भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 693, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 693

अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेषु तेषु पृथक्त्वेन पदेषु कमलं क्रमात्।<br>कल्पयेच्छालिनीवारगोधूमैश्च यवादिभिः॥ ३४<br><br>तण्डुलैश्च तिलैर्वाथ गौरसर्षपसंयुतैः।<br>अथवा कल्पयेदेतैैर्यथाकालं विधानतः॥ ३५<br><br>अष्टपत्रं लिखेत्तेषु कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>शालीनामाढकं प्रोक्तं कमलानां पृथक् पृथक्॥ ३६<br><br>तण्डुलानां तदर्धं स्यात्तदर्धं च यवादयः।<br>द्रोणं प्रधानकुम्भस्य तदर्धं तण्डुलाः स्मृताः॥ ३७<br><br>तिलानामाढकं मध्ये यवानां च तदर्धकम्।[अब कलशस्थापनकी विधि बतायी जा रही है—] अष्टकोणीय एक हजार आठ पद वहाँ परिमण्डलमें बनाने चाहिये। तत्पश्चात् उन-उन पदोंमें अलग-अलग क्रमसे कर्णिका तथा केसरसे युक्त अष्टदल कमलको शालि (धान), नीवार, गोधूम, यव, तण्डुल, तिल, श्वेत सर्षप (सरसों)-के द्वारा निर्मित करना चाहिये; अथवा समयसे इनमें जो उपलब्ध हो जाय, उसीसे विधानपूर्वक कमलकी रचना करनी चाहिये। प्रत्येक कमलके लिये शालि-धानका परिमाण एक आढक बताया गया है; तण्डुलका परिमाण उसका आधा और जौ आदिका परिमाण उसका भी आधा होना चाहिये। प्रधान कुम्भका प्रमाण एक द्रोण होना चाहिये। इसके लिये चावल उसका आधा बताया गया है। तिलका परिमाण एक आढक और जौका परिमाण उसका आधा होना चाहिये॥ ३३—३७ १/२॥
अथाम्भसा सम्भ्युक्ष्य कमलं प्रणवेन तु॥ ३८<br><br>तेषु सर्वेषु विधिना प्रणवं विन्यसेत्क्रमात्।<br>एवं समाप्य चाभ्युक्ष्य पदसाहस्रमुत्तमम्॥ ३९<br><br>कलशानां सहस्राणि हैमानि च शुभानि च।<br>उक्तलक्षणयुक्तानि कारयेद्राजतानि वा॥ ४०<br><br>ताम्रजानि यथान्यायं प्रणवेनार्घ्यवारिणा।इस प्रकार कमलकी रचना करके जलसे प्रणवके द्वारा उसका प्रोक्षणकर उन सबमें विधिपूर्वक क्रमसे प्रणवका न्यास करना चाहिये। ऐसा करनेके अनन्तर पवित्र सभी हजार पदोंका प्रोक्षण करके बताये गये लक्षणोंवाले स्वर्ण, रजत या ताम्रके हजार शुभ कलशोंको व्यवस्थित कराना चाहिये और प्रणवका उच्चारण करके अर्घ्य-जलसे प्रोक्षण करना चाहिये॥ ३८—४० १/२॥
द्वादशाङ्गुलविस्तारमुदरे समुदाहृतम्॥ ४१<br><br>वर्तितं तु तदर्धेन नाभिस्तस्य विधीयते।<br>कण्ठं तु द्व्यङ्गुलोत्सेधं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ४२<br><br>ओष्ठं च द्व्यङ्गुलोत्सेधं निर्गमं द्व्यङ्गुलं स्मृतम्।<br>तत्तद्वै द्विगुणं दिव्यं शिवकुम्भे प्रकीर्तितम्॥ ४३<br><br>यवमात्रान्तरं सम्यक्तन्तुना वेष्टयेद्धि वै।<br>अवगुण्ठ्य तथाभ्युक्ष्य कुशोपरि यथाविधि॥ ४४<br><br>पूर्ववत्प्रणवेनैव पूरयेद्गन्धवारिणा।<br>स्थापयेच्छिवकुम्भाढ्यं वर्धनीं च विधानतः॥ ४५<br><br>मध्यपद्मस्य मध्ये तु सकूर्चं साक्षतं क्रमात्।<br>आवेष्ट्य वस्त्रयुग्मेन प्रच्छाद्य कमलेन तु॥ ४६[अब कलशका मान निरूपित किया जाता है—] कलशके उदरका विस्तार बारह अंगुलका वृत्ताकार बताया गया है। उसकी नाभि छः अंगुलकी होनी चाहिये। कलशका कण्ठ दो अंगुल ऊँचा तथा चार अंगुल चौड़ा होना चाहिये। उसका ओष्ठ दो अंगुल ऊँचा तथा निर्गम (जल निकलनेका मार्ग) दो अंगुल प्रमाणका बताया गया है। दिव्य शिवकुम्भ उन-उन प्रमाणोंसे दूने प्रमाणका बताया गया है। कलशको जौके बराबर मोटे सूत्रसे भली-भाँति वेष्टित कर देना चाहिये। इसके बाद अवगुण्ठन तथा अभ्युक्षण करके कुशके ऊपर रखकर विधिपूर्वक पूर्वकी भाँति प्रणवमन्त्रका उच्चारण करके गन्धयुक्त जलसे कलशको पूरित करे और कूर्च तथा अक्षतसहित मध्यपद्मके ऊपर शिवकुम्भको