देवं सर्वदेवोत्तमोत्तमम्।<br>पूजयेत्सर्वभावेन ब्रह्माङ्गैरब्रह्मणः पतिम्॥ १२ | उत्पन्न शरीरको प्रयत्नपूर्वक शुद्ध ज्ञानसे तथा ज्ञानाग्निसे दग्ध करके कल्याणमय अमृतके द्वारा शिवके योग्य पवित्र देह बनाये। ग्रीवासे एक वितस्ति नीचे तथा नाभिसे एक वितस्ति ऊपर हृदयदेश विराजमान है, उसीको विश्वका महान् स्थान समझना चाहिये; उसी हृदयकमलकी कर्णिकामें साक्षात् भगवान् सदाशिवका ध्यान करना चाहिये। वे पाँच मुखों तथा दस भुजाओंसे युक्त हैं, सभी आभरणोंसे सुशोभित हैं, उन्होंने प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र धारण कर रखा है, उनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजमान है, वे बद्ध पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं, शुद्ध स्फटिकके समान उनका वर्ण है, उनका ऊर्ध्व मुख श्वेतवर्ण है, पूर्व मुख कुंकुमसदृश है, दक्षिण मुख नील आभावाला है और उत्तर मुख अत्यन्त रक्तवर्ण है। उन परमेष्ठी शिवका पश्चिम मुख गोदुग्धके समान धवल तथा दिव्य है। उन्होंने दाहिने हाथमें शूल, परशु, खड्ग, वज्र तथा शक्ति और बायें हाथमें पाश, अंकुश, घंटा, नाग तथा श्रेष्ठ नाराच धारण कर रखा है, वे समस्त आभरणोंसे समन्वित हैं, अद्भुत वस्त्र पहने हुए हैं और वरद तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं—इस प्रकार सद्योजात आदि अंगविग्रहवाले, सभी देवताओंमें अतिश्रेष्ठ तथा ब्रह्माके पति भगवान् शिवका ध्यान करना चाहिये तथा [सद्योजातादि] ब्रह्ममन्त्रोंसे सम्यक् प्रकारसे उनका पूजन करना चाहिये॥ ४—१२॥ | | उक्तानि पञ्च ब्रह्माणि शिवाङ्गानि शृणुष्व मे।<br>शक्तिभूतानि च तथा हृदयादीनि सुव्रत॥ १३<br>ॐ ईशानः सर्वविद्यानां हृदयाय शक्तिबीजाय नमः।<br>ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः॥ १४<br>ॐ ब्रह्माधिपतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः।<br>ॐ ब्रह्माणोऽधिपतये कालचण्डमारुताय कवचाय नमः॥ १५<br>ॐ ब्रह्मणे बृंहणाय ज्ञानमूर्तये नेत्राय नमः।<br>ॐ शिवाय सदाशिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्॥ १६<br>ॐ सद्योजाताय भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंसशिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परापराय शिवाय शिवतमाय नमः॥ १७<br>कथितानि शिवाङ्गानि मूर्तिविद्या च तस्य वै।<br>ब्रह्माङ्गमूर्तिं विद्याङ्गसहितां शिवशासने॥ १८ | हे सुव्रत! पंचब्रह्म और शिवांग पहले ही कहे गये हैं; अब शक्तिभूत हृदय आदि मन्त्रोंको सुनिये। ॐ ईशानः सर्वविद्यानां हृदयाय शक्तिबीजाय नमः। ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः। ॐ ब्रह्माधिपतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः। ॐ ब्रह्माणोऽधिपतये कालचण्डमारुताय कवचाय नमः। ॐ ब्रह्मणे बृंहणाय ज्ञानमूर्तये नेत्राय नमः। ॐ शिवाय सदाशिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्। ॐ सद्योजाताय भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंसशिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परापराय शिवाय शिवतमाय नमः—ये शिवांगमन्त्र, उनके मूर्तिमन्त्र तथा विद्यामन्त्र |

६६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग


| सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाष्कलाद्यानि सुव्रत।<br>अङ्गानि सर्ववेदेषु सारभूतानि सुव्रत॥ १९<br>ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ<br>तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म।<br>नवाक्षरमयं मन्त्रं बाष्कलं परिकीर्तितम्।<br>न क्षरतीति लोकेऽस्मिंस्ततो ह्यक्षरमुच्यते।<br>सत्यमक्षरमित्युक्तं प्रणवादिनमोऽन्तकम्॥ २०<br>ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्।<br>नमः सूर्याय खखोल्काय नमः॥ २१<br>मूलमन्त्रमिति प्रोक्तं भास्करस्य महात्मनः।<br>नवाक्षरेण दीप्ताद्या मूलमन्त्रेण भास्करम्॥ २२<br>पूजयेदङ्गमन्त्राणि कथयामि समासतः।<br>वेदादिभिः प्रभूताद्यं प्रणवेन तु मध्यमम्॥ २३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे हृदयाय नमः। ॐ भुवः विष्णवे<br>शिरसे नमः। ॐ स्वः रुद्राय शिखायै नमः। ॐ<br>भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिन्यै देवाय नमः। ॐ महः<br>महेश्वराय कवचाय नमः। ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यो<br>नमः। ॐ तपस्तापनाय अस्त्राय नमः।<br>एवं प्रसङ्गाद्देवेश सौराणि कथितानि ह।<br>शैवानि च समासेन न्यासयोगेन सुव्रत॥ २४<br>इत्थं मन्त्रमयं देवं पूजयेद्धृदयाम्बुजे।<br>नाभौ होमं तु कर्तव्यं जनयित्वा यथाक्रमम्॥ २५<br>मनसा सर्वकार्याणि शिवाग्नौ देवमीश्वरम्।<br>पञ्चब्रह्माङ्गसम्भूतं शिवमूर्तिं सदाशिवम्॥ २६<br>रक्तपद्मासनासीनं शकलीकृत्य यत्नतः।<br>मूलेन मूर्तिमन्त्रेण ब्रह्माङ्गाद्यैस्तु सुव्रत॥ २७<br>समिदाज्याहुतीर्हुत्वा मनसा चन्द्रमण्डलात्।<br>चन्द्रस्थानात्समुत्पन्नां पूर्णधारामनुस्मरेत्॥ २८<br>पूर्णाहुतिविधानेन ज्ञानिनां शिवशासने।<br>शिवं वक्त्रगतं ध्यायेत्तेजोमात्रं च शाङ्करम्॥ २९<br>ललाटे देवदेवेशं भ्रूमध्ये वा स्मरेत्पुनः।<br>यच्च हृत्कमले सर्वं समाप्य विधिविस्तरम्॥ ३० | कहे गये हैं। विद्यांगसहित ब्रह्मांग-मूर्तिको शिवशास्त्रमें विद्यमान जानना चाहिये। हे सुव्रत! सभी वेदोंके सारभूत सूर्यसम्बन्धी बाष्कल आदि तथा अंगमन्त्रोंको मैं [प्रसंगवश फिरसे] बताऊँगा॥ १३-१९॥<br><br>ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म—यह नौ अक्षरोंवाला बाष्कलमन्त्र कहा गया है। चूँकि नष्ट नहीं होता, अतः इस लोकमें उसे अक्षर कहा जाता है। आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमःसे युक्त मन्त्रको सत्य तथा अक्षर कहा गया है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः—यह महात्मा भास्करका मूलमन्त्र कहा गया है। नवाक्षरमन्त्रसे दीप्ता आदि शक्तियोंकी तथा मूलमन्त्रसे भास्करकी पूजा करनी चाहिये। अब संक्षेपमें अंगमन्त्र बता रहा हूँ। अंगमन्त्र आदिमें प्रणव तथा मध्यमें व्याहृतियोंसे युक्त है। ॐ भूः ब्रह्मणे हृदयाय नमः, ॐ भुवः विष्णवे शिरसे नमः, ॐ स्वः रुद्राय शिखायै नमः, ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिन्यै देवाय नमः, ॐ महः महेश्वराय कवचाय नमः, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यो नमः, ॐ तपस्तापनाय अस्त्राय नमः। हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने यहाँ प्रसंगवश संक्षेपमें न्यासयोगसे सौर तथा शैव मन्त्रोंको कह दिया॥ २०-२४॥<br><br>इस प्रकार हृदयकमलमें मन्त्रमय भगवान् शिवकी पूजा करे तथा नाभिस्थानमें यथाविधि अग्नि उत्पन्न करके होम करे; सभी कार्य मनसे ही सम्पन्न करना चाहिये। रक्तकमलके आसनपर बैठे हुए पंचब्रह्मांगसम्भूत कल्याणमूर्ति भगवान् सदाशिवको सकलीकृत करके यत्नपूर्वक मूलमन्त्र, मूर्तिमन्त्र, ब्रह्ममन्त्र और अंगमन्त्रोंसे शिवाग्निमें मनसे ही समिधा और घृतकी आहुति प्रदान करके ज्ञानियोंके लिये शिवशास्त्रमें कही गयी तथा चन्द्रमण्डलमें चन्द्रस्थानसे उत्पन्न अमृतधाराका पूर्णाहृतिके विधानसे स्मरण करना चाहिये। कल्याणकारी तेजोमय शिव मेरे मुखमें प्रविष्ट हैं—ऐसा ध्यान करना चाहिये। ललाटमें अथवा भ्रूमध्यस्थानमें उन देवदेवेश शिवका |

२४- न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य

अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६६९


शुद्धदीपशिखाकारं भावयेद्भवनाशनम्।<br><br>लिङ्गे च पूजयेद्देवं स्थण्डिले वा सदाशिवम्॥ ३१स्मरण करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक समस्त कृत्य सम्पन्न करके अपने हृदयकमलमें शुद्ध दीपशिखाके आकारवाले भवनाशक शिवकी भावना करनी चाहिये और शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें प्रभु सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये॥ २५—३१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवार्चनविधिवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवार्चनविधिवर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥


चौबीसवाँ अध्याय

न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य

शैलादिरुवाच<br>व्याख्यां पूजाविधानस्य प्रवदामि समासतः।<br>शिवशास्त्रोक्तमार्गेण शिवेन कथितं पुरा॥ १शैलादि बोले—[हे सनत्कुमार!] मैं शिवशास्त्रमें कही गयी रीतिसे शिवपूजा-विधिका वर्णन संक्षेपमें कर रहा हूँ, जिसे पूर्व कालमें स्वयं शिवजीने कहा था॥ १॥
अथोभौ चन्दनचर्चितौ हस्तौ वौषडन्तेनाद्यञ्जलिं<br>कृत्वा मूर्तिविद्याशिवादीनि जप्त्वा अङ्गुष्ठादि-<br>कनिष्ठिकान्तं ईशानाद्यं कनिष्ठिकादिमध्यमान्तं<br>हृदयादितृतीयान्तं तुरीयमङ्गुष्ठेनानामिकया पञ्चमं<br>तलद्वयेन षष्ठं तर्जन्यङ्गुष्ठाभ्यां नाराचास्त्रप्रयोगेण<br>पुनरपि मूलं जप्त्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य<br>शिवहस्तमित्युच्यते॥ २<br><br>शिवार्चना तेन हस्तेन कार्या॥ ३[शिवस्नान और भस्मस्नानके पश्चात्] दोनों हाथोंको चन्दनसे चर्चित करके अन्तमें 'वौषट्' से युक्त मूलमन्त्रके द्वारा अंजलि बाँधकर मूर्ति, विद्या और अंगमन्त्रोंका जप करके अँगुष्ठसे कनिष्ठिकापर्यन्त ईशान आदि पाँच मन्त्रोंका न्यास करे। [न्यासक्रम इस प्रकार है—] पूर्वोक्त अंगमन्त्रोंमेंसे सद्योजातसे लेकर तीसरे अघोर मन्त्रोंका कनिष्ठिका, तर्जनी और मध्यमामें न्यास करे; चौथे मन्त्र (तत्पुरुषमन्त्र)-का अंगुष्ठमें और पाँचवें मन्त्रका अनामिकामें और छठे मन्त्रका दोनों हाथोंके दोनों तलोंमें न्यास करे। इसके पश्चात् तर्जनी तथा अंगुष्ठके योगसे नाराच अस्त्र मुद्रा बनाये और फिर मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-का जप करके चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करे; इसे ही शिवहस्त कहा जाता है, उसी हाथसे शिवपूजन करना चाहिये॥ २-३॥
तत्त्वगतमात्मानं व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्ववत्॥ ४<br><br>क्ष्माम्भोऽग्निवायुव्योमान्तं पञ्चचतुःशुद्धकोट्यन्ते<br>धारासहितेन व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्वं कुर्यात्॥ ५तत्त्वोंमें विद्यमान आत्माको व्यवस्थित करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशपर्यन्त पंचकोशोंका अतिक्रमण करके अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और ब्रह्मका भी उल्लंघनकर शुद्धकोटि (ब्रह्म)-के समीप अमृतधारासहित सुषुम्णा मार्गसे अपनी आत्माको स्थापित करके सर्वप्रथम
६७०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्त्वशुद्धिः षष्ठेन सद्येन तृतीयेन फडन्ताद्धराशुद्धिः ॥ ६<br><br>षष्ठसहितेन सद्येन तृतीयेन फडन्तेन वारितत्त्वशुद्धिः ॥ ७<br><br>वाह्नेयतृतीयेन फडन्तेनाग्निशुद्धिः ॥ ८<br><br>वायव्यचतुर्थेन षष्ठसहितेन फडन्तेन वायुशुद्धिः ॥ ९<br><br>षष्ठेन ससद्येन तृतीयेन फडन्तेनाकाशशुद्धिः ॥ १०तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥<br><br>तत्त्वशुद्धि इस प्रकार होती है—अन्तमें फट्से युक्त छठे 'नमो हिरण्यबाहवे०' मन्त्र, सद्योजातमन्त्र तथा तृतीय अघोरमन्त्रसे पृथ्वीतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित सद्योजात और तृतीय अघोरमन्त्रसे जलतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त अग्निसम्बन्धी तृतीय अघोरमन्त्रसे अग्नितत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित वायुसम्बन्धी चतुर्थ तत्पुरुषमन्त्रसे वायुतत्त्वकी शुद्धि होती है और फडन्त सद्योजातसहित षष्ठ तथा तृतीय अघोर-मन्त्रसे आकाशतत्त्वकी शुद्धि होती है ॥ ६—१०॥
उपसंहृत्यैवं सद्यषष्ठेन तृतीयेन मूलेन फडन्तेन ताडनं<br>तृतीयेन सम्पुटीकृत्य ग्रहणं मूलमेव योनिबीजेन<br>सम्पुटीकृत्वा बन्धनं बन्धः ॥ ११इस प्रकार पूर्वोक्तका उपसंहार करके सद्योजातमन्त्रके साथ षष्ठ 'नमो हिरण्यबाहवे०' और तृतीय 'अघोरेभ्यो०' मन्त्रके साथ फडन्त मूलमन्त्र [पंचाक्षरी]-से ताड़न करे। तृतीय [अघोरेभ्यो०] मन्त्रसे सम्पुटित मूल [पंचाक्षरी] मन्त्रद्वारा ग्रहण करे। योनि [ह्रीं] बीजद्वारा सम्पुटितकर मूल [पंचाक्षरी]-से दिग्बन्ध करे ॥ ११ ॥
एवं शान्तातीतादिनिवृत्तिपर्यन्तं पूर्ववत्कृत्वा प्रणवेन<br>तत्त्वत्रयकमनुध्याय आत्मानं दीपशिखाकारं<br>पुर्यष्टकसहितं त्रयातीतं शक्तिक्षोभेणामृतधारां<br>सुषुम्णायां ध्यात्वा ॥ १२इक्कीसवें अध्यायमें कहे गये शांतातीतादिसे निवृत्तिकलातक सब विधान पूर्ण करके प्रणवद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्ररूप दीपशिखाकार आत्माका ध्यान करके शुद्ध चैतन्यरूपको मूलाधारादि पुर्यष्टकके साथ त्रयातीत [विश्व तैजस, प्राज्ञादिसे परे] स्वयं का कुण्डलिनीप्रबोध होनेसे सुषुम्णामें अमृतधारारूपमें ध्यान करे। इसी प्रकार नाद, बिन्दु, अकार, उकार तथा मकारका जिनमें अन्त होता है और जो रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्मासे भी अतीत हैं, उन कल्याणकारी सदाशिवका शान्त्यातीता आदिसे
शान्त्यतीतादिनिवृत्तिपर्यन्तानां चान्तर्नादबिन्द्वकारो-<br>कारमकारान्तं शिवं सदाशिवं रुद्रविष्णुब्रह्मान्तं<br>सृष्टिक्रमेणामृतीकरणं ब्रह्मन्यासं कृत्वा पञ्चवक्त्रेषु<br>पञ्चदशनयनं विन्यस्य मूलेन पादादिकेशान्तं<br>महामुद्रामपि बद्ध्वा शिवोऽहमिति ध्यात्वा<br>शक्त्यादीनि विन्यस्य हृदि शक्त्या बीजाङ्कुरा-<br>नन्तरात्तसुषिरसूत्रकण्टकपत्रकेसरधर्मज्ञानवैराग्यै-<br>श्वर्यसूर्यसोमाग्निवामा-ज्येष्ठा-रौद्रीकाली-कल-निवृत्तिपर्यन्त [पाँच] कलाओंका ध्यान करके सृष्टिक्रमसे अमृतीकरण तथा ब्रह्मन्यासकर उनके पाँच मुखोंमें पन्द्रह नेत्रोंका न्यास करे और मूल मन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-के द्वारा पादसे केशपर्यन्त न्यास करके महामुद्रा बाँधकर 'मैं शिव हूँ'—ऐसा ध्यान करे, पुनः शक्ति आदिका न्यास करके हृदयाकाशमें शक्तिके साथ बीज, अंकुर, व्यवधानरहित छिद्र, सूत्र, कण्टक, पत्र, केसर और कर्णिकायुक्त कमलका ध्यान करके उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्निका तथा उसके

अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विकरणीबलविकरणीबलप्रमथनीसर्वभूतदमनीः<br>केसरेषु कर्णिकायां मनोन्मनीमपि ध्यात्वा॥ १३केसरोंमें वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनीका तथा उसकी कर्णिकामें मनोन्मनी शक्तिका भी ध्यान करे॥ १२-१३॥
आसनं परिकल्प्यैवं सर्वोपचारसहितं बहिर्योगोप-<br>चारेणान्तःकरणं कृत्वा नाभौ वह्निकुण्डे पूर्ववदासनं<br>परिकल्प्य सदाशिवं ध्यात्वा बिन्दुतोऽमृतधारां<br>शिवमण्डले निपतितां ध्यात्वा ललाटे महेश्वरं<br>दीपशिखाकारं ध्यात्वा आत्मशुद्धिरित्थं प्राणापानौ<br>संयम्य सुषुम्णया वायुं व्यवस्थाप्य षष्ठेन तालुमुद्रां<br>कृत्वा दिग्बन्धं कृत्वा षष्ठेन स्थानशुद्धिर्वस्त्रादि-<br>दिपूतान्तरर्घ्यपात्रादिषु प्रणवेन तत्त्वत्रयं विन्यस्य<br>तदुपरि बिन्दुं ध्यात्वा त्वम्भसा विपूर्य द्रव्याणि च<br>विधाय अमृतप्लावनं कृत्वा पाद्यपात्रादिषु<br>तेषामर्घ्यवदासनं परिकल्प्य संहितयाभिमन्त्र्या-<br>द्येनाभ्यर्च्य द्वितीयेनामृतीकृत्वा तृतीयेन विशोध्य<br>चतुर्थेनावगुण्ठ्य पञ्चमेनावलोक्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय चतुर्थेन कुशपुञ्जेनार्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य<br>आत्मानमपि द्रव्याणि पुनरर्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य सपुष्पेण<br>सर्वद्रव्याणि पृथक्पृथक् शोधयेत्॥ १४बहिर्योगके उपचारसे अन्तःकरण सामग्री करके पूर्वोक्त प्रकारसे समस्त उपचारसहित आसन कल्पितकर नाभिमें वह्निकुण्डके मध्य पूर्वकी भाँति आसन परिकल्पित करके उसके ऊपर सदाशिवका चिन्तनकर ललाटमें दीपशिखाके आकारवाले महेश्वरका ध्यान करके बिन्दुसे शिवमण्डलमें गिरती हुई अमृतधाराका ध्यान करे—इस रूपसे आत्मशुद्धि होती है। प्राण तथा अपानको संयमित करके सुषुम्णाद्वारा वायुको व्यवस्थितकर षष्ठ मन्त्रसे खेचरी मुद्रा बनाकर षष्ठ मन्त्रसे ही दिग्बन्ध करे—इस प्रकारसे शरीरशुद्धि होती है। तदनन्तर वस्त्र आदिके द्वारा सम्यक् पोंछकर पवित्र किये गये अर्घ्यपात्र आदिमें प्रणवके द्वारा तत्त्वत्रयका न्यास करके उनके ऊपर बिन्दुका ध्यानकर जलसे पूर्ण करके पूजाद्रव्योंको व्यवस्थितकर अमृतप्लावन करके पाद्यपात्रोंमें तत्त्व आदिके लिये अर्घ्यकी भाँति आसनकी कल्पना करे; तत्पश्चात् संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके प्रथम मन्त्रसे उनका अभ्यर्चन, द्वितीय मन्त्रसे अमृतीकरण, तृतीय मन्त्रसे विशोधन, चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन, पंचम मन्त्रसे अवलोकन और षष्ठ मन्त्रसे रक्षाविधान करे, इसके बाद चतुर्थ मन्त्रसे कुशकूर्चके द्वारा अपने ऊपर तथा द्रव्योंके ऊपर भी अर्घ्यजलसे अभ्युक्षण करके पुनः पुष्पयुक्त अर्घ्यजलसे सभी द्रव्योंका पृथक्-पृथक् शोधन करे॥ १४॥
सद्येन गन्धं वामेन वस्त्रम्। अघोरेण आभरणं पुरुषेण<br>नैवेद्यम्। ईशानेन पुष्पाणि अथाभिमन्त्रयेत्॥ १५तत्पश्चात् सद्योजातमन्त्रसे गन्धको, वामदेवमन्त्रसे वस्त्रको, अघोरमन्त्रसे आभरणको, तत्पुरुषमन्त्रसे नैवेद्यको और ईशानमन्त्रसे पुष्पोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये;
शिवगायत्र्या शेषं प्रोक्षयेत्॥ १६शिवगायत्रीसे शेष अन्य द्रव्योंका प्रोक्षण करना चाहिये।
पञ्चामृतपञ्चगव्यादीनि ब्रह्माङ्गमूलाद्यैरभिमन्त्रयेत्॥ १७पंचामृत, पंचगव्य आदि पदार्थोंके ब्रह्ममन्त्र, अंगमन्त्र, मूलमन्त्र (पंचाक्षर बीजमन्त्र) आदिसे अभिमन्त्रित करना चाहिये। पुनः पृथक्-पृथक् उन गन्ध आदि
पृथक्पृथङ्भूलेनार्घ्यं धूपं दत्त्वाचमनीयं च तेषामपिपूजोपचारोंको मूलमन्त्रके द्वारा अर्घ्य, धूप, आचमनीय

| ६७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |

| धेनुमुद्रां च दर्शयित्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षां च विधाय द्रव्यशुद्धिं कुर्यात् ॥ १८ | आदि अर्पण करके उन्हें धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्र-मन्त्रसे रक्षाविधान करके द्रव्यशुद्धि करनी चाहिये ॥ १५-१८ ॥ | | अर्घ्योदकमग्रे हृदा गन्धमादायास्त्रेण विशोध्यं पूजाप्रभृतिकरणं रक्षान्तं कृत्वैवं द्रव्यशुद्धिं पूजासमर्पणान्तं मौनमास्थाय पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा सर्वमन्त्राणि प्रणवादिन्मोऽन्ताज्जपित्वा पुष्पाञ्जलिं त्यजेन्मन्त्रशुद्धिरित्थम् ॥ १९ | सर्वप्रथम हृदयमन्त्रके द्वारा अर्घ्योदकयुक्त गन्ध लेकर अस्त्रमन्त्रसे शोधन करके पूजनोपयोगी साधन सम्प्रोक्षणसे लेकर [भूतापसारण, दिग्बन्धनादि] रक्षाविधान करके ही द्रव्यशुद्धि करे; तब पूजासमर्पणके अन्ततक मौन धारण करके अन्तमें पुष्पांजलि ग्रहण करके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमःसे युक्त सभी पूजा-मन्त्रोंको जपकर पुष्पांजलि छोड़ देनी चाहिये—इस प्रकार मन्त्रशुद्धि होती है॥ १९॥ | | अग्रे सामान्यार्घ्यपात्रं पयसापूर्य गन्धपुष्पादिना संहितायामभिमन्त्र्य धेनुमुद्रां दत्त्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षयेत्। पूजां पर्युषितां गायत्र्या समभ्यर्च्य सामान्यार्घ्यं दत्त्वा गन्धपुष्पधूपाचमनीयं स्वधान्तं नमोऽन्तं वा दत्त्वा ब्रह्माभिः पृथक्पृथक्पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा फडन्तास्त्रेण निर्माल्यं व्यपोह्य ईशान्यां चण्डमभ्यर्च्य्यासनमूर्तिं चण्डं सामान्यास्त्रेण लिङ्गपीठं शिवं पाशुपतास्त्रेण विशोध्य मूर्ध्नि पुष्पं निधाय पूजयेल्लिङ्गशुद्धिः ॥ २० | अपने आगे सामान्य अर्घ्यपात्रको जलसे पूर्ण करके उसमें गन्ध-पुष्प आदि डालकर संहितामन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित करे और धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन करके अस्त्रमन्त्रसे रक्षा करे। पूर्व दिनके पूजित शिवलिङ्गकी गायत्रीसे अर्चना करके सामान्य अर्घ्य प्रदानकर स्वधा अथवा नमः अन्तमें लगाकर गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि उपचार अर्पित करके ब्रह्ममन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् पुष्पांजलि प्रदान करे; इसके बाद फडन्त अस्त्रमन्त्रसे निर्माल्य उतारकर ईशान दिशामें चण्डका अभ्यर्चन करके आसनमूर्ति चण्डका सामान्य अस्त्रमन्त्रसे और लिङ्गपीठ (योनि) तथा शिवलिङ्गका पाशुपतास्त्रमन्त्रसे विशोधन करके लिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर पूजन करे; इस प्रकार लिङ्गशुद्धि होती है॥ २०॥ | | आसनं कूर्मशिलायां बीजाङ्कुरं तदुपरि ब्रह्मशिलायामन्तन्नालसुषिरे सूत्रपत्रकण्टककर्णिकाकेसरधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसूर्यासोमाग्निकेसरशक्तिं मनोन्मनीं कर्णिकायां मनोन्मनेनानन्तासनायेति समासेनासनं परिकल्प्य तदुपरि निवृत्त्यादिकलामयं षड्विधसहितं कर्मकलाङ्गदेहं सदाशिवं भावयेत् ॥ २१ | तत्पश्चात् कूर्मपृष्ठके आसन और उसके ऊपर बीजांकुर, पुनः उसके ऊपर ब्रह्मशिलापर छिद्रयुक्त अनन्त नालके भीतर सूत्र, दल, कण्टक, कर्णिका, केसर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वामा आदि [पूर्वकथित आठ] शक्तियाँ और कर्णिकामें मनोन्मनसहित मनोन्मनीका ध्यान करे। पुनः ‘अनन्तासनाय नमः’—इस मन्त्रसे संक्षेपमें आसन कल्पित करके उसके ऊपर निवृत्ति आदि कलायुक्त षट्कोशसहित वेदमूर्ति सदाशिवका चिन्तन करे॥ २१॥ | | उभाभ्यां सपुष्पाभ्यां हस्ताभ्यामङ्गुष्ठेन पुष्पमापीड्य | तदनन्तर दोनों हाथोंमें पुष्प ग्रहणकर अँगुष्ठसे |

अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आवाहनमुद्रया शनैः शनैः हृदयादिमस्तकान्तमारोप्य<br>हृदा सह मूलं प्लुतमुच्चार्य सद्येन बिन्दुस्था-<br>नादभ्यधिकं दीपशिखाकारं सर्वतोमुखहस्तं व्याप्य-<br>व्यापकमावाह्य स्थापयेत्॥ २२पुष्पको दबाकर आवाहनमुद्राके द्वारा धीरे-धीरे हृदयसे मस्तकपर्यन्य आरोपण करके हृदयमन्त्रसहित मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-को उच्च स्वरमें उच्चारित करके बिन्दुस्थानसे भी अधिक दीपशिखाकार और सभी ओर मुख तथा हाथ करके व्याप्त उन व्यापक परमेश्वरको सद्योजातमन्त्रसे आवाहितकर स्थापित करना चाहिये॥ २२॥
पूर्वहृदा शिवशक्तिसमवायेन परमीकरणममृतीकरणं<br>हृदयादिमूलेन सद्येनावाहनं हृदा मूलोपरि वामेन<br>स्थापनं हृदा मूलोपरि अघोरेण संनिरोधं हृदा मूलोपरि<br>पुरुषेण सान्निध्यं हृदा मूलेन ईशानेन पूजयेदिति<br>उपदेशः॥ २३<br><br>पञ्चमन्त्रसहितेन यथापूर्वमात्मनो देहनिर्माणं तथा<br>देवस्यापि वह्नेश्चैवमुपदेशः॥ २४पहले हृदयमन्त्रसे शिवशक्तिके तादात्म्यसे एकीकरण तथा अमृतीकरण करे; पुनः हृदयमन्त्रपूर्वक मूलमन्त्रसहित सद्योजातमन्त्रसे आवाहन करके हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रयुक्त वामदेवमन्त्रसे स्थापन और इसी प्रकार हृदयमन्त्र एवं मूलमन्त्रसहित अघोर मन्त्रसे संनिरोधन करे; इसके बाद हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रसहित तत्पुरुषमन्त्रसे सान्निध्य करे। तदनन्तर हृदयमन्त्र और मूलमन्त्रयुक्त ईशानमन्त्रसे पूजन करे—यह उपदेश है। पूर्वमें जिस प्रकार पाँच मन्त्रोंसे अपना देहनिर्माण किया, उसी प्रकार देवता तथा अग्निका भी देहनिर्माण करना चाहिये—ऐसा उपदेश है॥ २३-२४॥
रूपकध्यानं कृत्वा मूलेन नमस्कारान्तमापाद्य<br>स्वधान्तमाचमनीयं सर्वं नमस्कारान्तं वा स्वाहाकारा-<br>न्तमर्घ्यं मूलेन पुष्पाञ्जलिं वौषडन्तेन सर्वं नमस्कारान्तं<br>हृदा वा ईशानेन वा रुद्रगायत्र्या ॐ नमः शिवायेति<br>मूलमन्त्रेण वा पूजयेत्॥ २५मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)-को नमस्कारान्त बोलकर सदाशिवके प्रतिबिम्बका ध्यान करके, आचमनीय देते समय मन्त्रको स्वधान्त अथवा सब कुछ नमस्कारान्त ही करे। अर्घ्यदानमें मूलमन्त्रको स्वाहान्त बोले, पुष्पांजलि वौषट्युक्त मूलमन्त्रसे अथवा सर्वत्र नमस्कारान्त हृदयमन्त्रसे, ईशानमन्त्रसे, रुद्रगायत्रीसे अथवा ‘ॐ नमः शिवाय’—इस मूलमन्त्रसे पूजा करे। तत्पश्चात् पुष्पांजलि देकर धूप तथा आचमनीय अर्पण करे। इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे
पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा पुनर्धूपाचमनीयं षष्ठेन पुष्पावसरणं<br>विसर्जनं मन्त्रोदकेन मूलेन संस्नाप्य सर्वद्रव्या-<br>भिषेकमिशानेन प्रतिद्रव्यमष्टपुष्पं दत्त्वैवमर्घ्यं च<br>गन्धपुष्पधूपाचमनीयं फडन्तास्त्रेण पूजापसरणं<br>शुद्धोदकेन मूलेन संस्नाप्य पिष्टामलकादिभिः॥ २६पुष्पोंको उतारकर पूजाका विसर्जन करके मूलमन्त्रद्वारा शुद्ध जल, पंचामृत आदि द्रव्योंसे स्नान कराये। प्रत्येक द्रव्यके स्नानमें ईशानमन्त्रसे आठ-आठ पुष्पांजलि देकर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि अर्पण करे; पुनः फडन्त अस्त्रमन्त्रसे पूजाद्रव्योंको [शिवलिङ्गसे] हटाकर पिसे हुए आमलक आदिसे युक्त शुद्ध जलसे मूलमन्त्रके द्वारा स्नान कराकर
उष्णोदकेन हरिद्राद्येन लिङ्गमूर्तिं पीठसहितां विशोध्य<br>गन्धोदकहिरण्योदकमन्त्रोदकेन रुद्राध्यायं पठमानः<br>नीलरुद्रत्वरितरुद्रपञ्चब्रह्मादिभिः नमः शिवायेति<br>स्नापयेत्॥ २७हरिद्रा आदिके चूर्णसे युक्त उष्ण जलसे पीठसहित शिवलिङ्गका शोधनकर गन्ध-हिरण्यसमन्वित अभिमन्त्रित जलके द्वारा रुद्राध्यायका पाठ करते हुए एवं नीलरुद्र, त्वरितरुद्र, पंचब्रह्म तथा नमः शिवाय—इन मन्त्रोंसे
६७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| मूर्ध्नि पुष्पं निधायैवं न शून्यं लिङ्गमस्तकं कुर्यादत्र श्लोकः॥ २८<br><br>यस्य राष्ट्रे तु लिङ्गस्य मस्तकं शून्यलक्षणम्।<br>तस्यालक्ष्मीर्महारोगो दुर्भिक्षं वाहनक्षयः॥ २९<br><br>तस्मात्परिहरेद्राजा धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शून्ये लिङ्गे स्वयं राजा राष्ट्रं चैव प्रणश्यति॥ ३० | स्नान कराना चाहिये॥ २५-२७॥<br><br>शिवलिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर ही अभिषेक करना चाहिये; लिङ्गमस्तकको शून्य नहीं रखना चाहिये। इस सम्बन्धमें यह श्लोक है—जिस राजाके राष्ट्रमें लिङ्गका मस्तक बिल्वपत्र या पुष्पसे शून्य रहता है, उसके यहाँ लक्ष्मीशून्यता, महारोग, दुर्भिक्ष तथा वाहनोंका क्षय होता है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्विधपुरुषार्थकी प्राप्तिके लिये राजाको चाहिये कि शिवलिङ्गके मस्तकको शून्य न रखे; लिङ्गके शून्य रहनेपर स्वयं राजा तथा राष्ट्र—दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ २८-३०॥ | | एवं सुस्नाप्यार्घ्यं च दत्त्वा सम्मृज्य वस्त्रेण गन्धपुष्पवस्त्रालङ्कारादींश्च मूलेन दद्यात्॥ ३१<br><br>धूपाचमनीयदीपनैवेद्यादींश्च मूलेन प्रधानेनोपरि पूजनं पवित्रीकरणमित्युक्तम्॥ ३२ | इस प्रकार सम्यक् स्नान कराकर अर्घ्य अर्पण करके वस्त्रसे [शिवलिङ्गको] भलीभाँति पोंछकर मूलमन्त्रके द्वारा गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अलंकार, धूप, आचमनीय, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। शिवलिङ्गके मस्तकपर केवल प्रणवके द्वारा पूजनको पवित्रीकरण कहा गया है। | | आरार्तिदीपादींश्चैव धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनावगुण्ठितानि षष्ठेन रक्षितानि लिङ्गोपरि लिङ्गे च लिङ्गस्याधः साधारणं च दर्शयेत्॥ ३३ | आरती तथा दीप, धेनुमुद्रा बनाकर कवचसे अवगुण्ठनकर तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षण करके लिङ्गके मस्तकपर, लिङ्गके मध्य भागमें तथा लिङ्गके अधोभागमें प्रदर्शित करना चाहिये। | | मूलेन नमस्कारं विज्ञाप्यावाहनस्थापनसन्निरोधसान्निध्यपाद्याचमनीयार्घ्यगन्धपुष्पधूपनैवेद्याचमनीयहस्तोद्वर्तनमुखवासाद्युपचारयुक्तं ब्रह्माङ्गभोगमार्गेण पूजयेत्॥ ३४ | मूल मन्त्रसे नमस्कार करके आवाहन, स्थापन, संनिरोधन, सान्निध्य, पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, हस्तोद्वर्तन, मुखवास आदि उपचार निवेदित करके ब्रह्ममन्त्रस्वरूप पाद आदि अंगोंकी उपचारक्रमसे पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३४॥ | | सकलध्यानं निष्कलस्मरणं परावरध्यानं मूलमन्त्रजपः। दशांशं ब्रह्माङ्गजपसमर्पणमात्मनिवेदनस्तुतिनमस्कारादयश्च गुरुपूजा च पूर्वतो दक्षिणे विनायकस्य॥ ३५ | पूजाके अनन्तर सकल (सगुण) ध्यान, निष्कल (निर्गुण) ध्यान, परावर ध्यान, मूलमन्त्रजप, ब्रह्ममन्त्र तथा अंगमन्त्रका दशांशजप, समर्पण, आत्मनिवेदन, स्तुति, नमस्कार आदि करके पूर्वभागमें गुरुपूजा तथा दक्षिण भागमें विनायक गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। | | आदौ चान्ते च सम्पूज्यो विघ्नेशो जगदीश्वरः।<br>दैवतैश्च द्विजैश्चैव सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३६ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंको समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आदिमें तथा अन्तमें जगत्‌के स्वामी विघ्नेश्वर श्रीगणेशकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३६॥ | | यः शिवं पूजयेद्देवं लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा।<br>स याति शिवसायुज्यं वर्षमात्रेण कर्मणा॥ ३७ | जो लिङ्गमें अथवा स्थण्डिलमें शिवकी पूजा करता है, वह केवल एक ही वर्षमें अपने इस कर्मके |

२५- शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणि-मन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन

अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६७५


लिङ्गार्चकश्च षण्मासान्नात्र कार्या विचारणा।<br>सप्त प्रदक्षिणाः कृत्वा दण्डवत्प्रणमेद्बुधः॥ ३८प्रभावसे शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। केवल शिवलिङ्गकी पूजा करनेवाला छः मासमें ही शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् भक्तको चाहिये कि [पूजाके अनन्तर] सात प्रदक्षिणा करके दण्डवत् प्रणाम करे॥ ३७-३८॥
प्रदक्षिणक्रमपादेन अश्वमेधफलं शतम्।<br>तस्मात्सम्पूजयेन्नित्यं सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३९प्रदक्षिणामें एक-एक पगके द्वारा सौ-सौ अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अतः समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये सम्यक् प्रकारसे [भगवान् शिवकी] नित्य पूजा करनी चाहिये। [इस पूजनसे]
भोगार्थी भोगमाप्नोति राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात्।<br>पुत्रार्थी तनयं श्रेष्ठं रोगी रोगात्प्रमुच्यते॥ ४०भोगकी अभिलाषा रखनेवाला भोग-सुख प्राप्त करता है, राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला उत्तम पुत्र प्राप्त करता है और रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य जिन-जिन मनोरथोंको सोचता है,
यान् यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान् प्राप्नोति मानवः॥ ४१उन्हें प्राप्त कर लेता है॥ ३९-४१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गार्चनविधानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गार्चनविधान' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय

शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणिमन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन

शैलादिरुवाचशैलादि बोले—
शिवाग्निकार्यं वक्ष्यामि शिवेन परिभाषितम्।<br>जनयित्वाग्रतः प्राचीं शुभे देशे सुसंस्कृते॥ १[हे सनत्कुमार!] अब मैं शैव-अग्निकार्यका वर्णन करूँगा, जिसे [स्वयं] शिवजीने कहा है। सर्वप्रथम [दिक्साधनके विधानसे] पूर्व दिशाका निर्धारण करके शुभ तथा परिष्कृत भूमिपर
पूर्वाग्रमुत्तराग्रं च कुर्यात्सूत्रत्रयं शुभम्।<br>चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे कुर्यात्कुण्डानि यत्नतः॥ २पवित्र तीन सूत पूर्वाग्र तथा तीन सूत उत्तराग्र रखकर चतुष्कोणीय निर्मित की गयी भूमिमें यत्नपूर्वक कुण्ड बनाना चाहिये॥ १-२॥
नित्यहोमाग्निकुण्डं च त्रिमेखलसमायुतम्।<br>चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलायामा मेखला हस्तमात्रतः॥ ३नित्यहोमके लिये तीन मेखलाओंसे युक्त अग्निकुण्ड होना चाहिये। तीनों मेखलाएँ एक हाथ प्रमाणकी तथा चार अँगुल, तीन अँगुल और दो अँगुल ऊँचाईकी बनानी चाहिये। कुण्ड एक हाथ प्रमाणका होना चाहिये तथा
हस्तमात्रं भवेत्कुण्डं योनिः प्रादेशमात्रतः।<br>अश्वत्थपत्रवद्योनिं मेखलोपरि कल्पयेत्॥ ४योनि प्रादेशमात्र (अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीचकी दूरी) होनी चाहिये। मेखलाके ऊपर अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी योनि बनानी चाहिये॥ ३-४॥
६७६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुण्डमध्ये तु नाभिः स्यादष्टपत्रं सकर्णिकम्।<br>प्रादेशमात्रं विधिना कारयेद्ब्रह्मणः सुत॥ ५<br><br>षष्ठेनोल्लेखनं प्रोक्तं प्रोक्षणं वर्मणा स्मृतम्।<br>नेत्रेणालोक्य वै कुण्डं षड्रेखाः कारयेद्बुधः॥ ६<br><br>प्रागायतेन विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>उत्तराग्राः शिवा रेखाः प्रोक्षयेद्वर्मणा पुनः॥ ७हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! कुण्डके मध्यमें नाभि होनी चाहिये; उसे विधिपूर्वक अष्टदलीय, कर्णिकायुक्त और प्रादेशमात्र प्रमाणकी निर्मित करानी चाहिये। अस्त्रमन्त्रसे उल्लेखन करना कहा गया है तथा कवचमन्त्रसे प्रोक्षण करना बताया गया है; बुद्धिमान्‌को चाहिये कि कुण्डको नेत्रमन्त्रसे देखकर छः रेखाएँ बनाये। हे विप्रेन्द्र! पूर्वाग्र तीन रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरस्वरूप हैं और उत्तराग्र रेखाएँ शिवस्वरूप हैं। इसके बाद कवचमन्त्रसे पुनः प्रोक्षण करना चाहिये॥ ५-७॥
शमीपिप्पलसम्भूतामरणीं षोडशाङ्गुलाम्।<br>मथित्वा वह्निबीजेन शक्तिन्यासं हृदैव तु॥ ८<br><br>प्रक्षिपेद्विधिना वह्निमन्वाधाय यथाविधि।<br>तूष्णीं प्रादेशमात्रैस्तु याज्ञिकैः शकलैः शुभैः॥ ९<br><br>परिसम्मोहनं कुर्याज्जलेनाष्टसु दिक्षु वै।<br>परिस्तीर्य विधानेन प्रागाद्येवमनुक्रमात्॥ १०<br><br>उत्तराग्रं पुरस्ताद्धि प्रागग्रं दक्षिणे पुनः।<br>पश्चिमे चोत्तराग्रं तु सौम्ये पूर्वाग्रमेव तु॥ ११शमीगर्भस्थ पीपलके काष्ठकी बनी हुई सोलह अँगुल प्रमाणकी अरणीद्वारा वह्निबीज (रं)-से मन्थन करके और हृदयमन्त्रसे शक्तिन्यास करके अग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। इसके बाद मौन होकर विधिपूर्वक उसे अग्निकुण्डमें रख देना चाहिये। विधानके अनुसार अग्न्याधान करके शान्तिपूर्वक प्रादेशप्रमाणके यज्ञसम्बन्धी शुभ काष्ठकी समिधाओंको उसपर प्राक् आदिके क्रमसे विधिपूर्वक व्यवस्थित करके जलके द्वारा आठों दिशाओंमें परिसम्मोहन करना चाहिये। पूरबमें उत्तराग्र, दक्षिणमें पूर्वाग्र, पश्चिममें उत्तराग्र और उत्तरमें पूर्वाग्र कुश बिछाना चाहिये॥ ८-११॥
ऐन्द्रे चैन्द्राग्नमावाह्य याम्य एवं विधीयते।<br>सौम्यस्योपरि चान्द्राग्नं वारुणाग्नमधस्ततः॥ १२<br><br>द्वन्द्वरूपेण पात्राणि बर्हिष्वासाद्य सुव्रत।<br>अधोमुखानि सर्वाणि द्रव्याणि च तथोत्तरे॥ १३<br><br>तस्योपरि न्यसेद्दर्भाञ्छिवं दक्षिणतो न्यसेत्।<br>पूजयेन्मूलमन्त्रेण पश्चाद्धोमं समाचरेत्॥ १४पूर्व दिग्भागमें इन्द्राग्निदैवतका आवाहन करके दक्षिण दिग्भागमें यामाग्नि, उत्तर दिग्भागमें चन्द्राग्नि और इसके बाद पश्चिम दिग्भागमें वारुणाग्निका आवाहन किया जाता है। हे सुव्रत! पात्रोंको द्वन्द्वरूपमें अधोमुख करके कुशाओंपर रखकर तथा सभी द्रव्योंको उत्तर भागमें रखकर उसके ऊपर कुशोंको रख देना चाहिये। दक्षिण भागमें शिवको स्थापित करना चाहिये; इसके बाद मूलमन्त्रसे पूजन करना चाहिये, तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करना चाहिये॥ १२-१४॥
प्रोक्षणीपात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>प्रादेशमात्रौ तु कुशौ स्थापयेदुदकोपरि॥ १५<br><br>प्लावयेच्च कुशाग्रं तु वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः।<br>विकीर्य सर्वपात्राणि सुसम्प्रोक्ष्य विधानतः॥ १६<br><br>प्रणीतापात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>अन्योदककुशाग्रैस्तु सम्यगाच्छाद्य सुव्रत॥ १७तदनन्तर प्रोक्षणीपात्र लेकर उसे जलसे भर देना चाहिये और फिर प्रादेशप्रमाणके दो कुशोंको जलके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। अग्नि तथा सूर्यकी किरणोंसे कुशाग्रको प्लावित करना चाहिये। तदनन्तर सभी पात्रोंको फैलाकर विधिपूर्वक प्रोक्षण करके प्रणीतापात्रको लेकर उसे पुनः जलसे पूर्ण करना

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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण···हवन-विधानका वर्णन [ ६७७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हस्ताभ्यां नासिकं पात्रमैशान्यां दिशि विन्यसेत्।<br>आज्याधिश्रयणं कुर्यात्पश्चिमोत्तरतः शुभम् ॥ १८<br><br>भस्ममिश्रांस्तथाङ्गारान् ग्राहयेत्सकलेन वै।<br>पश्चिमोत्तरतो नीत्वा तत्र चाज्यं प्रतापयेत् ॥ १९<br><br>कुशानग्नौ तु प्रज्वाल्य पर्यग्निं त्रिभिराचरेत्।<br>तान् सर्वांस्तत्र निःक्षिप्य चाग्रे चाज्यं निधापयेत् ॥ २०<br><br>अङ्गुष्ठमात्रौ तु कुशौ प्रक्षाल्य विधिनैव तु।<br>पर्यग्निं च ततः कुर्यात्तैरेव नवभिः पुनः ॥ २१<br><br>पर्यग्निं च पुनः कुर्यात्तदाज्यमवरोपयेत्।<br>अथापकर्षयेत्पात्रं क्रमेणोत्तरपश्चिमे ॥ २२चाहिये। हे सुव्रत! इसके बाद जलमें रखी अन्य कुशाओंके द्वारा उसे भलीभाँति आच्छादित करके दोनों हाथोंसे नासिकापर्यन्त उस पात्रको उठाकर ईशान दिशामें स्थापित कर देना चाहिये॥ १५-१७॥<br><br>तत्पश्चात् वायव्य कोणमें शुभ आज्याश्रयण (घृतस्थापन) करना चाहिये। भस्मयुक्त अंगारोंको लेना चाहिये और उसे वायव्य दिशामें रखकर उसके ऊपर घृतको तपाना चाहिये। तदनन्तर कुशोंको अग्निमें प्रज्वलित करके तीन कुशोंसे पर्यग्निकरण करना चाहिये। फिर उन सभी कुशोंको उस कुण्डमें डालकर घृतको अपने सम्मुख रख लेना चाहिये। इसके बाद अँगुष्ठप्रमाणके दो कुशोंको विधिवत् प्रक्षालित करके उन कुशोंसे तथा अन्य नौ कुशोंसे पर्यग्नि करनी चाहिये, इसके बाद फिर पर्यग्नि करनी चाहिये। तदनन्तर घृतको अग्निपरसे उतार लेना चाहिये और घृतपात्रको क्रमसे उत्तर-पश्चिम दिशामें रख देना चाहिये॥ १८-२२॥
संयुज्य चाग्निं काष्ठेन प्रक्षाल्यारोप्य पश्चिमे।<br>आज्यस्योत्पवनं कुर्यात्पवित्राभ्यां सहैव तु ॥ २३<br><br>पृथगादाय हस्ताभ्यां प्रवाहेण यथाक्रमम्।<br>अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु उभाभ्यां मूलविद्यया ॥ २४<br><br>अभ्युक्ष्य दापयेदग्नौ पवित्रे घृतपङ्किते।तदनन्तर उपवेषणकाष्ठद्वारा अग्निका संयोजन करके पश्चिम दिशामें रखकर उसे प्रक्षालित करके दोनों हाथोंकी अँगुष्ठ और अनामिका अँगुलियोंद्वारा याज्ञिकोक्त पद्धतिके अनुसार दो पवित्रियोंको ग्रहण करके मूलमन्त्रके द्वारा आज्योत्पवन करना चाहिये। उसके बाद घृतसे भीगी हुई दोनों पवित्रियोंका अभ्युक्षण करके उन्हें अग्निमें डाल देना चाहिये॥ २३-२४ १/२॥
सौवर्णं स्रुक्स्रुवं कुर्याद्रत्निमात्रेण सुव्रत ॥ २५<br><br>राजतं वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>अथवा याज्ञिकैर्वृक्षैः कर्तव्यौ स्रुक्स्रुवावुभौ ॥ २६हे सुव्रत! सोने अथवा चाँदीका स्रुक्-स्रुव बनाना चाहिये, जो एक हाथ लम्बा हो तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हो अथवा यज्ञीय वृक्षोंसे ही स्रुक्-स्रुवाका निर्माण करना चाहिये॥ २५-२६॥
अरत्निमात्रमायामं तत्पोत्रे तु बिलं भवेत्।<br>षडङ्गुलपरीणाहं दण्डमूलं महामुने ॥ २७<br><br>तदर्धं कण्ठनालं स्यात्पुष्करं मूलवद्भवेत्।<br>गोबालसदृशं दण्डं स्रुवाग्रं नासिकासमम् ॥ २८<br><br>पुटद्वयसमायुक्तं मुक्ताद्येन प्रपूरितम्।स्रुव एक हाथ प्रमाणका और उसके मुखपर गहरा गर्त होना चाहिये। हे महामुने! उस स्रुवका दण्डमूल छः अँगल चौड़ा और कण्ठनाल तीन अँगल चौड़ा होना चाहिये। उसका मुख भी मूलकी भाँति बनाना चाहिये। स्रुवका दण्ड गायकी पूँछके सदृश ऊपर मोटा और क्रमशः नीचेकी ओर पतला होना चाहिये; उसका अग्रभाग नासिकाके समान दो पुटोंसे युक्त तथा मुक्ता आदिसे समन्वित होना चाहिये॥ २७-२८ १/२॥
षट्त्रिंशदङ्गुलायाममष्टाङ्गुलसविस्तरम् ॥ २९
६७८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उस्सेधस्तु तदर्थं स्यात्सूत्रेण समितं ततः।<br>सप्ताङ्गुलं भवेदास्यं विस्तरायामतः पुनः॥ ३०<br>त्रिभागैकं भवेदग्रं कृत्वा शेषं परित्यजेत्।<br>कण्ठं च द्व्यङ्गुलायामं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ३१पूर्णाहुतिमें प्रयुक्त होनेवाला स्रुव छत्तीस अँगल लम्बा, आठ अँगल चौड़ा और चार अँगल मोटा बनाना चाहिये। सूतके द्वारा उसे सम कर लेना चाहिये। उस स्रुवका मुख सात अँगल चौड़ा होना चाहिये और बारह अँगल लम्बा होना चाहिये। स्रुव का कण्ठ दो अँगल लम्बा और चार अँगल चौड़ा होना चाहिये॥ २९–३१॥
वेदिरष्टाङ्गुलायामा विस्तारस्तत्प्रमाणतः।<br>तस्य मध्ये बिलं कुर्याच्चतुरङ्गुलमानतः॥ ३२<br>बिलं सुवर्तितं कुर्यादष्टपत्रं सुकर्णिकम्।<br>परितो बिलबाह्ये तु पट्टिकार्थाङ्गुलेन तु॥ ३३<br>तद्बाह्ये च विनिद्रं तु पद्मपत्रविचित्रितम्।<br>यवद्वयप्रमाणेने तद्बाह्ये पट्टिका भवेत्॥ ३४वेदी आठ अँगल लम्बी तथा उतने ही प्रमाणकी अर्थात् आठ अँगल चौड़ी होनी चाहिये। उसके मध्यमें चार अँगल प्रमाणका गर्त बनाना चाहिये। गर्त पूर्णरूपसे गोल, अष्टदलयुक्त और सुन्दर कर्णिकामय निर्मित करना चाहिये। उस गर्तके बाहर चारों ओर आधे अँगलप्रमाणकी पट्टिका, पट्टिकाके बाहर विकसित सुन्दर कमल और पुनः उसके बाहर दो यव-प्रमाणकी पट्टिकाकी रचना करनी चाहिये॥ ३२–३४॥
वेदिकामध्यतो रन्ध्रं कनिष्ठाङ्गुलमानतः।<br>खातं यावन्मुखान्तः स्याद् बिलमानं तु निम्नगम्॥ ३५<br>दण्डं षडङ्गुलं नालं दण्डाग्रे दण्डिकात्रयम्।<br>अर्धाङ्गुलविवृद्ध्या तु कर्तव्यं चतुरङ्गुलम्॥ ३६<br>त्रयोदशाङ्गुलायामं दण्डमूले घटं भवेत्।<br>द्व्यङ्गुलस्तु भवेत्कुम्भो नाभिं विद्याद्दशाङ्गुलम्॥ ३७<br>वेदिमध्ये तथा कृत्वा पादं कुर्याच्च द्व्यङ्गुलम्।<br>पद्मपृष्ठसमाकारं पादं वै कर्णिकाकृतिम्॥ ३८<br>गजौष्ठसदृशाकारं तस्य पृष्ठाकृतिर्भवेत्।<br>अभिचारादिकार्येषु कुर्यात्कृष्णायसेन तु॥ ३९<br>पञ्चविंशत्कुशेनैव स्रुक्स्रुवौ मार्जयेत्पुनः।<br>अग्रमग्रेण संशोध्य मध्यं मध्येन सुव्रत॥ ४०<br>मूलं मूलेन विधिना अग्नौ ताप्य हृदा पुनः।वेदीके मध्यमें कनिष्ठा अँगुलीके प्रमाणसे मुखपर्यन्त गम्भीर प्रवाहवाला छिद्र होना चाहिये। दण्डका मूल छः अँगल-प्रमाणका होना चाहिये, दण्डके अग्रभागमें चार अँगलके बीच आधे अँगलकी वृद्धिसे तीन दण्डिकाएँ बनानी चाहिये। दण्डके अग्रभागमें तेरह अँगलके विस्तारमें घट (शिर) होना चाहिये, उसका कण्ठ दो अँगल और नाभि अर्थात् मध्य भाग दस अँगल होना चाहिये। वेदीके मध्यमें वैसे ही दस अँगलकी पद्मपृष्ठके आकारकी नाभि बनाकर दो अँगल-प्रमाणका कर्णिकाके आकृतिसदृश पाद बनाना चाहिये। उस स्रुवके पृष्ठकी आकृति हाथीके ओष्ठके आकारसदृश होनी चाहिये। अभिचार आदि कर्मोंमें कृष्ण लौहसे स्रुक्-स्रुवका निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर पचीस कुशोंके द्वारा स्रुक्-स्रुवका मार्जन करना चाहिये। हे सुव्रत! [स्रुक्-स्रुवके] अग्रभागको कुशके अग्रभागसे, मध्यभागको मध्य भागसे और मूलको मूलसे शोधित करके पुनः भलीभाँति हृदयमन्त्रका उच्चारण करके अग्निमें उन्हें तपाना चाहिये॥ ३५–४० १/२॥
आज्यस्थाली प्रणीता च प्रोक्षणी तिस्त्र एव च॥ ४१<br>सौवर्णी राजती वापि ताम्री वा मृन्मयी तु वा।<br>अन्यथा नैव कर्तव्यं शान्तिके पौष्टिके शुभे॥ ४२आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणी—ये तीनों ही पात्र सोने, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके होने चाहिये। शान्तिक तथा पौष्टिक शुभ कर्ममें अन्य धातुके पात्रोंका