भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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६९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| अष्टाङ्गुलप्रमाणेन कर्णिकाहेमसन्निभा।<br>चतुरङ्गुलमानेन केसरस्थानमुच्यते॥ २० | प्रमाणके सुन्दर, अष्टदलोंवाले, श्वेत, गोलाकार तथा कर्णिका-केसरसे युक्त कमलकी रचना करनी चाहिये। कर्णिका आठ अंगुल प्रमाणकी तथा सुवर्णके समान होनी चाहिये; केसरका स्थान चार अंगुल प्रमाणका बताया गया है॥ १६-२०॥ | | धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं च यथाक्रमम्।<br>आग्नेयादिषु कोणेषु स्थापयेत्प्रणवेन तु॥ २१<br>अव्यक्तादीनि वै दिक्षु गात्राकारेण वै न्यसेत्।<br>अव्यक्तं नियतः कालः काली चेति चतुष्टयम्॥ २२<br>सितरक्तहिरण्याभकृष्णा धर्मादयः क्रमात्।<br>हंसाकारेण वै गात्रं हेमाभासेन सुव्रताः॥ २३ | आग्नेय आदि कोणोंमें प्रणव मन्त्रके द्वारा क्रमानुसार धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्यकी स्थापना करनी चाहिये। साथ ही चारों दिशाओंमें अव्यक्त, नियत, काल और कालीको बाह्य पत्राकाररूपमें स्थापित करना चाहिये। हे सुव्रतो! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य—ये चारों क्रमसे श्वेत, रक्त, स्वर्णकी आभावाले तथा कृष्णवर्णवाले होने चाहिये और गात्र (बाह्यपत्र) हंसाकार तथा सुवर्णसदृश होना चाहिये॥ २१-२३॥ | | आधारशक्तिमध्ये तु कमलं सृष्टिकारणम्।<br>बिन्दुमात्रं कलामध्ये नादाकारमतः परम्॥ २४<br>नादोपरि शिवं ध्यायेदोङ्काराख्यं जगद्गुरुम्।<br>मनोन्मनीं च पद्माभां महादेवं च भावयेत्॥ २५ | आधारशक्तिके मध्यमें सृष्टिकारणरूप कमलकी तथा कलामध्यमें बिन्दुमात्र नादाकारकी कल्पना करे; तत्पश्चात् उस नादके ऊपर ओंकारसंज्ञक जगद्गुरु शिवका ध्यान करना चाहिये और मनोन्मनी तथा पद्मकी आभावाले महादेवकी भावना करनी चाहिये। तदनन्तर | | वामादयः क्रमेणैव प्रागाद्याः केसरेषु वै।<br>वामा ज्येष्ठा तथा रौद्री काली विकरणी तथा॥ २६<br>बला प्रमथिनी देवी दमनी च यथाक्रमम्।<br>वामदेवादिभिः सार्धं प्रणवेनैव विन्यसेत्॥ २७ | वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनी—इन वामा आदि आठ शक्तियोंका वामदेव आदि अष्ट शिव-मूर्तियोंके साथ प्रणवके उच्चारणपूर्वक पूर्वादिके क्रमसे केसरोंमें न्यास करना चाहिये॥ २४-२७॥ | | नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने॥ २८<br>रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च।<br>बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च॥ २९<br>मनोन्मनाय देवाय मनोन्मन्यै नमो नमः।<br>मन्त्रैरेतैर्यथान्यायं पूजयेत्परिमण्डलम्॥ ३० | 'नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने॥ रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च। बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च॥ मनोन्मनाय देवाय मनोन्मन्यै नमो नमः।'—इन मन्त्रोंसे विधानके अनुसार परिमण्डलका पूजन करना चाहिये॥ २८-३०॥ | | प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>द्वितीयावरणे चैव शक्तयः षोडशैव तु॥ ३१<br>तृतीयावरणे चैव चतुर्विंशदनुक्रमात्।<br>पिशाचवीथिवैं मध्ये नाभिवीथिः समन्ततः॥ ३२<br>मन्त्रैरेतैर्यथान्यायं पिशाचानां प्रकीर्तिता।<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु पदमष्टारसंयुक्तम्॥ ३३ | प्रथम आवरणका वर्णन कर दिया गया; अब द्वितीय आवरणके विषयमें सुनिये। द्वितीय आवरणमें कुल सोलह शक्तियाँ होती हैं और तृतीय आवरणमें क्रमसे चौबीस शक्तियाँ होती हैं। मध्यमें पिशाचवीथि और चारों ओर नाभिवीथि है; यह पिशाचोंकी वीथि कही गयी है, इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंसे इनकी सम्यक् पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३२ १/२॥ |

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