श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 702, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 702
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्मथः कथितो व्यूहो मन्मथायाः शृणुष्व मे।<br>धर्मरक्षा विधाना च धर्मा धर्मवती तथा ॥ १७५<br>सुमतिर्दुर्मतिर्मेधा विमला चाष्टमी स्मृता।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १७६<br>शुद्धिर्बुद्धिर्धृतिः कान्तिर्वर्तुला मोहवर्धिनी।<br>बला चातिबला भीमा प्राणवृद्धिकरी तथा ॥ १७७<br>निर्लज्जा निर्गुणा मन्दा सर्वपापक्षयङ्करी।<br>कपिला चातिविधुरा षोडशैताः प्रकीर्तिताः ॥ १७८ | हैं।] मन्मथव्यूह कह दिया गया, अब मन्मथायूहको मुझसे सुनिये। धर्मरक्षा, विधाना, धर्मा, धर्मवती, सुमति, दुर्मति, मेधा तथा आठवीं शक्ति विमला कही गयी है। पहला आवरण बता दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये। शुद्धि, बुद्धि, धृति, कान्ति, वर्तुला, मोहवर्धिनी, बला, अतिबला, भीमा, प्राणवृद्धिकरी, निर्लज्जा, निर्गुणा, मन्दा, सर्वपापक्षयंकरी, कपिला तथा अतिविधुरा—ये सोलह [शक्तियाँ] बतायी गयी हैं॥ १७२—१७८॥ |
| मन्मथायिक उक्तस्ते भीमव्यूहं वदामि च।<br>रक्ता चैव विरक्ता च उद्वेगा शोकवर्धिनी ॥ १७९<br>कामा तृष्णा क्षुधा मोहा चाष्टमी परिकीर्तिता।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १८०<br>जया निद्रा भयालस्या जलतृष्णोदरी दरा।<br>कृष्णा कृष्णाङ्गिनी वृद्धा शुद्धोच्छिष्टाशनी वृषा ॥ १८१<br>कामना शोभिनी दग्धा दुःखदा सुखदावली।<br>भीमव्यूहः समाख्यातो भीमायीव्यूह उच्यते ॥ १८२<br>आनन्दा च सुनन्दा च महानन्दा शुभङ्करी।<br>वीतरागा महोत्साहा जितरागा मनोरथा ॥ १८३<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>मनोन्मनी मनःक्षोभा मदोन्मत्ता मदाकुला ॥ १८४<br>मन्दगर्भा महाभासा कामानन्दा सुविह्वला।<br>महावेगा सुवेगा च महाभोगा क्षयावहा ॥ १८५<br>क्रमिणी क्रामणी वक्रा द्वितीयावरणे स्मृताः।<br>कथितं तव भीमायीव्यूहं परमशोभनम् ॥ १८६ | मैंने आपसे मन्मथायूहका वर्णन कर दिया, अब भीमव्यूह बता रहा हूँ। रक्ता, विरक्ता, उद्वेगा, शोकवर्धिनी, कामा, तृष्णा, क्षुधा तथा आठवीं शक्ति मोहा कही गयी है। यह पहला आवरण कह दिया, अब दूसरा आवरण सुनिये। जया, निद्रा, भया, आलस्या, जलतृष्णोदरी, दरा, कृष्णा, कृष्णांगिनी, वृद्धा, शुद्धोच्छिष्टाशनी, वृषा, कामना, शोभिनी, दग्धा, दुःखदा तथा सुखदावली—[ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं।] भीमव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब भीमायीव्यूह बताया जाता है। आनन्दा, सुनन्दा, महानन्दा, शुभंकरी, वीतरागा, महोत्साहा, जितरागा तथा मनोरथा—[ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरण की हैं।] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। मनोन्मनी, मनःक्षोभा, मदोन्मत्ता, मदाकुला, मन्दगर्भा, महाभासा, कामा, आनन्दा, सुविह्वला, महावेगा, सुवेगा, महाभोगा, क्षयावहा, क्रमिणी, क्रामिणी तथा वक्रा—ये दूसरे आवरणमें बतायी गयी हैं; मैंने आपसे अत्यन्त सुन्दर भीमायीव्यूहके विषयमें कह दिया॥ १७९—१८६॥ |
| शाकुनं कथयाम्यद्य स्वायम्भुव मनोत्सुकम्।<br>योगा वेगा सुवेगा च अतिवेगा सुवासिनी ॥ १८७<br>देवी मनोरयावेगा जलावर्ता च धीमती।<br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १८८<br>रोधिनी क्षोभिणी बाला विप्राशेषासुशोषिणी।<br>विद्युता भासिनी देवी मनोवेगा च चापला ॥ १८९<br>विद्युज्जिह्वा महाजिह्वा भृकुटी कुटिलानना।<br>फुल्लज्वाला महाज्वाला सुज्वाला च क्षयान्तिका ॥ १९०<br>शाकुनः कथितो व्यूहः शाकुनायाः शृणुष्व मे।<br>ज्वालिनी चैव भस्माङ्गी तथा भस्मान्तगा तता ॥ १९१ | हे स्वायम्भुव! अब मैं मनोहर शाकुनव्यूह बताता हूँ। योगा, वेगा, सुवेगा, अतिवेगा, देवी सुवासिनी, मनोरयावेगा, जलावर्ता और धीमती—[ये प्रथम आवरणकी आठ शक्तियाँ बतायी गयी हैं।] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। रोधिनी, क्षोभिणी, बाला, विप्रा-शेषासुशोषिणी, विद्युता, देवी भासिनी, मनोवेगा, चापला, विद्युज्जिह्वा, महाजिह्वा, भृकुटी, कुटिलानना, फुल्लज्वाला, महाज्वाला, सुज्वाला और क्षयान्तिका; यह शाकुनव्यूह कह दिया गया, अब मुझसे शाकुनाव्यूह सुनिये। ज्वालिनी, भस्मांगी, भस्मांतगा, |