भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 687, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 687
अध्याय २६ ]शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य६८५

| प्रायश्चित्तमघोरेण स्विष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम्।<br>त्रिप्रकारं मया प्रोक्तमग्निकार्यं सुशोभनम्॥ १०४ | शक्तिबीज (ह्रीँ)-के क्रमसे सभी आवरण देवताओंके लिये पूर्वकी भाँति पाँच-पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। अघोरमन्त्रसे प्रायश्चित्तहोम तथा स्विष्टकृत्पर्यन्त पूर्वकी भाँति कहा गया है। इस प्रकार मैंने अत्यन्त सुन्दर तीन प्रकारके अग्निकार्यका वर्णन कर दिया॥ १०१-१०४॥ | | यथावसरमेवं हि कुर्यान्नित्यं महामुने।<br>जीवितान्ते लभेत्स्वर्गं लभते अग्निदीपनम्॥ १०५ | हे महामुने! जो [मनुष्य] यथासमय नित्य इसे करता है, वह मृत्युके अनन्तर स्वर्ग प्राप्त करता है, अग्निके समान दीप्ति प्राप्त करता है। किसी भी प्रकारके कर्मके लिये उसे नरककी प्राप्ति नहीं होती है। त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम)-की इच्छावाला अहिंसक (परनाशशून्य) होम करे और मुक्तिकी इच्छावाला शिवाग्निको अपने हृदयमें स्थित समझकर चिन्तन करे एवं ध्यानयज्ञके द्वारा हवन करे। सभी प्राणियोंके देहमें स्थित तथा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी उन शिवको जानकर प्राणायामके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिदिन हवन करना चाहिये। शिवध्यानसे रहित होकर होम करनेवाला पाषाणमें मेढक होता है॥ १०५-१०८॥ | | नरकं चैव नाप्नोति यस्य कस्यापि कर्मणः।<br>अहिंसकं चरेद्धोमं साधको मुक्तिकाङ्क्षकः॥ १०६ | | | हृदिस्थं चिन्तयेदग्निं ध्यानयज्ञेन होमयेत्।<br>देहस्थं सर्वभूतानां शिवं सर्वजगत्पतिम्॥ १०७ | | | तं ज्ञात्वा होमयेद्भक्त्या प्राणायामेन नित्यशः।<br>बाह्यहोमप्रदाता तु पाषाणे दर्दुरो भवेत्॥ १०८ | |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाग्निकार्यवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः॥ २५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवाग्निकार्यवर्णन' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥


छब्बीसवाँ अध्याय

शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य

शैलादिरुवाचशैलादि बोले—
अथवा देवमीशानं लिङ्गे सम्पूजयेच्छिवम्।<br>ब्राह्मणः शिवभक्तश्च शिवध्यानपरायणः॥ १<br>अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>उद्धूलयेद्वि सर्वाङ्गमापादतलमस्तकम्॥ २<br>आचामेद्ब्रह्मतीर्थेन ब्रह्मसूत्री ह्युदङ्मुखः।<br>अथों नमः शिवायेति तनुं कृत्वात्मनः पुनः॥ ३<br>देवं च तेन मन्त्रेण पूजयेत्प्रणवेन च।<br>सर्वस्मादधिका पूजा अघोरेशस्य शूलिनः॥ ४[हे सनत्कुमार!] शिवभक्त ब्राह्मणको चाहिये कि भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होकर शिवलिङ्गमें परमेश्वर शिवका विधिवत् पूजन करे। 'अग्निरिति०'—इस मन्त्रसे अग्निहोत्रजन्य भस्म लेकर पादतलसे मस्तकपर्यन्त सभी अंगोंमें उसे लगाये। इसके बाद उत्तराभिमुख हो ब्रह्मसूत्री होकर ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। तत्पश्चात् 'ॐ नमः शिवाय'—इस मन्त्रसे अपने देहको शुद्ध करके मूलमन्त्र तथा प्रणवसे शिवका पूजन करना चाहिये; अघोरेश्वर शिवकी पूजा सबसे बढ़कर है॥ १-४॥
सामान्यं यजनं सर्वमग्निकार्यं च सुव्रत।<br>मन्त्रभेदः प्रभोस्तस्य अघोरध्यानमेव च॥ ५हे सुव्रत! समस्त पूजन तथा अग्निकार्य पूर्वकी भाँति हैं। उन प्रभुके मन्त्रोंमें भेद तथा भगवान् अघोरका