भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आवाहनमुद्रया शनैः शनैः हृदयादिमस्तकान्तमारोप्य<br>हृदा सह मूलं प्लुतमुच्चार्य सद्येन बिन्दुस्था-<br>नादभ्यधिकं दीपशिखाकारं सर्वतोमुखहस्तं व्याप्य-<br>व्यापकमावाह्य स्थापयेत्॥ २२पुष्पको दबाकर आवाहनमुद्राके द्वारा धीरे-धीरे हृदयसे मस्तकपर्यन्य आरोपण करके हृदयमन्त्रसहित मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-को उच्च स्वरमें उच्चारित करके बिन्दुस्थानसे भी अधिक दीपशिखाकार और सभी ओर मुख तथा हाथ करके व्याप्त उन व्यापक परमेश्वरको सद्योजातमन्त्रसे आवाहितकर स्थापित करना चाहिये॥ २२॥
पूर्वहृदा शिवशक्तिसमवायेन परमीकरणममृतीकरणं<br>हृदयादिमूलेन सद्येनावाहनं हृदा मूलोपरि वामेन<br>स्थापनं हृदा मूलोपरि अघोरेण संनिरोधं हृदा मूलोपरि<br>पुरुषेण सान्निध्यं हृदा मूलेन ईशानेन पूजयेदिति<br>उपदेशः॥ २३<br><br>पञ्चमन्त्रसहितेन यथापूर्वमात्मनो देहनिर्माणं तथा<br>देवस्यापि वह्नेश्चैवमुपदेशः॥ २४पहले हृदयमन्त्रसे शिवशक्तिके तादात्म्यसे एकीकरण तथा अमृतीकरण करे; पुनः हृदयमन्त्रपूर्वक मूलमन्त्रसहित सद्योजातमन्त्रसे आवाहन करके हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रयुक्त वामदेवमन्त्रसे स्थापन और इसी प्रकार हृदयमन्त्र एवं मूलमन्त्रसहित अघोर मन्त्रसे संनिरोधन करे; इसके बाद हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रसहित तत्पुरुषमन्त्रसे सान्निध्य करे। तदनन्तर हृदयमन्त्र और मूलमन्त्रयुक्त ईशानमन्त्रसे पूजन करे—यह उपदेश है। पूर्वमें जिस प्रकार पाँच मन्त्रोंसे अपना देहनिर्माण किया, उसी प्रकार देवता तथा अग्निका भी देहनिर्माण करना चाहिये—ऐसा उपदेश है॥ २३-२४॥
रूपकध्यानं कृत्वा मूलेन नमस्कारान्तमापाद्य<br>स्वधान्तमाचमनीयं सर्वं नमस्कारान्तं वा स्वाहाकारा-<br>न्तमर्घ्यं मूलेन पुष्पाञ्जलिं वौषडन्तेन सर्वं नमस्कारान्तं<br>हृदा वा ईशानेन वा रुद्रगायत्र्या ॐ नमः शिवायेति<br>मूलमन्त्रेण वा पूजयेत्॥ २५मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)-को नमस्कारान्त बोलकर सदाशिवके प्रतिबिम्बका ध्यान करके, आचमनीय देते समय मन्त्रको स्वधान्त अथवा सब कुछ नमस्कारान्त ही करे। अर्घ्यदानमें मूलमन्त्रको स्वाहान्त बोले, पुष्पांजलि वौषट्युक्त मूलमन्त्रसे अथवा सर्वत्र नमस्कारान्त हृदयमन्त्रसे, ईशानमन्त्रसे, रुद्रगायत्रीसे अथवा ‘ॐ नमः शिवाय’—इस मूलमन्त्रसे पूजा करे। तत्पश्चात् पुष्पांजलि देकर धूप तथा आचमनीय अर्पण करे। इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे
पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा पुनर्धूपाचमनीयं षष्ठेन पुष्पावसरणं<br>विसर्जनं मन्त्रोदकेन मूलेन संस्नाप्य सर्वद्रव्या-<br>भिषेकमिशानेन प्रतिद्रव्यमष्टपुष्पं दत्त्वैवमर्घ्यं च<br>गन्धपुष्पधूपाचमनीयं फडन्तास्त्रेण पूजापसरणं<br>शुद्धोदकेन मूलेन संस्नाप्य पिष्टामलकादिभिः॥ २६पुष्पोंको उतारकर पूजाका विसर्जन करके मूलमन्त्रद्वारा शुद्ध जल, पंचामृत आदि द्रव्योंसे स्नान कराये। प्रत्येक द्रव्यके स्नानमें ईशानमन्त्रसे आठ-आठ पुष्पांजलि देकर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि अर्पण करे; पुनः फडन्त अस्त्रमन्त्रसे पूजाद्रव्योंको [शिवलिङ्गसे] हटाकर पिसे हुए आमलक आदिसे युक्त शुद्ध जलसे मूलमन्त्रके द्वारा स्नान कराकर
उष्णोदकेन हरिद्राद्येन लिङ्गमूर्तिं पीठसहितां विशोध्य<br>गन्धोदकहिरण्योदकमन्त्रोदकेन रुद्राध्यायं पठमानः<br>नीलरुद्रत्वरितरुद्रपञ्चब्रह्मादिभिः नमः शिवायेति<br>स्नापयेत्॥ २७हरिद्रा आदिके चूर्णसे युक्त उष्ण जलसे पीठसहित शिवलिङ्गका शोधनकर गन्ध-हिरण्यसमन्वित अभिमन्त्रित जलके द्वारा रुद्राध्यायका पाठ करते हुए एवं नीलरुद्र, त्वरितरुद्र, पंचब्रह्म तथा नमः शिवाय—इन मन्त्रोंसे