भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 701

अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९९


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
कल्लोला चेति क्रमशः षोडशैव यथाविधि।<br>शौण्डव्यूहः समाख्यातः शौण्डाया व्यूह उच्यते॥ १५९<br><br>दन्तुरा रौद्रभागा च अमृता सकुला शुभा।<br>चलजिह्वार्यनेत्रा च रूपिणी दारिका तथा॥ १६०<br><br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>खादिका रूपनामा च संहारी च क्षमान्तका॥ १६१<br><br>कण्डिनी पेषिणी चैव महात्रासा कृतान्तिका।<br>दण्डिनी किङ्करी बिम्बा वर्णिनी चाम्लाङ्गिनी॥ १६२<br><br>द्रविणी द्राविणी चैव शक्तयः षोडशैव तु।<br>कथितो हि मनोरम्यः शौण्डाया व्यूह उत्तमः॥ १६३<br><br>प्रथमाख्यं प्रवक्ष्यामि व्यूहं परमशोभनम्।<br>प्लविनी प्लावनी शोभा मन्दा चैव मदोत्कटा॥ १६४<br><br>मन्दाक्षेपा महादेवी प्रथमावरणे स्मृताः।<br>कामसन्दीपिनी देवी अतिरूपा मनोहरा॥ १६५<br><br>महावशा मदग्राहा विह्वला मदविह्वला।<br>अरुणा शोषणा दिव्या रेवती भाण्डनायिका॥ १६६<br><br>स्तम्भिनी घोररक्ताक्षी स्मररूपा सुघोषणा।<br>व्यूहः प्रथम आख्यातः स्वायम्भुव यथा तथा॥ १६७<br><br>कथितं प्रथमव्यूहं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे।<br>घोरा घोरतराघोरा अतिघोराघनायिका॥ १६८<br><br>धावनी क्रोष्टुका मुण्डा चाष्टमी परिकीर्तिता।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु॥ १६९<br><br>भीमा भीमतराभीमा शस्ता चैव सुवर्तुला।<br>स्तम्भिनी रोदनी रौद्रा रुद्रवत्यचलाचला॥ १७०<br><br>महाबला महाशान्तिः शाला शान्ता शिवाशिवा।<br>बृहत्कक्षा महानासा षोडशैव प्रकीर्तिता॥ १७१<br><br>प्रथमायाः समाख्यातो मन्मथव्यूह उच्यते।<br>तालकर्णी च बाला च कल्याणी कपिला शिवा॥ १७२<br><br>इष्टिस्रुष्टिः प्रतिज्ञा च प्रथमावरणे स्मृताः।<br>ख्यातिः पुष्टिकरी तुष्टिर्जला चैव श्रुतिर्धृतिः॥ १७३<br><br>कामदा शुभदा सौम्या तेजिनी कामतन्त्रिका।<br>धर्मा धर्मवशा शीला पापहा धर्मवर्धिनी॥ १७४दण्डकी, घोणा, शोणा, सत्यवती तथा कल्लोला—ये क्रमशः सोलह शक्तियाँ हैं। शौण्डव्यूह कह दिया गया, अब शौण्डाव्यूह कहा जाता है॥ १५२-१५९॥<br><br>दन्तुरा, रौद्रभागा, अमृता, शुभ सकुला, चलजिह्वा, आर्यनेत्रा, रूपिणी तथा दारिका—[प्रथम आवरणमें ये आठ शक्तियाँ हैं।] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। खादिका, रूपनामा, संहारी, क्षमा, अन्तका, कण्डिनी, पेषिणी, महात्रासा, कृतान्तिका, दण्डिनी, किंकरी, बिम्बा, वर्णिनी, अम्लांगिनी, द्रविणी तथा द्राविणी—ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं। मैंने इस मनोरम उत्तम शौण्डाव्यूहका वर्णन कर दिया॥ १६०-१६३॥<br><br>इसके बाद मैं प्रथम नामक परम सुन्दर व्यूहका वर्णन करूँगा। प्लविनी, प्लावनी, शोभा, मन्दा, मदोत्कटा, मन्दा, आक्षेपा तथा महादेवी—ये पहले आवरणकी [शक्तियाँ] कही गयी हैं। देवी कामसंदीपनी, अतिरूपा, मनोहरा, महावशा, मदग्राहा, विह्वला, मदविह्वला, अरुणा, शोषणा, दिव्या, रेवती, भाण्डनायिका, स्तम्भिनी, घोररक्ताक्षी, स्मररूपा तथा सुघोषणा—[ये दूसरे आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं।] हे स्वायम्भुव! प्रथम व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मैं प्रथमा व्यूहका वर्णन करूँगा, उसे मुझसे सुनिये। घोरा, घोरतरा, अघोरा, अतिघोरा, अघनायिका, धावनी, क्रोष्टुका और आठवीं मुण्डा—[ये पहले आवरणकी शक्तियाँ] कही गयी हैं। पहला आवरण कह दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये। भीमा, भीमतरा, अभीमा, उत्तम सुवर्तुला, स्तम्भिनी, रोदनी, रौद्रा, रुद्रवती, अचलाचला, महाबला, महाशान्ति, शाला, शान्ता, शिवाशिवा, बृहत्कक्षा, महानासा—[दूसरे आवरणकी] ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं॥ १६४-१७१॥<br><br>प्रथमा व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मन्मथव्यूह कहा जाता है। तालकर्णी, बाला, कल्याणी, कपिला, शिवा, इष्टि, तुष्टि तथा प्रतिज्ञा—ये पहले आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं। ख्याति, पुष्टिकरी, तुष्टि, जला, श्रुति, धृति, कामदा, शुभदा, सौम्या, तेजिनी, कामतन्त्रिका, धर्मा, धर्मवशा, शीला, पापहा तथा धर्मवर्धिनी—[ये सोलह शक्तियाँ दूसरे आवरणकी