श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
| सप्त जिह्वाः प्रकल्प्यैव सर्वकार्याणि कारयेत्।<br>अथवा सर्वकार्याणि जिह्वामात्रेण सिध्यति॥ ५५<br><br>शिवाग्निरिति विप्रेन्द्रा जिह्वामात्रेण साधकः॥ ५६<br><br>ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा॥ ५७<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा॥ ५८<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा॥ ५९<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा॥ ६०<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा॥ ६१<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा॥ ६२<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा॥ ६३<br><br>ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा॥ ६४<br><br>एतावद्वह्निheaderसंस्कारमथवा वह्निकर्मसु।<br>नैमित्तिके च विधिना शिवाग्निं कारयेत्पुनः॥ ६५<br><br>निरीक्षणं प्रोक्षणं ताडनं च षष्ठेन फडन्तेन अभ्युक्षणं चतुर्थेन खननोट्किरणं षष्ठेन पूरणं समीकरणमाद्येन सेचनं वौषडन्तेन कुट्टनं षष्ठेन सम्मार्जनोपलेपने तुरीयेण कुण्डपरिकल्पनं निवृत्या त्रिभिरेव कुण्डपरिधानं चतुर्थेन कुण्डार्चनमाद्येन रेखाचतुष्टयसम्पादनं षष्ठेन फडन्तेन वज्रीकरणं चतुष्पदापादनमाद्येन एवं कुण्डसंस्कारमष्टादशविधम्॥ ६६ | होते हैं। हे सुव्रत! समस्त कर्मोंमें शिवाग्नि उत्पन्न करके सात जिह्वाओंकी कल्पना करके ही सभी कार्य करने चाहिये अथवा शिवाग्नि जिह्वामात्रसे ही सिद्ध हो जाती है, अतः हे विप्रेन्द्रो! साधकको चाहिये कि जिह्वामात्रसे ही समस्त कार्य सम्पन्न करे॥ ५३—५६॥<br><br>[सात जिह्वाओंका स्वरूप इस प्रकार बताया जाता है—] ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा।<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा।<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा।<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा।<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा—ये सात जिह्वारूप मन्त्र हैं और ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा—यह प्रधान मन्त्र है॥ ५७—६४॥<br><br>इस विधिसे वह्निसंस्कार करना चाहिये। अथवा वह्निकार्योंमें और नैमित्तिक कर्ममें विधिपूर्वक शिवाग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। [उसकी विधि इस प्रकार है—] फडन्त षष्ठ मन्त्रसे निरीक्षण, प्रोक्षण और ताड़न; चतुर्थ मन्त्रसे अभ्युक्षण; षष्ठ मन्त्रसे खनन तथा उत्किरण; आद्यमन्त्रसे पूरण तथा समीकरण; वौषडन्त आद्यमन्त्रसे सेचन; षष्ठ मन्त्रसे कुट्टन; तुरीय (चतुर्थ) मन्त्रसे सम्मार्जन तथा उपलेपन; अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन तीन मन्त्रोंसे कुण्डपरिकल्पन; चतुर्थ मन्त्रसे कुण्डका परिधान (मेखलाकरण); आद्य (प्रथम) मन्त्रसे कुण्डका अर्चन फडन्त षष्ठ मन्त्रसे रेखाचतुष्टयकरण और प्रथम मन्त्रसे वज्रीकरण और ऐन्द्रागण आदि चारों देवोंका स्थापन प्रथम मन्त्रसे—इस प्रकार अठारह प्रकारके इन कुण्डसंस्कारोंको करना |