भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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६८६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोक / मन्त्रहिन्दी अनुवाद
अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।<br>सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ ६<br><br>अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदयाय नमः। अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा। घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट्। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो पिङ्गलकवचाय हुम्। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट्। सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट्।<br><br>स्नात्वाचम्य तनुं कृत्वा समभ्युक्ष्याघमर्षणम्।<br>तर्पणं विधिना चार्घ्यं भानवे भानुपूजनम्॥ ७ध्यान अब कहा जायगा। मन्त्र इस प्रकार है—<br>अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः। अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदाय नमः। अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा। घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट्। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्योः पिङ्गलकवचाय हुम्। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट्। सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट्—[इन छः मन्त्रोंसे अंगन्यास करे]। पूजाविधि इस प्रकार है—स्नान करके आचमनकर शरीरका मार्जन, अघमर्षण, तर्पण, विधिपूर्वक सूर्यार्घ्य तथा सूर्यपूजन पूर्वकी भाँति करे; अघोर पूजामें केवल मन्त्रका भेद है॥ ५-७॥
समं चाघोरपूजायां मन्त्रमात्रेण भेदितम्।<br>मार्गशुद्धिस्तथा द्वारि पूजां वास्त्वधिपस्य च॥ ८<br><br>कृत्वा करं विशोध्याग्रे स शुभासनमास्थितः।<br>नासाग्रकमले स्थाप्य दग्धाक्षः क्षुभिकाग्निना॥ ९<br><br>वायुना प्रेर्य तद्भस्म विशोध्य च शुभाम्भसा।<br>शक्त्यामृतमये ब्रह्मकलां तत्र प्रकल्पयेत्॥ १०मार्गशुद्धि, द्वारपूजा तथा वास्तुपतिकी पूजा करके पूजकको चाहिये कि पवित्र आसनपर बैठ जाय और सर्वप्रथम हाथ शुद्ध करके नासाग्रके पास करकमलमें भस्म स्थापित करके क्षुभिकाग्नि (विरक्तिरूप अग्नि)-से समस्त विषयोंको दग्ध करके उस भस्मको वायुसे प्रेरितकर पवित्र जलसे उसका शोधनकर ब्रह्ममय उस भस्ममें शक्तिसहित ब्रह्मकलाकी भावना करे॥ ८-१०॥
अघोरं पञ्चधा कृत्वा पञ्चाङ्गसहितं पुनः।<br>इत्थं ज्ञानक्रियामेवं विन्यस्य च विधानतः॥ ११<br><br>न्यासस्त्रिनेत्रसहितो हृदि ध्यात्वा वरासने।<br>नाभौ वह्निगतं स्मृत्वा भ्रूमध्ये दीपवत्प्रभुम्॥ १२अघोरमन्त्रको पाँच भागोंमें विभक्त करके उसे पंचांगभस्मविलेपनयुक्त करना चाहिये। इस प्रकार ज्ञानयुक्त क्रियाका विधानपूर्वक न्यास करके अघोरमूर्तिसहित न्यास करना चाहिये और हृदयमें श्रेष्ठ आसनपर विराजमानरूपमें ध्यान करके नाभिमें अग्निके मध्य स्थित स्मरण करके भ्रूमध्यमें दीपशिखाके आकारवाले प्रभुका चिन्तन करना चाहिये॥ ११-१२॥
शान्त्या बीजाङ्कुरानन्तधर्माद्यैरपि संयुते।<br>सोमसूर्याग्निसम्पन्ने मूर्तित्रयसमन्विते॥ १३<br><br>वामादिभिश्च सहिते मनोन्मन्याप्यधिष्ठिते।<br>शिवासनेतमूर्तिस्थमक्षयाकाररूपिणम् ॥ १४<br><br>अष्टत्रिंशत्कलादेहं त्रितत्त्वसहितं शिवम्।<br>अष्टादशभुजं देवं गजचर्मोत्तरीयकम॥ १५शान्तिसहित बीज, अंकुर, अनन्त तथा धर्म आदिसे युक्त, सोम, सूर्य तथा अग्निसे सम्पन्न, तीन मूर्तियोंसे समन्वित; वामा आदि आठ शक्तियोंसे संयुक्त तथा मनोन्मनीसे भी अधिष्ठित शिवासनपर अघोरमूर्ति परमेश्वर शिवका इस प्रकार ध्यान करे कि वे आत्ममूर्तिमें स्थित हैं, अक्षयाकार स्वरूप हैं, अड़तीस कलाओंसे परिपूर्ण विग्रहवाले हैं, तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं, अठारह भुजाओंसे सम्पन्न हैं, गजचर्मका उत्तरीय धारण