श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 698, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 698
| ६९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| पाली भुजङ्गनामा च पिनाकी खड्गिरेव च।<br>काम ईशस्तथा श्वेतो भृगुः षोडश वै स्मृताः ॥ १०८<br>कथितो महिमाव्यूहः प्राप्तिव्यूहं शृणुष्व मे।<br>संवर्तो लकुलीशश्च वाडवो हस्तिरेव च ॥ १०९<br>चण्डयक्षो गणपतिर्महात्मा भृगुजॊऽष्टमः।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ ११०<br>त्रिविक्रमो महाजिह्वो ऋक्षः श्रीभद्र एव च।<br>महादेवो दधीचश्च कुमारश्च परावरः ॥ १११<br>महादंष्ट्रः करालश्च सूचकश्च सुवर्धनः।<br>महाध्वांक्षो महानन्दो दण्डी गोपालकस्तथा ॥ ११२ | खड्गि, काम, ईश, श्वेत तथा भृगु—ये सोलह कहे गये हैं। यह महिमाव्यूह कह दिया गया, अब मुझसे प्राप्तिव्यूहका श्रवण कीजिये। संवर्त, लकुलीश, वाडव, हस्ति, चण्डयक्ष, गणपति, महात्मा और आठवाँ भृगुज—[ये आठ प्रथम आवरणके देवता हैं।] प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरणको सुनिये। त्रिविक्रम, महाजिह्व, ऋक्ष, श्रीभद्र, महादेव, दधीच, कुमार, परावर, महादंष्ट्र, कराल, सूचक, सुवर्धन, महाध्वांक्ष, महानन्द, दण्डी तथा गोपाल—[ये सोलह द्वितीय आवरणके देवता हैं]॥ १०७–११२॥ |
| प्राप्तिव्यूहः समाख्यातः प्राकाम्यं शृणु सुव्रत।<br>पुष्पदन्तो महानागो विपुला्रन्दकारकः ॥ ११३<br>शुक्लो विशालः कमलो बिल्वश्चारुण एव च।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ ११४<br>रतिप्रियः सुरेशानश्चित्राङ्गश्च सुदुर्जयः।<br>विनायकः क्षेत्रपालो महामोहश्च जङ्गलः ॥ ११५<br>वत्सपुत्रो महापुत्रो ग्रामदेशाधिपस्तथा।<br>सर्वावस्थाधिपो देवो मेघनादः प्रचण्डकः ॥ ११६<br>कालदूतश्च कथितो द्वितीयावरणं स्मृतम्।<br>प्राकाम्यः कथितो व्यूह ऐश्वर्यं कथयामि ते ॥ ११७ | हे सुव्रत! प्राप्तिव्यूह बता दिया गया, प्राकाम्यव्यूहका श्रवण कीजिये। पुष्पदन्त, महानाग, विफुलानन्दकारक, शुक्ल, विशाल, कमल, बिल्व तथा अरुण—[ये आठ प्रथम आवरणके देवता हैं।] प्रथम आवरणका वर्णन कर दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। रतिप्रिय, सुरेशान, चित्रांग, सुदुर्जय, विनायक, क्षेत्रपाल, महामोह, जंगल, वत्सपुत्र, महापुत्र, ग्रामदेशाधिप, सर्वावस्थाधिप, देव, मेघनाद, प्रचण्डक तथा कालदूत—ये सोलह देवता कहे गये हैं। इसे द्वितीय आवरण कहा गया है। प्राकाम्यव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब आपको ऐश्वर्यव्यूह बता रहा हूँ॥ ११३–११७॥ |
| मङ्गला चर्चिका चैव योगेशा हरदायिका।<br>भासुरा सुरमाता च सुन्दरी मातृकाष्टमी ॥ ११८<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणे शृणु।<br>गणाधिपश्च मन्त्रज्ञो वरदेवः षडाननः ॥ ११९<br>विदग्धश्च विचित्रश्च अमोघो मोघ एव च।<br>अश्वीरुद्रश्च सोमेशश्चोत्तमोदुम्बरस्तथा ॥ १२०<br>नारसिंहश्च विजयस्तथा इन्द्रगुहः प्रभुः।<br>अपाम्यतिश्च विधिना द्वितीयावरणं स्मृतम् ॥ १२१<br>ऐश्वर्यः कथितो व्यूहो वशित्वं पुनरुच्यते। | मंगला, चर्चिका, योगेशा, हरदायिका, भासुरा, सुरमाता, सुन्दरी तथा आठवीं मातृका—ये [आठ शक्तियाँ] प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। अब द्वितीय आवरण सुनिये। गणाधिप, मंत्रज्ञ, वरदेव, षडानन, विदग्ध, विचित्र, अमोघ, मोघ, अश्वीरुद्र, सोमेश, उत्तमोदुम्बर, नारसिंह, विजय, इन्द्रगुह, प्रभु तथा अपाम्पति—इस प्रकार इसे द्वितीय आवरण कहा गया है। ऐश्वर्यव्यूह कह दिया गया, अब वशित्वव्यूह बताया जा रहा है। |
| गगनो भवनश्चैव विजयो ह्यजयस्तथा ॥ १२२<br>महाजयस्तथाङ्गारो व्यङ्गारश्च महायशाः।<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणे शृणु ॥ १२३<br>सुन्दरश्च प्रचण्डेशो महावर्णो महासुरः।<br>महारोमा महागर्भः प्रथमः कनकस्तथा ॥ १२४<br>खरजो गरुडश्चैव मेघनादोऽथ गर्जकः।<br>गजश्च छेदको बाहुस्त्रिशिखो मारिरेव च ॥ १२५ | गगन, भवन, विजय, अजय, महाजय, अंगार, व्यंगार तथा महायश—ये प्रथम आवरणके देवता बताये गये हैं, अब द्वितीय आवरण सुनिये। सुन्दर, प्रचण्डेश, महावर्ण, महासुर, महारोमा, महागर्भ, प्रथम, कनक, खरज, गरुड़, मेघनाद, गर्जक, गज, छेदकबाहु, त्रिशिख तथा मारि। [ये सोलह देवता द्वितीय आवरणके |