श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शङ्किनी हालिनी चैव लङ्कावर्णा च कल्किनी।<br>यक्षिणी मालिनी चैव वमनी च रसात्मनी॥ ९०<br>प्रथमावरणे चैव शक्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>चण्डा घण्टा महानादा सुमुखी दुर्मुखी बला॥ ९१<br>रेवती प्रथमा घोरा सैन्या लीना महाबला।<br>जया च विजया चैव अपरा चापराजिता॥ ९२<br>द्वितीयावरणे चैव शक्तयः षोडशैव तु।<br>कथितो गोमुखीव्यूहो भद्रकर्णीं शृणुष्व मे॥ ९३ | हूँ। शंकिनी, हालिनी, लंकावर्णा, कल्किनी, यक्षिणी, मालिनी, वमनी, रसात्मनी—ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। चण्डा, घण्टा, महानादा, सुमुखी, दुर्मुखी, बला, रेवती, प्रथमा, घोरा, सैन्या, लीना, महाबला, जया, विजया, अजिता और अपराजिता—ये सोलह शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें कही गयी हैं। गोमुखव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब भद्रकर्णीव्यूहके विषयमें सुनिये॥ ८५—९३॥ |
| महाजया विरूपाक्षी शुक्लाभाकाशमातृका।<br>संहारी जातहारी च दंष्ट्राली शुष्करेवती॥ ९४<br>प्रथमावरणे चाष्टौ शक्तयः परिकीर्तिताः।<br>पिपीलिका पुण्यहारी अशनी सर्वहारिणी॥ ९५<br>भद्रहा विश्वहारी च हिमा योगेश्वरी तथा।<br>छिद्रा भानुमती छिद्रा सैंहिकी सुरभी समा॥ ९६<br>सर्वभव्या च वेगाख्या शक्तयः षोडशैव तु।<br>महाव्यूहाष्टकं प्रोक्तमुपव्यूहाष्टकं शृणु॥ ९७ | महाजया, विरूपाक्षी, शुक्लाभा, आकाशमातृका, संहारी, जातहारी, दंष्ट्राली और शुष्करेवती—ये प्रथम आवरणकी आठ शक्तियाँ बतायी गयी हैं। पिपीलिका, पुण्यहारी, अशनी, सर्वहारिणी, भद्रहा, विश्वहारी, हिमा, योगेश्वरी, छिद्रा, भानुमती, छिद्रा, सैंहिकी, सुरभी, समा, सर्वभव्या तथा वेगा—द्वितीय आवरणकी ये सोलह शक्तियाँ हैं। यह आठ महाव्यूहोंका वर्णन किया गया, अब आठ उपव्यूहोंको सुनिये॥ ९४—९७॥ |
| अणिमाव्यूहमावेष्ट्य प्रथमावरणे क्रमात्।<br>ऐन्द्रा तु चित्रभानुश्च वारुणी दण्डिरेव च॥ ९८<br>प्राणरूपी तथा हंसः स्वात्मशक्तिः पितामहः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ ९९<br>केशवो भगवान् रुद्रश्चन्द्रमा भास्करस्तथा।<br>महात्मा च तथा ह्यात्मा ह्यन्तरात्मा महेश्वरः॥ १००<br>परमात्मा ह्यणुर्जीवः पिङ्गलः पुरुषः पशुः।<br>भोक्ता भूतपतिर्भीमो द्वितीयावरणे स्मृताः॥ १०१<br>कथितश्चाणिमाव्यूहो लघिमाख्यं वदामि ते।<br>श्रीकण्ठोऽन्तश्च सूक्ष्मश्च त्रिमूर्तिः शशकस्तथा॥ १०२<br>अमरेशः स्थितीशश्च दारतश्च तथाष्टमः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ १०३<br>स्थाणुर्हरश्च दण्डेशो भौक्तीशः सुरपुङ्गवः।<br>सद्योजातोऽनुग्रहेशः क्रूरसेनः सुरेश्वरः॥ १०४<br>क्रोधीशश्च तथा चण्डः प्रचण्डः शिव एव च।<br>एकरुद्रस्तथा कूर्मश्चैकनेत्रश्चतुर्मुखः॥ १०५<br>द्वितीयावरणे रुद्राः षोडशैव प्रकीर्तिताः।<br>कथितो लघिमाव्यूहो महिमां शृणु सुव्रत॥ १०६ | अणिमाव्यूहको आवेष्टित करके प्रथम आवरणमें क्रमसे ऐन्द्रा, चित्रभानु, वारुणी, दण्ड, प्राणरूपी, हंस, स्वात्मशक्ति और पितामह—ये शक्तियाँ हैं। प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। केशव, भगवान् रुद्र, चन्द्रमा, भास्कर, महात्मा, आत्मा, अन्तरात्मा, महेश्वर, परमात्मा, सूक्ष्म जीव, पिंगल, पुरुष, पशु, भोक्ता, भूतपति तथा भीम—ये शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें कही गयी हैं। अणिमाव्यूह कह दिया गया, अब लघिमा नामक व्यूहका वर्णन आपसे करता हूँ। श्रीकण्ठ, अन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, शशक, अमरेश, स्थितीश और आठवाँ दारत—[ये आठ शक्तियाँ हैं।] प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। स्थाणु, हर, दण्डेश, सुरश्रेष्ठ भौक्तीश, सद्योजात, अनुग्रहेश, क्रूरसेन, सुरेश्वर, क्रोधीश, चण्ड, प्रचण्ड, शिव, एकरुद्र, कूर्म, एकनेत्र तथा चतुर्मुख—द्वितीय आवरणमें ये ही सोलह रुद्र बताये गये हैं। हे सुव्रत! लघिमाव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब महिमाव्यूहका श्रवण कीजिये॥ ९८—१०६॥ |
| अजेशः क्षेमरुद्रश्च सोमोऽंशो लाङ्गली तथा।<br>दण्डारुश्चार्धनारी च एकान्तश्चान्त एव च॥ १०७ | अजेश, क्षेमरुद्र, सोम, अंश, लांगली, दण्डारु, अर्धनारी, एकान्त, अन्त, भुजंग नामक पाली, पिनाकी, |