श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६८० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
| सप्त जिह्वाः प्रकल्प्यैव सर्वकार्याणि कारयेत्।<br>अथवा सर्वकार्याणि जिह्वामात्रेण सिध्यति॥ ५५<br><br>शिवाग्निरिति विप्रेन्द्रा जिह्वामात्रेण साधकः॥ ५६<br><br>ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा॥ ५७<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा॥ ५८<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा॥ ५९<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा॥ ६०<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा॥ ६१<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा॥ ६२<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा॥ ६३<br><br>ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा॥ ६४<br><br>एतावद्वह्निheaderसंस्कारमथवा वह्निकर्मसु।<br>नैमित्तिके च विधिना शिवाग्निं कारयेत्पुनः॥ ६५<br><br>निरीक्षणं प्रोक्षणं ताडनं च षष्ठेन फडन्तेन अभ्युक्षणं चतुर्थेन खननोट्किरणं षष्ठेन पूरणं समीकरणमाद्येन सेचनं वौषडन्तेन कुट्टनं षष्ठेन सम्मार्जनोपलेपने तुरीयेण कुण्डपरिकल्पनं निवृत्या त्रिभिरेव कुण्डपरिधानं चतुर्थेन कुण्डार्चनमाद्येन रेखाचतुष्टयसम्पादनं षष्ठेन फडन्तेन वज्रीकरणं चतुष्पदापादनमाद्येन एवं कुण्डसंस्कारमष्टादशविधम्॥ ६६ | होते हैं। हे सुव्रत! समस्त कर्मोंमें शिवाग्नि उत्पन्न करके सात जिह्वाओंकी कल्पना करके ही सभी कार्य करने चाहिये अथवा शिवाग्नि जिह्वामात्रसे ही सिद्ध हो जाती है, अतः हे विप्रेन्द्रो! साधकको चाहिये कि जिह्वामात्रसे ही समस्त कार्य सम्पन्न करे॥ ५३—५६॥<br><br>[सात जिह्वाओंका स्वरूप इस प्रकार बताया जाता है—] ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा।<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा।<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा।<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा।<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा—ये सात जिह्वारूप मन्त्र हैं और ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा—यह प्रधान मन्त्र है॥ ५७—६४॥<br><br>इस विधिसे वह्निसंस्कार करना चाहिये। अथवा वह्निकार्योंमें और नैमित्तिक कर्ममें विधिपूर्वक शिवाग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। [उसकी विधि इस प्रकार है—] फडन्त षष्ठ मन्त्रसे निरीक्षण, प्रोक्षण और ताड़न; चतुर्थ मन्त्रसे अभ्युक्षण; षष्ठ मन्त्रसे खनन तथा उत्किरण; आद्यमन्त्रसे पूरण तथा समीकरण; वौषडन्त आद्यमन्त्रसे सेचन; षष्ठ मन्त्रसे कुट्टन; तुरीय (चतुर्थ) मन्त्रसे सम्मार्जन तथा उपलेपन; अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन तीन मन्त्रोंसे कुण्डपरिकल्पन; चतुर्थ मन्त्रसे कुण्डका परिधान (मेखलाकरण); आद्य (प्रथम) मन्त्रसे कुण्डका अर्चन फडन्त षष्ठ मन्त्रसे रेखाचतुष्टयकरण और प्रथम मन्त्रसे वज्रीकरण और ऐन्द्रागण आदि चारों देवोंका स्थापन प्रथम मन्त्रसे—इस प्रकार अठारह प्रकारके इन कुण्डसंस्कारोंको करना |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण-हवन-विधानका वर्णन ६८१
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डसंस्कारानन्तरमक्षपाटनं षष्ठेन विष्टरन्यासमाद्येन<br>वज्रासने वागीश्वर्यावाहनम्॥ ६७<br><br>ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं<br>यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमा-<br>वाहयामि॥ ६८<br><br>ॐ वागीश्वरीं पूजयामि॥ ६९<br><br>ॐ पुनर्वागीश्वरावाहनम्॥ ७०<br><br>एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं<br>परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषित-<br>मावाहयामि॥ ७१<br><br>ॐ ईं वागीश्वराय नमः। आवाहनस्थापन-<br>सन्निधानसन्निरोधपूजान्तं वागीश्वरीं सम्भाव्य<br>गर्भाधानवह्निसंस्कारम्॥ ७२ | चाहिये॥ ६५-६६॥<br><br>कुण्डसंस्कारके पश्चात् षष्ठ मन्त्रसे अक्षपाटन और प्रथम मन्त्रसे विष्टरन्यास करके वज्रासन (हीरेके आसन)-पर भगवती वागीश्वरीका आवाहन करना चाहिये। [वागीश्वरीके आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—] ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमावाहयामि। वागीश्वरीं पूजयामि। इसके अनन्तर वागीश्वरका आवाहन करना चाहिये। [मन्त्र इस प्रकार है—] एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषितमावाहयामि। ॐ ईं वागीश्वराय नमः। इस प्रकार आवाहन, स्थापन, सन्निधान तथा सन्निरोध पूजापर्यन्त करके वागीश्वरीको सत्कृतकर गर्भाधान, वह्निसंस्कार करना चाहिये॥ ६७—७२॥ |
| अरणीजनितं कान्तोद्भवं वा अग्निहोत्रजं वा ताम्रपात्रे<br>शरावे वा आनीय निरीक्षणताडनाभ्युक्षणप्रक्षालन-<br>माद्येन क्रव्यादाशिवपरित्यागोऽपि प्रथमेन<br>वह्नेस्त्रैकारणं जठरभ्रूमध्यादावाह्याग्निं<br>वैकारणामूर्तावाग्नेयेन उद्दीपनमाद्येन पुरुषेण संहितया<br>धारणा धेनुमुद्रां तुरीयेणावगुण्ठ्य जानुभ्यामवनिं<br>गत्वा शरावोत्थापनं कुण्डोपरि निधाय<br>प्रदक्षिणामावर्त्य तुरीयेणात्मसम्मुखां वागीश्वरीं<br>गर्भनाड्यां गर्भाधानान्तरीयेण कमलप्रदानमाद्येन<br>वौषडन्तेन कुशार्घ्यं दत्त्वा इन्धनप्रदानमाद्येन प्रज्वालनं<br>गर्भाधानं च सद्येनाद्येन पूजनं पुंसवनं वामेन पूजनं<br>द्वितीयेन सीमन्तोन्नयनमघोरेण तृतीयेन पूजनम्॥ ७३ | [संस्कारविधि इस प्रकार है—] अरणीसे उत्पन्न, सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अथवा अग्निहोत्रसे उत्पन्न अग्निको ताम्रपात्र या मिट्टीके शराव (कसोरा)-में लाकर आद्यमन्त्रसे निरीक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण तथा प्रक्षालन करके पुनः आद्य मन्त्रसे ही क्रव्यादंश तथा अशिवका परित्यागकर जठर और भ्रूमध्यसे वह्निके त्रैकारण (त्रिवर्गसाधन)-का आवाहन करके उस आवाहित मूर्तिमें वह्निमन्त्रसे उद्दीपन करके तत्पुरुषमन्त्रसहित आद्यमन्त्रके द्वारा धारणा तथा संहितामन्त्रसे धेनुमुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। तत्पश्चात् चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करके दोनों घुटनोंको भूमिपर टेककर कसोरेको उठाकर कुण्डके ऊपर रखकर चतुर्थ मन्त्रसे प्रदक्षिणक्रमसे चारों ओर घुमाकर अपने सम्मुख विराजमान वागीश्वरीका ध्यान करके गर्भनालमें गर्भाधानकी रीतिसे वौषडन्त आद्यमन्त्रसे कमल प्रदान करके कुशार्घ्य देकर तथा प्रथम मन्त्रसे ईंधन देकर सद्योजातमन्त्रसे प्रज्वालन तथा गर्भाधान करना चाहिये। तदनन्तर प्रथम सद्योजातमन्त्रसे पूजन, वामदेवमन्त्रसे पुंसवन, उसी द्वितीय मन्त्रसे पुनः पूजन, अघोरमन्त्रसे सीमन्तोन्नयन और पुनः उसी तृतीय मन्त्रसे पूजन करना चाहिये॥ ७३॥ |
| ६८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| अवयवव्याप्तिर्वक्त्रोद्घाटनं वक्त्रनिष्कृतिरिति<br>तृतीयेन गर्भजातकर्मपुरुषेण पूजनं तुरीयेण षष्ठेन<br>प्रोक्षणं सूतकशुद्धये चाग्निसूनुरक्षाकुशास्त्रेण वक्त्रे-<br>णाऽग्नौ मूलमीशाग्रं नैर्ऋतिमूलं वायव्याग्रं वायव्य-<br>मूलमीशाग्रमिति कुशास्तरणमिति पूर्वोक्तमिध्ममग्र-<br>मूलघृताक्तं लालापनोदाय षष्ठेन जुहुयात्॥ ७४ | अंगोंकी व्याप्ति, वक्त्रोद्घाटन और वक्त्रनिष्कृति तृतीय मन्त्रसे करना चाहिये। गर्भजातकर्म तत्पुरुषमन्त्रसे, पूजन चतुर्थ मन्त्रसे, सूतकशुद्धिके लिये प्रोक्षण षष्ठ मन्त्रसे और अग्निरूप पुत्रकी रक्षा कुशास्त्र मन्त्रसे करे। तत्पश्चात् वक्त्रमन्त्रसे अग्निकोणमें कुशमूल, ईशानमें कुशका अग्रभाग, नैर्ऋत्यमें कुशमूल, वायव्यमें अग्रभाग, वायव्यमें कुशमूल और ईशानमें अग्रभाग—इस भाँति पूर्वोक्त रीतिसे कुशास्तरण करके घृतमें भींगी हुई समिधाका अग्निकी लालानिवृत्तिके लिये षष्ठ मन्त्रसे हवन करना चाहिये॥ ७४॥ | | पञ्चपूर्वातिक्रमेण परिधिविष्टरन्यासोऽपि आद्येन<br>विष्टरोपरि हिरण्यगर्भहरनारायणानपि पूजयेत्॥ ७५<br><br>इन्द्रादिलोकपालांश्च पूजयेत्॥ ७६<br><br>वज्रावर्तपर्यन्तानपि पूजयेत्॥ ७७<br><br>वागीश्वरवागीश्वरीपूजाद्येनमुद्रास्य हुतं विसर्ज-<br>येत्॥ ७८ | वामदेव आदि चार मन्त्रोंसे परिधियुक्त विष्टरका स्थापन करके आद्यमन्त्रसे विष्टरके ऊपर ब्रह्मा, शिव तथा नारायणका पूजन करना चाहिये। इसी प्रकार इन्द्र आदि लोकपालों तथा वज्रसे लेकर त्रिशूलपर्यन्त उनके आठ आयुधोंकी भी पूजा करनी चाहिये। वागीश्वर तथा वागीश्वरीकी पूजा आदि करके इन वागीश्वरका उद्वासनकर होमद्रव्यका हवन करना चाहिये॥ ७५—७८॥ | | स्रुक्स्रुवसंस्कारमथो निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत् स्रुक् स्रुवं च हस्तद्वये गृहीत्वा<br>संस्थापनमाद्येन ताडनमपि स्रुक्स्रुवोपरि<br>दर्भानुलेखनमूलमध्यमाग्रेण त्रित्वेन स्रुक्शक्तिं<br>स्रुवमपि शम्भुं दक्षिणपार्श्वे कुशोपरि शक्तये नमः<br>शम्भवे नमः॥ ७९ | इसके पश्चात् स्रुक्-स्रुवका संस्कार बताया जाता है—पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करके दोनों हाथोंमें स्रुक्-स्रुव ग्रहणकर प्रथम मन्त्रसे संस्थापन तथा ताड़न करके स्रुक्-स्रुवके ऊपर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे तीन प्रकारसे अनुलेखन करके स्रुक्को शक्ति और स्रुवको शिव मानकर उन्हें दक्षिण भागमें कुशके ऊपर 'शक्तये नमः', 'शम्भवे नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा स्थापित करना चाहिये॥ ७९॥ | | ततो ह्यन्तिसूत्रेण स्रुक्स्रुवौ तुरीयेण<br>वेष्टयेदर्चयेच्च॥ ८०<br><br>धेनुमुद्रां दर्शयित्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय स्रुक्स्रुवसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः॥ ८१ | तदनन्तर समीपवर्ती सूत्रसे स्रुक्-स्रुवको चतुर्थ मन्त्रका उच्चारण करके वेष्टित करना चाहिये और पुनः अर्चन करना चाहिये। इसके बाद धेनुमुद्रा दिखाकर चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षाकर्म सम्पन्न करके स्रुक्-स्रुव संस्कार करना चाहिये॥ ८०–८१॥ | | पुनराज्यसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत्॥ ८२ | आज्यसंस्कार पूर्वमें बताया गया है, पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करना चाहिये। | | आज्यप्रतापनमैशान्यां वा षष्ठेन वेद्युपरि विन्यस्य<br>घृतपात्रं वितस्तिमात्रं कुशपवित्रं वामहस्ताङ्गुष्ठा- | इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे ईशानकोणमें घृतको तपाकर घृतपात्रको वेदीके ऊपर रखकर वितस्तिमात्र (बारह |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६८३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नामिकाग्रं गृहीत्वा दक्षिणाङ्गुष्ठानामिकामूलं गृही-<br>त्वाग्निज्वलोत्प्लवनं स्वाहान्तेन तुरीयेण पुनः षड्<br>दर्भान् गृहीत्वा पूर्ववत्स्वात्मसम्प्लवनं स्वाहान्तेनाद्येन<br>कुशद्वयपवित्रबन्धनं चाद्येन घृते न्यशेदिति पवित्री-<br>करणम्॥ ८३ | अंगुल) कुशाके पवित्रकका अग्रभाग अपने वाम<br>हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे ग्रहण करके तथा<br>दक्षिण हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे पवित्रकका<br>मूल ग्रहण करके स्वाहान्त चतुर्थ मन्त्रसे अग्निज्वालाका<br>उत्प्लवन करना चाहिये। इसके बाद छः कुश लेकर<br>स्वाहान्त प्रथम मन्त्रसे पूर्वकी भाँति अपने देहमें<br>सम्प्लवन करके दो कुशोंका पवित्रक बनाकर प्रथम<br>मन्त्रसे उसे घृतमें डाल देना चाहिये—यह पवित्रीकरण<br>है॥ ८२-८३॥ |
| दर्भद्वयं प्रगृह्याग्निप्रज्वालनं घृतं त्रिधा वर्तयेत्।<br>सम्प्रोक्ष्याग्नौ निधापयेदिति नीराजनम्॥ ८४ | घृतप्लुत दो दर्भ लेकर उसे प्रज्वलित करके<br>घृतके ऊपर तीन बार घुमाये और पुनः सम्प्रोक्षण करके<br>अग्निमें डाल दे—यह नीराजन है। पुनः दर्भोंको लेकर<br>कीट आदि देख करके अर्घ्यजलसे सम्प्रोक्षण करके<br>दर्भोंको अग्निमें डाल देना चाहिये—यह अवद्योतन है।<br>दो दर्भ लेकर अग्निमें प्रज्वलित करके घृतको देखे—<br>यह निरीक्षण है॥ ८४-८६॥ |
| पुनर्दर्भान् गृहीत्वा कीटकादि निरीक्ष्यार्घ्येण सम्प्रोक्ष्य<br>दर्भानग्नौ निधाय इत्यवद्योतनम्॥ ८५ | |
| दर्भद्वयं गृहीत्वाग्निज्वल्य घृतं निरीक्षयेत्॥ ८६ | |
| दर्भेण गृहीत्वा तेनाग्रद्वयेन शुक्लपक्षद्वयेनाद्येनेति<br>कृष्णपक्षसम्पातनं घृतं त्रिभागेन विभज्य<br>स्रुवेणैकभागेनाज्येनाग्नये स्वाहा द्वितीयेनाज्येन<br>सोमाय स्वाहा आज्येन ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा<br>आज्येनाग्नये स्विष्टकृते स्वाहा॥ ८७ | इसके बाद अन्य दर्भके साथ दो पवित्रक लेकर<br>उनमें शुक्लपक्षद्वयकी भावना करे तथा उन दोनोंके<br>सहित घृतको सद्योजातमन्त्रसे पृथक् कर दे, शेषको<br>कृष्णपक्षकी भावनासे पृथक् करे; इस प्रकार घीको तीन<br>भागोंमें विभक्त करके स्रुवद्वारा घृतके एक भागको<br>‘अग्नये स्वाहा’, घृतके द्वितीय भागको ‘सोमाय<br>स्वाहा’ और घृतके तृतीय भागको ‘अग्नीषोमाभ्यां<br>स्वाहा’ तथा अवशिष्ट घृतको ‘अग्नये स्विष्टकृते<br>स्वाहा’—ऐसा कहकर होम करे॥ ८७॥ |
| पुनः कुशेन गृहीत्वा संहिताभिमन्त्रेण<br>नमोऽन्तेनाभिमन्त्रयेत्॥ ८८ | तत्पश्चात् कुशयुक्त पवित्रक लेकर अन्तमें नमः<br>लगाकर संहिता मन्त्रसे घृतको अभिमन्त्रित करना<br>चाहिये। |
| अभिमन्त्र्य धेनुमुद्राप्रदर्शनकवचावगुण्ठनास्त्रेण<br>रक्षाम्। अथ संस्कृते निधापयेद् आज्यसंस्कारः॥ ८९ | अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्रा प्रदर्शित करे।<br>कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्रमन्त्रसे रक्षण करना<br>चाहिये, इसके बाद संस्कारित पवित्रकोंको अग्निमें<br>डाल देना चाहिये—यह आज्यसंस्कार है॥ ८८-८९॥ |
| आज्येन स्रुग्वदनेन चक्राभिधारणं शक्तिबीजादी-<br>शानमूर्तये स्वाहा। पूर्ववत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा<br>अघोरहृदयाय स्वाहा वामदेवाय गुह्याय स्वाहा<br>सद्योजातमूर्तये स्वाहा। इति वक्त्रोद्घाटनम्॥ ९० | स्रुवमें भरकर लिये गये घृतसे शक्तिबीजमन्त्र<br>(ह्रीं)-के द्वारा आहुति दे—यह चक्राभिधारण है। इसके<br>बाद ईशानमूर्तये स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा,<br>अघोरहृदाय स्वाहा, वामदेवगुह्याय स्वाहा, |
| ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा तत्पुरुषवक्त्राय<br>अघोरहृदयाय स्वाहा अघोरहृदाय वामगुह्याय |
| ६८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सद्योजातमूर्तये स्वाहा इति वक्त्रसन्धानम्॥ ९१<br><br>ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदाय<br>वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा इति<br>वक्त्रैक्यकरणम्॥ ९२ | सद्योजातमूर्तये स्वाहा—इन [पाँच] मन्त्रोंसे आहुति दे—यह वक्त्रोद्घाटन है। ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय अघोरहृदाय स्वाहा, अघोरहृदाय वामगुह्याय सद्योजातमूर्तये स्वाहा—इन मन्त्रोंसे आहुति दे—यह वक्त्रसन्धान है। ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदाय वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा—इस मन्त्रसे आहुति दे—यह वक्त्रैक्यकरण है॥ ९०–९२॥ |
| शिवाग्निं जनयित्वैवं सर्वकर्माणि कारयेत्।<br>केवलं जिह्वया वापि शान्तिकाद्यानि सर्वदा॥ ९३<br><br>गर्भाधानादिकार्येषु वह्नेः प्रत्येकमव्यय।<br>दश आहुतयो देया योनिबीजेन पञ्चधा॥ ९४ | इस प्रकार शिवाग्नि उत्पन्न करके समस्त कार्य सम्पन्न करने चाहिये अथवा केवल अग्निजिह्वासे भी शान्तिक आदि कार्य सदा करने चाहिये। हे अव्यय! गर्भाधान आदि प्रत्येक संस्कारोंमें योनिबीजसे अग्निमें दस-दस या पाँच-पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये॥ ९३-९४॥ |
| शिवाग्नौ कल्पयेद्दिव्यं पूर्ववत्परमासनम्।<br>आवाहनं तथा न्यासं यथा देवे तथार्चनम्॥ ९५<br><br>मूलमन्त्रं सकृज्जप्त्वा देवदेवं प्रणम्य च।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा सगर्भं सर्वसम्मतम्॥ ९६<br><br>परिक्षेचनपूर्वं च तदिध्ममभिघार्य च।<br>जुहुयादग्निमध्ये तु ज्वलितेऽथ महामुने॥ ९७ | शिवाग्निमें पूर्वकी भाँति परम दिव्य आसन कल्पित करना चाहिये और उसपर देवका आवाहन, स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। हे महामुने! मूलमन्त्रका एक बार जप करके देवदेवको प्रणामकर फिर तीन बार सर्वसम्मत सगर्भ प्राणायाम करके परिक्षेचनपूर्वक उस समिधाको आधारहोमको उद्देश्य करके प्रज्वलित अग्निके मध्यमें हवन करना चाहिये॥ ९५–९७॥ |
| आघारावपि चाधाय चाज्येनैव तु षण्मुखे।<br>आज्यभागौ तु जुहुयाद्विधिनैव घृतेन च॥ ९८<br><br>चक्षुषी चाज्यभागौ तु चाग्नये च तथोत्तरे।<br>आत्मनो दक्षिणे चैव सोमायेति द्विजोत्तम॥ ९९<br><br>प्रत्यङ्मुखस्य देवस्य शिवाग्नेर्ब्रह्मणः सुत।<br>अक्षि वै दक्षिणं चैव चोत्तरं चोत्तरं तथा॥ १००<br><br>दक्षिणं तु महाभाग भवत्येव न संशयः।<br>आज्येनाहुतयस्तत्र मूलेनैव दशैव तु॥ १०१ | स्रुवमें दो-दो आधारहोम-निमित्तक तथा आज्यभाग-होमनिमित्तक आहुतियाँ लेकर विधिपूर्वक सद्योजात आदि छः मन्त्ररूप मुखवाली अग्निमें उनका हवन करना चाहिये। हे द्विजश्रेष्ठ! अग्नये स्वाहा—ऐसा कहकर अपने उत्तरमें एवं सोमाय स्वाहा—ऐसा कहकर अपने दक्षिणमें नेत्रस्वरूप दोनों आज्यभागोंकी आहुतियाँ देनी चाहिये। हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! हे महाभाग! पश्चिमकी ओर मुखवाले शिवाग्निरूप महादेवका दाहिना नेत्र उत्तरकी ओर तथा बायाँ नेत्र दक्षिणकी ओर होता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ९८–१०० १/२॥ |
| चरुणा च यथावद्धि समिद्भिश्च तथा स्मृतम्।<br>पूर्णाहुतिं ततो दद्यान्मूलमन्त्रेण सुव्रत॥ १०२<br><br>सर्वावरणदेवानां पञ्चपञ्चैव पूर्ववत्।<br>ईशानादिक्रमेणैव शक्तिबीजक्रमेण च॥ १०३ | घृत, चरु तथा समिधाओंसे मूलमन्त्रके द्वारा यथाविधि दस आहुतियाँ देनी चाहिये—ऐसा कहा गया है। हे सुव्रत! तदनन्तर मूल मन्त्रसे पूर्णाहुति प्रदान करनी चाहिये। ईशान आदि मन्त्रोंके क्रमसे तथा |
२६- शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य
| अध्याय २६ ] | शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य | ६८५ |
|---|
| प्रायश्चित्तमघोरेण स्विष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम्।<br>त्रिप्रकारं मया प्रोक्तमग्निकार्यं सुशोभनम्॥ १०४ | शक्तिबीज (ह्रीँ)-के क्रमसे सभी आवरण देवताओंके लिये पूर्वकी भाँति पाँच-पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। अघोरमन्त्रसे प्रायश्चित्तहोम तथा स्विष्टकृत्पर्यन्त पूर्वकी भाँति कहा गया है। इस प्रकार मैंने अत्यन्त सुन्दर तीन प्रकारके अग्निकार्यका वर्णन कर दिया॥ १०१-१०४॥ | | यथावसरमेवं हि कुर्यान्नित्यं महामुने।<br>जीवितान्ते लभेत्स्वर्गं लभते अग्निदीपनम्॥ १०५ | हे महामुने! जो [मनुष्य] यथासमय नित्य इसे करता है, वह मृत्युके अनन्तर स्वर्ग प्राप्त करता है, अग्निके समान दीप्ति प्राप्त करता है। किसी भी प्रकारके कर्मके लिये उसे नरककी प्राप्ति नहीं होती है। त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम)-की इच्छावाला अहिंसक (परनाशशून्य) होम करे और मुक्तिकी इच्छावाला शिवाग्निको अपने हृदयमें स्थित समझकर चिन्तन करे एवं ध्यानयज्ञके द्वारा हवन करे। सभी प्राणियोंके देहमें स्थित तथा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी उन शिवको जानकर प्राणायामके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिदिन हवन करना चाहिये। शिवध्यानसे रहित होकर होम करनेवाला पाषाणमें मेढक होता है॥ १०५-१०८॥ | | नरकं चैव नाप्नोति यस्य कस्यापि कर्मणः।<br>अहिंसकं चरेद्धोमं साधको मुक्तिकाङ्क्षकः॥ १०६ | | | हृदिस्थं चिन्तयेदग्निं ध्यानयज्ञेन होमयेत्।<br>देहस्थं सर्वभूतानां शिवं सर्वजगत्पतिम्॥ १०७ | | | तं ज्ञात्वा होमयेद्भक्त्या प्राणायामेन नित्यशः।<br>बाह्यहोमप्रदाता तु पाषाणे दर्दुरो भवेत्॥ १०८ | |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाग्निकार्यवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः॥ २५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवाग्निकार्यवर्णन' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
छब्बीसवाँ अध्याय
शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
|---|---|
| अथवा देवमीशानं लिङ्गे सम्पूजयेच्छिवम्।<br>ब्राह्मणः शिवभक्तश्च शिवध्यानपरायणः॥ १<br>अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>उद्धूलयेद्वि सर्वाङ्गमापादतलमस्तकम्॥ २<br>आचामेद्ब्रह्मतीर्थेन ब्रह्मसूत्री ह्युदङ्मुखः।<br>अथों नमः शिवायेति तनुं कृत्वात्मनः पुनः॥ ३<br>देवं च तेन मन्त्रेण पूजयेत्प्रणवेन च।<br>सर्वस्मादधिका पूजा अघोरेशस्य शूलिनः॥ ४ | [हे सनत्कुमार!] शिवभक्त ब्राह्मणको चाहिये कि भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होकर शिवलिङ्गमें परमेश्वर शिवका विधिवत् पूजन करे। 'अग्निरिति०'—इस मन्त्रसे अग्निहोत्रजन्य भस्म लेकर पादतलसे मस्तकपर्यन्त सभी अंगोंमें उसे लगाये। इसके बाद उत्तराभिमुख हो ब्रह्मसूत्री होकर ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। तत्पश्चात् 'ॐ नमः शिवाय'—इस मन्त्रसे अपने देहको शुद्ध करके मूलमन्त्र तथा प्रणवसे शिवका पूजन करना चाहिये; अघोरेश्वर शिवकी पूजा सबसे बढ़कर है॥ १-४॥ |
| सामान्यं यजनं सर्वमग्निकार्यं च सुव्रत।<br>मन्त्रभेदः प्रभोस्तस्य अघोरध्यानमेव च॥ ५ | हे सुव्रत! समस्त पूजन तथा अग्निकार्य पूर्वकी भाँति हैं। उन प्रभुके मन्त्रोंमें भेद तथा भगवान् अघोरका |
| ६८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक / मन्त्र | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।<br>सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ ६<br><br>अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदयाय नमः। अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा। घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट्। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो पिङ्गलकवचाय हुम्। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट्। सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट्।<br><br>स्नात्वाचम्य तनुं कृत्वा समभ्युक्ष्याघमर्षणम्।<br>तर्पणं विधिना चार्घ्यं भानवे भानुपूजनम्॥ ७ | ध्यान अब कहा जायगा। मन्त्र इस प्रकार है—<br>अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः। अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदाय नमः। अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा। घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट्। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्योः पिङ्गलकवचाय हुम्। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट्। सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट्—[इन छः मन्त्रोंसे अंगन्यास करे]। पूजाविधि इस प्रकार है—स्नान करके आचमनकर शरीरका मार्जन, अघमर्षण, तर्पण, विधिपूर्वक सूर्यार्घ्य तथा सूर्यपूजन पूर्वकी भाँति करे; अघोर पूजामें केवल मन्त्रका भेद है॥ ५-७॥ |
| समं चाघोरपूजायां मन्त्रमात्रेण भेदितम्।<br>मार्गशुद्धिस्तथा द्वारि पूजां वास्त्वधिपस्य च॥ ८<br><br>कृत्वा करं विशोध्याग्रे स शुभासनमास्थितः।<br>नासाग्रकमले स्थाप्य दग्धाक्षः क्षुभिकाग्निना॥ ९<br><br>वायुना प्रेर्य तद्भस्म विशोध्य च शुभाम्भसा।<br>शक्त्यामृतमये ब्रह्मकलां तत्र प्रकल्पयेत्॥ १० | मार्गशुद्धि, द्वारपूजा तथा वास्तुपतिकी पूजा करके पूजकको चाहिये कि पवित्र आसनपर बैठ जाय और सर्वप्रथम हाथ शुद्ध करके नासाग्रके पास करकमलमें भस्म स्थापित करके क्षुभिकाग्नि (विरक्तिरूप अग्नि)-से समस्त विषयोंको दग्ध करके उस भस्मको वायुसे प्रेरितकर पवित्र जलसे उसका शोधनकर ब्रह्ममय उस भस्ममें शक्तिसहित ब्रह्मकलाकी भावना करे॥ ८-१०॥ |
| अघोरं पञ्चधा कृत्वा पञ्चाङ्गसहितं पुनः।<br>इत्थं ज्ञानक्रियामेवं विन्यस्य च विधानतः॥ ११<br><br>न्यासस्त्रिनेत्रसहितो हृदि ध्यात्वा वरासने।<br>नाभौ वह्निगतं स्मृत्वा भ्रूमध्ये दीपवत्प्रभुम्॥ १२ | अघोरमन्त्रको पाँच भागोंमें विभक्त करके उसे पंचांगभस्मविलेपनयुक्त करना चाहिये। इस प्रकार ज्ञानयुक्त क्रियाका विधानपूर्वक न्यास करके अघोरमूर्तिसहित न्यास करना चाहिये और हृदयमें श्रेष्ठ आसनपर विराजमानरूपमें ध्यान करके नाभिमें अग्निके मध्य स्थित स्मरण करके भ्रूमध्यमें दीपशिखाके आकारवाले प्रभुका चिन्तन करना चाहिये॥ ११-१२॥ |
| शान्त्या बीजाङ्कुरानन्तधर्माद्यैरपि संयुते।<br>सोमसूर्याग्निसम्पन्ने मूर्तित्रयसमन्विते॥ १३<br><br>वामादिभिश्च सहिते मनोन्मन्याप्यधिष्ठिते।<br>शिवासनेतमूर्तिस्थमक्षयाकाररूपिणम् ॥ १४<br><br>अष्टत्रिंशत्कलादेहं त्रितत्त्वसहितं शिवम्।<br>अष्टादशभुजं देवं गजचर्मोत्तरीयकम॥ १५ | शान्तिसहित बीज, अंकुर, अनन्त तथा धर्म आदिसे युक्त, सोम, सूर्य तथा अग्निसे सम्पन्न, तीन मूर्तियोंसे समन्वित; वामा आदि आठ शक्तियोंसे संयुक्त तथा मनोन्मनीसे भी अधिष्ठित शिवासनपर अघोरमूर्ति परमेश्वर शिवका इस प्रकार ध्यान करे कि वे आत्ममूर्तिमें स्थित हैं, अक्षयाकार स्वरूप हैं, अड़तीस कलाओंसे परिपूर्ण विग्रहवाले हैं, तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं, अठारह भुजाओंसे सम्पन्न हैं, गजचर्मका उत्तरीय धारण |
अध्याय २६ ] शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य ६८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सिंहाजिनाम्बरधरमघोरं परमेश्वरम्।<br>द्वात्रिंशाक्षररूपेण द्वात्रिंशच्छक्तिभिर्वृतम्॥ १६<br>सर्वाभरणसंयुक्तं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>कपालमालाभरणं सर्पवृश्चिकभूषणम्॥ १७<br>पूर्णेन्दुवदनं सौम्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्।<br>चन्द्ररेखाधरं शक्त्या सहितं नीलरूपिणम्॥ १८<br>हस्ते खड्गं खेटकं पाशमेके<br>रत्नैश्चित्रं चाङ्कुशं नागकक्षाम्।<br>शरासनं पाशुपतं तथास्त्रं<br>दण्डं च खट्वाङ्गमथापरे च॥ १९<br>तन्त्रीं च घण्टां विपुलं च शूलं<br>तथापरे डामरुकं च दिव्यम्।<br>वज्रं गदां टङ्कमेकं च दीप्तं<br>समुद्गरं हस्तमथास्य शम्भोः॥ २०<br>वरदाभयहस्तं च वरेण्यं परमेश्वरम्।<br>भावयेत्पूजयेच्चापि वह्नौ होमं च कारयेत्॥ २१ | किये हुए हैं, सिंहचर्मको वस्त्ररूपमें धारण किये हुए हैं, बत्तीस अक्षरोंके रूपमें बत्तीस शक्तियोंसे आवृत हैं, समस्त प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हैं, सभी देवता उन्हें नमस्कार कर रहे हैं, वे नरमुण्डकी माला पहने हुए हैं, सर्पों तथा बिच्छुओंको आभूषणरूपमें धारण किये हुए हैं, पूर्णचन्द्रके समान उनका मुखमण्डल है, वे सौम्य स्वभाववाले हैं, करोड़ों चन्द्रमाके तुल्य कान्तिसे युक्त हैं, मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए हैं, शक्तिसहित सुशोभित हो रहे हैं, नीलवर्णवाले हैं, उनकी दाहिनी ओरकी आठ भुजाओंमें खड्ग-खेटक-पाश-रत्नमय अंकुश-नागकक्षा-शरासनयुक्त पाशुपतास्त्र-दण्ड और खट्वांग तथा बायीं ओरकी आठ भुजाओंमें तन्त्री-घण्टा-विशाल शूल-दिव्य डमरू-वज्र-गदा-टंक और प्रदीप्त मुद्गर हैं। वे वरेण्य परमेश्वर शेष दो हाथोंमें वरद और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं—इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये और अन्तमें अग्निमें हवन करना चाहिये॥ १३—२१॥ |
| होमश्च पूर्ववत्सर्वो मन्त्रभेदश्च कीर्तितः।<br>अष्टपुष्पादि गन्धादि पूजास्तुतिनिवेदनम्॥ २२<br>अन्तर्बलिं च कुण्डस्य वाह्येयेन विधानतः।<br>मण्डलं विधिना कृत्वा मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ २३<br>रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो<br>राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः<br>क्षेत्रपालेभ्यः अथ वायुवरुणदिग्भागे क्षेत्रपालबलिं<br>क्षिपेत्॥<br>अर्घ्यं गन्धं पुष्पं च धूपं दीपं च सुव्रताः।<br>नैवेद्यं मुखवासादि निवेद्यं वै यथाविधि॥ २४<br>विज्ञाप्यैवं विसृज्याथ अष्टपुष्पैश्च पूजनम्।<br>सर्वसामान्यमेतद्धि पूजायां मुनिपुङ्गवाः॥ २५<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चादि सुव्रत।<br>अघोरार्चाविधानं च लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा॥ २६<br>स्थण्डिलात्कोटिगुणितं लिङ्गार्चनमनुत्तमम्।<br>लिङ्गार्चनरतो विप्रो महापातकसम्भवैः॥ २७ | सम्पूर्ण होमकर्म पूर्ववत् होता है, केवल मन्त्रोंमें भेद कहा गया है। अष्टपुष्पांजलि, गन्ध, पुष्पके साथ पूजा, स्तुति, निवेदन तथा कुण्डकी अन्तर्बलि (होम) वह्निपुराणोक्त विधानसे करना चाहिये। पुनः विधिपूर्वक मण्डलकी रचना करके यथाक्रम रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः क्षेत्रपालेभ्यः [नमः]—इन मन्त्रोंका उच्चारण करके वायव्य तथा पश्चिम दिशामें क्षेत्रपालबलि प्रदान करनी चाहिये। [सूतजी बोले—] हे सुव्रतो! तदनन्तर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मुखवास आदि विधिपूर्वक निवेदित करना चाहिये। ये सब उपचार समर्पित करके अष्टपुष्पांजलियोंके द्वारा विसर्जनकर प्रार्थना करनी चाहिये। हे मुनिश्रेष्ठो! पूजामें यह सब सामान्य विधि है। [शैलादि बोले—] हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अघोरपूजनका विधान कहा है। शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें भी अघोरपूजनका विधान है, किंतु स्थण्डिलकी अपेक्षा लिङ्गमें पूजन करोड़ों गुना |
२७- राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण
| ६८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| पापैरपि न लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>लिङ्गस्य दर्शनं पुण्यं दर्शनात्स्पर्शनं वरम्॥ २८<br><br>अर्चनादधिकं नास्ति ब्रह्मपुत्र न संशयः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चनमुत्तमम्॥ २९<br><br>वर्षकोटिशतेनापि विस्तरेण न शक्यते॥ ३० | श्रेष्ठ होता है। लिङ्गार्चनमें संलग्न विप्र महापातकोंके द्वारा लगनेवाले पापोंसे भी कमलके पत्रपर स्थित जलकी भाँति लिप्त नहीं होता है। लिङ्गका दर्शन पुण्यप्रद होता है, दर्शनसे अधिक उत्तम लिङ्गका स्पर्श है, किंतु लिङ्गार्चनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है, हे ब्रह्मपुत्र! इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें उत्तम अघोरार्चनका वर्णन कर दिया; करोड़ों वर्षोंमें भी विस्तारके साथ इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ २२—३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अघोरार्चनवर्णनं नाम षड्विंशतितमोऽध्यायः॥ २६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरार्चनवर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण
| ऋषय ऊचुः<br>प्रभावो नन्दिनश्चैव लिङ्गपूजाफलं श्रुतम्।<br>श्रुतिभिः सम्मितं सर्वं रोमहर्षण सुव्रत॥ १<br><br>जयाभिषेक ईशेन कथितो मनवे पुरा।<br>हिताय मेरुशिखरे क्षत्रियाणां त्रिशूलिना॥ २<br><br>तत्कथं षोडशविधं महादानं च शोभनम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत बुद्धिमतां वर॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>जीवच्छ्राद्धं पुरा कृत्वा मनुः स्वायम्भुवः प्रभुः।<br>मेरुमासाद्य देवेशमस्तवीन्नीललोहितम्॥ ४<br><br>तपसा च विनीताय प्रहृष्टः प्रददौ भवः।<br>दिव्यं दर्शनमीशानस्तेनापश्यत्तमव्ययम्॥ ५<br><br>नत्वा सम्पूज्य विधिना कृताञ्जलिपुटः स्थितः।<br>हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाच च ननाम च॥ ६ | ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण! हे सुव्रत! हमलोगोंने [भगवान्] नन्दीका प्रभाव तथा वेदप्रतिपादित लिङ्गपूजाका फल—यह सब [आपसे] सुन लिया॥ १॥<br>त्रिशूलधारी महेश्वर शिवने क्षत्रियोंके कल्याणके लिये पूर्व कालमें मेरुपर्वतके शिखरपर स्वायम्भुव मनुको जयाभिषेकका उपदेश किया था, उसे बतायें; और हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतजी! उत्तम षोडशविध महादानका विधान क्या है—यह सब आप कृपापूर्वक हमलोगोंको बतायें॥ २-३॥<br>सूतजी बोले—प्राचीन कालमें प्रभु स्वायम्भुव मनुने जीवच्छ्राद्ध करके मेरुशिखरपर पहुँचकर देवेश्वर नीललोहितका स्तवन किया था॥ ४॥<br>तब उनकी तपस्यासे भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन विनम्र मनुको दिव्य दृष्टि प्रदान की; फलतः उन्होंने अव्यय शिवको देखा और उन्हें प्रणाम करके विधिवत् पूजा करके दोनों हाथ जोड़े हुए वे स्थित हो गये। मनुने शिवजीको पुनः प्रणाम किया और हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें उनसे कहा—॥ ५-६॥ |
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६८९
| देवदेव जगन्नाथ नमस्ते भुवनेश्वर।<br>जीवच्छ्राद्धं महादेव प्रसादेन विनिर्मितम्॥ ७<br>पूजितश्च ततो देवो दृष्टश्चैव मयाधुना।<br>शक्राय कथितं पूर्वं धर्मकामार्थमोक्षदम्॥ ८<br>जयाभिषेकं देवेश वक्तुमर्हसि मे प्रभो। | हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है। हे महादेव! आपकी कृपासे मैंने अपना जीवच्छ्राद्ध कर लिया। मैंने आपकी पूजा की, उससे मुझे इस समय आप प्रभुका दर्शन प्राप्त हुआ है। हे देवेश! आपने प्राचीन कालमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करनेवाले जयाभिषेकका उपदेश इन्द्रको किया था; हे प्रभो! उसे मुझे भी बतानेकी कृपा कीजिये॥ ७-८१/२ ॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>तस्मै देवो महादेवे भगवानीललोहितः॥ ९<br>जयाभिषेकमखिलमवदत्परमेश्वरः। | सूतजी बोले—तदनन्तर नीललोहित भगवान् परमेश्वर महादेवने उन मनुको सम्पूर्ण जयाभिषेकका उपदेश किया॥ ९१/२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>जयाभिषेकं वक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया॥ १०<br>अपमृत्युजयार्थं च सर्वशत्रुजयाय च।<br>युद्धकाले तु सम्प्राप्ते कृत्वैवमभिषेचनम्॥ ११<br>स्वपतिं चाभिषिच्यैव गच्छेद्योद्धुं रणाजिरे।<br>विधिना मण्डपं कृत्वा प्रपां वा कूटमेव वा॥ १२ | श्रीभगवान् बोले—राजाओंके हितकी कामनासे, अकाल मृत्युसे बचने तथा सभी शत्रुओंको जीतनेके लिये मैं आपसे जयाभिषेकका वर्णन करूँगा। युद्ध-काल उपस्थित होनेपर यथाविधि जयाभिषेक करके तथा अपने स्वामी राजसेनाधिपतिका अभिषेक करके ही युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें जाना चाहिये॥ १०-१११/२ ॥ |
| नवधा स्थापयेद्वह्निं ब्राह्मणो वेदपारगः।<br>ततः सर्वाभिषेकार्थं सूत्रपातं च कारयेत्॥ १३ | विधिपूर्वक मण्डप, पानीयशाला तथा निश्चल स्थान बनाकर वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको नौ प्रकारकी वह्निकी स्थापना करनी चाहिये। तदनन्तर सम्पूर्ण अभिषेकके लिये मण्डपमें रेखाकरण करना चाहिये॥ १२-१३॥ |
| प्रागाद्यं वर्णसूत्रं च दक्षिणाद्यं तथा पुनः।<br>सहस्राणां द्वयं तत्र शतानां च चतुष्टयम्॥ १४<br>शेषमेव शुभं कोष्ठं तेषु कोष्ठं तु संहरेत्।<br>बाह्ये वीथ्यां पदं चैकं समन्तादुपसंहरेत्॥ १५ | पूर्वसे पश्चिम तथा दक्षिणसे उत्तरकी ओर रँगे हुए सूतसे रेखाएँ बनायें, जिससे दो हजार चार सौ कोष्ठ होंगे। सभी शुभ कोष्ठोंको बनाकर उनमेंसे शेष शुभ कोष्ठोंको लेकर बाहरवाली पंक्तिमें सब ओरसे एक-एक पदको ले॥ १४-१५॥ |
| अङ्गसूत्राणि सङ्गृह्य विधिना पृथगेव तु।<br>प्रागाद्यं वर्णसूत्रं च दक्षिणाद्यं तथा पुनः॥ १६<br>प्रागाद्यं दक्षिणाद्यं च षट्त्रिंशत्संहरेत्क्रमात्।<br>प्रागाद्याः पङ्क्तयः सप्त दक्षिणाद्यास्तथा पुनः॥ १७<br>तस्मादेकोनपञ्चाशत्पङ्क्तयः परिकीर्तिताः।<br>नव पङ्क्तीर्हरेन्मध्ये गन्धगोमयवारिणा॥ १८<br>कमलं चालिखेत्तत्र हस्तमात्रेण शोभनम्।<br>अष्टपत्रं सितं वृत्तं कर्णिकाकेसरान्वितम्॥ १९ | इसके बाद अंगसूत्र लेकर विधिपूर्वक पृथक् प्रागाद्य तथा दक्षिणाद्य रँगा हुआ सूत डालना चाहिये; प्रागाद्य तथा दक्षिणाद्य छत्तीस रेखाएँ बनानी चाहिये। पुनः प्रागाद्य सात पंक्तियाँ और दक्षिणाद्य सात पंक्तियाँ बनाये, इस प्रकार उनचास पंक्तियाँ कही गयी हैं। उसके मध्य भागमें नौ पंक्तियाँ ग्रहण करनी चाहिये। गन्ध तथा गोमययुक्त जलसे लीपकर उसमें एक हाथ |
| ६९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| अष्टाङ्गुलप्रमाणेन कर्णिकाहेमसन्निभा।<br>चतुरङ्गुलमानेन केसरस्थानमुच्यते॥ २० | प्रमाणके सुन्दर, अष्टदलोंवाले, श्वेत, गोलाकार तथा कर्णिका-केसरसे युक्त कमलकी रचना करनी चाहिये। कर्णिका आठ अंगुल प्रमाणकी तथा सुवर्णके समान होनी चाहिये; केसरका स्थान चार अंगुल प्रमाणका बताया गया है॥ १६-२०॥ | | धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं च यथाक्रमम्।<br>आग्नेयादिषु कोणेषु स्थापयेत्प्रणवेन तु॥ २१<br>अव्यक्तादीनि वै दिक्षु गात्राकारेण वै न्यसेत्।<br>अव्यक्तं नियतः कालः काली चेति चतुष्टयम्॥ २२<br>सितरक्तहिरण्याभकृष्णा धर्मादयः क्रमात्।<br>हंसाकारेण वै गात्रं हेमाभासेन सुव्रताः॥ २३ | आग्नेय आदि कोणोंमें प्रणव मन्त्रके द्वारा क्रमानुसार धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्यकी स्थापना करनी चाहिये। साथ ही चारों दिशाओंमें अव्यक्त, नियत, काल और कालीको बाह्य पत्राकाररूपमें स्थापित करना चाहिये। हे सुव्रतो! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य—ये चारों क्रमसे श्वेत, रक्त, स्वर्णकी आभावाले तथा कृष्णवर्णवाले होने चाहिये और गात्र (बाह्यपत्र) हंसाकार तथा सुवर्णसदृश होना चाहिये॥ २१-२३॥ | | आधारशक्तिमध्ये तु कमलं सृष्टिकारणम्।<br>बिन्दुमात्रं कलामध्ये नादाकारमतः परम्॥ २४<br>नादोपरि शिवं ध्यायेदोङ्काराख्यं जगद्गुरुम्।<br>मनोन्मनीं च पद्माभां महादेवं च भावयेत्॥ २५ | आधारशक्तिके मध्यमें सृष्टिकारणरूप कमलकी तथा कलामध्यमें बिन्दुमात्र नादाकारकी कल्पना करे; तत्पश्चात् उस नादके ऊपर ओंकारसंज्ञक जगद्गुरु शिवका ध्यान करना चाहिये और मनोन्मनी तथा पद्मकी आभावाले महादेवकी भावना करनी चाहिये। तदनन्तर | | वामादयः क्रमेणैव प्रागाद्याः केसरेषु वै।<br>वामा ज्येष्ठा तथा रौद्री काली विकरणी तथा॥ २६<br>बला प्रमथिनी देवी दमनी च यथाक्रमम्।<br>वामदेवादिभिः सार्धं प्रणवेनैव विन्यसेत्॥ २७ | वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनी—इन वामा आदि आठ शक्तियोंका वामदेव आदि अष्ट शिव-मूर्तियोंके साथ प्रणवके उच्चारणपूर्वक पूर्वादिके क्रमसे केसरोंमें न्यास करना चाहिये॥ २४-२७॥ | | नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने॥ २८<br>रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च।<br>बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च॥ २९<br>मनोन्मनाय देवाय मनोन्मन्यै नमो नमः।<br>मन्त्रैरेतैर्यथान्यायं पूजयेत्परिमण्डलम्॥ ३० | 'नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने॥ रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च। बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च॥ मनोन्मनाय देवाय मनोन्मन्यै नमो नमः।'—इन मन्त्रोंसे विधानके अनुसार परिमण्डलका पूजन करना चाहिये॥ २८-३०॥ | | प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>द्वितीयावरणे चैव शक्तयः षोडशैव तु॥ ३१<br>तृतीयावरणे चैव चतुर्विंशदनुक्रमात्।<br>पिशाचवीथिवैं मध्ये नाभिवीथिः समन्ततः॥ ३२<br>मन्त्रैरेतैर्यथान्यायं पिशाचानां प्रकीर्तिता।<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु पदमष्टारसंयुक्तम्॥ ३३ | प्रथम आवरणका वर्णन कर दिया गया; अब द्वितीय आवरणके विषयमें सुनिये। द्वितीय आवरणमें कुल सोलह शक्तियाँ होती हैं और तृतीय आवरणमें क्रमसे चौबीस शक्तियाँ होती हैं। मध्यमें पिशाचवीथि और चारों ओर नाभिवीथि है; यह पिशाचोंकी वीथि कही गयी है, इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंसे इनकी सम्यक् पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३२ १/२॥ |
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेषु तेषु पृथक्त्वेन पदेषु कमलं क्रमात्।<br>कल्पयेच्छालिनीवारगोधूमैश्च यवादिभिः॥ ३४<br><br>तण्डुलैश्च तिलैर्वाथ गौरसर्षपसंयुतैः।<br>अथवा कल्पयेदेतैैर्यथाकालं विधानतः॥ ३५<br><br>अष्टपत्रं लिखेत्तेषु कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>शालीनामाढकं प्रोक्तं कमलानां पृथक् पृथक्॥ ३६<br><br>तण्डुलानां तदर्धं स्यात्तदर्धं च यवादयः।<br>द्रोणं प्रधानकुम्भस्य तदर्धं तण्डुलाः स्मृताः॥ ३७<br><br>तिलानामाढकं मध्ये यवानां च तदर्धकम्। | [अब कलशस्थापनकी विधि बतायी जा रही है—] अष्टकोणीय एक हजार आठ पद वहाँ परिमण्डलमें बनाने चाहिये। तत्पश्चात् उन-उन पदोंमें अलग-अलग क्रमसे कर्णिका तथा केसरसे युक्त अष्टदल कमलको शालि (धान), नीवार, गोधूम, यव, तण्डुल, तिल, श्वेत सर्षप (सरसों)-के द्वारा निर्मित करना चाहिये; अथवा समयसे इनमें जो उपलब्ध हो जाय, उसीसे विधानपूर्वक कमलकी रचना करनी चाहिये। प्रत्येक कमलके लिये शालि-धानका परिमाण एक आढक बताया गया है; तण्डुलका परिमाण उसका आधा और जौ आदिका परिमाण उसका भी आधा होना चाहिये। प्रधान कुम्भका प्रमाण एक द्रोण होना चाहिये। इसके लिये चावल उसका आधा बताया गया है। तिलका परिमाण एक आढक और जौका परिमाण उसका आधा होना चाहिये॥ ३३—३७ १/२॥ |
| अथाम्भसा सम्भ्युक्ष्य कमलं प्रणवेन तु॥ ३८<br><br>तेषु सर्वेषु विधिना प्रणवं विन्यसेत्क्रमात्।<br>एवं समाप्य चाभ्युक्ष्य पदसाहस्रमुत्तमम्॥ ३९<br><br>कलशानां सहस्राणि हैमानि च शुभानि च।<br>उक्तलक्षणयुक्तानि कारयेद्राजतानि वा॥ ४०<br><br>ताम्रजानि यथान्यायं प्रणवेनार्घ्यवारिणा। | इस प्रकार कमलकी रचना करके जलसे प्रणवके द्वारा उसका प्रोक्षणकर उन सबमें विधिपूर्वक क्रमसे प्रणवका न्यास करना चाहिये। ऐसा करनेके अनन्तर पवित्र सभी हजार पदोंका प्रोक्षण करके बताये गये लक्षणोंवाले स्वर्ण, रजत या ताम्रके हजार शुभ कलशोंको व्यवस्थित कराना चाहिये और प्रणवका उच्चारण करके अर्घ्य-जलसे प्रोक्षण करना चाहिये॥ ३८—४० १/२॥ |
| द्वादशाङ्गुलविस्तारमुदरे समुदाहृतम्॥ ४१<br><br>वर्तितं तु तदर्धेन नाभिस्तस्य विधीयते।<br>कण्ठं तु द्व्यङ्गुलोत्सेधं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ४२<br><br>ओष्ठं च द्व्यङ्गुलोत्सेधं निर्गमं द्व्यङ्गुलं स्मृतम्।<br>तत्तद्वै द्विगुणं दिव्यं शिवकुम्भे प्रकीर्तितम्॥ ४३<br><br>यवमात्रान्तरं सम्यक्तन्तुना वेष्टयेद्धि वै।<br>अवगुण्ठ्य तथाभ्युक्ष्य कुशोपरि यथाविधि॥ ४४<br><br>पूर्ववत्प्रणवेनैव पूरयेद्गन्धवारिणा।<br>स्थापयेच्छिवकुम्भाढ्यं वर्धनीं च विधानतः॥ ४५<br><br>मध्यपद्मस्य मध्ये तु सकूर्चं साक्षतं क्रमात्।<br>आवेष्ट्य वस्त्रयुग्मेन प्रच्छाद्य कमलेन तु॥ ४६ | [अब कलशका मान निरूपित किया जाता है—] कलशके उदरका विस्तार बारह अंगुलका वृत्ताकार बताया गया है। उसकी नाभि छः अंगुलकी होनी चाहिये। कलशका कण्ठ दो अंगुल ऊँचा तथा चार अंगुल चौड़ा होना चाहिये। उसका ओष्ठ दो अंगुल ऊँचा तथा निर्गम (जल निकलनेका मार्ग) दो अंगुल प्रमाणका बताया गया है। दिव्य शिवकुम्भ उन-उन प्रमाणोंसे दूने प्रमाणका बताया गया है। कलशको जौके बराबर मोटे सूत्रसे भली-भाँति वेष्टित कर देना चाहिये। इसके बाद अवगुण्ठन तथा अभ्युक्षण करके कुशके ऊपर रखकर विधिपूर्वक पूर्वकी भाँति प्रणवमन्त्रका उच्चारण करके गन्धयुक्त जलसे कलशको पूरित करे और कूर्च तथा अक्षतसहित मध्यपद्मके ऊपर शिवकुम्भको |
| ६९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हैमेन चित्ररत्नेन सहस्रकलशं पृथक्।<br>शिवकुम्भे शिवं स्थाप्य गायत्र्या प्रणवेन च॥ ४७<br><br>विद्महे पुरुषायैव महादेवाय धीमहि।<br>तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ ४८<br><br>मन्त्रेणानेन रुद्रस्य सान्निध्यं सर्वदा स्मृतम्।<br>वर्धन्यां देवि गायत्र्या देवीं संस्थाप्य पूजयेत्॥ ४९<br><br>गणाम्बिकायै विद्महे महातपायै धीमहि।<br>तन्नो गौरी प्रचोदयात्॥ ५० | विधानपूर्वक स्थापित करे तथा खड्गाकार एक वर्धनी भी स्थापित करे। इसके बाद दो वस्त्रोंसे उसे वेष्टित करके स्वर्णरचित अथवा विचित्र रत्नादिसे सज्जित कमलद्वारा आच्छादित करे, इसके बाद उन सहस्र कलशोंको भी पृथक्से आवेष्टित एवं आच्छादित करे। शिवकुम्भमें शिवगायत्री और प्रणवद्वारा शिवकी स्थापना करे।<br><br>'विद्महे पुरुषायैव महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्'*—इस मन्त्रसे सर्वदा रुद्रका सान्निध्य बताया गया है। देवीगायत्रीके द्वारा वर्धनीमें भगवती गौरीकी स्थापना करके उनका पूजन करना चाहिये। 'गणाम्बिकायै विद्महे महातपायै धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात्।'—यह देवीगायत्री है॥ ४९—५०॥ |
| प्रथमावरणे चैव वामाद्याः परिकीर्तिताः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ ५१<br><br>शक्तयः षोडशैवात्र पूर्वाद्यन्तेषु सुव्रत।<br>ऐन्द्रव्यूहस्य मध्ये तु सुभद्रां स्थाप्य पूजयेत्॥ ५२<br><br>भद्रामाग्नेयचक्रे तु याम्ये तु कनकाण्डजाम्।<br>अम्बिकां नैर्ऋते व्यूहे मध्यकुम्भे तु पूजयेत्॥ ५३<br><br>श्रीदेवीं वारुणे भागे वागीशां वायुगोचरे।<br>गोमुखीं सौम्यभागे तु मध्यकुम्भे तु पूजयेत्॥ ५४<br><br>रुद्रव्यूहस्य मध्ये तु भद्रकर्णां समर्च्चयेत्।<br>ऐन्द्राग्निविदिशोर्मध्ये पूजयेदणिमां शुभाम्॥ ५५<br><br>याम्यपावकयोर्मध्ये लघिमां कमले न्यसेत्।<br>राक्षसान्तकयोर्मध्ये महिमां मध्यतो यजेत्॥ ५६<br><br>वरुणासुरयोर्मध्ये प्राप्तिं वै मध्यतो यजेत्।<br>वरुणानिलयोर्मध्ये प्राकाम्यं कमले न्यसेत्॥ ५७<br><br>वित्तेशानिलयोर्मध्ये ईशित्वं स्थाप्य पूजयेत्।<br>वित्तेशेशानयोर्मध्ये वशित्वं स्थाप्य पूजयेत्॥ ५८<br><br>ऐन्द्रेशेशानयोर्मध्ये यजेत्कामावसायकम्।<br>द्वितीयावरणं प्रोक्तं तृतीयावरणं शृणु॥ ५९ | प्रथम आवरणमें वामा आदि शक्तियाँ पहले ही बतायी गयी हैं। प्रथम आवरण कह दिया गया है, अब द्वितीय आवरणके विषयमें सुनिये। हे सुव्रत! पूर्व आदि दिशाओंमें सोलह शक्तियाँ विद्यमान हैं। पूर्व दिशामें सुभद्राकी स्थापना करके उनकी पूजा करनी चाहिये। आग्नेय चक्रमें भद्रा, दक्षिण दिशामें कनकाण्डजा और नैर्ऋत्यकोणमें कुम्भके मध्य अम्बिकाकी पूजा करनी चाहिये। पश्चिम दिशामें श्रीदेवी, वायव्य कोणमें वागीशा तथा उत्तर दिशामें कुम्भके मध्य गोमुखीका पूजन करना चाहिये। ईशानकोणमें भद्रकर्णाकी अर्चना करनी चाहिये। पूर्व दिशा तथा अग्निकोणके मध्यमें मंगलमयी अणिमाकी पूजा तथा दक्षिण दिशा और अग्निकोणके मध्य कमलमें लघिमाकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार दक्षिण और नैर्ऋत्यकोणके मध्यमें महिमाकी पूजा और नैर्ऋत्य तथा पश्चिम दिशाके मध्यमें प्राप्तिकी पूजा करनी चाहिये। पश्चिम दिशा तथा वायव्यकोणके मध्यमें कमलमें प्राकाम्यका न्यास करना चाहिये और वायव्यकोण तथा उत्तर दिशाके मध्य ईशित्वकी स्थापना करके उसका पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् उत्तर और ईशानकोणके मध्य वशित्वका न्यास करके उसका पूजन करना चाहिये और ईशानकोण तथा पूर्व दिशाके |
* तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्—यह रुद्रगायत्री मन्त्र है।
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मध्य कामावसायित्वका पूजन करना चाहिये। यह द्वितीय आवरणपूजन मैंने कह दिया, अब तृतीय आवरणपूजनके विषयमें सुनिये॥ ५१—५९॥ | |
| शक्तयस्तु चतुर्विंशत्प्रधानकलशेषु च।<br>पूजयेद्व्यूहमध्ये तु पूर्ववद्विधिपूर्वकम्॥ ६०<br><br>दीक्षां दीक्षायिकां चैव चण्डां चण्डांशुनायिकाम्।<br>सुमतिं सुमत्यायीं च गोपां गोपायिकां तथा॥ ६१<br><br>अथ नन्दं च नन्दायीं पितामहमतः परम्।<br>पितामहार्यीं पूर्वाद्यं विधिना स्थाप्य पूजयेत्॥ ६२ | प्रधान कलशों (अष्ट दिक्पाल-कलशों)-में चौबीस शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। व्यूहके मध्य द्वितीय व्यूहकी भाँति सोलह शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उनके अतिरिक्त दीक्षा, दीक्षायिका, चण्डा, चण्डांशुनायिका, सुमति, सुमत्यायी, गोपा तथा गोपायिका—इन आठ शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उक्त चौबीस शक्तियोंकी पूजाके अनन्तर नन्द-नन्दायी, पितामह-पितामहायी—इनकी पूर्व आदि दिशाओंमें विधिपूर्वक स्थापना करके पूजा करनी चाहिये॥ ६०–६२॥ |
| एवं सम्पूज्य विधिना तृतीयावरणं शुभम्।<br>सौभद्रं व्यूहमासाद्य प्रथमावरणे क्रमात्॥ ६३<br><br>प्रागाद्यं विधिना स्थाप्य शक्त्यष्टकमनुक्रमात्।<br>द्वितीयावरणे चैव प्रागाद्यं शृणु शक्तयः॥ ६४<br><br>षोडशैव तु अभ्यर्च्य पद्ममुद्रां तु दर्शयेत्।<br>बिन्दुका बिन्दुगर्भा च नादिनी नादगर्भजा॥ ६५<br><br>शक्तिका शक्तिगर्भा च परा चैव परापरा।<br>प्रथमावरणेऽष्टौ च शक्तयः परिकीर्तिताः॥ ६६<br><br>चण्डा चण्डमुखी चैव चण्डवेगा मनोजवा।<br>चण्डाक्षी चण्डनिर्घोषा भृकुटी चण्डनायिका॥ ६७<br><br>मनोत्सेधा मनोध्यक्षा मानसी माननायिका।<br>मनोहरी मनोह्लादी मनःप्रीतिर्महेश्वरी॥ ६८<br><br>द्वितीयावरणे चैव षोडशैव प्रकीर्तिताः।<br>सौभद्रः कथितो व्यूहो भद्रं व्यूहं शृणुष्व मे॥ ६९ | इस प्रकार शुभ तृतीय आवरणकी विधिपूर्वक पूजा करके प्रथम आवरणमें सौभद्र व्यूहको प्राप्तकर आठ शक्तियोंको क्रमसे पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापितकर विधिवत् उनकी पूजा करनी चाहिये। अब द्वितीय आवरणमें प्रागाद्य शक्तियोंको सुनिये। इन सोलहोंका अर्चन करके पद्ममुद्रा दिखानी चाहिये। बिन्दुका, बिन्दुगर्भा, नादिनी, नादगर्भजा, शक्तिका, शक्तिगर्भा, परा तथा परापरा—ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। चण्डा, चण्डमुखी, चण्डवेगा, मनोजवा, चण्डाक्षी, चण्डनिर्घोषा, भृकुटी, चण्डनायिका, मनोत्सेधा, मनोध्यक्षा, मानसी, माननायिका, मनोहरी, मनोह्लादी, मनःप्रीति और महेश्वरी—ये सोलह शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें बतायी गयी हैं। मैंने सौभद्रव्यूहका वर्णन कर दिया, अब भद्रव्यूहके विषयमें सुनिये॥ ६३—६९॥ |
| ऐन्द्री हौताशनी याम्या नैर्ऋती वारुणी तथा।<br>वायव्या चैव कौबेरी ऐशानी चाष्टशक्तयः॥ ७०<br><br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>हरिणी च सुवर्णा च काञ्चनी हाटकी तथा॥ ७१<br><br>रुक्मिणी सत्यभामा च सुभगा जम्बुनायिका।<br>वाग्भवा वाक्पथा वाणी भीमा चित्ररथा सुधीः॥ ७२<br><br>वेदमाता हिरण्याक्षी द्वितीयावरणे स्मृता।<br>भद्राख्यः कथितो व्यूहः कनकाख्यं शृणुष्व मे॥ ७३ | ऐन्द्री, हौताशनी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायव्या, कौबेरी तथा ऐशानी—ये आठ शक्तियाँ हैं। प्रथम आवरण बता दिया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। हरिणी, सुवर्णा, कांचनी, हाटकी, रुक्मिणी, सत्यभामा, सुभगा, जम्बुनायिका, वाग्भवा, वाक्पथा, वाणी, भीमा, चित्ररथा, सुधी, वेदमाता तथा हिरण्याक्षी—ये द्वितीय आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं। भद्राख्य व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब कनक नामक व्यूहके विषयमें सुनिये॥ ७०–७३॥ |
[ उत्तरभाग ६९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण
| वज्रं शक्तिं च दण्डं च खड्गं पाशं ध्वजं तथा।<br>गदां त्रिशूलं क्रमशः प्रथमावरणे स्मृताः॥ ७४<br>युद्धा प्रबुद्धा चण्डा च मुण्डा चैव कपालिनी।<br>मृत्युहन्त्री विरूपाक्षी कपर्दा कमलासना॥ ७५<br>दंष्ट्रिणी रङ्गिणी चैव लम्बाक्षी कङ्कभूषणी।<br>सम्भावा भाविनी चैव षोडशैव प्रकीर्तिताः॥ ७६<br>कथितः कनकव्यूहो ह्यम्बिकाख्यं शृणुष्व मे।<br>खेचरी चात्मनासा च भवानी वह्निरूपिणी॥ ७७<br>वह्निनी वह्निनाभा च महिमामृतलालसा।<br>प्रथमावरणे चाष्टौ शक्तयः सर्वसम्मताः॥ ७८<br>क्षमा च शिखरा देवी ऋतुरत्ना शिला तथा।<br>छाया भूतपनी धन्या इन्द्रमाता च वैष्णवी॥ ७९<br>तृष्णा रागवती मोहा कामकोपा महोत्कटा।<br>इन्द्रा च बधिरा देवी षोडशैताः प्रकीर्तिताः॥ ८० | वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा और त्रिशूल—ये क्रमानुसार प्रथम आवरणकी [आयुधरूप] शक्तियाँ कही गयी हैं। युद्धा, प्रबुद्धा, चण्डा, मुण्डा, कपालिनी, मृत्युहन्त्री, विरूपाक्षी, कपर्दा, कमला, आसना, दंष्ट्रिणी, रंगिणी, लम्बाक्षी, कंकभूषणी, सम्भावा तथा भाविनी—ये [द्वितीय आवरणकी] सोलह शक्तियाँ बतायी गयी हैं। कनकव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब अम्बिका नामक व्यूहके विषयमें सुनिये। खेचरी, आत्मनासा, भवानी, वह्निरूपिणी, वह्निनी, वह्निनाभा, महिमा और अमृतलालसा—ये प्रथम आवरणकी आठ सर्वसम्मत शक्तियाँ कही गयी हैं। उसी प्रकार क्षमा, शिखरादेवी, ऋतुरत्ना, शिला, छाया, भूतपनी, धन्या, इन्द्रमाता, वैष्णवी, तृष्णा, रागवती, मोहा, कामकोपा, महोत्कटा, इन्द्रा और बधिरादेवी—ये सोलह शक्तियाँ [द्वितीय आवरणकी] कही गयी हैं॥ ७४-८०॥ | | कथितश्चाम्बिकाव्यूहः श्रीव्यूहं शृणु सुव्रत।<br>स्पर्शा स्पर्शवती गन्धा प्राणापाना समानिका॥ ८१<br>उदाना व्याननामा च प्रथमावरणे स्मृताः।<br>तमोहता प्रभामोघा तेजिनी दहिनी तथा॥ ८२<br>भीमास्या जालिनी चोषा शोषिणी रुद्रनायिका।<br>वीरभद्रा गणाध्यक्षा चन्द्रहासा च गह्वरा॥ ८३<br>गणमाताम्बिका चैव शक्तयः सर्वसम्मताः।<br>द्वितीयावरणे प्रोक्ताः षोडशैव यथाक्रमात्॥ ८४ | हे सुव्रत! अम्बिकाव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब श्रीव्यूहका श्रवण कीजिये। स्पर्शा, स्पर्शवती, गन्धा, प्राणा, अपाना, समाना, उदाना और व्याना—प्रथम आवरणकी ये आठ शक्तियाँ कही गयी हैं। उसी तरह तमोहता, प्रभा, अमोघा, तेजिनी, दहिनी, भीमास्या, जालिनी, उषा, शोषिणी, रुद्रनायिका, वीरभद्रा, गणाध्यक्षा, चन्द्रहासा, गह्वरा, गणमाता और अम्बिका—यथाक्रम ये सोलह सर्वसम्मत शक्तियाँ द्वितीय आवरणकी बतायी गयी हैं॥ ८१-८४॥ | | श्रीव्यूहः कथितो भद्रं वागीशं शृणु सुव्रत।<br>धारा वारिधरा चैव वह्निकी नाशकी तथा॥ ८५<br>मर्त्यातीता महामाया वज्रिणी कामधेनुका।<br>प्रथमावरणेऽप्येवं शक्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ ८६<br>पयोष्णी वारुणी शान्ता जयन्ती च वरप्रदा।<br>प्लाविनी जलमाता च पयोमाता महाम्बिका॥ ८७<br>रक्ता कराली चण्डाक्षी महोच्छुष्मा पयस्विनी।<br>माया विद्येश्वरी काली कालिका च यथाक्रमम्॥ ८८<br>षोडशैव समाख्याताः शक्तयः सर्वसम्मताः।<br>व्यूहो वागीश्वरः प्रोक्तो गोमुखो व्यूह उच्यते॥ ८९ | हे सुव्रत! कल्याणकारी श्रीव्यूहका वर्णन कर दिया, अब वागीशव्यूहके विषयमें सुनिये। धारा, वारिधरा, वह्निकी, नाशकी, मर्त्यातीता, महामाया, वज्रिणी तथा कामधेनुका—ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणकी बतायी गयी हैं। पयोष्णी वारुणी, शान्ता, वरप्रदायिनी जयन्ती, प्लाविनी, जलमाता, पयोमाता, महाम्बिका, रक्ता, कराली, चण्डाक्षी, महोच्छुष्मा, पयस्विनी, माया, विद्येश्वरी, काली, कालिका—क्रमसे ये सोलह सर्वसम्मत शक्तियाँ द्वितीय आवरणकी कही गयी हैं। वागीश नामक व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब गोमुखव्यूह बता रहा |
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शङ्किनी हालिनी चैव लङ्कावर्णा च कल्किनी।<br>यक्षिणी मालिनी चैव वमनी च रसात्मनी॥ ९०<br>प्रथमावरणे चैव शक्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>चण्डा घण्टा महानादा सुमुखी दुर्मुखी बला॥ ९१<br>रेवती प्रथमा घोरा सैन्या लीना महाबला।<br>जया च विजया चैव अपरा चापराजिता॥ ९२<br>द्वितीयावरणे चैव शक्तयः षोडशैव तु।<br>कथितो गोमुखीव्यूहो भद्रकर्णीं शृणुष्व मे॥ ९३ | हूँ। शंकिनी, हालिनी, लंकावर्णा, कल्किनी, यक्षिणी, मालिनी, वमनी, रसात्मनी—ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। चण्डा, घण्टा, महानादा, सुमुखी, दुर्मुखी, बला, रेवती, प्रथमा, घोरा, सैन्या, लीना, महाबला, जया, विजया, अजिता और अपराजिता—ये सोलह शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें कही गयी हैं। गोमुखव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब भद्रकर्णीव्यूहके विषयमें सुनिये॥ ८५—९३॥ |
| महाजया विरूपाक्षी शुक्लाभाकाशमातृका।<br>संहारी जातहारी च दंष्ट्राली शुष्करेवती॥ ९४<br>प्रथमावरणे चाष्टौ शक्तयः परिकीर्तिताः।<br>पिपीलिका पुण्यहारी अशनी सर्वहारिणी॥ ९५<br>भद्रहा विश्वहारी च हिमा योगेश्वरी तथा।<br>छिद्रा भानुमती छिद्रा सैंहिकी सुरभी समा॥ ९६<br>सर्वभव्या च वेगाख्या शक्तयः षोडशैव तु।<br>महाव्यूहाष्टकं प्रोक्तमुपव्यूहाष्टकं शृणु॥ ९७ | महाजया, विरूपाक्षी, शुक्लाभा, आकाशमातृका, संहारी, जातहारी, दंष्ट्राली और शुष्करेवती—ये प्रथम आवरणकी आठ शक्तियाँ बतायी गयी हैं। पिपीलिका, पुण्यहारी, अशनी, सर्वहारिणी, भद्रहा, विश्वहारी, हिमा, योगेश्वरी, छिद्रा, भानुमती, छिद्रा, सैंहिकी, सुरभी, समा, सर्वभव्या तथा वेगा—द्वितीय आवरणकी ये सोलह शक्तियाँ हैं। यह आठ महाव्यूहोंका वर्णन किया गया, अब आठ उपव्यूहोंको सुनिये॥ ९४—९७॥ |
| अणिमाव्यूहमावेष्ट्य प्रथमावरणे क्रमात्।<br>ऐन्द्रा तु चित्रभानुश्च वारुणी दण्डिरेव च॥ ९८<br>प्राणरूपी तथा हंसः स्वात्मशक्तिः पितामहः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ ९९<br>केशवो भगवान् रुद्रश्चन्द्रमा भास्करस्तथा।<br>महात्मा च तथा ह्यात्मा ह्यन्तरात्मा महेश्वरः॥ १००<br>परमात्मा ह्यणुर्जीवः पिङ्गलः पुरुषः पशुः।<br>भोक्ता भूतपतिर्भीमो द्वितीयावरणे स्मृताः॥ १०१<br>कथितश्चाणिमाव्यूहो लघिमाख्यं वदामि ते।<br>श्रीकण्ठोऽन्तश्च सूक्ष्मश्च त्रिमूर्तिः शशकस्तथा॥ १०२<br>अमरेशः स्थितीशश्च दारतश्च तथाष्टमः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ १०३<br>स्थाणुर्हरश्च दण्डेशो भौक्तीशः सुरपुङ्गवः।<br>सद्योजातोऽनुग्रहेशः क्रूरसेनः सुरेश्वरः॥ १०४<br>क्रोधीशश्च तथा चण्डः प्रचण्डः शिव एव च।<br>एकरुद्रस्तथा कूर्मश्चैकनेत्रश्चतुर्मुखः॥ १०५<br>द्वितीयावरणे रुद्राः षोडशैव प्रकीर्तिताः।<br>कथितो लघिमाव्यूहो महिमां शृणु सुव्रत॥ १०६ | अणिमाव्यूहको आवेष्टित करके प्रथम आवरणमें क्रमसे ऐन्द्रा, चित्रभानु, वारुणी, दण्ड, प्राणरूपी, हंस, स्वात्मशक्ति और पितामह—ये शक्तियाँ हैं। प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। केशव, भगवान् रुद्र, चन्द्रमा, भास्कर, महात्मा, आत्मा, अन्तरात्मा, महेश्वर, परमात्मा, सूक्ष्म जीव, पिंगल, पुरुष, पशु, भोक्ता, भूतपति तथा भीम—ये शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें कही गयी हैं। अणिमाव्यूह कह दिया गया, अब लघिमा नामक व्यूहका वर्णन आपसे करता हूँ। श्रीकण्ठ, अन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, शशक, अमरेश, स्थितीश और आठवाँ दारत—[ये आठ शक्तियाँ हैं।] प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। स्थाणु, हर, दण्डेश, सुरश्रेष्ठ भौक्तीश, सद्योजात, अनुग्रहेश, क्रूरसेन, सुरेश्वर, क्रोधीश, चण्ड, प्रचण्ड, शिव, एकरुद्र, कूर्म, एकनेत्र तथा चतुर्मुख—द्वितीय आवरणमें ये ही सोलह रुद्र बताये गये हैं। हे सुव्रत! लघिमाव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब महिमाव्यूहका श्रवण कीजिये॥ ९८—१०६॥ |
| अजेशः क्षेमरुद्रश्च सोमोऽंशो लाङ्गली तथा।<br>दण्डारुश्चार्धनारी च एकान्तश्चान्त एव च॥ १०७ | अजेश, क्षेमरुद्र, सोम, अंश, लांगली, दण्डारु, अर्धनारी, एकान्त, अन्त, भुजंग नामक पाली, पिनाकी, |
| ६९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| पाली भुजङ्गनामा च पिनाकी खड्गिरेव च।<br>काम ईशस्तथा श्वेतो भृगुः षोडश वै स्मृताः ॥ १०८<br>कथितो महिमाव्यूहः प्राप्तिव्यूहं शृणुष्व मे।<br>संवर्तो लकुलीशश्च वाडवो हस्तिरेव च ॥ १०९<br>चण्डयक्षो गणपतिर्महात्मा भृगुजॊऽष्टमः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ ११०<br>त्रिविक्रमो महाजिह्वो ऋक्षः श्रीभद्र एव च।<br>महादेवो दधीचश्च कुमारश्च परावरः ॥ १११<br>महादंष्ट्रः करालश्च सूचकश्च सुवर्धनः।<br>महाध्वांक्षो महानन्दो दण्डी गोपालकस्तथा ॥ ११२ | खड्गि, काम, ईश, श्वेत तथा भृगु—ये सोलह कहे गये हैं। यह महिमाव्यूह कह दिया गया, अब मुझसे प्राप्तिव्यूहका श्रवण कीजिये। संवर्त, लकुलीश, वाडव, हस्ति, चण्डयक्ष, गणपति, महात्मा और आठवाँ भृगुज—[ये आठ प्रथम आवरणके देवता हैं।] प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरणको सुनिये। त्रिविक्रम, महाजिह्व, ऋक्ष, श्रीभद्र, महादेव, दधीच, कुमार, परावर, महादंष्ट्र, कराल, सूचक, सुवर्धन, महाध्वांक्ष, महानन्द, दण्डी तथा गोपाल—[ये सोलह द्वितीय आवरणके देवता हैं]॥ १०७–११२॥ |
| प्राप्तिव्यूहः समाख्यातः प्राकाम्यं शृणु सुव्रत।<br>पुष्पदन्तो महानागो विपुला्रन्दकारकः ॥ ११३<br>शुक्लो विशालः कमलो बिल्वश्चारुण एव च।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ ११४<br>रतिप्रियः सुरेशानश्चित्राङ्गश्च सुदुर्जयः।<br>विनायकः क्षेत्रपालो महामोहश्च जङ्गलः ॥ ११५<br>वत्सपुत्रो महापुत्रो ग्रामदेशाधिपस्तथा।<br>सर्वावस्थाधिपो देवो मेघनादः प्रचण्डकः ॥ ११६<br>कालदूतश्च कथितो द्वितीयावरणं स्मृतम्।<br>प्राकाम्यः कथितो व्यूह ऐश्वर्यं कथयामि ते ॥ ११७ | हे सुव्रत! प्राप्तिव्यूह बता दिया गया, प्राकाम्यव्यूहका श्रवण कीजिये। पुष्पदन्त, महानाग, विफुलानन्दकारक, शुक्ल, विशाल, कमल, बिल्व तथा अरुण—[ये आठ प्रथम आवरणके देवता हैं।] प्रथम आवरणका वर्णन कर दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। रतिप्रिय, सुरेशान, चित्रांग, सुदुर्जय, विनायक, क्षेत्रपाल, महामोह, जंगल, वत्सपुत्र, महापुत्र, ग्रामदेशाधिप, सर्वावस्थाधिप, देव, मेघनाद, प्रचण्डक तथा कालदूत—ये सोलह देवता कहे गये हैं। इसे द्वितीय आवरण कहा गया है। प्राकाम्यव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब आपको ऐश्वर्यव्यूह बता रहा हूँ॥ ११३–११७॥ |
| मङ्गला चर्चिका चैव योगेशा हरदायिका।<br>भासुरा सुरमाता च सुन्दरी मातृकाष्टमी ॥ ११८<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणे शृणु।<br>गणाधिपश्च मन्त्रज्ञो वरदेवः षडाननः ॥ ११९<br>विदग्धश्च विचित्रश्च अमोघो मोघ एव च।<br>अश्वीरुद्रश्च सोमेशश्चोत्तमोदुम्बरस्तथा ॥ १२०<br>नारसिंहश्च विजयस्तथा इन्द्रगुहः प्रभुः।<br>अपाम्यतिश्च विधिना द्वितीयावरणं स्मृतम् ॥ १२१<br>ऐश्वर्यः कथितो व्यूहो वशित्वं पुनरुच्यते। | मंगला, चर्चिका, योगेशा, हरदायिका, भासुरा, सुरमाता, सुन्दरी तथा आठवीं मातृका—ये [आठ शक्तियाँ] प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। अब द्वितीय आवरण सुनिये। गणाधिप, मंत्रज्ञ, वरदेव, षडानन, विदग्ध, विचित्र, अमोघ, मोघ, अश्वीरुद्र, सोमेश, उत्तमोदुम्बर, नारसिंह, विजय, इन्द्रगुह, प्रभु तथा अपाम्पति—इस प्रकार इसे द्वितीय आवरण कहा गया है। ऐश्वर्यव्यूह कह दिया गया, अब वशित्वव्यूह बताया जा रहा है। |
| गगनो भवनश्चैव विजयो ह्यजयस्तथा ॥ १२२<br>महाजयस्तथाङ्गारो व्यङ्गारश्च महायशाः।<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणे शृणु ॥ १२३<br>सुन्दरश्च प्रचण्डेशो महावर्णो महासुरः।<br>महारोमा महागर्भः प्रथमः कनकस्तथा ॥ १२४<br>खरजो गरुडश्चैव मेघनादोऽथ गर्जकः।<br>गजश्च छेदको बाहुस्त्रिशिखो मारिरेव च ॥ १२५ | गगन, भवन, विजय, अजय, महाजय, अंगार, व्यंगार तथा महायश—ये प्रथम आवरणके देवता बताये गये हैं, अब द्वितीय आवरण सुनिये। सुन्दर, प्रचण्डेश, महावर्ण, महासुर, महारोमा, महागर्भ, प्रथम, कनक, खरज, गरुड़, मेघनाद, गर्जक, गज, छेदकबाहु, त्रिशिख तथा मारि। [ये सोलह देवता द्वितीय आवरणके |
अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९७
| हैं] ॥ ११८-१२५ ॥ | |
| वशित्वं कथितो व्यूहः शृणु कामावसायिकम्।<br>विनादो विकटश्चैव वसन्तोऽभय एव च॥ १२६<br>विद्युन्महाबलश्चैव कमलो दमनस्तथा।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ १२७<br>धर्मश्चातिबलः सर्पो महाकायो महानुः।<br>सबलश्चैव भस्माङ्गी दुर्जयो दुरतिक्रमः॥ १२८<br>वेतालो रौरवश्चैव दुर्धरो भोग एव च।<br>वज्रः कालाग्निरुद्रश्च सद्योनादो महागुहः॥ १२९<br>द्वितीयावरणं प्रोक्तं व्यूहश्चैवावसायिकः।<br>कथितः षोडशो व्यूहो द्वितीयावरणं शृणु॥ १३० | वशित्वव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब कामावसायिकव्यूहका श्रवण कीजिये। विनाद, विकट, वसन्त, अभय, विद्युत्, महाबल, कमल तथा दमन—[ये आठ देवता प्रथम आवरणके हैं।] प्रथम आवरण बता दिया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। धर्म, अतिबल, सर्प, महाकाय, महानु, सबल, भस्मांगी, दुर्जय, दुरतिक्रम, वेताल, रौरव, दुर्धर, भोग, वज्र, कालाग्निरुद्र सद्योनाद तथा महागुह—[ये द्वितीय आवरणके देवता हैं।] द्वितीय आवरण कह दिया गया। आवसायिक व्यूहका भी वर्णन कर दिया गया। इस प्रकार सोलह व्यूहवाले आवरणके विषयमें बता दिया गया, अब दूसरे आवरणका श्रवण कीजिये॥ १२६-१३०॥ |
| द्वितीयावरणे चैव दक्षव्यूहे च शक्तयः।<br>प्रथमावरणे चाष्टौ बाह्ये षोडश एव च॥ १३१<br>मनोहरा महानादा चित्रा चित्ररथा तथा।<br>रोहिणी चैव चित्राङ्गी चित्ररेखा विचित्रिका॥ १३२<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणं शृणु।<br>चित्रा विचित्ररूपा च शुभदा कामदा शुभा॥ १३३<br>क्रूरा च पिङ्गला देवी खड्गिका लम्बिका सती।<br>दंष्ट्राली राक्षसी ध्वंसी लोलुपा लोहितामुखी॥ १३४<br>द्वितीयावरणे प्रोक्ताः षोडशैव समासतः।<br>दक्षव्यूहः समाख्यातो दाक्षव्यूहं शृणुष्व मे॥ १३५ | दूसरे आवरणमें दक्षव्यूह प्रथम है, जिसके पहले आवरणमें आठ शक्तियाँ हैं और बाह्य आवरणमें सोलह शक्तियाँ हैं। मनोहरा, महानादा, चित्रा, चित्ररथा, रोहिणी, चित्रांगी, चित्ररेखा तथा विचित्रिका—ये [आठ] शक्तियाँ प्रथम आवरणमें कही गयी हैं; अब दूसरा आवरण सुनिये। चित्रा, विचित्ररूपा, शुभदा, कामदा, शुभा, क्रूरा, पिंगला, देवी, खड्गिका, लम्बिका, सती, दंष्ट्राली, राक्षसी, ध्वंसी, लोलुपा और लोहितामुखी—द्वितीय आवरणमें ये सोलह शक्तियाँ बतायी गयी हैं। दक्षव्यूह संक्षेपमें बता दिया गया, अब मुझसे दाक्षव्यूहका श्रवण कीजिये॥ १३१-१३५॥ |
| सर्वासती विश्वरूपा लम्पटा चामिषप्रिया।<br>दीर्घदंष्ट्रा च वज्रा च लम्बोष्ठी प्राणहारिणी॥ १३६<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>गजकर्णाश्वकर्णा च महाकाली सुभीषणा॥ १३७<br>वातवेगरवा घोरा घना घनरवा तथा।<br>वरघोषा महावर्णा सुघण्टा घण्टिका तथा॥ १३८<br>घण्टेश्वरी महाघोरा घोरा चैवातिघोरिका।<br>द्वितीयावरणे चैव षोडशैव प्रकीर्तिताः॥ १३९<br>दाक्षव्यूहः समाख्यातश्चण्डव्यूहं शृणुष्व मे।<br>अतिघण्टा चातिघोरा कराला करभा तथा॥ १४०<br>विभूतिर्भोगदा कान्तिः शङ्खिनी चाष्टमी स्मृता।<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीया वरणे शृणु॥ १४१ | सर्वासती, विश्वरूपा, लंपटा, आमिषप्रिया, दीर्घदंष्ट्रा, वज्रा, लम्बोष्ठी तथा प्राणहारिणी—[ये दक्षव्यूहके प्रथम आवरणकी शक्तियाँ हैं।] प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। गजकर्णा, अश्वकर्णा, महाकाली, सुभीषणा, वातवेगरवा, घोरा, घना, घनरवा, वरघोषा, महावर्णा, सुघण्टा, घण्टिका, घण्टेश्वरी, महाघोरा, घोरा तथा अतिघोरिका—द्वितीय आवरणमें ये सोलह [शक्तियाँ] बतायी गयी हैं। दाक्षव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मुझसे चण्डव्यूह सुनिये। अतिघण्टा, अतिघोरा, कराला, करभा, विभूति, भोगदा, कान्ति तथा आठवीं शंखिनी—ये प्रथम आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं, |
| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|---|
| ६९८ |
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पत्रिणी चैव गान्धारी योगमाता सुपीवरा।<br>रक्ता मालांशुका वीरा संहारी मांसहारिणी ॥ १४२<br>फलहारी जीवहारी स्वेच्छाहारी च तुण्डिका।<br>रेवती रङ्गिणी सङ्गा द्वितीये षोडशैव तु ॥ १४३ | अब द्वितीय आवरण सुनिये। पत्रिणी, गान्धारी, योगमाता, सुपीवरा, रक्ता, मालांशुका, वीरा, संहारी, मांसहारिणी, फलहारी, जीवहारी, स्वेच्छाहारी, तुण्डिका, रेवती, रंगिणी तथा संगा—ये सोलह [शक्तियाँ] द्वितीय आवरणमें कही गयी हैं॥ १३६-१४३॥ |
| चण्डव्यूहः समाख्यातश्चण्डाव्यूहस्तथोच्यते।<br>चण्डी चण्डमुखी चण्डा चण्डवेगा महारवा ॥ १४४<br>भ्रुकुटी चण्डभूश्चैव चण्डरूपाष्टमी स्मृता।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १४५<br>चन्द्रघ्राणा बला चैव बलजिह्वा बलेश्वरी।<br>बलवेगा महाकाया महाकोपा च विद्युता ॥ १४६<br>कङ्काली कलशी चैव विद्युता चण्डघोषिका।<br>महाघोषा महारावा चण्डभानङ्गचण्डिका ॥ १४७<br>चण्डायाः कथितो व्यूहो हरव्यूहं शृणुष्व मे।<br>चण्डाक्षी कामदा देवी सूकरी कुक्कुटानना ॥ १४८<br>गान्धारी दुन्दुभी दुर्गा सौमित्रा चाष्टमी स्मृता।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १४९<br>मॄतोद्भवा महालक्ष्मीर्वर्णदा जीवरक्षिणी।<br>हरिणी क्षीणजीवा च दण्डवक्त्रा चतुर्भुजा ॥ १५०<br>व्योमचारी व्योमरूपा व्योमव्यापी शुभोदया।<br>गृहचारी सुचारी च विषाहारी विषार्तिहा ॥ १५१ | चण्डव्यूह कह दिया गया, अब चण्डाव्यूह बताया जाता है। चण्डी, चण्डमुखी, चण्डा, चण्डवेगा, महारवा, भ्रुकुटी, चण्डभू तथा आठवीं शक्ति चण्डरूपा बतायी गयी है। प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। चन्द्रघ्राणा, बला, बलजिह्वा, बलेश्वरी, बलवेगा, महाकाया, महाकोपा, विद्युता, कंकाली, कलशी, विद्युता, चण्डघोषिका, महाघोषा, महारावा, चण्डभा, अनंग-चण्डिका—[ये सोलह शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें कही गयी हैं।] चण्डाव्यूहका वर्णन मैंने कर दिया, अब हरव्यूहके विषयमें मुझसे सुनिये। चण्डाक्षी, कामदादेवी, सूकरी, कुक्कुटानना, गान्धारी, दुन्दुभी, दुर्गा और आठवीं शक्ति सौमित्रा कही गयी है। प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। मृतोद्भवा, महालक्ष्मी, वर्णदा, जीवरक्षिणी, हरिणी, क्षीणजीवा, दण्डवक्त्रा, चतुर्भुजा, व्योमचारी, व्योमरूपा, व्योमव्यापी, शुभोदया, गृहचारी, सुचारी, विषाहारी और विषार्तिहा—[ये सोलह शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें बतायी गयी हैं]॥ १४४-१५१॥ |
| हरव्यूहः समाख्यातो हराया व्यूह उच्यते।<br>जम्भाच्युता च कङ्कारी देविका दुर्धरा वहा ॥ १५२<br>चण्डिका चपला चेति प्रथमावरणे स्मृताः।<br>चण्डिका चामरी चैव भण्डिका च शुभानना ॥ १५३<br>पिण्डिका मुण्डिनी मुण्डा शाकिनी शाङ्करी तथा।<br>कर्तरी भर्तरी चैव भागिनी यज्ञदायिनी ॥ १५४<br>यमदंष्ट्रा महादंष्ट्रा कराला चेति शक्तयः।<br>हरायाः कथितो व्यूहः शौण्डव्यूहं शृणुष्व मे ॥ १५५ | हरव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब हराव्यूह बताया जा रहा है। जंभा, अच्युता, कंकारी, देविका, दुर्धरा, वहा, चण्डिका तथा चपला—[ये आठ शक्तियाँ] प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। चण्डिका, चामरी, भण्डिका, शुभानना, पिण्डिका, मुण्डिनी, मुण्डा, शाकिनी, शांकरी, कर्तरी, भर्तरी, भागिनी, यज्ञदायिनी, यमदंष्ट्रा, महादंष्ट्रा तथा कराला—[ये द्वितीय आवरणकी सोलह] शक्तियाँ हैं। |
| विकराली कराली च कालजङ्घा यशस्विनी।<br>वेगा वेगवती यज्ञा वेदाङ्गा चाष्टमी स्मृता ॥ १५६<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>वज्रा शङ्खातिशङ्खा वा बला चैवाबला तथा ॥ १५७<br>अञ्जनी मोहिनी माया विकटाङ्गी नली तथा।<br>गण्डकी दण्डकी घोणा शोणा सत्यवती तथा ॥ १५८ | हराव्यूह कह दिया गया, अब शौण्डव्यूह मुझसे सुनिये। विकराली, कराली, कालजंघा, यशस्विनी, वेगा, वेगवती, यज्ञा तथा आठवीं शक्ति वेदांगा बतायी गयी है। प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। वज्रा, शंखा, अतिशंखा, बला, अबला, अंजनी, मोहिनी, माया, विकटांगी, नली, गण्डकी, |
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९९
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कल्लोला चेति क्रमशः षोडशैव यथाविधि।<br>शौण्डव्यूहः समाख्यातः शौण्डाया व्यूह उच्यते॥ १५९<br><br>दन्तुरा रौद्रभागा च अमृता सकुला शुभा।<br>चलजिह्वार्यनेत्रा च रूपिणी दारिका तथा॥ १६०<br><br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>खादिका रूपनामा च संहारी च क्षमान्तका॥ १६१<br><br>कण्डिनी पेषिणी चैव महात्रासा कृतान्तिका।<br>दण्डिनी किङ्करी बिम्बा वर्णिनी चाम्लाङ्गिनी॥ १६२<br><br>द्रविणी द्राविणी चैव शक्तयः षोडशैव तु।<br>कथितो हि मनोरम्यः शौण्डाया व्यूह उत्तमः॥ १६३<br><br>प्रथमाख्यं प्रवक्ष्यामि व्यूहं परमशोभनम्।<br>प्लविनी प्लावनी शोभा मन्दा चैव मदोत्कटा॥ १६४<br><br>मन्दाक्षेपा महादेवी प्रथमावरणे स्मृताः।<br>कामसन्दीपिनी देवी अतिरूपा मनोहरा॥ १६५<br><br>महावशा मदग्राहा विह्वला मदविह्वला।<br>अरुणा शोषणा दिव्या रेवती भाण्डनायिका॥ १६६<br><br>स्तम्भिनी घोररक्ताक्षी स्मररूपा सुघोषणा।<br>व्यूहः प्रथम आख्यातः स्वायम्भुव यथा तथा॥ १६७<br><br>कथितं प्रथमव्यूहं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे।<br>घोरा घोरतराघोरा अतिघोराघनायिका॥ १६८<br><br>धावनी क्रोष्टुका मुण्डा चाष्टमी परिकीर्तिता।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ १६९<br><br>भीमा भीमतराभीमा शस्ता चैव सुवर्तुला।<br>स्तम्भिनी रोदनी रौद्रा रुद्रवत्यचलाचला॥ १७०<br><br>महाबला महाशान्तिः शाला शान्ता शिवाशिवा।<br>बृहत्कक्षा महानासा षोडशैव प्रकीर्तिता॥ १७१<br><br>प्रथमायाः समाख्यातो मन्मथव्यूह उच्यते।<br>तालकर्णी च बाला च कल्याणी कपिला शिवा॥ १७२<br><br>इष्टिस्रुष्टिः प्रतिज्ञा च प्रथमावरणे स्मृताः।<br>ख्यातिः पुष्टिकरी तुष्टिर्जला चैव श्रुतिर्धृतिः॥ १७३<br><br>कामदा शुभदा सौम्या तेजिनी कामतन्त्रिका।<br>धर्मा धर्मवशा शीला पापहा धर्मवर्धिनी॥ १७४ | दण्डकी, घोणा, शोणा, सत्यवती तथा कल्लोला—ये क्रमशः सोलह शक्तियाँ हैं। शौण्डव्यूह कह दिया गया, अब शौण्डाव्यूह कहा जाता है॥ १५२-१५९॥<br><br>दन्तुरा, रौद्रभागा, अमृता, शुभ सकुला, चलजिह्वा, आर्यनेत्रा, रूपिणी तथा दारिका—[प्रथम आवरणमें ये आठ शक्तियाँ हैं।] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। खादिका, रूपनामा, संहारी, क्षमा, अन्तका, कण्डिनी, पेषिणी, महात्रासा, कृतान्तिका, दण्डिनी, किंकरी, बिम्बा, वर्णिनी, अम्लांगिनी, द्रविणी तथा द्राविणी—ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं। मैंने इस मनोरम उत्तम शौण्डाव्यूहका वर्णन कर दिया॥ १६०-१६३॥<br><br>इसके बाद मैं प्रथम नामक परम सुन्दर व्यूहका वर्णन करूँगा। प्लविनी, प्लावनी, शोभा, मन्दा, मदोत्कटा, मन्दा, आक्षेपा तथा महादेवी—ये पहले आवरणकी [शक्तियाँ] कही गयी हैं। देवी कामसंदीपनी, अतिरूपा, मनोहरा, महावशा, मदग्राहा, विह्वला, मदविह्वला, अरुणा, शोषणा, दिव्या, रेवती, भाण्डनायिका, स्तम्भिनी, घोररक्ताक्षी, स्मररूपा तथा सुघोषणा—[ये दूसरे आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं।] हे स्वायम्भुव! प्रथम व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मैं प्रथमा व्यूहका वर्णन करूँगा, उसे मुझसे सुनिये। घोरा, घोरतरा, अघोरा, अतिघोरा, अघनायिका, धावनी, क्रोष्टुका और आठवीं मुण्डा—[ये पहले आवरणकी शक्तियाँ] कही गयी हैं। पहला आवरण कह दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये। भीमा, भीमतरा, अभीमा, उत्तम सुवर्तुला, स्तम्भिनी, रोदनी, रौद्रा, रुद्रवती, अचलाचला, महाबला, महाशान्ति, शाला, शान्ता, शिवाशिवा, बृहत्कक्षा, महानासा—[दूसरे आवरणकी] ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं॥ १६४-१७१॥<br><br>प्रथमा व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मन्मथव्यूह कहा जाता है। तालकर्णी, बाला, कल्याणी, कपिला, शिवा, इष्टि, तुष्टि तथा प्रतिज्ञा—ये पहले आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं। ख्याति, पुष्टिकरी, तुष्टि, जला, श्रुति, धृति, कामदा, शुभदा, सौम्या, तेजिनी, कामतन्त्रिका, धर्मा, धर्मवशा, शीला, पापहा तथा धर्मवर्धिनी—[ये सोलह शक्तियाँ दूसरे आवरणकी |