श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सद्योजातमूर्तये स्वाहा इति वक्त्रसन्धानम्॥ ९१<br><br>ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदाय<br>वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा इति<br>वक्त्रैक्यकरणम्॥ ९२ | सद्योजातमूर्तये स्वाहा—इन [पाँच] मन्त्रोंसे आहुति दे—यह वक्त्रोद्घाटन है। ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय अघोरहृदाय स्वाहा, अघोरहृदाय वामगुह्याय सद्योजातमूर्तये स्वाहा—इन मन्त्रोंसे आहुति दे—यह वक्त्रसन्धान है। ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदाय वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा—इस मन्त्रसे आहुति दे—यह वक्त्रैक्यकरण है॥ ९०–९२॥ |
| शिवाग्निं जनयित्वैवं सर्वकर्माणि कारयेत्।<br>केवलं जिह्वया वापि शान्तिकाद्यानि सर्वदा॥ ९३<br><br>गर्भाधानादिकार्येषु वह्नेः प्रत्येकमव्यय।<br>दश आहुतयो देया योनिबीजेन पञ्चधा॥ ९४ | इस प्रकार शिवाग्नि उत्पन्न करके समस्त कार्य सम्पन्न करने चाहिये अथवा केवल अग्निजिह्वासे भी शान्तिक आदि कार्य सदा करने चाहिये। हे अव्यय! गर्भाधान आदि प्रत्येक संस्कारोंमें योनिबीजसे अग्निमें दस-दस या पाँच-पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये॥ ९३-९४॥ |
| शिवाग्नौ कल्पयेद्दिव्यं पूर्ववत्परमासनम्।<br>आवाहनं तथा न्यासं यथा देवे तथार्चनम्॥ ९५<br><br>मूलमन्त्रं सकृज्जप्त्वा देवदेवं प्रणम्य च।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा सगर्भं सर्वसम्मतम्॥ ९६<br><br>परिक्षेचनपूर्वं च तदिध्ममभिघार्य च।<br>जुहुयादग्निमध्ये तु ज्वलितेऽथ महामुने॥ ९७ | शिवाग्निमें पूर्वकी भाँति परम दिव्य आसन कल्पित करना चाहिये और उसपर देवका आवाहन, स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। हे महामुने! मूलमन्त्रका एक बार जप करके देवदेवको प्रणामकर फिर तीन बार सर्वसम्मत सगर्भ प्राणायाम करके परिक्षेचनपूर्वक उस समिधाको आधारहोमको उद्देश्य करके प्रज्वलित अग्निके मध्यमें हवन करना चाहिये॥ ९५–९७॥ |
| आघारावपि चाधाय चाज्येनैव तु षण्मुखे।<br>आज्यभागौ तु जुहुयाद्विधिनैव घृतेन च॥ ९८<br><br>चक्षुषी चाज्यभागौ तु चाग्नये च तथोत्तरे।<br>आत्मनो दक्षिणे चैव सोमायेति द्विजोत्तम॥ ९९<br><br>प्रत्यङ्मुखस्य देवस्य शिवाग्नेर्ब्रह्मणः सुत।<br>अक्षि वै दक्षिणं चैव चोत्तरं चोत्तरं तथा॥ १००<br><br>दक्षिणं तु महाभाग भवत्येव न संशयः।<br>आज्येनाहुतयस्तत्र मूलेनैव दशैव तु॥ १०१ | स्रुवमें दो-दो आधारहोम-निमित्तक तथा आज्यभाग-होमनिमित्तक आहुतियाँ लेकर विधिपूर्वक सद्योजात आदि छः मन्त्ररूप मुखवाली अग्निमें उनका हवन करना चाहिये। हे द्विजश्रेष्ठ! अग्नये स्वाहा—ऐसा कहकर अपने उत्तरमें एवं सोमाय स्वाहा—ऐसा कहकर अपने दक्षिणमें नेत्रस्वरूप दोनों आज्यभागोंकी आहुतियाँ देनी चाहिये। हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! हे महाभाग! पश्चिमकी ओर मुखवाले शिवाग्निरूप महादेवका दाहिना नेत्र उत्तरकी ओर तथा बायाँ नेत्र दक्षिणकी ओर होता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ९८–१०० १/२॥ |
| चरुणा च यथावद्धि समिद्भिश्च तथा स्मृतम्।<br>पूर्णाहुतिं ततो दद्यान्मूलमन्त्रेण सुव्रत॥ १०२<br><br>सर्वावरणदेवानां पञ्चपञ्चैव पूर्ववत्।<br>ईशानादिक्रमेणैव शक्तिबीजक्रमेण च॥ १०३ | घृत, चरु तथा समिधाओंसे मूलमन्त्रके द्वारा यथाविधि दस आहुतियाँ देनी चाहिये—ऐसा कहा गया है। हे सुव्रत! तदनन्तर मूल मन्त्रसे पूर्णाहुति प्रदान करनी चाहिये। ईशान आदि मन्त्रोंके क्रमसे तथा |