श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६८३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| नामिकाग्रं गृहीत्वा दक्षिणाङ्गुष्ठानामिकामूलं गृही-<br>त्वाग्निज्वलोत्प्लवनं स्वाहान्तेन तुरीयेण पुनः षड्<br>दर्भान् गृहीत्वा पूर्ववत्स्वात्मसम्प्लवनं स्वाहान्तेनाद्येन<br>कुशद्वयपवित्रबन्धनं चाद्येन घृते न्यशेदिति पवित्री-<br>करणम्॥ ८३ | अंगुल) कुशाके पवित्रकका अग्रभाग अपने वाम<br>हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे ग्रहण करके तथा<br>दक्षिण हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे पवित्रकका<br>मूल ग्रहण करके स्वाहान्त चतुर्थ मन्त्रसे अग्निज्वालाका<br>उत्प्लवन करना चाहिये। इसके बाद छः कुश लेकर<br>स्वाहान्त प्रथम मन्त्रसे पूर्वकी भाँति अपने देहमें<br>सम्प्लवन करके दो कुशोंका पवित्रक बनाकर प्रथम<br>मन्त्रसे उसे घृतमें डाल देना चाहिये—यह पवित्रीकरण<br>है॥ ८२-८३॥ |
| दर्भद्वयं प्रगृह्याग्निप्रज्वालनं घृतं त्रिधा वर्तयेत्।<br>सम्प्रोक्ष्याग्नौ निधापयेदिति नीराजनम्॥ ८४ | घृतप्लुत दो दर्भ लेकर उसे प्रज्वलित करके<br>घृतके ऊपर तीन बार घुमाये और पुनः सम्प्रोक्षण करके<br>अग्निमें डाल दे—यह नीराजन है। पुनः दर्भोंको लेकर<br>कीट आदि देख करके अर्घ्यजलसे सम्प्रोक्षण करके<br>दर्भोंको अग्निमें डाल देना चाहिये—यह अवद्योतन है।<br>दो दर्भ लेकर अग्निमें प्रज्वलित करके घृतको देखे—<br>यह निरीक्षण है॥ ८४-८६॥ |
| पुनर्दर्भान् गृहीत्वा कीटकादि निरीक्ष्यार्घ्येण सम्प्रोक्ष्य<br>दर्भानग्नौ निधाय इत्यवद्योतनम्॥ ८५ | |
| दर्भद्वयं गृहीत्वाग्निज्वल्य घृतं निरीक्षयेत्॥ ८६ | |
| दर्भेण गृहीत्वा तेनाग्रद्वयेन शुक्लपक्षद्वयेनाद्येनेति<br>कृष्णपक्षसम्पातनं घृतं त्रिभागेन विभज्य<br>स्रुवेणैकभागेनाज्येनाग्नये स्वाहा द्वितीयेनाज्येन<br>सोमाय स्वाहा आज्येन ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा<br>आज्येनाग्नये स्विष्टकृते स्वाहा॥ ८७ | इसके बाद अन्य दर्भके साथ दो पवित्रक लेकर<br>उनमें शुक्लपक्षद्वयकी भावना करे तथा उन दोनोंके<br>सहित घृतको सद्योजातमन्त्रसे पृथक् कर दे, शेषको<br>कृष्णपक्षकी भावनासे पृथक् करे; इस प्रकार घीको तीन<br>भागोंमें विभक्त करके स्रुवद्वारा घृतके एक भागको<br>‘अग्नये स्वाहा’, घृतके द्वितीय भागको ‘सोमाय<br>स्वाहा’ और घृतके तृतीय भागको ‘अग्नीषोमाभ्यां<br>स्वाहा’ तथा अवशिष्ट घृतको ‘अग्नये स्विष्टकृते<br>स्वाहा’—ऐसा कहकर होम करे॥ ८७॥ |
| पुनः कुशेन गृहीत्वा संहिताभिमन्त्रेण<br>नमोऽन्तेनाभिमन्त्रयेत्॥ ८८ | तत्पश्चात् कुशयुक्त पवित्रक लेकर अन्तमें नमः<br>लगाकर संहिता मन्त्रसे घृतको अभिमन्त्रित करना<br>चाहिये। |
| अभिमन्त्र्य धेनुमुद्राप्रदर्शनकवचावगुण्ठनास्त्रेण<br>रक्षाम्। अथ संस्कृते निधापयेद् आज्यसंस्कारः॥ ८९ | अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्रा प्रदर्शित करे।<br>कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्रमन्त्रसे रक्षण करना<br>चाहिये, इसके बाद संस्कारित पवित्रकोंको अग्निमें<br>डाल देना चाहिये—यह आज्यसंस्कार है॥ ८८-८९॥ |
| आज्येन स्रुग्वदनेन चक्राभिधारणं शक्तिबीजादी-<br>शानमूर्तये स्वाहा। पूर्ववत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा<br>अघोरहृदयाय स्वाहा वामदेवाय गुह्याय स्वाहा<br>सद्योजातमूर्तये स्वाहा। इति वक्त्रोद्घाटनम्॥ ९० | स्रुवमें भरकर लिये गये घृतसे शक्तिबीजमन्त्र<br>(ह्रीं)-के द्वारा आहुति दे—यह चक्राभिधारण है। इसके<br>बाद ईशानमूर्तये स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा,<br>अघोरहृदाय स्वाहा, वामदेवगुह्याय स्वाहा, |
| ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा तत्पुरुषवक्त्राय<br>अघोरहृदयाय स्वाहा अघोरहृदाय वामगुह्याय |