श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आवाहनमुद्रया शनैः शनैः हृदयादिमस्तकान्तमारोप्य<br>हृदा सह मूलं प्लुतमुच्चार्य सद्येन बिन्दुस्था-<br>नादभ्यधिकं दीपशिखाकारं सर्वतोमुखहस्तं व्याप्य-<br>व्यापकमावाह्य स्थापयेत्॥ २२ | पुष्पको दबाकर आवाहनमुद्राके द्वारा धीरे-धीरे हृदयसे मस्तकपर्यन्य आरोपण करके हृदयमन्त्रसहित मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-को उच्च स्वरमें उच्चारित करके बिन्दुस्थानसे भी अधिक दीपशिखाकार और सभी ओर मुख तथा हाथ करके व्याप्त उन व्यापक परमेश्वरको सद्योजातमन्त्रसे आवाहितकर स्थापित करना चाहिये॥ २२॥ |
| पूर्वहृदा शिवशक्तिसमवायेन परमीकरणममृतीकरणं<br>हृदयादिमूलेन सद्येनावाहनं हृदा मूलोपरि वामेन<br>स्थापनं हृदा मूलोपरि अघोरेण संनिरोधं हृदा मूलोपरि<br>पुरुषेण सान्निध्यं हृदा मूलेन ईशानेन पूजयेदिति<br>उपदेशः॥ २३<br><br>पञ्चमन्त्रसहितेन यथापूर्वमात्मनो देहनिर्माणं तथा<br>देवस्यापि वह्नेश्चैवमुपदेशः॥ २४ | पहले हृदयमन्त्रसे शिवशक्तिके तादात्म्यसे एकीकरण तथा अमृतीकरण करे; पुनः हृदयमन्त्रपूर्वक मूलमन्त्रसहित सद्योजातमन्त्रसे आवाहन करके हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रयुक्त वामदेवमन्त्रसे स्थापन और इसी प्रकार हृदयमन्त्र एवं मूलमन्त्रसहित अघोर मन्त्रसे संनिरोधन करे; इसके बाद हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रसहित तत्पुरुषमन्त्रसे सान्निध्य करे। तदनन्तर हृदयमन्त्र और मूलमन्त्रयुक्त ईशानमन्त्रसे पूजन करे—यह उपदेश है। पूर्वमें जिस प्रकार पाँच मन्त्रोंसे अपना देहनिर्माण किया, उसी प्रकार देवता तथा अग्निका भी देहनिर्माण करना चाहिये—ऐसा उपदेश है॥ २३-२४॥ |
| रूपकध्यानं कृत्वा मूलेन नमस्कारान्तमापाद्य<br>स्वधान्तमाचमनीयं सर्वं नमस्कारान्तं वा स्वाहाकारा-<br>न्तमर्घ्यं मूलेन पुष्पाञ्जलिं वौषडन्तेन सर्वं नमस्कारान्तं<br>हृदा वा ईशानेन वा रुद्रगायत्र्या ॐ नमः शिवायेति<br>मूलमन्त्रेण वा पूजयेत्॥ २५ | मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)-को नमस्कारान्त बोलकर सदाशिवके प्रतिबिम्बका ध्यान करके, आचमनीय देते समय मन्त्रको स्वधान्त अथवा सब कुछ नमस्कारान्त ही करे। अर्घ्यदानमें मूलमन्त्रको स्वाहान्त बोले, पुष्पांजलि वौषट्युक्त मूलमन्त्रसे अथवा सर्वत्र नमस्कारान्त हृदयमन्त्रसे, ईशानमन्त्रसे, रुद्रगायत्रीसे अथवा ‘ॐ नमः शिवाय’—इस मूलमन्त्रसे पूजा करे। तत्पश्चात् पुष्पांजलि देकर धूप तथा आचमनीय अर्पण करे। इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे |
| पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा पुनर्धूपाचमनीयं षष्ठेन पुष्पावसरणं<br>विसर्जनं मन्त्रोदकेन मूलेन संस्नाप्य सर्वद्रव्या-<br>भिषेकमिशानेन प्रतिद्रव्यमष्टपुष्पं दत्त्वैवमर्घ्यं च<br>गन्धपुष्पधूपाचमनीयं फडन्तास्त्रेण पूजापसरणं<br>शुद्धोदकेन मूलेन संस्नाप्य पिष्टामलकादिभिः॥ २६ | पुष्पोंको उतारकर पूजाका विसर्जन करके मूलमन्त्रद्वारा शुद्ध जल, पंचामृत आदि द्रव्योंसे स्नान कराये। प्रत्येक द्रव्यके स्नानमें ईशानमन्त्रसे आठ-आठ पुष्पांजलि देकर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि अर्पण करे; पुनः फडन्त अस्त्रमन्त्रसे पूजाद्रव्योंको [शिवलिङ्गसे] हटाकर पिसे हुए आमलक आदिसे युक्त शुद्ध जलसे मूलमन्त्रके द्वारा स्नान कराकर |
| उष्णोदकेन हरिद्राद्येन लिङ्गमूर्तिं पीठसहितां विशोध्य<br>गन्धोदकहिरण्योदकमन्त्रोदकेन रुद्राध्यायं पठमानः<br>नीलरुद्रत्वरितरुद्रपञ्चब्रह्मादिभिः नमः शिवायेति<br>स्नापयेत्॥ २७ | हरिद्रा आदिके चूर्णसे युक्त उष्ण जलसे पीठसहित शिवलिङ्गका शोधनकर गन्ध-हिरण्यसमन्वित अभिमन्त्रित जलके द्वारा रुद्राध्यायका पाठ करते हुए एवं नीलरुद्र, त्वरितरुद्र, पंचब्रह्म तथा नमः शिवाय—इन मन्त्रोंसे |
| ६७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| मूर्ध्नि पुष्पं निधायैवं न शून्यं लिङ्गमस्तकं कुर्यादत्र श्लोकः॥ २८<br><br>यस्य राष्ट्रे तु लिङ्गस्य मस्तकं शून्यलक्षणम्।<br>तस्यालक्ष्मीर्महारोगो दुर्भिक्षं वाहनक्षयः॥ २९<br><br>तस्मात्परिहरेद्राजा धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शून्ये लिङ्गे स्वयं राजा राष्ट्रं चैव प्रणश्यति॥ ३० | स्नान कराना चाहिये॥ २५-२७॥<br><br>शिवलिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर ही अभिषेक करना चाहिये; लिङ्गमस्तकको शून्य नहीं रखना चाहिये। इस सम्बन्धमें यह श्लोक है—जिस राजाके राष्ट्रमें लिङ्गका मस्तक बिल्वपत्र या पुष्पसे शून्य रहता है, उसके यहाँ लक्ष्मीशून्यता, महारोग, दुर्भिक्ष तथा वाहनोंका क्षय होता है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्विधपुरुषार्थकी प्राप्तिके लिये राजाको चाहिये कि शिवलिङ्गके मस्तकको शून्य न रखे; लिङ्गके शून्य रहनेपर स्वयं राजा तथा राष्ट्र—दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ २८-३०॥ | | एवं सुस्नाप्यार्घ्यं च दत्त्वा सम्मृज्य वस्त्रेण गन्धपुष्पवस्त्रालङ्कारादींश्च मूलेन दद्यात्॥ ३१<br><br>धूपाचमनीयदीपनैवेद्यादींश्च मूलेन प्रधानेनोपरि पूजनं पवित्रीकरणमित्युक्तम्॥ ३२ | इस प्रकार सम्यक् स्नान कराकर अर्घ्य अर्पण करके वस्त्रसे [शिवलिङ्गको] भलीभाँति पोंछकर मूलमन्त्रके द्वारा गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अलंकार, धूप, आचमनीय, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। शिवलिङ्गके मस्तकपर केवल प्रणवके द्वारा पूजनको पवित्रीकरण कहा गया है। | | आरार्तिदीपादींश्चैव धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनावगुण्ठितानि षष्ठेन रक्षितानि लिङ्गोपरि लिङ्गे च लिङ्गस्याधः साधारणं च दर्शयेत्॥ ३३ | आरती तथा दीप, धेनुमुद्रा बनाकर कवचसे अवगुण्ठनकर तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षण करके लिङ्गके मस्तकपर, लिङ्गके मध्य भागमें तथा लिङ्गके अधोभागमें प्रदर्शित करना चाहिये। | | मूलेन नमस्कारं विज्ञाप्यावाहनस्थापनसन्निरोधसान्निध्यपाद्याचमनीयार्घ्यगन्धपुष्पधूपनैवेद्याचमनीयहस्तोद्वर्तनमुखवासाद्युपचारयुक्तं ब्रह्माङ्गभोगमार्गेण पूजयेत्॥ ३४ | मूल मन्त्रसे नमस्कार करके आवाहन, स्थापन, संनिरोधन, सान्निध्य, पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, हस्तोद्वर्तन, मुखवास आदि उपचार निवेदित करके ब्रह्ममन्त्रस्वरूप पाद आदि अंगोंकी उपचारक्रमसे पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३४॥ | | सकलध्यानं निष्कलस्मरणं परावरध्यानं मूलमन्त्रजपः। दशांशं ब्रह्माङ्गजपसमर्पणमात्मनिवेदनस्तुतिनमस्कारादयश्च गुरुपूजा च पूर्वतो दक्षिणे विनायकस्य॥ ३५ | पूजाके अनन्तर सकल (सगुण) ध्यान, निष्कल (निर्गुण) ध्यान, परावर ध्यान, मूलमन्त्रजप, ब्रह्ममन्त्र तथा अंगमन्त्रका दशांशजप, समर्पण, आत्मनिवेदन, स्तुति, नमस्कार आदि करके पूर्वभागमें गुरुपूजा तथा दक्षिण भागमें विनायक गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। | | आदौ चान्ते च सम्पूज्यो विघ्नेशो जगदीश्वरः।<br>दैवतैश्च द्विजैश्चैव सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३६ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंको समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आदिमें तथा अन्तमें जगत्के स्वामी विघ्नेश्वर श्रीगणेशकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३६॥ | | यः शिवं पूजयेद्देवं लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा।<br>स याति शिवसायुज्यं वर्षमात्रेण कर्मणा॥ ३७ | जो लिङ्गमें अथवा स्थण्डिलमें शिवकी पूजा करता है, वह केवल एक ही वर्षमें अपने इस कर्मके |
२५- शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणि-मन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६७५
| लिङ्गार्चकश्च षण्मासान्नात्र कार्या विचारणा।<br>सप्त प्रदक्षिणाः कृत्वा दण्डवत्प्रणमेद्बुधः॥ ३८ | प्रभावसे शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। केवल शिवलिङ्गकी पूजा करनेवाला छः मासमें ही शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् भक्तको चाहिये कि [पूजाके अनन्तर] सात प्रदक्षिणा करके दण्डवत् प्रणाम करे॥ ३७-३८॥ |
| प्रदक्षिणक्रमपादेन अश्वमेधफलं शतम्।<br>तस्मात्सम्पूजयेन्नित्यं सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३९ | प्रदक्षिणामें एक-एक पगके द्वारा सौ-सौ अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अतः समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये सम्यक् प्रकारसे [भगवान् शिवकी] नित्य पूजा करनी चाहिये। [इस पूजनसे] |
| भोगार्थी भोगमाप्नोति राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात्।<br>पुत्रार्थी तनयं श्रेष्ठं रोगी रोगात्प्रमुच्यते॥ ४० | भोगकी अभिलाषा रखनेवाला भोग-सुख प्राप्त करता है, राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला उत्तम पुत्र प्राप्त करता है और रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य जिन-जिन मनोरथोंको सोचता है, |
| यान् यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान् प्राप्नोति मानवः॥ ४१ | उन्हें प्राप्त कर लेता है॥ ३९-४१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गार्चनविधानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गार्चनविधान' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥
पचीसवाँ अध्याय
शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणिमन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
|---|---|
| शिवाग्निकार्यं वक्ष्यामि शिवेन परिभाषितम्।<br>जनयित्वाग्रतः प्राचीं शुभे देशे सुसंस्कृते॥ १ | [हे सनत्कुमार!] अब मैं शैव-अग्निकार्यका वर्णन करूँगा, जिसे [स्वयं] शिवजीने कहा है। सर्वप्रथम [दिक्साधनके विधानसे] पूर्व दिशाका निर्धारण करके शुभ तथा परिष्कृत भूमिपर |
| पूर्वाग्रमुत्तराग्रं च कुर्यात्सूत्रत्रयं शुभम्।<br>चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे कुर्यात्कुण्डानि यत्नतः॥ २ | पवित्र तीन सूत पूर्वाग्र तथा तीन सूत उत्तराग्र रखकर चतुष्कोणीय निर्मित की गयी भूमिमें यत्नपूर्वक कुण्ड बनाना चाहिये॥ १-२॥ |
| नित्यहोमाग्निकुण्डं च त्रिमेखलसमायुतम्।<br>चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलायामा मेखला हस्तमात्रतः॥ ३ | नित्यहोमके लिये तीन मेखलाओंसे युक्त अग्निकुण्ड होना चाहिये। तीनों मेखलाएँ एक हाथ प्रमाणकी तथा चार अँगुल, तीन अँगुल और दो अँगुल ऊँचाईकी बनानी चाहिये। कुण्ड एक हाथ प्रमाणका होना चाहिये तथा |
| हस्तमात्रं भवेत्कुण्डं योनिः प्रादेशमात्रतः।<br>अश्वत्थपत्रवद्योनिं मेखलोपरि कल्पयेत्॥ ४ | योनि प्रादेशमात्र (अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीचकी दूरी) होनी चाहिये। मेखलाके ऊपर अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी योनि बनानी चाहिये॥ ३-४॥ |
| ६७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डमध्ये तु नाभिः स्यादष्टपत्रं सकर्णिकम्।<br>प्रादेशमात्रं विधिना कारयेद्ब्रह्मणः सुत॥ ५<br><br>षष्ठेनोल्लेखनं प्रोक्तं प्रोक्षणं वर्मणा स्मृतम्।<br>नेत्रेणालोक्य वै कुण्डं षड्रेखाः कारयेद्बुधः॥ ६<br><br>प्रागायतेन विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>उत्तराग्राः शिवा रेखाः प्रोक्षयेद्वर्मणा पुनः॥ ७ | हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! कुण्डके मध्यमें नाभि होनी चाहिये; उसे विधिपूर्वक अष्टदलीय, कर्णिकायुक्त और प्रादेशमात्र प्रमाणकी निर्मित करानी चाहिये। अस्त्रमन्त्रसे उल्लेखन करना कहा गया है तथा कवचमन्त्रसे प्रोक्षण करना बताया गया है; बुद्धिमान्को चाहिये कि कुण्डको नेत्रमन्त्रसे देखकर छः रेखाएँ बनाये। हे विप्रेन्द्र! पूर्वाग्र तीन रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरस्वरूप हैं और उत्तराग्र रेखाएँ शिवस्वरूप हैं। इसके बाद कवचमन्त्रसे पुनः प्रोक्षण करना चाहिये॥ ५-७॥ |
| शमीपिप्पलसम्भूतामरणीं षोडशाङ्गुलाम्।<br>मथित्वा वह्निबीजेन शक्तिन्यासं हृदैव तु॥ ८<br><br>प्रक्षिपेद्विधिना वह्निमन्वाधाय यथाविधि।<br>तूष्णीं प्रादेशमात्रैस्तु याज्ञिकैः शकलैः शुभैः॥ ९<br><br>परिसम्मोहनं कुर्याज्जलेनाष्टसु दिक्षु वै।<br>परिस्तीर्य विधानेन प्रागाद्येवमनुक्रमात्॥ १०<br><br>उत्तराग्रं पुरस्ताद्धि प्रागग्रं दक्षिणे पुनः।<br>पश्चिमे चोत्तराग्रं तु सौम्ये पूर्वाग्रमेव तु॥ ११ | शमीगर्भस्थ पीपलके काष्ठकी बनी हुई सोलह अँगुल प्रमाणकी अरणीद्वारा वह्निबीज (रं)-से मन्थन करके और हृदयमन्त्रसे शक्तिन्यास करके अग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। इसके बाद मौन होकर विधिपूर्वक उसे अग्निकुण्डमें रख देना चाहिये। विधानके अनुसार अग्न्याधान करके शान्तिपूर्वक प्रादेशप्रमाणके यज्ञसम्बन्धी शुभ काष्ठकी समिधाओंको उसपर प्राक् आदिके क्रमसे विधिपूर्वक व्यवस्थित करके जलके द्वारा आठों दिशाओंमें परिसम्मोहन करना चाहिये। पूरबमें उत्तराग्र, दक्षिणमें पूर्वाग्र, पश्चिममें उत्तराग्र और उत्तरमें पूर्वाग्र कुश बिछाना चाहिये॥ ८-११॥ |
| ऐन्द्रे चैन्द्राग्नमावाह्य याम्य एवं विधीयते।<br>सौम्यस्योपरि चान्द्राग्नं वारुणाग्नमधस्ततः॥ १२<br><br>द्वन्द्वरूपेण पात्राणि बर्हिष्वासाद्य सुव्रत।<br>अधोमुखानि सर्वाणि द्रव्याणि च तथोत्तरे॥ १३<br><br>तस्योपरि न्यसेद्दर्भाञ्छिवं दक्षिणतो न्यसेत्।<br>पूजयेन्मूलमन्त्रेण पश्चाद्धोमं समाचरेत्॥ १४ | पूर्व दिग्भागमें इन्द्राग्निदैवतका आवाहन करके दक्षिण दिग्भागमें यामाग्नि, उत्तर दिग्भागमें चन्द्राग्नि और इसके बाद पश्चिम दिग्भागमें वारुणाग्निका आवाहन किया जाता है। हे सुव्रत! पात्रोंको द्वन्द्वरूपमें अधोमुख करके कुशाओंपर रखकर तथा सभी द्रव्योंको उत्तर भागमें रखकर उसके ऊपर कुशोंको रख देना चाहिये। दक्षिण भागमें शिवको स्थापित करना चाहिये; इसके बाद मूलमन्त्रसे पूजन करना चाहिये, तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करना चाहिये॥ १२-१४॥ |
| प्रोक्षणीपात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>प्रादेशमात्रौ तु कुशौ स्थापयेदुदकोपरि॥ १५<br><br>प्लावयेच्च कुशाग्रं तु वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः।<br>विकीर्य सर्वपात्राणि सुसम्प्रोक्ष्य विधानतः॥ १६<br><br>प्रणीतापात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>अन्योदककुशाग्रैस्तु सम्यगाच्छाद्य सुव्रत॥ १७ | तदनन्तर प्रोक्षणीपात्र लेकर उसे जलसे भर देना चाहिये और फिर प्रादेशप्रमाणके दो कुशोंको जलके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। अग्नि तथा सूर्यकी किरणोंसे कुशाग्रको प्लावित करना चाहिये। तदनन्तर सभी पात्रोंको फैलाकर विधिपूर्वक प्रोक्षण करके प्रणीतापात्रको लेकर उसे पुनः जलसे पूर्ण करना |
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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण···हवन-विधानका वर्णन [ ६७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हस्ताभ्यां नासिकं पात्रमैशान्यां दिशि विन्यसेत्।<br>आज्याधिश्रयणं कुर्यात्पश्चिमोत्तरतः शुभम् ॥ १८<br><br>भस्ममिश्रांस्तथाङ्गारान् ग्राहयेत्सकलेन वै।<br>पश्चिमोत्तरतो नीत्वा तत्र चाज्यं प्रतापयेत् ॥ १९<br><br>कुशानग्नौ तु प्रज्वाल्य पर्यग्निं त्रिभिराचरेत्।<br>तान् सर्वांस्तत्र निःक्षिप्य चाग्रे चाज्यं निधापयेत् ॥ २०<br><br>अङ्गुष्ठमात्रौ तु कुशौ प्रक्षाल्य विधिनैव तु।<br>पर्यग्निं च ततः कुर्यात्तैरेव नवभिः पुनः ॥ २१<br><br>पर्यग्निं च पुनः कुर्यात्तदाज्यमवरोपयेत्।<br>अथापकर्षयेत्पात्रं क्रमेणोत्तरपश्चिमे ॥ २२ | चाहिये। हे सुव्रत! इसके बाद जलमें रखी अन्य कुशाओंके द्वारा उसे भलीभाँति आच्छादित करके दोनों हाथोंसे नासिकापर्यन्त उस पात्रको उठाकर ईशान दिशामें स्थापित कर देना चाहिये॥ १५-१७॥<br><br>तत्पश्चात् वायव्य कोणमें शुभ आज्याश्रयण (घृतस्थापन) करना चाहिये। भस्मयुक्त अंगारोंको लेना चाहिये और उसे वायव्य दिशामें रखकर उसके ऊपर घृतको तपाना चाहिये। तदनन्तर कुशोंको अग्निमें प्रज्वलित करके तीन कुशोंसे पर्यग्निकरण करना चाहिये। फिर उन सभी कुशोंको उस कुण्डमें डालकर घृतको अपने सम्मुख रख लेना चाहिये। इसके बाद अँगुष्ठप्रमाणके दो कुशोंको विधिवत् प्रक्षालित करके उन कुशोंसे तथा अन्य नौ कुशोंसे पर्यग्नि करनी चाहिये, इसके बाद फिर पर्यग्नि करनी चाहिये। तदनन्तर घृतको अग्निपरसे उतार लेना चाहिये और घृतपात्रको क्रमसे उत्तर-पश्चिम दिशामें रख देना चाहिये॥ १८-२२॥ |
| संयुज्य चाग्निं काष्ठेन प्रक्षाल्यारोप्य पश्चिमे।<br>आज्यस्योत्पवनं कुर्यात्पवित्राभ्यां सहैव तु ॥ २३<br><br>पृथगादाय हस्ताभ्यां प्रवाहेण यथाक्रमम्।<br>अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु उभाभ्यां मूलविद्यया ॥ २४<br><br>अभ्युक्ष्य दापयेदग्नौ पवित्रे घृतपङ्किते। | तदनन्तर उपवेषणकाष्ठद्वारा अग्निका संयोजन करके पश्चिम दिशामें रखकर उसे प्रक्षालित करके दोनों हाथोंकी अँगुष्ठ और अनामिका अँगुलियोंद्वारा याज्ञिकोक्त पद्धतिके अनुसार दो पवित्रियोंको ग्रहण करके मूलमन्त्रके द्वारा आज्योत्पवन करना चाहिये। उसके बाद घृतसे भीगी हुई दोनों पवित्रियोंका अभ्युक्षण करके उन्हें अग्निमें डाल देना चाहिये॥ २३-२४ १/२॥ |
| सौवर्णं स्रुक्स्रुवं कुर्याद्रत्निमात्रेण सुव्रत ॥ २५<br><br>राजतं वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>अथवा याज्ञिकैर्वृक्षैः कर्तव्यौ स्रुक्स्रुवावुभौ ॥ २६ | हे सुव्रत! सोने अथवा चाँदीका स्रुक्-स्रुव बनाना चाहिये, जो एक हाथ लम्बा हो तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हो अथवा यज्ञीय वृक्षोंसे ही स्रुक्-स्रुवाका निर्माण करना चाहिये॥ २५-२६॥ |
| अरत्निमात्रमायामं तत्पोत्रे तु बिलं भवेत्।<br>षडङ्गुलपरीणाहं दण्डमूलं महामुने ॥ २७<br><br>तदर्धं कण्ठनालं स्यात्पुष्करं मूलवद्भवेत्।<br>गोबालसदृशं दण्डं स्रुवाग्रं नासिकासमम् ॥ २८<br><br>पुटद्वयसमायुक्तं मुक्ताद्येन प्रपूरितम्। | स्रुव एक हाथ प्रमाणका और उसके मुखपर गहरा गर्त होना चाहिये। हे महामुने! उस स्रुवका दण्डमूल छः अँगल चौड़ा और कण्ठनाल तीन अँगल चौड़ा होना चाहिये। उसका मुख भी मूलकी भाँति बनाना चाहिये। स्रुवका दण्ड गायकी पूँछके सदृश ऊपर मोटा और क्रमशः नीचेकी ओर पतला होना चाहिये; उसका अग्रभाग नासिकाके समान दो पुटोंसे युक्त तथा मुक्ता आदिसे समन्वित होना चाहिये॥ २७-२८ १/२॥ |
| षट्त्रिंशदङ्गुलायाममष्टाङ्गुलसविस्तरम् ॥ २९ |
| ६७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उस्सेधस्तु तदर्थं स्यात्सूत्रेण समितं ततः।<br>सप्ताङ्गुलं भवेदास्यं विस्तरायामतः पुनः॥ ३०<br>त्रिभागैकं भवेदग्रं कृत्वा शेषं परित्यजेत्।<br>कण्ठं च द्व्यङ्गुलायामं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ३१ | पूर्णाहुतिमें प्रयुक्त होनेवाला स्रुव छत्तीस अँगल लम्बा, आठ अँगल चौड़ा और चार अँगल मोटा बनाना चाहिये। सूतके द्वारा उसे सम कर लेना चाहिये। उस स्रुवका मुख सात अँगल चौड़ा होना चाहिये और बारह अँगल लम्बा होना चाहिये। स्रुव का कण्ठ दो अँगल लम्बा और चार अँगल चौड़ा होना चाहिये॥ २९–३१॥ |
| वेदिरष्टाङ्गुलायामा विस्तारस्तत्प्रमाणतः।<br>तस्य मध्ये बिलं कुर्याच्चतुरङ्गुलमानतः॥ ३२<br>बिलं सुवर्तितं कुर्यादष्टपत्रं सुकर्णिकम्।<br>परितो बिलबाह्ये तु पट्टिकार्थाङ्गुलेन तु॥ ३३<br>तद्बाह्ये च विनिद्रं तु पद्मपत्रविचित्रितम्।<br>यवद्वयप्रमाणेने तद्बाह्ये पट्टिका भवेत्॥ ३४ | वेदी आठ अँगल लम्बी तथा उतने ही प्रमाणकी अर्थात् आठ अँगल चौड़ी होनी चाहिये। उसके मध्यमें चार अँगल प्रमाणका गर्त बनाना चाहिये। गर्त पूर्णरूपसे गोल, अष्टदलयुक्त और सुन्दर कर्णिकामय निर्मित करना चाहिये। उस गर्तके बाहर चारों ओर आधे अँगलप्रमाणकी पट्टिका, पट्टिकाके बाहर विकसित सुन्दर कमल और पुनः उसके बाहर दो यव-प्रमाणकी पट्टिकाकी रचना करनी चाहिये॥ ३२–३४॥ |
| वेदिकामध्यतो रन्ध्रं कनिष्ठाङ्गुलमानतः।<br>खातं यावन्मुखान्तः स्याद् बिलमानं तु निम्नगम्॥ ३५<br>दण्डं षडङ्गुलं नालं दण्डाग्रे दण्डिकात्रयम्।<br>अर्धाङ्गुलविवृद्ध्या तु कर्तव्यं चतुरङ्गुलम्॥ ३६<br>त्रयोदशाङ्गुलायामं दण्डमूले घटं भवेत्।<br>द्व्यङ्गुलस्तु भवेत्कुम्भो नाभिं विद्याद्दशाङ्गुलम्॥ ३७<br>वेदिमध्ये तथा कृत्वा पादं कुर्याच्च द्व्यङ्गुलम्।<br>पद्मपृष्ठसमाकारं पादं वै कर्णिकाकृतिम्॥ ३८<br>गजौष्ठसदृशाकारं तस्य पृष्ठाकृतिर्भवेत्।<br>अभिचारादिकार्येषु कुर्यात्कृष्णायसेन तु॥ ३९<br>पञ्चविंशत्कुशेनैव स्रुक्स्रुवौ मार्जयेत्पुनः।<br>अग्रमग्रेण संशोध्य मध्यं मध्येन सुव्रत॥ ४०<br>मूलं मूलेन विधिना अग्नौ ताप्य हृदा पुनः। | वेदीके मध्यमें कनिष्ठा अँगुलीके प्रमाणसे मुखपर्यन्त गम्भीर प्रवाहवाला छिद्र होना चाहिये। दण्डका मूल छः अँगल-प्रमाणका होना चाहिये, दण्डके अग्रभागमें चार अँगलके बीच आधे अँगलकी वृद्धिसे तीन दण्डिकाएँ बनानी चाहिये। दण्डके अग्रभागमें तेरह अँगलके विस्तारमें घट (शिर) होना चाहिये, उसका कण्ठ दो अँगल और नाभि अर्थात् मध्य भाग दस अँगल होना चाहिये। वेदीके मध्यमें वैसे ही दस अँगलकी पद्मपृष्ठके आकारकी नाभि बनाकर दो अँगल-प्रमाणका कर्णिकाके आकृतिसदृश पाद बनाना चाहिये। उस स्रुवके पृष्ठकी आकृति हाथीके ओष्ठके आकारसदृश होनी चाहिये। अभिचार आदि कर्मोंमें कृष्ण लौहसे स्रुक्-स्रुवका निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर पचीस कुशोंके द्वारा स्रुक्-स्रुवका मार्जन करना चाहिये। हे सुव्रत! [स्रुक्-स्रुवके] अग्रभागको कुशके अग्रभागसे, मध्यभागको मध्य भागसे और मूलको मूलसे शोधित करके पुनः भलीभाँति हृदयमन्त्रका उच्चारण करके अग्निमें उन्हें तपाना चाहिये॥ ३५–४० १/२॥ |
| आज्यस्थाली प्रणीता च प्रोक्षणी तिस्त्र एव च॥ ४१<br>सौवर्णी राजती वापि ताम्री वा मृन्मयी तु वा।<br>अन्यथा नैव कर्तव्यं शान्तिके पौष्टिके शुभे॥ ४२ | आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणी—ये तीनों ही पात्र सोने, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके होने चाहिये। शान्तिक तथा पौष्टिक शुभ कर्ममें अन्य धातुके पात्रोंका |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण...हवन-विधानका वर्णन [ ६७९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| आयसी त्वभिचारे तु शान्तिके मृन्मयी तु वा।<br>षडङ्गुलं सुविस्तीर्णं पात्राणां मुखमुच्यते॥ ४३<br><br>प्रोक्षणी द्व्यङ्गुलोत्सेधा प्रणीता द्व्यङ्गुलाधिका।<br>आज्यस्थाली ततस्तस्या उत्सेधो द्व्यङ्गुलाधिकः॥ ४४ | प्रयोग नहीं करना चाहिये। अभिचार (जारण, मारण आदि)-कर्ममें लौहकी और शान्तिकर्ममें मृत्तिकाकी आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणीपात्र प्रयुक्त करना चाहिये; इन पात्रोंका मुख छः अँगल चौड़ा होना चाहिये—ऐसा कहा जाता है। प्रोक्षणी दो अँगल ऊँची, प्रणीता चार अँगल ऊँची और आज्यस्थाली उससे भी दो अँगल अधिक अर्थात् छः अँगल ऊँची होनी चाहिये॥ ४१-४४॥ |
| यैः समिद्भिर्हुतं प्रोक्तं तैरेव परिधिर्भवेत्।<br>मध्याङ्गुलपरीणाहा अवक्रा निर्व्रणाः समाः॥ ४५<br><br>द्वात्रिंशदङ्गुलायामास्तिस्रः परिधयः स्मृताः।<br>द्वात्रिंशदङ्गुलायामैस्त्रिंशद्दर्भैः परिस्तरेत्॥ ४६<br><br>चतुरङ्गुलमध्ये तु ग्रथितं तु प्रदक्षिणम्।<br>अभिचारादिकार्येषु शिवाग्न्याधानवर्जितम्॥ ४७<br><br>अकोमलाः स्थिरा विप्र सङ्ग्राह्यास्त्वाभिचारिके।<br>समग्राः सुसमाः स्थूलाः कनिष्ठाङ्गुलसम्मिताः॥ ४८<br><br>अवक्रा निर्व्रणाः स्निग्धा द्वादशाङ्गुलसम्मिताः।<br>समिधस्थं प्रमाणं हि सर्वकार्येषु सुव्रत॥ ४९ | जिन समिधाओंसे हवन बताया गया है, उन्हींसे परिधि बनानी चाहिये। मध्य अँगुलीतुल्य चौड़ी, सीधी व्रणरहित, सम तथा बत्तीस अँगल लम्बी तीन परिधियाँ कही गयी हैं। चार अँगलके बीच प्रदक्षिणक्रमसे ग्रथितरूपसे बत्तीस-बत्तीस अँगल लम्बे तीस कुशोंसे परिस्तरण करना चाहिये। अभिचार आदि कार्योंमें शिवाग्न्याधानसे वर्जित कर्म करना चाहिये। हे विप्र! अभिचारकर्ममें कठोर और दृढ़ समिधाएँ लेनी चाहिये, किंतु शुभ कर्ममें पूर्णरूपसे सम, कनिष्ठा अँगुलीके सदृश मोटी, सीधी, व्रणरहित, कोमल तथा बारह अँगल लम्बी समिधाएँ ग्रहण करनी चाहिये। हे सुव्रत! सभी कार्योंमें समिधाका यही प्रमाण सुनिश्चित किया गया है॥ ४५-४९॥ |
| गव्यं घृतं ततः श्रेष्ठं कापिलं तु ततोऽधिकम्।<br>आहुतीनां प्रमाणं तु स्रुवं पूर्णं यथा भवेत्॥ ५०<br><br>अन्नमक्षप्रमाणं स्याच्छुक्तिमात्रेण वै तिलः।<br>यवानां च तदधं स्यात्फलानां स्वप्रमाणतः॥ ५१<br><br>क्षीरस्य मधुनो दध्नः प्रमाणं घृतवद्भवेत्।<br>चतुःस्रुवप्रमाणेन स्रुचा पूर्णाहुतिर्भवेत्॥ ५२<br><br>तदधं स्विष्टकृत्प्रोक्तं शेषं सर्वमथापि वा।<br>शान्तिकं पौष्टिकं चैव शिवाग्नौ जुहुयात्सदा॥ ५३ | हवनके लिये गोघृत श्रेष्ठ होता है, किंतु कपिला गोका घृत उससे भी श्रेष्ठ माना गया है। आहुतिका प्रमाण उतना ही है, जितनेमें स्रुव पूर्णरूपसे भरा हुआ हो। अन्न (चरु)-का प्रमाण एक अक्ष (कर्ष) तथा तिलका प्रमाण एक शुक्ति (सीप) होना चाहिये। जौका प्रमाण उसका आधा अर्थात् आधी शुक्ति और फलोंका प्रमाण अपने इच्छानुसार होना चाहिये। दुग्ध, मधु और दहीका प्रमाण घृतके बराबर होना चाहिये। चार स्रुवसे स्रुक्को भरकर आहुति देनेसे पूर्णाहुति होती है। उसके आधे अर्थात् दो स्रुव-परिमाणके द्वारा अथवा अवशिष्ट भागद्वारा हवनको स्विष्टकृत् कहा गया है॥ ५०-५२ १/२॥ |
| लौकिकाग्नौ महाभाग मोहनोच्चाटनादयः।<br>शिवाग्निं जनयित्वा तु सर्वकर्मणि सुव्रत॥ ५४ | शान्तिक और पौष्टिक कर्मोंमें सदा शिवाग्निमें ही हवन करना चाहिये, किंतु हे महाभाग! मोहन, उच्चाटन आदि [अभिचार-कर्म]-से सम्बन्धित हवन लौकिकाग्निमें |
६८० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
| सप्त जिह्वाः प्रकल्प्यैव सर्वकार्याणि कारयेत्।<br>अथवा सर्वकार्याणि जिह्वामात्रेण सिध्यति॥ ५५<br><br>शिवाग्निरिति विप्रेन्द्रा जिह्वामात्रेण साधकः॥ ५६<br><br>ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा॥ ५७<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा॥ ५८<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा॥ ५९<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा॥ ६०<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा॥ ६१<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा॥ ६२<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा॥ ६३<br><br>ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा॥ ६४<br><br>एतावद्वह्निheaderसंस्कारमथवा वह्निकर्मसु।<br>नैमित्तिके च विधिना शिवाग्निं कारयेत्पुनः॥ ६५<br><br>निरीक्षणं प्रोक्षणं ताडनं च षष्ठेन फडन्तेन अभ्युक्षणं चतुर्थेन खननोट्किरणं षष्ठेन पूरणं समीकरणमाद्येन सेचनं वौषडन्तेन कुट्टनं षष्ठेन सम्मार्जनोपलेपने तुरीयेण कुण्डपरिकल्पनं निवृत्या त्रिभिरेव कुण्डपरिधानं चतुर्थेन कुण्डार्चनमाद्येन रेखाचतुष्टयसम्पादनं षष्ठेन फडन्तेन वज्रीकरणं चतुष्पदापादनमाद्येन एवं कुण्डसंस्कारमष्टादशविधम्॥ ६६ | होते हैं। हे सुव्रत! समस्त कर्मोंमें शिवाग्नि उत्पन्न करके सात जिह्वाओंकी कल्पना करके ही सभी कार्य करने चाहिये अथवा शिवाग्नि जिह्वामात्रसे ही सिद्ध हो जाती है, अतः हे विप्रेन्द्रो! साधकको चाहिये कि जिह्वामात्रसे ही समस्त कार्य सम्पन्न करे॥ ५३—५६॥<br><br>[सात जिह्वाओंका स्वरूप इस प्रकार बताया जाता है—] ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा।<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा।<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा।<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा।<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा—ये सात जिह्वारूप मन्त्र हैं और ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा—यह प्रधान मन्त्र है॥ ५७—६४॥<br><br>इस विधिसे वह्निसंस्कार करना चाहिये। अथवा वह्निकार्योंमें और नैमित्तिक कर्ममें विधिपूर्वक शिवाग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। [उसकी विधि इस प्रकार है—] फडन्त षष्ठ मन्त्रसे निरीक्षण, प्रोक्षण और ताड़न; चतुर्थ मन्त्रसे अभ्युक्षण; षष्ठ मन्त्रसे खनन तथा उत्किरण; आद्यमन्त्रसे पूरण तथा समीकरण; वौषडन्त आद्यमन्त्रसे सेचन; षष्ठ मन्त्रसे कुट्टन; तुरीय (चतुर्थ) मन्त्रसे सम्मार्जन तथा उपलेपन; अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन तीन मन्त्रोंसे कुण्डपरिकल्पन; चतुर्थ मन्त्रसे कुण्डका परिधान (मेखलाकरण); आद्य (प्रथम) मन्त्रसे कुण्डका अर्चन फडन्त षष्ठ मन्त्रसे रेखाचतुष्टयकरण और प्रथम मन्त्रसे वज्रीकरण और ऐन्द्रागण आदि चारों देवोंका स्थापन प्रथम मन्त्रसे—इस प्रकार अठारह प्रकारके इन कुण्डसंस्कारोंको करना |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण-हवन-विधानका वर्णन ६८१
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डसंस्कारानन्तरमक्षपाटनं षष्ठेन विष्टरन्यासमाद्येन<br>वज्रासने वागीश्वर्यावाहनम्॥ ६७<br><br>ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं<br>यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमा-<br>वाहयामि॥ ६८<br><br>ॐ वागीश्वरीं पूजयामि॥ ६९<br><br>ॐ पुनर्वागीश्वरावाहनम्॥ ७०<br><br>एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं<br>परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषित-<br>मावाहयामि॥ ७१<br><br>ॐ ईं वागीश्वराय नमः। आवाहनस्थापन-<br>सन्निधानसन्निरोधपूजान्तं वागीश्वरीं सम्भाव्य<br>गर्भाधानवह्निसंस्कारम्॥ ७२ | चाहिये॥ ६५-६६॥<br><br>कुण्डसंस्कारके पश्चात् षष्ठ मन्त्रसे अक्षपाटन और प्रथम मन्त्रसे विष्टरन्यास करके वज्रासन (हीरेके आसन)-पर भगवती वागीश्वरीका आवाहन करना चाहिये। [वागीश्वरीके आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—] ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमावाहयामि। वागीश्वरीं पूजयामि। इसके अनन्तर वागीश्वरका आवाहन करना चाहिये। [मन्त्र इस प्रकार है—] एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषितमावाहयामि। ॐ ईं वागीश्वराय नमः। इस प्रकार आवाहन, स्थापन, सन्निधान तथा सन्निरोध पूजापर्यन्त करके वागीश्वरीको सत्कृतकर गर्भाधान, वह्निसंस्कार करना चाहिये॥ ६७—७२॥ |
| अरणीजनितं कान्तोद्भवं वा अग्निहोत्रजं वा ताम्रपात्रे<br>शरावे वा आनीय निरीक्षणताडनाभ्युक्षणप्रक्षालन-<br>माद्येन क्रव्यादाशिवपरित्यागोऽपि प्रथमेन<br>वह्नेस्त्रैकारणं जठरभ्रूमध्यादावाह्याग्निं<br>वैकारणामूर्तावाग्नेयेन उद्दीपनमाद्येन पुरुषेण संहितया<br>धारणा धेनुमुद्रां तुरीयेणावगुण्ठ्य जानुभ्यामवनिं<br>गत्वा शरावोत्थापनं कुण्डोपरि निधाय<br>प्रदक्षिणामावर्त्य तुरीयेणात्मसम्मुखां वागीश्वरीं<br>गर्भनाड्यां गर्भाधानान्तरीयेण कमलप्रदानमाद्येन<br>वौषडन्तेन कुशार्घ्यं दत्त्वा इन्धनप्रदानमाद्येन प्रज्वालनं<br>गर्भाधानं च सद्येनाद्येन पूजनं पुंसवनं वामेन पूजनं<br>द्वितीयेन सीमन्तोन्नयनमघोरेण तृतीयेन पूजनम्॥ ७३ | [संस्कारविधि इस प्रकार है—] अरणीसे उत्पन्न, सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अथवा अग्निहोत्रसे उत्पन्न अग्निको ताम्रपात्र या मिट्टीके शराव (कसोरा)-में लाकर आद्यमन्त्रसे निरीक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण तथा प्रक्षालन करके पुनः आद्य मन्त्रसे ही क्रव्यादंश तथा अशिवका परित्यागकर जठर और भ्रूमध्यसे वह्निके त्रैकारण (त्रिवर्गसाधन)-का आवाहन करके उस आवाहित मूर्तिमें वह्निमन्त्रसे उद्दीपन करके तत्पुरुषमन्त्रसहित आद्यमन्त्रके द्वारा धारणा तथा संहितामन्त्रसे धेनुमुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। तत्पश्चात् चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करके दोनों घुटनोंको भूमिपर टेककर कसोरेको उठाकर कुण्डके ऊपर रखकर चतुर्थ मन्त्रसे प्रदक्षिणक्रमसे चारों ओर घुमाकर अपने सम्मुख विराजमान वागीश्वरीका ध्यान करके गर्भनालमें गर्भाधानकी रीतिसे वौषडन्त आद्यमन्त्रसे कमल प्रदान करके कुशार्घ्य देकर तथा प्रथम मन्त्रसे ईंधन देकर सद्योजातमन्त्रसे प्रज्वालन तथा गर्भाधान करना चाहिये। तदनन्तर प्रथम सद्योजातमन्त्रसे पूजन, वामदेवमन्त्रसे पुंसवन, उसी द्वितीय मन्त्रसे पुनः पूजन, अघोरमन्त्रसे सीमन्तोन्नयन और पुनः उसी तृतीय मन्त्रसे पूजन करना चाहिये॥ ७३॥ |
| ६८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| अवयवव्याप्तिर्वक्त्रोद्घाटनं वक्त्रनिष्कृतिरिति<br>तृतीयेन गर्भजातकर्मपुरुषेण पूजनं तुरीयेण षष्ठेन<br>प्रोक्षणं सूतकशुद्धये चाग्निसूनुरक्षाकुशास्त्रेण वक्त्रे-<br>णाऽग्नौ मूलमीशाग्रं नैर्ऋतिमूलं वायव्याग्रं वायव्य-<br>मूलमीशाग्रमिति कुशास्तरणमिति पूर्वोक्तमिध्ममग्र-<br>मूलघृताक्तं लालापनोदाय षष्ठेन जुहुयात्॥ ७४ | अंगोंकी व्याप्ति, वक्त्रोद्घाटन और वक्त्रनिष्कृति तृतीय मन्त्रसे करना चाहिये। गर्भजातकर्म तत्पुरुषमन्त्रसे, पूजन चतुर्थ मन्त्रसे, सूतकशुद्धिके लिये प्रोक्षण षष्ठ मन्त्रसे और अग्निरूप पुत्रकी रक्षा कुशास्त्र मन्त्रसे करे। तत्पश्चात् वक्त्रमन्त्रसे अग्निकोणमें कुशमूल, ईशानमें कुशका अग्रभाग, नैर्ऋत्यमें कुशमूल, वायव्यमें अग्रभाग, वायव्यमें कुशमूल और ईशानमें अग्रभाग—इस भाँति पूर्वोक्त रीतिसे कुशास्तरण करके घृतमें भींगी हुई समिधाका अग्निकी लालानिवृत्तिके लिये षष्ठ मन्त्रसे हवन करना चाहिये॥ ७४॥ | | पञ्चपूर्वातिक्रमेण परिधिविष्टरन्यासोऽपि आद्येन<br>विष्टरोपरि हिरण्यगर्भहरनारायणानपि पूजयेत्॥ ७५<br><br>इन्द्रादिलोकपालांश्च पूजयेत्॥ ७६<br><br>वज्रावर्तपर्यन्तानपि पूजयेत्॥ ७७<br><br>वागीश्वरवागीश्वरीपूजाद्येनमुद्रास्य हुतं विसर्ज-<br>येत्॥ ७८ | वामदेव आदि चार मन्त्रोंसे परिधियुक्त विष्टरका स्थापन करके आद्यमन्त्रसे विष्टरके ऊपर ब्रह्मा, शिव तथा नारायणका पूजन करना चाहिये। इसी प्रकार इन्द्र आदि लोकपालों तथा वज्रसे लेकर त्रिशूलपर्यन्त उनके आठ आयुधोंकी भी पूजा करनी चाहिये। वागीश्वर तथा वागीश्वरीकी पूजा आदि करके इन वागीश्वरका उद्वासनकर होमद्रव्यका हवन करना चाहिये॥ ७५—७८॥ | | स्रुक्स्रुवसंस्कारमथो निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत् स्रुक् स्रुवं च हस्तद्वये गृहीत्वा<br>संस्थापनमाद्येन ताडनमपि स्रुक्स्रुवोपरि<br>दर्भानुलेखनमूलमध्यमाग्रेण त्रित्वेन स्रुक्शक्तिं<br>स्रुवमपि शम्भुं दक्षिणपार्श्वे कुशोपरि शक्तये नमः<br>शम्भवे नमः॥ ७९ | इसके पश्चात् स्रुक्-स्रुवका संस्कार बताया जाता है—पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करके दोनों हाथोंमें स्रुक्-स्रुव ग्रहणकर प्रथम मन्त्रसे संस्थापन तथा ताड़न करके स्रुक्-स्रुवके ऊपर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे तीन प्रकारसे अनुलेखन करके स्रुक्को शक्ति और स्रुवको शिव मानकर उन्हें दक्षिण भागमें कुशके ऊपर 'शक्तये नमः', 'शम्भवे नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा स्थापित करना चाहिये॥ ७९॥ | | ततो ह्यन्तिसूत्रेण स्रुक्स्रुवौ तुरीयेण<br>वेष्टयेदर्चयेच्च॥ ८०<br><br>धेनुमुद्रां दर्शयित्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय स्रुक्स्रुवसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः॥ ८१ | तदनन्तर समीपवर्ती सूत्रसे स्रुक्-स्रुवको चतुर्थ मन्त्रका उच्चारण करके वेष्टित करना चाहिये और पुनः अर्चन करना चाहिये। इसके बाद धेनुमुद्रा दिखाकर चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षाकर्म सम्पन्न करके स्रुक्-स्रुव संस्कार करना चाहिये॥ ८०–८१॥ | | पुनराज्यसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत्॥ ८२ | आज्यसंस्कार पूर्वमें बताया गया है, पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करना चाहिये। | | आज्यप्रतापनमैशान्यां वा षष्ठेन वेद्युपरि विन्यस्य<br>घृतपात्रं वितस्तिमात्रं कुशपवित्रं वामहस्ताङ्गुष्ठा- | इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे ईशानकोणमें घृतको तपाकर घृतपात्रको वेदीके ऊपर रखकर वितस्तिमात्र (बारह |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६८३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नामिकाग्रं गृहीत्वा दक्षिणाङ्गुष्ठानामिकामूलं गृही-<br>त्वाग्निज्वलोत्प्लवनं स्वाहान्तेन तुरीयेण पुनः षड्<br>दर्भान् गृहीत्वा पूर्ववत्स्वात्मसम्प्लवनं स्वाहान्तेनाद्येन<br>कुशद्वयपवित्रबन्धनं चाद्येन घृते न्यशेदिति पवित्री-<br>करणम्॥ ८३ | अंगुल) कुशाके पवित्रकका अग्रभाग अपने वाम<br>हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे ग्रहण करके तथा<br>दक्षिण हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे पवित्रकका<br>मूल ग्रहण करके स्वाहान्त चतुर्थ मन्त्रसे अग्निज्वालाका<br>उत्प्लवन करना चाहिये। इसके बाद छः कुश लेकर<br>स्वाहान्त प्रथम मन्त्रसे पूर्वकी भाँति अपने देहमें<br>सम्प्लवन करके दो कुशोंका पवित्रक बनाकर प्रथम<br>मन्त्रसे उसे घृतमें डाल देना चाहिये—यह पवित्रीकरण<br>है॥ ८२-८३॥ |
| दर्भद्वयं प्रगृह्याग्निप्रज्वालनं घृतं त्रिधा वर्तयेत्।<br>सम्प्रोक्ष्याग्नौ निधापयेदिति नीराजनम्॥ ८४ | घृतप्लुत दो दर्भ लेकर उसे प्रज्वलित करके<br>घृतके ऊपर तीन बार घुमाये और पुनः सम्प्रोक्षण करके<br>अग्निमें डाल दे—यह नीराजन है। पुनः दर्भोंको लेकर<br>कीट आदि देख करके अर्घ्यजलसे सम्प्रोक्षण करके<br>दर्भोंको अग्निमें डाल देना चाहिये—यह अवद्योतन है।<br>दो दर्भ लेकर अग्निमें प्रज्वलित करके घृतको देखे—<br>यह निरीक्षण है॥ ८४-८६॥ |
| पुनर्दर्भान् गृहीत्वा कीटकादि निरीक्ष्यार्घ्येण सम्प्रोक्ष्य<br>दर्भानग्नौ निधाय इत्यवद्योतनम्॥ ८५ | |
| दर्भद्वयं गृहीत्वाग्निज्वल्य घृतं निरीक्षयेत्॥ ८६ | |
| दर्भेण गृहीत्वा तेनाग्रद्वयेन शुक्लपक्षद्वयेनाद्येनेति<br>कृष्णपक्षसम्पातनं घृतं त्रिभागेन विभज्य<br>स्रुवेणैकभागेनाज्येनाग्नये स्वाहा द्वितीयेनाज्येन<br>सोमाय स्वाहा आज्येन ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा<br>आज्येनाग्नये स्विष्टकृते स्वाहा॥ ८७ | इसके बाद अन्य दर्भके साथ दो पवित्रक लेकर<br>उनमें शुक्लपक्षद्वयकी भावना करे तथा उन दोनोंके<br>सहित घृतको सद्योजातमन्त्रसे पृथक् कर दे, शेषको<br>कृष्णपक्षकी भावनासे पृथक् करे; इस प्रकार घीको तीन<br>भागोंमें विभक्त करके स्रुवद्वारा घृतके एक भागको<br>‘अग्नये स्वाहा’, घृतके द्वितीय भागको ‘सोमाय<br>स्वाहा’ और घृतके तृतीय भागको ‘अग्नीषोमाभ्यां<br>स्वाहा’ तथा अवशिष्ट घृतको ‘अग्नये स्विष्टकृते<br>स्वाहा’—ऐसा कहकर होम करे॥ ८७॥ |
| पुनः कुशेन गृहीत्वा संहिताभिमन्त्रेण<br>नमोऽन्तेनाभिमन्त्रयेत्॥ ८८ | तत्पश्चात् कुशयुक्त पवित्रक लेकर अन्तमें नमः<br>लगाकर संहिता मन्त्रसे घृतको अभिमन्त्रित करना<br>चाहिये। |
| अभिमन्त्र्य धेनुमुद्राप्रदर्शनकवचावगुण्ठनास्त्रेण<br>रक्षाम्। अथ संस्कृते निधापयेद् आज्यसंस्कारः॥ ८९ | अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्रा प्रदर्शित करे।<br>कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्रमन्त्रसे रक्षण करना<br>चाहिये, इसके बाद संस्कारित पवित्रकोंको अग्निमें<br>डाल देना चाहिये—यह आज्यसंस्कार है॥ ८८-८९॥ |
| आज्येन स्रुग्वदनेन चक्राभिधारणं शक्तिबीजादी-<br>शानमूर्तये स्वाहा। पूर्ववत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा<br>अघोरहृदयाय स्वाहा वामदेवाय गुह्याय स्वाहा<br>सद्योजातमूर्तये स्वाहा। इति वक्त्रोद्घाटनम्॥ ९० | स्रुवमें भरकर लिये गये घृतसे शक्तिबीजमन्त्र<br>(ह्रीं)-के द्वारा आहुति दे—यह चक्राभिधारण है। इसके<br>बाद ईशानमूर्तये स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा,<br>अघोरहृदाय स्वाहा, वामदेवगुह्याय स्वाहा, |
| ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा तत्पुरुषवक्त्राय<br>अघोरहृदयाय स्वाहा अघोरहृदाय वामगुह्याय |
| ६८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सद्योजातमूर्तये स्वाहा इति वक्त्रसन्धानम्॥ ९१<br><br>ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदाय<br>वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा इति<br>वक्त्रैक्यकरणम्॥ ९२ | सद्योजातमूर्तये स्वाहा—इन [पाँच] मन्त्रोंसे आहुति दे—यह वक्त्रोद्घाटन है। ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय अघोरहृदाय स्वाहा, अघोरहृदाय वामगुह्याय सद्योजातमूर्तये स्वाहा—इन मन्त्रोंसे आहुति दे—यह वक्त्रसन्धान है। ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदाय वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा—इस मन्त्रसे आहुति दे—यह वक्त्रैक्यकरण है॥ ९०–९२॥ |
| शिवाग्निं जनयित्वैवं सर्वकर्माणि कारयेत्।<br>केवलं जिह्वया वापि शान्तिकाद्यानि सर्वदा॥ ९३<br><br>गर्भाधानादिकार्येषु वह्नेः प्रत्येकमव्यय।<br>दश आहुतयो देया योनिबीजेन पञ्चधा॥ ९४ | इस प्रकार शिवाग्नि उत्पन्न करके समस्त कार्य सम्पन्न करने चाहिये अथवा केवल अग्निजिह्वासे भी शान्तिक आदि कार्य सदा करने चाहिये। हे अव्यय! गर्भाधान आदि प्रत्येक संस्कारोंमें योनिबीजसे अग्निमें दस-दस या पाँच-पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये॥ ९३-९४॥ |
| शिवाग्नौ कल्पयेद्दिव्यं पूर्ववत्परमासनम्।<br>आवाहनं तथा न्यासं यथा देवे तथार्चनम्॥ ९५<br><br>मूलमन्त्रं सकृज्जप्त्वा देवदेवं प्रणम्य च।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा सगर्भं सर्वसम्मतम्॥ ९६<br><br>परिक्षेचनपूर्वं च तदिध्ममभिघार्य च।<br>जुहुयादग्निमध्ये तु ज्वलितेऽथ महामुने॥ ९७ | शिवाग्निमें पूर्वकी भाँति परम दिव्य आसन कल्पित करना चाहिये और उसपर देवका आवाहन, स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। हे महामुने! मूलमन्त्रका एक बार जप करके देवदेवको प्रणामकर फिर तीन बार सर्वसम्मत सगर्भ प्राणायाम करके परिक्षेचनपूर्वक उस समिधाको आधारहोमको उद्देश्य करके प्रज्वलित अग्निके मध्यमें हवन करना चाहिये॥ ९५–९७॥ |
| आघारावपि चाधाय चाज्येनैव तु षण्मुखे।<br>आज्यभागौ तु जुहुयाद्विधिनैव घृतेन च॥ ९८<br><br>चक्षुषी चाज्यभागौ तु चाग्नये च तथोत्तरे।<br>आत्मनो दक्षिणे चैव सोमायेति द्विजोत्तम॥ ९९<br><br>प्रत्यङ्मुखस्य देवस्य शिवाग्नेर्ब्रह्मणः सुत।<br>अक्षि वै दक्षिणं चैव चोत्तरं चोत्तरं तथा॥ १००<br><br>दक्षिणं तु महाभाग भवत्येव न संशयः।<br>आज्येनाहुतयस्तत्र मूलेनैव दशैव तु॥ १०१ | स्रुवमें दो-दो आधारहोम-निमित्तक तथा आज्यभाग-होमनिमित्तक आहुतियाँ लेकर विधिपूर्वक सद्योजात आदि छः मन्त्ररूप मुखवाली अग्निमें उनका हवन करना चाहिये। हे द्विजश्रेष्ठ! अग्नये स्वाहा—ऐसा कहकर अपने उत्तरमें एवं सोमाय स्वाहा—ऐसा कहकर अपने दक्षिणमें नेत्रस्वरूप दोनों आज्यभागोंकी आहुतियाँ देनी चाहिये। हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! हे महाभाग! पश्चिमकी ओर मुखवाले शिवाग्निरूप महादेवका दाहिना नेत्र उत्तरकी ओर तथा बायाँ नेत्र दक्षिणकी ओर होता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ९८–१०० १/२॥ |
| चरुणा च यथावद्धि समिद्भिश्च तथा स्मृतम्।<br>पूर्णाहुतिं ततो दद्यान्मूलमन्त्रेण सुव्रत॥ १०२<br><br>सर्वावरणदेवानां पञ्चपञ्चैव पूर्ववत्।<br>ईशानादिक्रमेणैव शक्तिबीजक्रमेण च॥ १०३ | घृत, चरु तथा समिधाओंसे मूलमन्त्रके द्वारा यथाविधि दस आहुतियाँ देनी चाहिये—ऐसा कहा गया है। हे सुव्रत! तदनन्तर मूल मन्त्रसे पूर्णाहुति प्रदान करनी चाहिये। ईशान आदि मन्त्रोंके क्रमसे तथा |
२६- शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य
| अध्याय २६ ] | शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य | ६८५ |
|---|
| प्रायश्चित्तमघोरेण स्विष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम्।<br>त्रिप्रकारं मया प्रोक्तमग्निकार्यं सुशोभनम्॥ १०४ | शक्तिबीज (ह्रीँ)-के क्रमसे सभी आवरण देवताओंके लिये पूर्वकी भाँति पाँच-पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। अघोरमन्त्रसे प्रायश्चित्तहोम तथा स्विष्टकृत्पर्यन्त पूर्वकी भाँति कहा गया है। इस प्रकार मैंने अत्यन्त सुन्दर तीन प्रकारके अग्निकार्यका वर्णन कर दिया॥ १०१-१०४॥ | | यथावसरमेवं हि कुर्यान्नित्यं महामुने।<br>जीवितान्ते लभेत्स्वर्गं लभते अग्निदीपनम्॥ १०५ | हे महामुने! जो [मनुष्य] यथासमय नित्य इसे करता है, वह मृत्युके अनन्तर स्वर्ग प्राप्त करता है, अग्निके समान दीप्ति प्राप्त करता है। किसी भी प्रकारके कर्मके लिये उसे नरककी प्राप्ति नहीं होती है। त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम)-की इच्छावाला अहिंसक (परनाशशून्य) होम करे और मुक्तिकी इच्छावाला शिवाग्निको अपने हृदयमें स्थित समझकर चिन्तन करे एवं ध्यानयज्ञके द्वारा हवन करे। सभी प्राणियोंके देहमें स्थित तथा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी उन शिवको जानकर प्राणायामके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिदिन हवन करना चाहिये। शिवध्यानसे रहित होकर होम करनेवाला पाषाणमें मेढक होता है॥ १०५-१०८॥ | | नरकं चैव नाप्नोति यस्य कस्यापि कर्मणः।<br>अहिंसकं चरेद्धोमं साधको मुक्तिकाङ्क्षकः॥ १०६ | | | हृदिस्थं चिन्तयेदग्निं ध्यानयज्ञेन होमयेत्।<br>देहस्थं सर्वभूतानां शिवं सर्वजगत्पतिम्॥ १०७ | | | तं ज्ञात्वा होमयेद्भक्त्या प्राणायामेन नित्यशः।<br>बाह्यहोमप्रदाता तु पाषाणे दर्दुरो भवेत्॥ १०८ | |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाग्निकार्यवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः॥ २५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवाग्निकार्यवर्णन' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
छब्बीसवाँ अध्याय
शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
|---|---|
| अथवा देवमीशानं लिङ्गे सम्पूजयेच्छिवम्।<br>ब्राह्मणः शिवभक्तश्च शिवध्यानपरायणः॥ १<br>अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>उद्धूलयेद्वि सर्वाङ्गमापादतलमस्तकम्॥ २<br>आचामेद्ब्रह्मतीर्थेन ब्रह्मसूत्री ह्युदङ्मुखः।<br>अथों नमः शिवायेति तनुं कृत्वात्मनः पुनः॥ ३<br>देवं च तेन मन्त्रेण पूजयेत्प्रणवेन च।<br>सर्वस्मादधिका पूजा अघोरेशस्य शूलिनः॥ ४ | [हे सनत्कुमार!] शिवभक्त ब्राह्मणको चाहिये कि भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होकर शिवलिङ्गमें परमेश्वर शिवका विधिवत् पूजन करे। 'अग्निरिति०'—इस मन्त्रसे अग्निहोत्रजन्य भस्म लेकर पादतलसे मस्तकपर्यन्त सभी अंगोंमें उसे लगाये। इसके बाद उत्तराभिमुख हो ब्रह्मसूत्री होकर ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। तत्पश्चात् 'ॐ नमः शिवाय'—इस मन्त्रसे अपने देहको शुद्ध करके मूलमन्त्र तथा प्रणवसे शिवका पूजन करना चाहिये; अघोरेश्वर शिवकी पूजा सबसे बढ़कर है॥ १-४॥ |
| सामान्यं यजनं सर्वमग्निकार्यं च सुव्रत।<br>मन्त्रभेदः प्रभोस्तस्य अघोरध्यानमेव च॥ ५ | हे सुव्रत! समस्त पूजन तथा अग्निकार्य पूर्वकी भाँति हैं। उन प्रभुके मन्त्रोंमें भेद तथा भगवान् अघोरका |
| ६८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक / मन्त्र | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।<br>सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ ६<br><br>अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदयाय नमः। अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा। घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट्। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो पिङ्गलकवचाय हुम्। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट्। सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट्।<br><br>स्नात्वाचम्य तनुं कृत्वा समभ्युक्ष्याघमर्षणम्।<br>तर्पणं विधिना चार्घ्यं भानवे भानुपूजनम्॥ ७ | ध्यान अब कहा जायगा। मन्त्र इस प्रकार है—<br>अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः। अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदाय नमः। अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा। घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट्। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्योः पिङ्गलकवचाय हुम्। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट्। सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट्—[इन छः मन्त्रोंसे अंगन्यास करे]। पूजाविधि इस प्रकार है—स्नान करके आचमनकर शरीरका मार्जन, अघमर्षण, तर्पण, विधिपूर्वक सूर्यार्घ्य तथा सूर्यपूजन पूर्वकी भाँति करे; अघोर पूजामें केवल मन्त्रका भेद है॥ ५-७॥ |
| समं चाघोरपूजायां मन्त्रमात्रेण भेदितम्।<br>मार्गशुद्धिस्तथा द्वारि पूजां वास्त्वधिपस्य च॥ ८<br><br>कृत्वा करं विशोध्याग्रे स शुभासनमास्थितः।<br>नासाग्रकमले स्थाप्य दग्धाक्षः क्षुभिकाग्निना॥ ९<br><br>वायुना प्रेर्य तद्भस्म विशोध्य च शुभाम्भसा।<br>शक्त्यामृतमये ब्रह्मकलां तत्र प्रकल्पयेत्॥ १० | मार्गशुद्धि, द्वारपूजा तथा वास्तुपतिकी पूजा करके पूजकको चाहिये कि पवित्र आसनपर बैठ जाय और सर्वप्रथम हाथ शुद्ध करके नासाग्रके पास करकमलमें भस्म स्थापित करके क्षुभिकाग्नि (विरक्तिरूप अग्नि)-से समस्त विषयोंको दग्ध करके उस भस्मको वायुसे प्रेरितकर पवित्र जलसे उसका शोधनकर ब्रह्ममय उस भस्ममें शक्तिसहित ब्रह्मकलाकी भावना करे॥ ८-१०॥ |
| अघोरं पञ्चधा कृत्वा पञ्चाङ्गसहितं पुनः।<br>इत्थं ज्ञानक्रियामेवं विन्यस्य च विधानतः॥ ११<br><br>न्यासस्त्रिनेत्रसहितो हृदि ध्यात्वा वरासने।<br>नाभौ वह्निगतं स्मृत्वा भ्रूमध्ये दीपवत्प्रभुम्॥ १२ | अघोरमन्त्रको पाँच भागोंमें विभक्त करके उसे पंचांगभस्मविलेपनयुक्त करना चाहिये। इस प्रकार ज्ञानयुक्त क्रियाका विधानपूर्वक न्यास करके अघोरमूर्तिसहित न्यास करना चाहिये और हृदयमें श्रेष्ठ आसनपर विराजमानरूपमें ध्यान करके नाभिमें अग्निके मध्य स्थित स्मरण करके भ्रूमध्यमें दीपशिखाके आकारवाले प्रभुका चिन्तन करना चाहिये॥ ११-१२॥ |
| शान्त्या बीजाङ्कुरानन्तधर्माद्यैरपि संयुते।<br>सोमसूर्याग्निसम्पन्ने मूर्तित्रयसमन्विते॥ १३<br><br>वामादिभिश्च सहिते मनोन्मन्याप्यधिष्ठिते।<br>शिवासनेतमूर्तिस्थमक्षयाकाररूपिणम् ॥ १४<br><br>अष्टत्रिंशत्कलादेहं त्रितत्त्वसहितं शिवम्।<br>अष्टादशभुजं देवं गजचर्मोत्तरीयकम॥ १५ | शान्तिसहित बीज, अंकुर, अनन्त तथा धर्म आदिसे युक्त, सोम, सूर्य तथा अग्निसे सम्पन्न, तीन मूर्तियोंसे समन्वित; वामा आदि आठ शक्तियोंसे संयुक्त तथा मनोन्मनीसे भी अधिष्ठित शिवासनपर अघोरमूर्ति परमेश्वर शिवका इस प्रकार ध्यान करे कि वे आत्ममूर्तिमें स्थित हैं, अक्षयाकार स्वरूप हैं, अड़तीस कलाओंसे परिपूर्ण विग्रहवाले हैं, तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं, अठारह भुजाओंसे सम्पन्न हैं, गजचर्मका उत्तरीय धारण |
अध्याय २६ ] शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य ६८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सिंहाजिनाम्बरधरमघोरं परमेश्वरम्।<br>द्वात्रिंशाक्षररूपेण द्वात्रिंशच्छक्तिभिर्वृतम्॥ १६<br>सर्वाभरणसंयुक्तं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>कपालमालाभरणं सर्पवृश्चिकभूषणम्॥ १७<br>पूर्णेन्दुवदनं सौम्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्।<br>चन्द्ररेखाधरं शक्त्या सहितं नीलरूपिणम्॥ १८<br>हस्ते खड्गं खेटकं पाशमेके<br>रत्नैश्चित्रं चाङ्कुशं नागकक्षाम्।<br>शरासनं पाशुपतं तथास्त्रं<br>दण्डं च खट्वाङ्गमथापरे च॥ १९<br>तन्त्रीं च घण्टां विपुलं च शूलं<br>तथापरे डामरुकं च दिव्यम्।<br>वज्रं गदां टङ्कमेकं च दीप्तं<br>समुद्गरं हस्तमथास्य शम्भोः॥ २०<br>वरदाभयहस्तं च वरेण्यं परमेश्वरम्।<br>भावयेत्पूजयेच्चापि वह्नौ होमं च कारयेत्॥ २१ | किये हुए हैं, सिंहचर्मको वस्त्ररूपमें धारण किये हुए हैं, बत्तीस अक्षरोंके रूपमें बत्तीस शक्तियोंसे आवृत हैं, समस्त प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हैं, सभी देवता उन्हें नमस्कार कर रहे हैं, वे नरमुण्डकी माला पहने हुए हैं, सर्पों तथा बिच्छुओंको आभूषणरूपमें धारण किये हुए हैं, पूर्णचन्द्रके समान उनका मुखमण्डल है, वे सौम्य स्वभाववाले हैं, करोड़ों चन्द्रमाके तुल्य कान्तिसे युक्त हैं, मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए हैं, शक्तिसहित सुशोभित हो रहे हैं, नीलवर्णवाले हैं, उनकी दाहिनी ओरकी आठ भुजाओंमें खड्ग-खेटक-पाश-रत्नमय अंकुश-नागकक्षा-शरासनयुक्त पाशुपतास्त्र-दण्ड और खट्वांग तथा बायीं ओरकी आठ भुजाओंमें तन्त्री-घण्टा-विशाल शूल-दिव्य डमरू-वज्र-गदा-टंक और प्रदीप्त मुद्गर हैं। वे वरेण्य परमेश्वर शेष दो हाथोंमें वरद और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं—इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये और अन्तमें अग्निमें हवन करना चाहिये॥ १३—२१॥ |
| होमश्च पूर्ववत्सर्वो मन्त्रभेदश्च कीर्तितः।<br>अष्टपुष्पादि गन्धादि पूजास्तुतिनिवेदनम्॥ २२<br>अन्तर्बलिं च कुण्डस्य वाह्येयेन विधानतः।<br>मण्डलं विधिना कृत्वा मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ २३<br>रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो<br>राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः<br>क्षेत्रपालेभ्यः अथ वायुवरुणदिग्भागे क्षेत्रपालबलिं<br>क्षिपेत्॥<br>अर्घ्यं गन्धं पुष्पं च धूपं दीपं च सुव्रताः।<br>नैवेद्यं मुखवासादि निवेद्यं वै यथाविधि॥ २४<br>विज्ञाप्यैवं विसृज्याथ अष्टपुष्पैश्च पूजनम्।<br>सर्वसामान्यमेतद्धि पूजायां मुनिपुङ्गवाः॥ २५<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चादि सुव्रत।<br>अघोरार्चाविधानं च लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा॥ २६<br>स्थण्डिलात्कोटिगुणितं लिङ्गार्चनमनुत्तमम्।<br>लिङ्गार्चनरतो विप्रो महापातकसम्भवैः॥ २७ | सम्पूर्ण होमकर्म पूर्ववत् होता है, केवल मन्त्रोंमें भेद कहा गया है। अष्टपुष्पांजलि, गन्ध, पुष्पके साथ पूजा, स्तुति, निवेदन तथा कुण्डकी अन्तर्बलि (होम) वह्निपुराणोक्त विधानसे करना चाहिये। पुनः विधिपूर्वक मण्डलकी रचना करके यथाक्रम रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः क्षेत्रपालेभ्यः [नमः]—इन मन्त्रोंका उच्चारण करके वायव्य तथा पश्चिम दिशामें क्षेत्रपालबलि प्रदान करनी चाहिये। [सूतजी बोले—] हे सुव्रतो! तदनन्तर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मुखवास आदि विधिपूर्वक निवेदित करना चाहिये। ये सब उपचार समर्पित करके अष्टपुष्पांजलियोंके द्वारा विसर्जनकर प्रार्थना करनी चाहिये। हे मुनिश्रेष्ठो! पूजामें यह सब सामान्य विधि है। [शैलादि बोले—] हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अघोरपूजनका विधान कहा है। शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें भी अघोरपूजनका विधान है, किंतु स्थण्डिलकी अपेक्षा लिङ्गमें पूजन करोड़ों गुना |
२७- राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण
| ६८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| पापैरपि न लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>लिङ्गस्य दर्शनं पुण्यं दर्शनात्स्पर्शनं वरम्॥ २८<br><br>अर्चनादधिकं नास्ति ब्रह्मपुत्र न संशयः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चनमुत्तमम्॥ २९<br><br>वर्षकोटिशतेनापि विस्तरेण न शक्यते॥ ३० | श्रेष्ठ होता है। लिङ्गार्चनमें संलग्न विप्र महापातकोंके द्वारा लगनेवाले पापोंसे भी कमलके पत्रपर स्थित जलकी भाँति लिप्त नहीं होता है। लिङ्गका दर्शन पुण्यप्रद होता है, दर्शनसे अधिक उत्तम लिङ्गका स्पर्श है, किंतु लिङ्गार्चनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है, हे ब्रह्मपुत्र! इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें उत्तम अघोरार्चनका वर्णन कर दिया; करोड़ों वर्षोंमें भी विस्तारके साथ इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ २२—३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अघोरार्चनवर्णनं नाम षड्विंशतितमोऽध्यायः॥ २६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरार्चनवर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण
| ऋषय ऊचुः<br>प्रभावो नन्दिनश्चैव लिङ्गपूजाफलं श्रुतम्।<br>श्रुतिभिः सम्मितं सर्वं रोमहर्षण सुव्रत॥ १<br><br>जयाभिषेक ईशेन कथितो मनवे पुरा।<br>हिताय मेरुशिखरे क्षत्रियाणां त्रिशूलिना॥ २<br><br>तत्कथं षोडशविधं महादानं च शोभनम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत बुद्धिमतां वर॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>जीवच्छ्राद्धं पुरा कृत्वा मनुः स्वायम्भुवः प्रभुः।<br>मेरुमासाद्य देवेशमस्तवीन्नीललोहितम्॥ ४<br><br>तपसा च विनीताय प्रहृष्टः प्रददौ भवः।<br>दिव्यं दर्शनमीशानस्तेनापश्यत्तमव्ययम्॥ ५<br><br>नत्वा सम्पूज्य विधिना कृताञ्जलिपुटः स्थितः।<br>हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाच च ननाम च॥ ६ | ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण! हे सुव्रत! हमलोगोंने [भगवान्] नन्दीका प्रभाव तथा वेदप्रतिपादित लिङ्गपूजाका फल—यह सब [आपसे] सुन लिया॥ १॥<br>त्रिशूलधारी महेश्वर शिवने क्षत्रियोंके कल्याणके लिये पूर्व कालमें मेरुपर्वतके शिखरपर स्वायम्भुव मनुको जयाभिषेकका उपदेश किया था, उसे बतायें; और हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतजी! उत्तम षोडशविध महादानका विधान क्या है—यह सब आप कृपापूर्वक हमलोगोंको बतायें॥ २-३॥<br>सूतजी बोले—प्राचीन कालमें प्रभु स्वायम्भुव मनुने जीवच्छ्राद्ध करके मेरुशिखरपर पहुँचकर देवेश्वर नीललोहितका स्तवन किया था॥ ४॥<br>तब उनकी तपस्यासे भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन विनम्र मनुको दिव्य दृष्टि प्रदान की; फलतः उन्होंने अव्यय शिवको देखा और उन्हें प्रणाम करके विधिवत् पूजा करके दोनों हाथ जोड़े हुए वे स्थित हो गये। मनुने शिवजीको पुनः प्रणाम किया और हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें उनसे कहा—॥ ५-६॥ |
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६८९
| देवदेव जगन्नाथ नमस्ते भुवनेश्वर।<br>जीवच्छ्राद्धं महादेव प्रसादेन विनिर्मितम्॥ ७<br>पूजितश्च ततो देवो दृष्टश्चैव मयाधुना।<br>शक्राय कथितं पूर्वं धर्मकामार्थमोक्षदम्॥ ८<br>जयाभिषेकं देवेश वक्तुमर्हसि मे प्रभो। | हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है। हे महादेव! आपकी कृपासे मैंने अपना जीवच्छ्राद्ध कर लिया। मैंने आपकी पूजा की, उससे मुझे इस समय आप प्रभुका दर्शन प्राप्त हुआ है। हे देवेश! आपने प्राचीन कालमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करनेवाले जयाभिषेकका उपदेश इन्द्रको किया था; हे प्रभो! उसे मुझे भी बतानेकी कृपा कीजिये॥ ७-८१/२ ॥ |
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| सूत उवाच<br>तस्मै देवो महादेवे भगवानीललोहितः॥ ९<br>जयाभिषेकमखिलमवदत्परमेश्वरः। | सूतजी बोले—तदनन्तर नीललोहित भगवान् परमेश्वर महादेवने उन मनुको सम्पूर्ण जयाभिषेकका उपदेश किया॥ ९१/२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>जयाभिषेकं वक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया॥ १०<br>अपमृत्युजयार्थं च सर्वशत्रुजयाय च।<br>युद्धकाले तु सम्प्राप्ते कृत्वैवमभिषेचनम्॥ ११<br>स्वपतिं चाभिषिच्यैव गच्छेद्योद्धुं रणाजिरे।<br>विधिना मण्डपं कृत्वा प्रपां वा कूटमेव वा॥ १२ | श्रीभगवान् बोले—राजाओंके हितकी कामनासे, अकाल मृत्युसे बचने तथा सभी शत्रुओंको जीतनेके लिये मैं आपसे जयाभिषेकका वर्णन करूँगा। युद्ध-काल उपस्थित होनेपर यथाविधि जयाभिषेक करके तथा अपने स्वामी राजसेनाधिपतिका अभिषेक करके ही युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें जाना चाहिये॥ १०-१११/२ ॥ |
| नवधा स्थापयेद्वह्निं ब्राह्मणो वेदपारगः।<br>ततः सर्वाभिषेकार्थं सूत्रपातं च कारयेत्॥ १३ | विधिपूर्वक मण्डप, पानीयशाला तथा निश्चल स्थान बनाकर वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको नौ प्रकारकी वह्निकी स्थापना करनी चाहिये। तदनन्तर सम्पूर्ण अभिषेकके लिये मण्डपमें रेखाकरण करना चाहिये॥ १२-१३॥ |
| प्रागाद्यं वर्णसूत्रं च दक्षिणाद्यं तथा पुनः।<br>सहस्राणां द्वयं तत्र शतानां च चतुष्टयम्॥ १४<br>शेषमेव शुभं कोष्ठं तेषु कोष्ठं तु संहरेत्।<br>बाह्ये वीथ्यां पदं चैकं समन्तादुपसंहरेत्॥ १५ | पूर्वसे पश्चिम तथा दक्षिणसे उत्तरकी ओर रँगे हुए सूतसे रेखाएँ बनायें, जिससे दो हजार चार सौ कोष्ठ होंगे। सभी शुभ कोष्ठोंको बनाकर उनमेंसे शेष शुभ कोष्ठोंको लेकर बाहरवाली पंक्तिमें सब ओरसे एक-एक पदको ले॥ १४-१५॥ |
| अङ्गसूत्राणि सङ्गृह्य विधिना पृथगेव तु।<br>प्रागाद्यं वर्णसूत्रं च दक्षिणाद्यं तथा पुनः॥ १६<br>प्रागाद्यं दक्षिणाद्यं च षट्त्रिंशत्संहरेत्क्रमात्।<br>प्रागाद्याः पङ्क्तयः सप्त दक्षिणाद्यास्तथा पुनः॥ १७<br>तस्मादेकोनपञ्चाशत्पङ्क्तयः परिकीर्तिताः।<br>नव पङ्क्तीर्हरेन्मध्ये गन्धगोमयवारिणा॥ १८<br>कमलं चालिखेत्तत्र हस्तमात्रेण शोभनम्।<br>अष्टपत्रं सितं वृत्तं कर्णिकाकेसरान्वितम्॥ १९ | इसके बाद अंगसूत्र लेकर विधिपूर्वक पृथक् प्रागाद्य तथा दक्षिणाद्य रँगा हुआ सूत डालना चाहिये; प्रागाद्य तथा दक्षिणाद्य छत्तीस रेखाएँ बनानी चाहिये। पुनः प्रागाद्य सात पंक्तियाँ और दक्षिणाद्य सात पंक्तियाँ बनाये, इस प्रकार उनचास पंक्तियाँ कही गयी हैं। उसके मध्य भागमें नौ पंक्तियाँ ग्रहण करनी चाहिये। गन्ध तथा गोमययुक्त जलसे लीपकर उसमें एक हाथ |
| ६९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| अष्टाङ्गुलप्रमाणेन कर्णिकाहेमसन्निभा।<br>चतुरङ्गुलमानेन केसरस्थानमुच्यते॥ २० | प्रमाणके सुन्दर, अष्टदलोंवाले, श्वेत, गोलाकार तथा कर्णिका-केसरसे युक्त कमलकी रचना करनी चाहिये। कर्णिका आठ अंगुल प्रमाणकी तथा सुवर्णके समान होनी चाहिये; केसरका स्थान चार अंगुल प्रमाणका बताया गया है॥ १६-२०॥ | | धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं च यथाक्रमम्।<br>आग्नेयादिषु कोणेषु स्थापयेत्प्रणवेन तु॥ २१<br>अव्यक्तादीनि वै दिक्षु गात्राकारेण वै न्यसेत्।<br>अव्यक्तं नियतः कालः काली चेति चतुष्टयम्॥ २२<br>सितरक्तहिरण्याभकृष्णा धर्मादयः क्रमात्।<br>हंसाकारेण वै गात्रं हेमाभासेन सुव्रताः॥ २३ | आग्नेय आदि कोणोंमें प्रणव मन्त्रके द्वारा क्रमानुसार धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्यकी स्थापना करनी चाहिये। साथ ही चारों दिशाओंमें अव्यक्त, नियत, काल और कालीको बाह्य पत्राकाररूपमें स्थापित करना चाहिये। हे सुव्रतो! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य—ये चारों क्रमसे श्वेत, रक्त, स्वर्णकी आभावाले तथा कृष्णवर्णवाले होने चाहिये और गात्र (बाह्यपत्र) हंसाकार तथा सुवर्णसदृश होना चाहिये॥ २१-२३॥ | | आधारशक्तिमध्ये तु कमलं सृष्टिकारणम्।<br>बिन्दुमात्रं कलामध्ये नादाकारमतः परम्॥ २४<br>नादोपरि शिवं ध्यायेदोङ्काराख्यं जगद्गुरुम्।<br>मनोन्मनीं च पद्माभां महादेवं च भावयेत्॥ २५ | आधारशक्तिके मध्यमें सृष्टिकारणरूप कमलकी तथा कलामध्यमें बिन्दुमात्र नादाकारकी कल्पना करे; तत्पश्चात् उस नादके ऊपर ओंकारसंज्ञक जगद्गुरु शिवका ध्यान करना चाहिये और मनोन्मनी तथा पद्मकी आभावाले महादेवकी भावना करनी चाहिये। तदनन्तर | | वामादयः क्रमेणैव प्रागाद्याः केसरेषु वै।<br>वामा ज्येष्ठा तथा रौद्री काली विकरणी तथा॥ २६<br>बला प्रमथिनी देवी दमनी च यथाक्रमम्।<br>वामदेवादिभिः सार्धं प्रणवेनैव विन्यसेत्॥ २७ | वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनी—इन वामा आदि आठ शक्तियोंका वामदेव आदि अष्ट शिव-मूर्तियोंके साथ प्रणवके उच्चारणपूर्वक पूर्वादिके क्रमसे केसरोंमें न्यास करना चाहिये॥ २४-२७॥ | | नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने॥ २८<br>रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च।<br>बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च॥ २९<br>मनोन्मनाय देवाय मनोन्मन्यै नमो नमः।<br>मन्त्रैरेतैर्यथान्यायं पूजयेत्परिमण्डलम्॥ ३० | 'नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने॥ रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च। बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च॥ मनोन्मनाय देवाय मनोन्मन्यै नमो नमः।'—इन मन्त्रोंसे विधानके अनुसार परिमण्डलका पूजन करना चाहिये॥ २८-३०॥ | | प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>द्वितीयावरणे चैव शक्तयः षोडशैव तु॥ ३१<br>तृतीयावरणे चैव चतुर्विंशदनुक्रमात्।<br>पिशाचवीथिवैं मध्ये नाभिवीथिः समन्ततः॥ ३२<br>मन्त्रैरेतैर्यथान्यायं पिशाचानां प्रकीर्तिता।<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु पदमष्टारसंयुक्तम्॥ ३३ | प्रथम आवरणका वर्णन कर दिया गया; अब द्वितीय आवरणके विषयमें सुनिये। द्वितीय आवरणमें कुल सोलह शक्तियाँ होती हैं और तृतीय आवरणमें क्रमसे चौबीस शक्तियाँ होती हैं। मध्यमें पिशाचवीथि और चारों ओर नाभिवीथि है; यह पिशाचोंकी वीथि कही गयी है, इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंसे इनकी सम्यक् पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३२ १/२॥ |
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तेषु तेषु पृथक्त्वेन पदेषु कमलं क्रमात्।<br>कल्पयेच्छालिनीवारगोधूमैश्च यवादिभिः॥ ३४<br><br>तण्डुलैश्च तिलैर्वाथ गौरसर्षपसंयुतैः।<br>अथवा कल्पयेदेतैैर्यथाकालं विधानतः॥ ३५<br><br>अष्टपत्रं लिखेत्तेषु कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>शालीनामाढकं प्रोक्तं कमलानां पृथक् पृथक्॥ ३६<br><br>तण्डुलानां तदर्धं स्यात्तदर्धं च यवादयः।<br>द्रोणं प्रधानकुम्भस्य तदर्धं तण्डुलाः स्मृताः॥ ३७<br><br>तिलानामाढकं मध्ये यवानां च तदर्धकम्। | [अब कलशस्थापनकी विधि बतायी जा रही है—] अष्टकोणीय एक हजार आठ पद वहाँ परिमण्डलमें बनाने चाहिये। तत्पश्चात् उन-उन पदोंमें अलग-अलग क्रमसे कर्णिका तथा केसरसे युक्त अष्टदल कमलको शालि (धान), नीवार, गोधूम, यव, तण्डुल, तिल, श्वेत सर्षप (सरसों)-के द्वारा निर्मित करना चाहिये; अथवा समयसे इनमें जो उपलब्ध हो जाय, उसीसे विधानपूर्वक कमलकी रचना करनी चाहिये। प्रत्येक कमलके लिये शालि-धानका परिमाण एक आढक बताया गया है; तण्डुलका परिमाण उसका आधा और जौ आदिका परिमाण उसका भी आधा होना चाहिये। प्रधान कुम्भका प्रमाण एक द्रोण होना चाहिये। इसके लिये चावल उसका आधा बताया गया है। तिलका परिमाण एक आढक और जौका परिमाण उसका आधा होना चाहिये॥ ३३—३७ १/२॥ |
| अथाम्भसा सम्भ्युक्ष्य कमलं प्रणवेन तु॥ ३८<br><br>तेषु सर्वेषु विधिना प्रणवं विन्यसेत्क्रमात्।<br>एवं समाप्य चाभ्युक्ष्य पदसाहस्रमुत्तमम्॥ ३९<br><br>कलशानां सहस्राणि हैमानि च शुभानि च।<br>उक्तलक्षणयुक्तानि कारयेद्राजतानि वा॥ ४०<br><br>ताम्रजानि यथान्यायं प्रणवेनार्घ्यवारिणा। | इस प्रकार कमलकी रचना करके जलसे प्रणवके द्वारा उसका प्रोक्षणकर उन सबमें विधिपूर्वक क्रमसे प्रणवका न्यास करना चाहिये। ऐसा करनेके अनन्तर पवित्र सभी हजार पदोंका प्रोक्षण करके बताये गये लक्षणोंवाले स्वर्ण, रजत या ताम्रके हजार शुभ कलशोंको व्यवस्थित कराना चाहिये और प्रणवका उच्चारण करके अर्घ्य-जलसे प्रोक्षण करना चाहिये॥ ३८—४० १/२॥ |
| द्वादशाङ्गुलविस्तारमुदरे समुदाहृतम्॥ ४१<br><br>वर्तितं तु तदर्धेन नाभिस्तस्य विधीयते।<br>कण्ठं तु द्व्यङ्गुलोत्सेधं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ४२<br><br>ओष्ठं च द्व्यङ्गुलोत्सेधं निर्गमं द्व्यङ्गुलं स्मृतम्।<br>तत्तद्वै द्विगुणं दिव्यं शिवकुम्भे प्रकीर्तितम्॥ ४३<br><br>यवमात्रान्तरं सम्यक्तन्तुना वेष्टयेद्धि वै।<br>अवगुण्ठ्य तथाभ्युक्ष्य कुशोपरि यथाविधि॥ ४४<br><br>पूर्ववत्प्रणवेनैव पूरयेद्गन्धवारिणा।<br>स्थापयेच्छिवकुम्भाढ्यं वर्धनीं च विधानतः॥ ४५<br><br>मध्यपद्मस्य मध्ये तु सकूर्चं साक्षतं क्रमात्।<br>आवेष्ट्य वस्त्रयुग्मेन प्रच्छाद्य कमलेन तु॥ ४६ | [अब कलशका मान निरूपित किया जाता है—] कलशके उदरका विस्तार बारह अंगुलका वृत्ताकार बताया गया है। उसकी नाभि छः अंगुलकी होनी चाहिये। कलशका कण्ठ दो अंगुल ऊँचा तथा चार अंगुल चौड़ा होना चाहिये। उसका ओष्ठ दो अंगुल ऊँचा तथा निर्गम (जल निकलनेका मार्ग) दो अंगुल प्रमाणका बताया गया है। दिव्य शिवकुम्भ उन-उन प्रमाणोंसे दूने प्रमाणका बताया गया है। कलशको जौके बराबर मोटे सूत्रसे भली-भाँति वेष्टित कर देना चाहिये। इसके बाद अवगुण्ठन तथा अभ्युक्षण करके कुशके ऊपर रखकर विधिपूर्वक पूर्वकी भाँति प्रणवमन्त्रका उच्चारण करके गन्धयुक्त जलसे कलशको पूरित करे और कूर्च तथा अक्षतसहित मध्यपद्मके ऊपर शिवकुम्भको |
| ६९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हैमेन चित्ररत्नेन सहस्रकलशं पृथक्।<br>शिवकुम्भे शिवं स्थाप्य गायत्र्या प्रणवेन च॥ ४७<br><br>विद्महे पुरुषायैव महादेवाय धीमहि।<br>तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ ४८<br><br>मन्त्रेणानेन रुद्रस्य सान्निध्यं सर्वदा स्मृतम्।<br>वर्धन्यां देवि गायत्र्या देवीं संस्थाप्य पूजयेत्॥ ४९<br><br>गणाम्बिकायै विद्महे महातपायै धीमहि।<br>तन्नो गौरी प्रचोदयात्॥ ५० | विधानपूर्वक स्थापित करे तथा खड्गाकार एक वर्धनी भी स्थापित करे। इसके बाद दो वस्त्रोंसे उसे वेष्टित करके स्वर्णरचित अथवा विचित्र रत्नादिसे सज्जित कमलद्वारा आच्छादित करे, इसके बाद उन सहस्र कलशोंको भी पृथक्से आवेष्टित एवं आच्छादित करे। शिवकुम्भमें शिवगायत्री और प्रणवद्वारा शिवकी स्थापना करे।<br><br>'विद्महे पुरुषायैव महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्'*—इस मन्त्रसे सर्वदा रुद्रका सान्निध्य बताया गया है। देवीगायत्रीके द्वारा वर्धनीमें भगवती गौरीकी स्थापना करके उनका पूजन करना चाहिये। 'गणाम्बिकायै विद्महे महातपायै धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात्।'—यह देवीगायत्री है॥ ४९—५०॥ |
| प्रथमावरणे चैव वामाद्याः परिकीर्तिताः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ ५१<br><br>शक्तयः षोडशैवात्र पूर्वाद्यन्तेषु सुव्रत।<br>ऐन्द्रव्यूहस्य मध्ये तु सुभद्रां स्थाप्य पूजयेत्॥ ५२<br><br>भद्रामाग्नेयचक्रे तु याम्ये तु कनकाण्डजाम्।<br>अम्बिकां नैर्ऋते व्यूहे मध्यकुम्भे तु पूजयेत्॥ ५३<br><br>श्रीदेवीं वारुणे भागे वागीशां वायुगोचरे।<br>गोमुखीं सौम्यभागे तु मध्यकुम्भे तु पूजयेत्॥ ५४<br><br>रुद्रव्यूहस्य मध्ये तु भद्रकर्णां समर्च्चयेत्।<br>ऐन्द्राग्निविदिशोर्मध्ये पूजयेदणिमां शुभाम्॥ ५५<br><br>याम्यपावकयोर्मध्ये लघिमां कमले न्यसेत्।<br>राक्षसान्तकयोर्मध्ये महिमां मध्यतो यजेत्॥ ५६<br><br>वरुणासुरयोर्मध्ये प्राप्तिं वै मध्यतो यजेत्।<br>वरुणानिलयोर्मध्ये प्राकाम्यं कमले न्यसेत्॥ ५७<br><br>वित्तेशानिलयोर्मध्ये ईशित्वं स्थाप्य पूजयेत्।<br>वित्तेशेशानयोर्मध्ये वशित्वं स्थाप्य पूजयेत्॥ ५८<br><br>ऐन्द्रेशेशानयोर्मध्ये यजेत्कामावसायकम्।<br>द्वितीयावरणं प्रोक्तं तृतीयावरणं शृणु॥ ५९ | प्रथम आवरणमें वामा आदि शक्तियाँ पहले ही बतायी गयी हैं। प्रथम आवरण कह दिया गया है, अब द्वितीय आवरणके विषयमें सुनिये। हे सुव्रत! पूर्व आदि दिशाओंमें सोलह शक्तियाँ विद्यमान हैं। पूर्व दिशामें सुभद्राकी स्थापना करके उनकी पूजा करनी चाहिये। आग्नेय चक्रमें भद्रा, दक्षिण दिशामें कनकाण्डजा और नैर्ऋत्यकोणमें कुम्भके मध्य अम्बिकाकी पूजा करनी चाहिये। पश्चिम दिशामें श्रीदेवी, वायव्य कोणमें वागीशा तथा उत्तर दिशामें कुम्भके मध्य गोमुखीका पूजन करना चाहिये। ईशानकोणमें भद्रकर्णाकी अर्चना करनी चाहिये। पूर्व दिशा तथा अग्निकोणके मध्यमें मंगलमयी अणिमाकी पूजा तथा दक्षिण दिशा और अग्निकोणके मध्य कमलमें लघिमाकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार दक्षिण और नैर्ऋत्यकोणके मध्यमें महिमाकी पूजा और नैर्ऋत्य तथा पश्चिम दिशाके मध्यमें प्राप्तिकी पूजा करनी चाहिये। पश्चिम दिशा तथा वायव्यकोणके मध्यमें कमलमें प्राकाम्यका न्यास करना चाहिये और वायव्यकोण तथा उत्तर दिशाके मध्य ईशित्वकी स्थापना करके उसका पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् उत्तर और ईशानकोणके मध्य वशित्वका न्यास करके उसका पूजन करना चाहिये और ईशानकोण तथा पूर्व दिशाके |
* तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्—यह रुद्रगायत्री मन्त्र है।