श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 681, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 681
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण...हवन-विधानका वर्णन [ ६७९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| आयसी त्वभिचारे तु शान्तिके मृन्मयी तु वा।<br>षडङ्गुलं सुविस्तीर्णं पात्राणां मुखमुच्यते॥ ४३<br><br>प्रोक्षणी द्व्यङ्गुलोत्सेधा प्रणीता द्व्यङ्गुलाधिका।<br>आज्यस्थाली ततस्तस्या उत्सेधो द्व्यङ्गुलाधिकः॥ ४४ | प्रयोग नहीं करना चाहिये। अभिचार (जारण, मारण आदि)-कर्ममें लौहकी और शान्तिकर्ममें मृत्तिकाकी आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणीपात्र प्रयुक्त करना चाहिये; इन पात्रोंका मुख छः अँगल चौड़ा होना चाहिये—ऐसा कहा जाता है। प्रोक्षणी दो अँगल ऊँची, प्रणीता चार अँगल ऊँची और आज्यस्थाली उससे भी दो अँगल अधिक अर्थात् छः अँगल ऊँची होनी चाहिये॥ ४१-४४॥ |
| यैः समिद्भिर्हुतं प्रोक्तं तैरेव परिधिर्भवेत्।<br>मध्याङ्गुलपरीणाहा अवक्रा निर्व्रणाः समाः॥ ४५<br><br>द्वात्रिंशदङ्गुलायामास्तिस्रः परिधयः स्मृताः।<br>द्वात्रिंशदङ्गुलायामैस्त्रिंशद्दर्भैः परिस्तरेत्॥ ४६<br><br>चतुरङ्गुलमध्ये तु ग्रथितं तु प्रदक्षिणम्।<br>अभिचारादिकार्येषु शिवाग्न्याधानवर्जितम्॥ ४७<br><br>अकोमलाः स्थिरा विप्र सङ्ग्राह्यास्त्वाभिचारिके।<br>समग्राः सुसमाः स्थूलाः कनिष्ठाङ्गुलसम्मिताः॥ ४८<br><br>अवक्रा निर्व्रणाः स्निग्धा द्वादशाङ्गुलसम्मिताः।<br>समिधस्थं प्रमाणं हि सर्वकार्येषु सुव्रत॥ ४९ | जिन समिधाओंसे हवन बताया गया है, उन्हींसे परिधि बनानी चाहिये। मध्य अँगुलीतुल्य चौड़ी, सीधी व्रणरहित, सम तथा बत्तीस अँगल लम्बी तीन परिधियाँ कही गयी हैं। चार अँगलके बीच प्रदक्षिणक्रमसे ग्रथितरूपसे बत्तीस-बत्तीस अँगल लम्बे तीस कुशोंसे परिस्तरण करना चाहिये। अभिचार आदि कार्योंमें शिवाग्न्याधानसे वर्जित कर्म करना चाहिये। हे विप्र! अभिचारकर्ममें कठोर और दृढ़ समिधाएँ लेनी चाहिये, किंतु शुभ कर्ममें पूर्णरूपसे सम, कनिष्ठा अँगुलीके सदृश मोटी, सीधी, व्रणरहित, कोमल तथा बारह अँगल लम्बी समिधाएँ ग्रहण करनी चाहिये। हे सुव्रत! सभी कार्योंमें समिधाका यही प्रमाण सुनिश्चित किया गया है॥ ४५-४९॥ |
| गव्यं घृतं ततः श्रेष्ठं कापिलं तु ततोऽधिकम्।<br>आहुतीनां प्रमाणं तु स्रुवं पूर्णं यथा भवेत्॥ ५०<br><br>अन्नमक्षप्रमाणं स्याच्छुक्तिमात्रेण वै तिलः।<br>यवानां च तदधं स्यात्फलानां स्वप्रमाणतः॥ ५१<br><br>क्षीरस्य मधुनो दध्नः प्रमाणं घृतवद्भवेत्।<br>चतुःस्रुवप्रमाणेन स्रुचा पूर्णाहुतिर्भवेत्॥ ५२<br><br>तदधं स्विष्टकृत्प्रोक्तं शेषं सर्वमथापि वा।<br>शान्तिकं पौष्टिकं चैव शिवाग्नौ जुहुयात्सदा॥ ५३ | हवनके लिये गोघृत श्रेष्ठ होता है, किंतु कपिला गोका घृत उससे भी श्रेष्ठ माना गया है। आहुतिका प्रमाण उतना ही है, जितनेमें स्रुव पूर्णरूपसे भरा हुआ हो। अन्न (चरु)-का प्रमाण एक अक्ष (कर्ष) तथा तिलका प्रमाण एक शुक्ति (सीप) होना चाहिये। जौका प्रमाण उसका आधा अर्थात् आधी शुक्ति और फलोंका प्रमाण अपने इच्छानुसार होना चाहिये। दुग्ध, मधु और दहीका प्रमाण घृतके बराबर होना चाहिये। चार स्रुवसे स्रुक्को भरकर आहुति देनेसे पूर्णाहुति होती है। उसके आधे अर्थात् दो स्रुव-परिमाणके द्वारा अथवा अवशिष्ट भागद्वारा हवनको स्विष्टकृत् कहा गया है॥ ५०-५२ १/२॥ |
| लौकिकाग्नौ महाभाग मोहनोच्चाटनादयः।<br>शिवाग्निं जनयित्वा तु सर्वकर्मणि सुव्रत॥ ५४ | शान्तिक और पौष्टिक कर्मोंमें सदा शिवाग्निमें ही हवन करना चाहिये, किंतु हे महाभाग! मोहन, उच्चाटन आदि [अभिचार-कर्म]-से सम्बन्धित हवन लौकिकाग्निमें |