भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६८९

देवदेव जगन्नाथ नमस्ते भुवनेश्वर।<br>जीवच्छ्राद्धं महादेव प्रसादेन विनिर्मितम्॥ ७<br>पूजितश्च ततो देवो दृष्टश्चैव मयाधुना।<br>शक्राय कथितं पूर्वं धर्मकामार्थमोक्षदम्॥ ८<br>जयाभिषेकं देवेश वक्तुमर्हसि मे प्रभो।हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है। हे महादेव! आपकी कृपासे मैंने अपना जीवच्छ्राद्ध कर लिया। मैंने आपकी पूजा की, उससे मुझे इस समय आप प्रभुका दर्शन प्राप्त हुआ है। हे देवेश! आपने प्राचीन कालमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करनेवाले जयाभिषेकका उपदेश इन्द्रको किया था; हे प्रभो! उसे मुझे भी बतानेकी कृपा कीजिये॥ ७-८१/२ ॥
सूत उवाच<br>तस्मै देवो महादेवे भगवानीललोहितः॥ ९<br>जयाभिषेकमखिलमवदत्परमेश्वरः।सूतजी बोले—तदनन्तर नीललोहित भगवान् परमेश्वर महादेवने उन मनुको सम्पूर्ण जयाभिषेकका उपदेश किया॥ ९१/२ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>जयाभिषेकं वक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया॥ १०<br>अपमृत्युजयार्थं च सर्वशत्रुजयाय च।<br>युद्धकाले तु सम्प्राप्ते कृत्वैवमभिषेचनम्॥ ११<br>स्वपतिं चाभिषिच्यैव गच्छेद्योद्धुं रणाजिरे।<br>विधिना मण्डपं कृत्वा प्रपां वा कूटमेव वा॥ १२श्रीभगवान् बोले—राजाओंके हितकी कामनासे, अकाल मृत्युसे बचने तथा सभी शत्रुओंको जीतनेके लिये मैं आपसे जयाभिषेकका वर्णन करूँगा। युद्ध-काल उपस्थित होनेपर यथाविधि जयाभिषेक करके तथा अपने स्वामी राजसेनाधिपतिका अभिषेक करके ही युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें जाना चाहिये॥ १०-१११/२ ॥
नवधा स्थापयेद्वह्निं ब्राह्मणो वेदपारगः।<br>ततः सर्वाभिषेकार्थं सूत्रपातं च कारयेत्॥ १३विधिपूर्वक मण्डप, पानीयशाला तथा निश्चल स्थान बनाकर वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको नौ प्रकारकी वह्निकी स्थापना करनी चाहिये। तदनन्तर सम्पूर्ण अभिषेकके लिये मण्डपमें रेखाकरण करना चाहिये॥ १२-१३॥
प्रागाद्यं वर्णसूत्रं च दक्षिणाद्यं तथा पुनः।<br>सहस्राणां द्वयं तत्र शतानां च चतुष्टयम्॥ १४<br>शेषमेव शुभं कोष्ठं तेषु कोष्ठं तु संहरेत्।<br>बाह्ये वीथ्यां पदं चैकं समन्तादुपसंहरेत्॥ १५पूर्वसे पश्चिम तथा दक्षिणसे उत्तरकी ओर रँगे हुए सूतसे रेखाएँ बनायें, जिससे दो हजार चार सौ कोष्ठ होंगे। सभी शुभ कोष्ठोंको बनाकर उनमेंसे शेष शुभ कोष्ठोंको लेकर बाहरवाली पंक्तिमें सब ओरसे एक-एक पदको ले॥ १४-१५॥
अङ्गसूत्राणि सङ्गृह्य विधिना पृथगेव तु।<br>प्रागाद्यं वर्णसूत्रं च दक्षिणाद्यं तथा पुनः॥ १६<br>प्रागाद्यं दक्षिणाद्यं च षट्त्रिंशत्संहरेत्क्रमात्।<br>प्रागाद्याः पङ्क्तयः सप्त दक्षिणाद्यास्तथा पुनः॥ १७<br>तस्मादेकोनपञ्चाशत्पङ्क्तयः परिकीर्तिताः।<br>नव पङ्क्तीर्हरेन्मध्ये गन्धगोमयवारिणा॥ १८<br>कमलं चालिखेत्तत्र हस्तमात्रेण शोभनम्।<br>अष्टपत्रं सितं वृत्तं कर्णिकाकेसरान्वितम्॥ १९इसके बाद अंगसूत्र लेकर विधिपूर्वक पृथक् प्रागाद्य तथा दक्षिणाद्य रँगा हुआ सूत डालना चाहिये; प्रागाद्य तथा दक्षिणाद्य छत्तीस रेखाएँ बनानी चाहिये। पुनः प्रागाद्य सात पंक्तियाँ और दक्षिणाद्य सात पंक्तियाँ बनाये, इस प्रकार उनचास पंक्तियाँ कही गयी हैं। उसके मध्य भागमें नौ पंक्तियाँ ग्रहण करनी चाहिये। गन्ध तथा गोमययुक्त जलसे लीपकर उसमें एक हाथ
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