श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 699, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 699
अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९७
| हैं] ॥ ११८-१२५ ॥ | |
| वशित्वं कथितो व्यूहः शृणु कामावसायिकम्।<br>विनादो विकटश्चैव वसन्तोऽभय एव च॥ १२६<br>विद्युन्महाबलश्चैव कमलो दमनस्तथा।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ १२७<br>धर्मश्चातिबलः सर्पो महाकायो महानुः।<br>सबलश्चैव भस्माङ्गी दुर्जयो दुरतिक्रमः॥ १२८<br>वेतालो रौरवश्चैव दुर्धरो भोग एव च।<br>वज्रः कालाग्निरुद्रश्च सद्योनादो महागुहः॥ १२९<br>द्वितीयावरणं प्रोक्तं व्यूहश्चैवावसायिकः।<br>कथितः षोडशो व्यूहो द्वितीयावरणं शृणु॥ १३० | वशित्वव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब कामावसायिकव्यूहका श्रवण कीजिये। विनाद, विकट, वसन्त, अभय, विद्युत्, महाबल, कमल तथा दमन—[ये आठ देवता प्रथम आवरणके हैं।] प्रथम आवरण बता दिया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। धर्म, अतिबल, सर्प, महाकाय, महानु, सबल, भस्मांगी, दुर्जय, दुरतिक्रम, वेताल, रौरव, दुर्धर, भोग, वज्र, कालाग्निरुद्र सद्योनाद तथा महागुह—[ये द्वितीय आवरणके देवता हैं।] द्वितीय आवरण कह दिया गया। आवसायिक व्यूहका भी वर्णन कर दिया गया। इस प्रकार सोलह व्यूहवाले आवरणके विषयमें बता दिया गया, अब दूसरे आवरणका श्रवण कीजिये॥ १२६-१३०॥ |
| द्वितीयावरणे चैव दक्षव्यूहे च शक्तयः।<br>प्रथमावरणे चाष्टौ बाह्ये षोडश एव च॥ १३१<br>मनोहरा महानादा चित्रा चित्ररथा तथा।<br>रोहिणी चैव चित्राङ्गी चित्ररेखा विचित्रिका॥ १३२<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणं शृणु।<br>चित्रा विचित्ररूपा च शुभदा कामदा शुभा॥ १३३<br>क्रूरा च पिङ्गला देवी खड्गिका लम्बिका सती।<br>दंष्ट्राली राक्षसी ध्वंसी लोलुपा लोहितामुखी॥ १३४<br>द्वितीयावरणे प्रोक्ताः षोडशैव समासतः।<br>दक्षव्यूहः समाख्यातो दाक्षव्यूहं शृणुष्व मे॥ १३५ | दूसरे आवरणमें दक्षव्यूह प्रथम है, जिसके पहले आवरणमें आठ शक्तियाँ हैं और बाह्य आवरणमें सोलह शक्तियाँ हैं। मनोहरा, महानादा, चित्रा, चित्ररथा, रोहिणी, चित्रांगी, चित्ररेखा तथा विचित्रिका—ये [आठ] शक्तियाँ प्रथम आवरणमें कही गयी हैं; अब दूसरा आवरण सुनिये। चित्रा, विचित्ररूपा, शुभदा, कामदा, शुभा, क्रूरा, पिंगला, देवी, खड्गिका, लम्बिका, सती, दंष्ट्राली, राक्षसी, ध्वंसी, लोलुपा और लोहितामुखी—द्वितीय आवरणमें ये सोलह शक्तियाँ बतायी गयी हैं। दक्षव्यूह संक्षेपमें बता दिया गया, अब मुझसे दाक्षव्यूहका श्रवण कीजिये॥ १३१-१३५॥ |
| सर्वासती विश्वरूपा लम्पटा चामिषप्रिया।<br>दीर्घदंष्ट्रा च वज्रा च लम्बोष्ठी प्राणहारिणी॥ १३६<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>गजकर्णाश्वकर्णा च महाकाली सुभीषणा॥ १३७<br>वातवेगरवा घोरा घना घनरवा तथा।<br>वरघोषा महावर्णा सुघण्टा घण्टिका तथा॥ १३८<br>घण्टेश्वरी महाघोरा घोरा चैवातिघोरिका।<br>द्वितीयावरणे चैव षोडशैव प्रकीर्तिताः॥ १३९<br>दाक्षव्यूहः समाख्यातश्चण्डव्यूहं शृणुष्व मे।<br>अतिघण्टा चातिघोरा कराला करभा तथा॥ १४०<br>विभूतिर्भोगदा कान्तिः शङ्खिनी चाष्टमी स्मृता।<br>प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीया वरणे शृणु॥ १४१ | सर्वासती, विश्वरूपा, लंपटा, आमिषप्रिया, दीर्घदंष्ट्रा, वज्रा, लम्बोष्ठी तथा प्राणहारिणी—[ये दक्षव्यूहके प्रथम आवरणकी शक्तियाँ हैं।] प्रथम आवरण कह दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। गजकर्णा, अश्वकर्णा, महाकाली, सुभीषणा, वातवेगरवा, घोरा, घना, घनरवा, वरघोषा, महावर्णा, सुघण्टा, घण्टिका, घण्टेश्वरी, महाघोरा, घोरा तथा अतिघोरिका—द्वितीय आवरणमें ये सोलह [शक्तियाँ] बतायी गयी हैं। दाक्षव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मुझसे चण्डव्यूह सुनिये। अतिघण्टा, अतिघोरा, कराला, करभा, विभूति, भोगदा, कान्ति तथा आठवीं शंखिनी—ये प्रथम आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं, |