श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७८- शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य
| ३८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| येन केनापि वा मर्त्यः प्रलिप्यायतनाग्रतः ।<br>उत्तरे दक्षिणे वापि पृष्ठतो वा द्विजोत्तमाः ॥ ९९<br><br>चतुष्कोणं तु वा चूर्णैरलङ्कृत्य समन्ततः ।<br>पुष्पाक्षतादिभिः पूज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १००<br><br>यस्तु गर्भगृहं भक्त्या सकृदालिप्य सर्वतः ।<br>चन्दनाद्यैः सकर्पूरैर्गन्धद्रव्यैः समन्ततः ॥ १०१<br><br>विकीर्य गन्धकुसुमैर्धूपैर्धूप्य चतुर्विधैः ।<br>प्रार्थयेद्देवमीशानं शिवलोकं स गच्छति ॥ १०२<br><br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् कल्पकोटिशतं नरः ।<br>स्वदेहगन्धकुसुमैः पूरयञ्छिवमन्दिरम् ॥ १०३<br><br>क्रमाद् गान्धर्वमासाद्य गन्धर्वैश्च सुपूजितः ।<br>क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन् राजा भवति वीर्यवान् ॥ १०४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! जिस किसी भी प्रकार शिवालयको लीपकर सामने, पीछे, उत्तरमें तथा दक्षिणमें चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसे चारों ओरसे चूर्णोंसे सजाकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो [मनुष्य] एक बार भी भक्तिपूर्वक गर्भगृहको चन्दन आदि तथा कपूरसहित गन्धद्रव्योंसे चारों ओरसे लीपकर सभी ओर सुगन्धित पुष्प बिखेरकर चार प्रकारके धूपोंसे उसे धूपित करके भगवान् ईशान (शिव)-की प्रार्थना करता है, वह शिवलोकको जाता है। वह मनुष्य वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक महान् सुखोंको भोगकर अपने देहरूपी सुगन्धित पुष्पोंसे शिवमन्दिरको पूरित करता हुआ क्रमसे गन्धर्वलोक पहुँचकर वहाँ गन्धर्वोंसे भलीभाँति पूजित होता है, [पुनः] क्रमसे इस लोकमें आकर पराक्रमी राजा होता है॥ ९९-१०४॥ |
| आदिदेवो महादेवः प्रलयस्थितिकारकः ।<br>सर्गश्च भुवनाधीशः सर्वव्यापी सदाशिवः ।<br>शिवब्रह्मामृतं ग्राह्यं मोक्षसाधनमुत्तमम् ॥ १०५<br><br>व्यक्ताव्यक्तं सदा नित्यमचिन्त्यमर्चयेत्प्रभुम् ॥ १०६ | वे सदाशिव आदिदेव, महादेव, सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले, जगत्के स्वामी तथा सर्वव्यापी हैं। शिवरूपी ब्रह्मसे [मोक्षसुखरूपी] अमृतको ग्रहण करना चाहिये और मोक्षके साधनस्वरूप उत्तम, व्यक्त, अव्यक्त, नित्य तथा अचिन्त्य प्रभुका सदा अर्चन करना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपलेपनादिकथनं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपलेपनादिकथन' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥
अठहत्तरवाँ अध्याय
शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सूत उवाच<br>वस्त्रपूतेन तोयेन कार्यं चैवोपलेपनम् ।<br>शिवक्षेत्रे मुनिश्रेष्ठा नान्यथा सिद्धिरिष्यते ॥ १<br><br>आपः पूता भवन्त्येता वस्त्रपूताः समुद्धृताः ।<br>अफेना मुनिशार्दूला नादेयाश्च विशेषतः ॥ २ | **सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवक्षेत्रमें वस्त्रके द्वारा छाने हुए पवित्र जलसे ही उपलेपन-कार्य करना चाहिये; अन्यथा सिद्धि नहीं मिलती है। हे श्रेष्ठ मुनियो! विशेषकर नदीसे ग्रहण किया गया फेनरहित जल, जो पुनः वस्त्रसे छाना गया हो—ऐसा जल पवित्र होता है॥ १-२॥ |
| तस्माद्वै सर्वकार्याणि दैविकानि द्विजोत्तमाः ।<br>अद्भिः कार्याणि पूताभिः सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥ ३ | अतः हे उत्तम द्विजो! समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये सभी देवकार्योंको पवित्र जलसे करना चाहिये। |
अध्याय ७८ ] शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य ३८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जन्तुभिर्मिश्रिता ह्यापः सूक्ष्माभिस्तान्निहत्य तु।<br>यत्पापं सकलं चाद्भिरपूताभिश्चिरं लभेत्॥ ४<br><br>सम्मार्र्जने तथा नॄणां मार्जने च विशेषतः।<br>अग्नौ कण्डनके चैव पेषणे तोयसङ्ग्रहे॥ ५<br><br>हिंसा सदा गृहस्थानां तस्माद्धिंसां विवर्जयेत्।<br>अहिंसेयं परो धर्मः सर्वेषां प्राणिनां द्विजाः॥ ६<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतं समाचरेत्। | जल सूक्ष्म कीटाणुओंसे युक्त रहता है, अतः निश्चय ही अपवित्र जलसे देवकार्य करनेपर वही सारा पाप होता है, जो उन्हें मारनेसे होता है। झाड़ू लगाने, सफाई करने, विशेष करके अग्निकर्ममें, कूटने-पीसनेमें तथा जलके संग्रहमें गृहस्थ मनुष्योंसे हिंसा हो जाती है, अतः हिंसासे बचना चाहिये। हे द्विजो! सभी प्राणियोंके प्रति यह अहिंसा [भाव] सबसे बड़ा धर्म है, अतः पूर्ण प्रयत्नसे वस्त्रसे पवित्र किया हुआ (छाना हुआ) जल प्रयोग करना चाहिये॥ ३—६ १/२॥ |
| तद्दानमभयं पुण्यं सर्वदानोत्तमोत्तमम्॥ ७<br><br>तस्मात्तु परिहर्तव्या हिंसा सर्वत्र सर्वदा।<br>मनसा कर्मणा वाचा सर्वदामिंसकं नरम्॥ ८<br><br>रक्षन्ति जन्तवः सर्वे हिंसकं बाधयन्ति च।<br>त्रैलोक्यमखिलं दत्त्वा यत्फलं वेदपारगे॥ ९<br><br>तत्फलं कोटिगुणितं लभतेऽहिंसको नरः। | वह दान पुण्यप्रद तथा सभी दानोंमें उत्तमोत्तम है, जो अभय देनेवाला होता है, अतः सभी जगह सर्वदा हिंसाका त्याग करना चाहिये। मन-वाणी तथा कर्मसे जो किसीकी हिंसा नहीं करता अर्थात् उन्हें दुःख नहीं पहुँचाता, ऐसे अहिंसक व्यक्तिकी सभी प्राणी सदा रक्षा करते हैं और हिंसकको कष्ट पहुँचाते हैं। वेदके पारगामी विद्वान्को सम्पूर्ण त्रिलोकका दान देकर मनुष्य जो फल पाता है, उसका करोड़ों गुना फल अहिंसक मनुष्य प्राप्त करता है॥ ७—९ १/२॥ |
| मनसा कर्मणा वाचा सर्वभूतहिते रताः॥ १०<br><br>दयादर्शितपन्थानो रुद्रलोकं व्रजन्ति च।<br>स्वामिवत्परिरक्षन्ति बहूनि विविधानि च॥ ११<br><br>ये पुत्रपौत्रवत्स्नेहाद्रुद्रलोकं व्रजन्ति ते।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतेन वारिणा॥ १२<br><br>कार्यमभ्युक्षणं नित्यं स्त्रपनं च विशेषतः।<br>त्रैलोक्यमखिलं हत्वा यत्फलं परिकीर्त्यते॥ १३<br><br>शिवालये निहत्यैकमपि तत्सकलं लभेत्। | मन, वचन तथा कर्मसे सभी प्राणियोंके हितमें संलग्न और दयादृष्टिके मार्गपर चलनेवाले रुद्रलोकको जाते हैं। जो लोग स्वामीके समान विभिन्न प्राणियोंको अपने पुत्र-पौत्रके समान समझकर स्नेहपूर्वक उनकी रक्षा करते हैं, वे रुद्रलोकको जाते हैं। अतः पूरे प्रयत्नसे वस्त्रसे पवित्र किये गये जलके द्वारा सदा अभ्युक्षण तथा विशेषरूपसे स्नान कराना चाहिये। सम्पूर्ण त्रिलोकका संहार करनेपर जो [पापका] फल कहा गया है, उस सम्पूर्ण पापको मनुष्य शिवालयमें मात्र एक प्राणीकी हत्या करके प्राप्त करता है॥ १०—१३ १/२॥ |
| शिवार्यं सर्वदा कार्या पुष्पहिंसा द्विजोत्तमाः॥ १४<br><br>यज्ञार्थं पशुहिंसा च क्षत्रियैर्दुष्टशासनम्।<br>विहिताविहितं नास्ति योगिनां ब्रह्मवादिनाम्॥ १५<br><br>यतस्तस्मान्न हन्तव्या निषिद्धानां निषेवणात्।<br>सर्वकर्माणि विन्यस्य संन्यस्ताद् ब्रह्मवादिनः॥ १६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवके निमित्त सदा पुष्पहिंसा की जानी चाहिये। यज्ञके लिये पशुहिंसा दुष्ट शासन है; यह क्षत्रियोंके द्वारा की जा सकती है। ब्रह्मवादी योगियोंके लिये [कोई] विधिनिषेध नहीं है। अतः निषिद्धका सेवन करनेपर भी वे वध्य नहीं हैं। सभी कर्मोंका त्याग करके संन्यास |
| ३८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लिये हुए ब्रह्मवादी लोगोंका वध नहीं करना चाहिये; वे पापकर्ममें लगे रहनेपर भी सदा पूज्य हैं॥ १४—१६ १/२॥ | |
| न हन्तव्याः सदा पूज्याः पापकर्मरता अपि।<br>पवित्रास्तु स्त्रियः सर्वा अत्रेश्च कुलसम्भवाः॥ १७<br><br>ब्रह्महत्यासमं पापमात्रेयीं विनिहत्य च।<br>स्त्रियः सर्वा न हन्तव्याः पापकर्मरता अपि॥ १८<br><br>न यज्ञार्थं स्त्रियो ग्राह्याः सर्वैः सर्वत्र सर्वदा।<br>सर्ववर्णेषु विप्रेन्द्राः पापकर्मरता अपि॥ १९<br><br>मलिना रूपवत्यश्च विरूपा मलिनाम्बराः।<br>न हन्तव्याः सदा मर्त्यैः शिववच्छ्रद्धया तथा॥ २० | अत्रिके कुलमें उत्पन्न सभी स्त्रियाँ पवित्र होती हैं। अत्रिवंशकी स्त्रीकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है, अतः पापकर्ममें रत होनेपर भी उन स्त्रियोंकी हत्या नहीं करनी चाहिये। सभी लोगोंको चाहिये कि यज्ञहेतु सर्वत्र सर्वदा स्त्रियोंको ग्रहण न करें; हे विप्रेन्द्रो! सभी वर्णोंकी स्त्रियाँ चाहे वे पापकर्ममें रत हों, मलिन हों, रूपवती हों, कुरूप हों अथवा मलिन वस्त्रोंवाली हों, मनुष्योंके द्वारा वध्य नहीं हैं; उनमें शिवभाव रखना चाहिये॥ १७—२०॥ |
| वेदबाह्यव्रताचाराः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः।<br>पाषण्डिन इति ख्याता न सम्भाष्या द्विजातिभिः॥ २१<br><br>न स्प्रष्टव्या न द्रष्टव्या दृष्ट्वा भानुं समीक्षते।<br>तथापि ते न वध्याश्च नृपैरन्यैश्च जन्तुभिः॥ २२ | वेदविरुद्ध व्रत तथा आचारवाले और श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख लोग पाखण्डरी कहे गये हैं। द्विजातियोंको उनके साथ बातचीत नहीं करनी चाहिये, उनका स्पर्श नहीं करना चाहिये और उन्हें देखना नहीं चाहिये; उन्हें देखनेपर सूर्यका दर्शन करना चाहिये; फिर भी राजाओं तथा अन्य प्राणियोंको चाहिये कि उनका वध न करें॥ २१–२२॥ |
| प्रसङ्गादपि यो मर्त्यः सतां सकृदहो द्विजाः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति समभ्यर्च्य महेश्वरम्॥ २३<br><br>भवन्ति दुःखिताः सर्वे निर्दया मुनिसत्तमाः।<br>भक्तिहीना नराः सर्वे भवे परमकारणे॥ २४<br><br>ये भक्ता देवदेवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>भाग्यवन्तो विमुच्यन्ते भुक्त्वा भोगानिहैव ते॥ २५ | हे द्विजो! मनुष्य सज्जनोंके संसर्गवश एक बार भी महेश्वरका पूजन करके रुद्रलोक प्राप्त कर लेता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! सभी दयारहित लोग तथा परमकारण शिवमें भक्तिसे हीन सभी मनुष्य दुःख भोगते हैं। जो लोग देवदेव परमेष्ठी शिवके भक्त हैं, वे भाग्यशाली हैं और इस लोकमें सुखोंको भोगकर मुक्त हो जाते हैं॥ २३–२५॥ |
| पुत्रेषु दारेषु गृहेषु नृणां<br>भक्तं यथा चित्तमथादिदेवे।<br>सकृत्प्रसङ्गाद्यतितापसानां<br>तेषां न दूरः परमेशलोकः॥ २६ | जैसे [गृहस्थ] मनुष्योंका चित्त पुत्रों, स्त्रियों तथा घरोंमें आसक्त रहता है, उसी प्रकार उनका चित्त यदि यतियों तथा तपस्वियोंके सान्निध्यसे एक बार भी आदिदेवमें लग जाय तो परमेश्वरका लोक उनके लिये दूर नहीं है॥ २६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिमहिमावर्णनं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिमहिमावर्णन' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥
७९- शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा
अध्याय ७९ ] शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि...दीपदानकी महिमा ३८५
उन्यासीवाँ अध्याय
शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>कथं पूज्यो महादेवो मर्त्यैर्मन्दैर्महामते।<br>अल्पायुषैरल्पवीर्यैरल्पसत्त्वैः प्रजापतिः ॥ १<br>संवत्सरसहस्रैश्च तपसा पूज्य शङ्करम्।<br>न पश्यन्ति सुराश्चापि कथं देवं यजन्ति ते॥ २ | ऋषिगण बोले— हे महामते! मन्दबुद्धिवाले, अल्प आयुवाले, अल्प पराक्रमवाले तथा अल्प सामर्थ्यवाले मनुष्योंको प्रजापति महादेवकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? हजार वर्षोंतक तपस्याके द्वारा शंकरकी पूजा करके देवता भी उनका दर्शन नहीं कर पाते; तो फिर वे [मनुष्य] भगवान् शिवकी पूजा कैसे करें? ॥ १-२ ॥ |
| सूत उवाच<br>कथितं तथ्यमेवात्र युष्माभिर्मुनिपुङ्गवाः।<br>तथापि श्रद्धया दृश्यः पूज्यः सम्भाष्य एव च॥ ३<br>प्रसङ्गाच्चैव सम्पूज्य भक्तिहीनैरपि द्विजाः।<br>भावानुरूपफलदो भगवानिति कीर्तितः॥ ४ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ मुनियो! आपलोगोंने यथार्थ बात कही है, फिर भी श्रद्धापूर्वक [शिवकी] पूजा करनेपर उनका दर्शन हो सकता है और उनसे सम्भाषण किया जा सकता है। हे द्विजो! प्रसंगवश भक्तिहीन लोगोंके द्वारा भी पूजित होकर वे भगवान् उनके भावके अनुरूप फल देनेवाले कहे गये हैं॥ ३-४॥ |
| उच्छिष्टः पूजयन् याति पैशाचं तु द्विजाधमः।<br>सङ्क्रुद्धो राक्षसं स्थानं प्राप्नुयान्मूढधीर्द्विजाः॥ ५<br>अभक्ष्यभक्षी सम्पूज्य याक्षं प्राप्नोति दुर्जनः।<br>गानशीलश्च गान्धर्वं नृत्यशीलस्तथैव च॥ ६<br>ख्यातिशीलस्तथा चान्द्रं स्त्रीषु सक्तो नराधमः।<br>मदार्तः पूजयन् रुद्रं सोमस्थानमवाप्नुयात्॥ ७ | हे द्विजो! उच्छिष्ट अधम ब्राह्मण शिवकी पूजा करके पिशाचलोकको जाता है और क्रोधमें भरकर पूजन करनेवाला मूढ़बुद्धि राक्षसका स्थान (लोक) प्राप्त करता है। अभक्ष्य [भोजन]-का भक्षण करनेवाला दुष्ट मनुष्य [शिवकी] पूजा करके यक्षलोक प्राप्त करता है और नृत्य-गान करनेवाला उनकी पूजा करके गन्धर्वलोक प्राप्त करता है। प्रसिद्धिका इच्छुक और स्त्रियोंमें आसक्त नराधम बुधलोक प्राप्त करता है। मदोन्मत्त व्यक्ति रुद्रकी पूजा करता हुआ सोमलोक प्राप्त करता है॥ ५-७॥ |
| गायत्र्या देवमभ्यर्च्य प्राजापत्यमवाप्नुयात्।<br>ब्राह्मं हि प्रणवेनैव वैष्णवं चाभिनन्द्य च॥ ८<br>श्रद्धया सकृदेवापि समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रैः सार्धं प्रमोदते॥ ९ | [रुद्र] गायत्री [मन्त्र] द्वारा शिवका पूजन करके मनुष्य प्रजापतिलोकको और प्रणवके द्वारा पूजन करके ब्रह्मलोक तथा विष्णुलोकको प्राप्त करता है। श्रद्धापूर्वक एक बार भी महेश्वरका पूजन करके मनुष्य रुद्रलोकमें पहुँचकर रुद्रोंके साथ आमोद-प्रमोद करता है॥ ८-९॥ |
| संशोध्य च शुभं लिङ्गममरासुरपूजितम्।<br>जलैः पूतैस्तथा पीठे देवमावाह्य भक्तितः॥ १०<br>दृष्ट्वा देवं यथान्यायं प्रणिपत्य च शङ्करम्।<br>कल्पिते चासने स्थाप्य धर्मज्ञानमये शुभे॥ ११<br>वैराग्यैश्वर्यसम्पन्ने सर्वलोकनमस्कृते।<br>ओङ्कारपद्ममध्ये तु सोमसूर्याग्निसम्भवे॥ १२ | देवताओं तथा असुरोंसे पूजित शुभ लिङ्गको पवित्र जलसे स्वच्छ करके पीठमें भक्तिपूर्वक शिवका आवाहन करके उन्हें देखकर विधिपूर्वक प्रणाम करके धर्मज्ञानमय, उत्तम, वैराग्य-ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सभी लोगोंसे नमस्कृत, ओंकार पद्मसे युक्त मध्यभागवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निसे उत्पन्न कल्पित आसनपर स्थापित करके रुद्र शम्भुको |
| ३८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पाद्यमाचमनं चार्घ्यं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे।<br>स्नापयेद्दिव्यतोयैश्च घृतेन पयसा तथा॥ १३<br>दध्ना च स्नापयेद् रुद्रं शोधयेच्च यथाविधि।<br>ततः शुद्धाम्बुना स्नाप्य चन्दनाद्यैश्च पूजयेत्॥ १४<br>रोचनाद्यैश्च सम्पूज्य दिव्यपुष्पैश्च पूजयेत्।<br>बिल्वपत्रैरखण्डैश्च पद्मैर्नानाविधैस्तथा॥ १५<br>नीलोत्पलैश्च राजीवैर्नन्द्यावर्तैश्च मल्लिकैः।<br>चम्पकैर्जातिपुष्पैश्च बकुलैः करवीरकैः॥ १६<br>शमीपुष्पैर्बृहत्पुष्पैरून्मत्तागस्त्यजैरपि ।<br>अपामार्गकदम्बैश्च भूषणैरपि शोभनैः॥ १७<br>दत्त्वा पञ्चविधं धूपं पायसं च निवेदयेत्।<br>दधिभक्तं च मध्वाज्यपरिल्लुतमतः परम्॥ १८<br>शुद्धान्नं चैव मुद्गान्नं षड्विधं च निवेदयेत्।<br>अथ पञ्चविधं वापि सघृतं विनिवेदयेत्॥ १९<br>केवलं चापि शुद्धान्नमाढकं तण्डुलं पचेत्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं चान्ते नमस्कृत्य मुहुर्मुहुः॥ २०<br>स्तुत्वा च देवमीशानं पुनः सम्पूज्य शङ्करम्।<br>ईशानं पुरुषं चैव अघोरं वाममेव च॥ २१<br>सद्योजातं जपंश्चापि पञ्चभिः पूजयेच्छिवम्।<br>अनेन विधिना देवः प्रसीदति महेश्वरः॥ २२ | पाद्य-आचमन-अर्घ्य प्रदान करके उन्हें दिव्य जलोंसे स्नान कराना चाहिये। पुनः घी, दूध तथा दहीसे रुद्रको स्नान कराना चाहिये एवं विधिपूर्वक स्वच्छ करना चाहिये। तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर चन्दन आदिसे पूजन करना चाहिये; पुनः रोचन आदिसे पूजन करके दिव्य पुष्पों, अखण्ड बिल्वपत्रों, अनेक प्रकारके पद्द्मों, नीलकमलों, रक्तकमलों, नन्द्यावर्तपुष्पों, मल्लिका, चम्पक, जातिपुष्पों, बकुलों, कनैंरके पुष्पों, शमीपुष्पों, बृहत्पुष्पों, धतूरके पुष्पों, अगस्त्यके उदित होनेपर खिलनेवाले पुष्पों, अपामार्ग-कदम्बके गुच्छों तथा सुन्दर आभूषणोंसे पूजन करके पाँच प्रकारके धूप प्रदान करके पायस (खीर) निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर दधिमिश्रित भात, मधु-घृत मिला हुआ भात, पका हुआ अन्न और मूँगका पका हुआ अन्न—यह छः प्रकारका अन्न निवेदित करे; अथवा पाँच प्रकारका घृतमिश्रित अन्न निवेदित करे; अथवा केवल एक आढक (चार प्रस्थ) शुद्ध चावल पकाये और उसे निवेदित करे। अन्तमें प्रदक्षिणा करके बार-बार नमस्कारकर देवता ईशानकी स्तुति करके पुनः शंकरजीकी विधिवत् पूजा करके ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात मन्त्रोंका जप करते हुए इन पाँच मन्त्रोंसे शिवकी पूजा करे। इस विधिसे [पूजा करनेपर] देव महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १०—२२॥ |
| वृक्षाः पुष्पादिपत्राद्यैरुपयुक्ताः शिवार्चने।<br>गावश्चैव द्विजश्रेष्ठाः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ २३<br>पूजयेद्यः शिवं रुद्रं शर्वं भवमजं सकृत्।<br>स याति शिवसायुज्यं पुनरावृत्तिवर्जितम्॥ २४<br>अर्चितं परमेशानं भवं शर्वमुमापतिम्।<br>सकृत्प्रसङ्गाद्वा दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २५<br>पूजितं वा महादेवं पूज्यमानमथापि वा।<br>दृष्ट्वा प्रयाति वै मर्त्यो ब्रह्मलोकं न संशयः॥ २६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवपूजनमें उपयोग किये गये पुष्प, पत्र आदिके साथ वृक्ष और गायें—ये सब परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो एक बार भी शिव, रुद्र, शर्व, भव, अजकी पूजा करता है; वह पुनर्जन्मरहित शिवसायुज्यको प्राप्त कर लेता है। एक बार अथवा प्रसंगवश भी पूजित परमेश्वर, भव, उमापतिका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पूजित किये गये अथवा पूजित होते हुए महादेवका दर्शनकर मनुष्य ब्रह्मलोकको जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २३—२६॥ |
| श्रुत्वानुमोदयेच्चापि स याति परमां गतिम्।<br>यो दद्याद् घृतदीपं च सकृल्लिङ्गस्य चाग्रतः॥ २७<br>स तां गतिमवाप्नोति स्वाश्रमैर्दुर्लभां स्थिराम्।<br>दीपवृक्षं पार्थिवं वा दारवं वा शिवालये॥ २८ | जो [शिवके सम्बन्धमें] कुछ भी सुनकर उसका अनुमोदन करता है, वह परमगति प्राप्त करता है। जो शिवके समक्ष एक बार भी घृतका दीपक अर्पित करता है, वह वर्णाश्रमी लोगोंके लिये दुर्लभ स्थिर गति प्राप्त |
८०- देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना
अध्याय ८० ] देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३८७
| दत्त्वा कुलशतं साग्रं शिवलोके महीयते।<br>आयसं ताम्रजं वापि रौप्यं सौवर्णिकं तथा॥ २९<br><br>शिवाय दीपं यो दद्याद्विधिना वापि भक्तितः।<br>सूर्यायुतसमैः श्लक्ष्णैर्यानैः शिवपुरं व्रजेत्॥ ३०<br><br>कार्तिके मासि यो दद्याद् घृतदीपं शिवाग्रतः।<br>सम्पूज्यमानं वा पश्येद्विधिना परमेश्वरम्॥ ३१<br><br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रद्धया मुनिसत्तमाः।<br>आवाहनं सुसान्निध्यं स्थापनं पूजनं तथा॥ ३२<br><br>सम्प्रोक्तं रुद्रगायत्र्या आसनं प्रणवेन वै।<br>पञ्चभिः स्नपनं प्रोक्तं रुद्राद्यैश्च विशेषतः॥ ३३<br><br>एवं सम्पूजयेन्नित्यं देवदेवमुमापतिम्।<br>ब्रह्माणं दक्षिणे तस्य प्रणवेन समर्चयेत्॥ ३४<br><br>उत्तरे देवदेवेशं विष्णुं गायत्रिया यजेत्।<br>वह्नौ हुत्वा यथान्यायं पञ्चभिः प्रणवेन च॥ ३५<br><br>स याति शिवसायुज्यमेवं सम्पूज्य शङ्करम्।<br>इति सङ्क्षेपतः प्रोक्तो लिङ्गार्चनविधिक्रमः॥ ३६<br><br>व्यासेन कथितः पूर्वं श्रुत्वा रुद्रमुखात्स्वयम्॥ ३७ | करता है। शिवालयमें मिट्टी अथवा लकड़ीका बना हुआ दीपवृक्ष (दीवट) प्रदान करके मनुष्य आगेके सौ कुलोंसहित शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो विधानके अनुसार भक्तिपूर्वक लोहे, ताँबे, चाँदी अथवा सोनेका बना हुआ दीपक शिवको समर्पित करता है, वह दस हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान विमानोंसे शिवलोकको जाता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! जो कार्तिक महीनेमें शिवके सामने घृतका दीपक समर्पित करता है अथवा विधानके साथ पूजित होते हुए परमेश्वरका दर्शन श्रद्धापूर्वक करता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ २७-३१½॥<br><br>[शिवका] आवाहन, उत्तम सान्निध्य, स्थापन तथा पूजन रुद्रगायत्री [मन्त्र]-द्वारा और आसन प्रणव-द्वारा बताया गया है। [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रोंसे तथा विशेषरूपसे रुद्रमन्त्रोंसे उनका स्नान बताया गया है। इस प्रकार देवदेव उमापतिकी पूजा नित्य करे। उनके दक्षिणमें ब्रह्माकी पूजा प्रणवसे करे और उत्तरमें देवदेवेश विष्णुकी पूजा गायत्री [मन्त्र]-से करे। विधिके अनुसार [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रोंसे तथा प्रणवसे अग्निमें होम करे। इस प्रकार शंकरकी भलीभाँति पूजा करके वह [मनुष्य] शिवसायुज्य प्राप्त करता है। [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें लिङ्गार्चनविधिका क्रम बता दिया; पहले स्वयं रुद्रके मुखसे इसे सुनकर व्यासजीने मुझको बताया था॥ ३२-३७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनविधिर्नमैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवार्चनविधि' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥
अस्सीवाँ अध्याय
देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| कथं पशुपतिं दृष्ट्वा पशुपाशविमोक्षणम्।<br>पशुत्वं तत्यजुर्देवास्तन्नो वक्तुमिहार्हसि॥ १ | [हे सूतजी!] पशुपतिका दर्शन करके पशुपाशसे मुक्ति किस प्रकार होती है; देवताओंने पशुत्वका कैसे त्याग किया? इसे आप कृपा करके हम लोगोंको बतायें॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| पुरा कैलासशिखरे भोग्याख्ये स्वपुरे स्थितम्।<br>समेत्य देवाः सर्वज्ञमाजग्मुस्तत्प्रसादतः॥ २ | पूर्वकालमें कैलास-शिखरपर भोग्य नामक अपने पुरमें स्थित सर्वज्ञ शिवके पास सभी देवता |
| ३८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| हिताय सर्वदेवानां ब्रह्मणा च जनार्दनः ।<br>गरुडस्य तथा स्कन्धमारुह्य पुरुषोत्तमः ॥ ३<br>जगाम देवताभिर्वै देवदेवान्तिकं हरिः ।<br>सर्वे सम्प्राप्य देवस्य सार्धं गिरिवरं शुभम् ॥ ४<br>सेन्द्राः ससाध्याः सयमाः प्रणेमुर्गिरिमुत्तमम् ।<br>भगवान् वासुदेवोऽसौ गरुडाद् गरुडध्वजः ।<br>अवतीर्य गिरिं मेरुमारुरोह सुरोत्तमैः ॥ ५<br>सकलदुरितहीनं सर्वदं भोगमुख्यं<br>मुदितकुररवन्दं नादितं नागवृन्दैः ।<br>मधुररणितगीतं सानुकूलाथकारं<br>पदरचितवनान्तं कान्तवातान्ततोयम् ॥ ६<br>भवनशतसहस्रैर्जुष्टमादित्यकल्पै-<br>र्ललितगतिविदर्घैर्हंसवृन्दैश्च भिन्नम् ।<br>धवकदिरपलाशैश्चन्दनाद्यैश्च वृक्षै-<br>र्द्विजवरगणवृन्दैः कोकिलाद्यैर्द्विरेफैः ॥ ७<br>क्वचिदशेषसुरद्रुमसङ्कुलं<br>कुरबकैः प्रियकैस्तिलकैस्तथा ।<br>बहुकदम्बतमाललतावृतं<br>गिरिवरं शिखरैर्विविधैस्तथा ॥ ८ | उनकी कृपासे एक साथ मिलकर आये। सभी देवताओंके हितके लिये जनार्दन पुरुषोत्तम विष्णु भी गरुड़के स्कन्धपर बैठकर ब्रह्मा तथा सभी देवताओंके साथ देवदेव शिवके पास पहुँचे॥ २-३ १/२॥<br>इन्द्र, साध्यगण तथा यमसहित सभी लोगोंने एक साथ शिवके गिरिश्रेष्ठ, शुभ तथा उत्तम पर्वतश्रेष्ठ मेरुपर आकर उस गिरिको प्रणाम किया। वे गरुड़ध्वज भगवान् वासुदेव गरुड़से उतरकर उत्तम देवताओंके साथ मेरु पर्वतपर चढ़ गये; वह समस्त पापोंसे रहित, सबकुछ देनेवाला, उत्तम भोगोंसे युक्त, आनन्दित कुरर पक्षियोंसे समन्वित, हाथियोंकी ध्वनियोंसे निनादित, मधुर गीतोंसे गुंजित, अन्य पर्वतोंके पृष्ठभागको अपने छायारूपी अन्धकारसे युक्त करनेवाला, पदचिह्नोंसे युक्त वन-प्रदेशवाला, सुन्दर हवाओं तथा जलसे परिपूर्ण, सूर्यके समान प्रदीप्त सैकड़ों-हजारों भवनोंसे युक्त, मनोहर गतिवाले हंससमूहोंसे मण्डित, धव-खदिर-पलाश-चन्दन आदि वृक्षोंसे परिपूर्ण, उत्तम पक्षियोंके समूहोंसे युक्त, कोकिल आदि तथा भौरोंसे शोभायमान, कहीं-कहीं बहुत-से दिव्य वृक्षोंसे भरा हुआ, कुरबक-प्रियक-तिलक पुष्पवृक्षोंसे सम्पन्न, बहुत-से कदम्ब-तमाल-लताओंसे घिरा हुआ तथा अनेक प्रकारके शिखरोंसे युक्त श्रेष्ठ पर्वत है॥ ४-८॥ | | गिरेः पृष्ठे पुरं शार्वं कल्पितं विश्वकर्मणा ।<br>क्रीडार्थं देवदेवस्य भवस्य परमेष्ठिनः ॥ ९<br>अपश्यंस्तत्पुरं देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समाहिताः ।<br>प्रणेमुर्दूरताश्चैव प्रभावादेव शूलिनः ॥ १० | [इस] पर्वतके पृष्ठपर देवदेव परमेश्वर शिवके विहारके लिये विश्वकर्माने एक शिवपुरका निर्माण किया है। इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित सभी देवताओंने उस पुरको ध्यानपूर्वक देखा और शिवजीके प्रभावसे दूरसे ही उसे प्रणाम किया॥ ९-१०॥ | | सहस्रसूर्यप्रतिमं महान्तं<br>सहस्रशः सर्वगुणैश्च भिन्नम् ।<br>जगाम कैलासगिरिं महात्मा<br>मेरुप्रभागे पुरमादिदेवः ॥ ११<br>ततोऽथ नारीगजवाजिसङ्कुलं<br>रथैरनेकैर्मरारिसूदनः ।<br>गणैर्गणेशैश्च गिरीन्द्रसन्निभं<br>महापुरद्वारमजो हरिश्च ॥ १२ | महात्मा आदिदेव [विष्णु] मेरुके एक भागमें [स्थित] हजारों सूर्योंके समान देदीप्यमान, हजारों तरहसे महान्, सभी गुणोंसे युक्त कैलासगिरिपर गये। तदनन्तर ब्रह्मा तथा देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले विष्णु उस महान् पुरके द्वारपर पहुँचे; जो स्त्रियों, हाथियों, घोड़ों, अनेक रथों, गणों तथा गणेश्वरोंसे भरा हुआ था और महापर्वतके समान प्रतीत हो रहा था॥ ११-१२॥ |
| अध्याय ८० ] | देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना | ३८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अथ जाम्बूनदमयैर्भवनैर्मणिभूषितैः ।<br>विमानैर्विविधाकारैः प्राकारैश्च समावृतम् ॥ १३<br>दृष्ट्वा शम्भोः पुरं बाह्यं देवैः सब्रह्मकैर्हरिः ।<br>प्रहृष्टवदनो भूत्वा प्रविवेश ततः पुरम् ॥ १४<br>हर्म्यप्रासादसम्बार्धं महाट्टालसमन्वितम् ।<br>द्वितीयं देवदेवस्य चतुर्द्वारं सुशोभनम् ॥ १५<br>वज्रवैडूर्यमाणिक्यमणिजालैः समावृतम् ।<br>दोलाविक्षेपसंयुक्तं घण्टाचामरभूषितम् ॥ १६<br>मृदङ्गमुरजैर्जुष्टं वीणावेणुनिनादितम् ।<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैर्भूतसङ्घैश्च संवृतम् ।<br>देवेन्द्रभवनाकारैर्भवनैर्दृष्टिमोहनैः ॥ १७ | तदनन्तर सुवर्णमय भवनों, मणिभूषित विमानों तथा अनेक आकारवाले प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए शिवके बाहरी पुरको देखकर प्रसन्नमुख होकर विष्णुने ब्रह्मसहित सभी देवताओंके साथ देवदेवके उस दूसरे पुरमें प्रवेश किया; जो विशाल भवनों तथा महलोंसे अवरुद्ध, ऊँची अट्टालिकाओंसे समन्वित, चार द्वारोंवाला, परम सुन्दर, हीरा-वैडूर्य-माणिक्य-मणियोंके जालोंसे आवृत, आन्दोलित हो रहे हिण्डोलोंसे समन्वित, घण्टा तथा चामरसे विभूषित, मृदंग-मुरज आदि वाद्ययन्त्रोंसे परिपूर्ण, वीणा-वेणुसे निनादित, नृत्य करती हुई अप्सराओं तथा भूतगणोंसे घिरा हुआ और दृष्टिको मोह लेनेवाले देवेन्द्रभवनके आकारवाले भवनोंसे मण्डित था॥ १३–१७॥ |
| प्रासादशृङ्गेष्वथ पौरनार्यः<br>सहस्रशः पुष्पफलाक्षताद्यैः ।<br>स्थिताः करैस्तस्य हरेः समन्तात्<br>प्रचिक्षिपुर्मूर्ध्नि यथा भवस्य ॥ १८<br>दृष्ट्वा नार्यस्तदा विष्णुं मदाघूर्णितलोचनाः ॥ १९<br>विशालजघनाः सद्यो ननृतुर्मुमुदुर्जगुः ।<br>काश्चिद् दृष्ट्वा हरिं नार्यः किञ्चित्प्रहसिताननाः ॥ २०<br>किञ्चिद्विस्रस्तवस्त्राश्च स्रस्तकाञ्चीगुणा जगुः । | [तीसरे पुरमें प्रवेश करनेपर] महलोंके शिखरोंपर विराजमान हजारों पुरस्त्रियाँ [अपने] हाथोंसे सभी ओरसे शिवकी भाँति विष्णुके मस्तकपर भी पुष्प, फल, अक्षत आदिकी वर्षा करने लगीं। उस समय विष्णुको देखकर मदसे घूर्णित नेत्रोंवाली तथा विशाल जाँघोंवाली स्त्रियाँ शीघ्र ही आनन्दमग्न हो गयीं और वे नाचने तथा गाने लगीं। विष्णुको देखकर कुछ स्त्रियोंका मुखमण्डल मन्द मुसकानसे भर गया, कुछके वस्त्र शिथिल हो गये और कुछकी करधनी ढीली पड़ गयी; वे सब गीत गाने लगीं॥ १८–२०१/२॥ |
| चतुर्थं पञ्चमं चैव षष्ठं च सप्तमं तथा ॥ २१<br>अष्टमं नवमं चैव दशमं च पुरोत्तमम् ।<br>अतीत्यासाद्य देवस्य पुरं शम्भोः सुशोभनम् ॥ २२<br>सुवृत्तं सुतरां शुभ्रं कैलासशिखरे शुभे ।<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैश्च विभूषितम् ॥ २३<br>स्फाटिकैर्मण्डपैः शुभ्रैर्जाम्बूनदमयैस्तथा ।<br>नानारत्नमयैश्चैव दिग्विधिक्षु विभूषितम् ॥ २४<br>गोपुरैर्गोपतेः शम्भोर्नानाभूषणभूषितैः ।<br>अनेकैः सर्वतोभद्रैः सर्वरत्नमयैस्तथा ॥ २५<br>प्राकारैर्विविधाकारैरष्टाविंशतिभिर्वृतम् ।<br>उपद्वारैर्महाद्वारैर्विदिक्षु विविधैर्दृढैः ॥ २६<br>गुह्यालयैर्गुह्यगृहैर्गुह्यस्य भवनैः शुभैः ।<br>ग्राम्यैर्नयैर्महाभागा मौक्तिकैर्दृष्टिमोहनैः ॥ २७ | हे महाभागो! तदनन्तर चौथे, पाँचवें, छठें, सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें उत्तम पुरोंको क्रमसे पार करके शुभ कैलास-शिखरपर [स्थित] देवदेव गोपति परमेश्वर भगवान् शिवके परम सुन्दर; पूर्ण गोलाकार; सूर्यमण्डलके समान भवनोंसे विभूषित; स्फटिकके शुभ्र मण्डपोंसे शोभायमान; सभी दिशाओंमें सुवर्णमय तथा विविध रत्नमय फाटकोंसे विभूषित; विविध आभूषणोंसे अलंकृत, अनेक सर्वतोभद्रोंसे युक्त; अनेक आकारवाले रत्नजटित अट्ठाईस प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए; उपदिशाओंमें अनेक प्रकारके दृढ़ उपद्वारों तथा महाद्वारोंसे युक्त; गुह (कार्तिकेय)-के गुप्त भवनों |
| ३९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| गणेशायतनैर्दिव्यैः पद्मरागमयैस्तथा।<br>चन्दनैर्विविधाकारैः पुष्पोद्यानैश्च शोभनैः॥ २८<br>तडागैर्दीर्घिकाभिश्च हेमसोपानपङ्क्तिभिः।<br>स्त्रीणां गतिजितैर्हंसैः सेविताभिः समन्ततः॥ २९<br>मयूरैश्चैव कारण्डैः कोकिलैश्चक्रवाकैः।<br>शोभिताभिश्च वापीभिर्दिव्यामृतजलैस्तथा॥ ३०<br>संलापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारावनम्रैश्च मदाघूर्णितलोचनैः॥ ३१<br>गेयनादरतैर्दिव्यै रुद्रकन्यासहस्रकैः।<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैरमरैरपि दुर्लभैः॥ ३२<br>प्रफुल्लाम्बुजवृन्दाद्यैस्तथा द्विजवरैरपि।<br>रुद्रस्त्रीगणसङ्कीर्णैर्जलक्रीडारतैस्तथा ॥ ३३<br>रतोत्सवरतैश्चैव ललितैश्च पदे पदे।<br>ग्रामरागानुरक्तैश्च पद्मरागसमप्रभैः॥ ३४<br>स्त्रीसङ्गैर्देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः।<br>दृष्ट्वा विस्मयमापन्नास्तस्थुर्देवाः समन्ततः॥ ३५ | तथा गुप्त कक्षोंसे सुशोभित; दृष्टिको मोह लेनेवाले मोतीके बने हुए अन्य सुन्दर ग्राम्य भवनोंसे युक्त; पद्मरागसे बने हुए दिव्य गणेश्वर-मन्दिरोंसे विभूषित; चन्दनके वृक्षोंसहित अनेक आकारवाले सुन्दर पुष्प-उद्यानोंसे सुशोभित; सोनेकी सीढ़ियोंकी पंक्तियोंसे युक्त और स्त्रियोंकी चालको तिरस्कृत करनेवाले हंसोंसे सभी ओरसे सेवित सरोवरों तथा बावलियोंसे विभूषित; मयूर, कारण्ड, कोकिल तथा चक्रवाकसे सुशोभित और दिव्य अमृतमय जलसे युक्त वापियोंसे विभूषित; वार्तालापमें कुशल, सभी आभूषणोंसे अलंकृत, वक्षःस्थलके भारसे झुकी हुई, मदसे घूर्णित नेत्रोंवाली, गाने-बजानेमें तल्लीन तथा नृत्य करती हुई देवदुर्लभ दिव्य हजारों रुद्र-कन्याओं एवं अप्सराओंसे सुशोभित; विकसित कमल आदिसे युक्त; उत्तम पक्षियोंसे परिपूर्ण; रुद्रस्त्रीगणोंसे भरे हुए; जलक्रीड़ामें रत, रतोत्सवमें तल्लीन, प्रत्येक पदपर ललित, संगीतमें अनुरक्त तथा पद्मरागके समान कान्तिवाली स्त्रियोंसे सुशोभित पुरको देखकर सभी देवता पूर्णरूपसे आश्चर्यचकित होकर वहीं खड़े हो गये॥ २१–३५॥ | | तत्रैव ददृशुर्देवा वृन्दं रुद्रगणस्य च।<br>गणेश्वराणां वीराणामपि वृन्दं सहस्रशः॥ ३६<br>सुवर्णकृतसोपानान् वज्रवैदूर्यभूषितान्।<br>स्फाटिकान् देवदेवस्य ददृशुस्ते विमानकान्॥ ३७ | वहींपर देवताओंने रुद्रगणों, हजारों वीर गणेश्वरों, हीरे तथा वैदूर्यमणिसे जटित सुवर्णमय सीढ़ियों और देवदेवके स्फटिकनिर्मित भवनोंको देखा॥ ३६–३७॥ | | तेषां शृङ्गेषु हृष्टाश्च नार्यः कमललोचनाः।<br>विशालजघना यक्षा गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ ३८<br>किन्नर्यः किन्नराश्चैव भुजङ्गाः सिद्धकन्यकाः।<br>नानावेषधराश्चान्या नानाभूषणभूषिताः॥ ३९<br>नानाप्रभावसंयुक्ता नानाभोगरतिप्रियाः।<br>नीलोत्पलदलप्रख्याः पद्मपत्रायतेक्षणाः॥ ४०<br>पद्मकिञ्जल्कसङ्काशैरंशुकैरतिशोभनाः ।<br>वलयैनूपुरैर्हारैश्छत्रैश्चित्रैस्तथांशुकैः ।<br>भूषिता भूषितैश्चान्यैर्मण्डिता मण्डनप्रियाः॥ ४१ | उन [भवनों]-के शिखरोंपर हृष्ट, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा विशाल जाँघोंवाली स्त्रियाँ, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ, किन्नरियाँ, किन्नर, नाग, सिद्धगणोंकी कन्याएँ, तथा अन्य स्त्रियाँ विराजमान थीं; वे अनेक वेष धारण की हुई थीं, अनेक आभूषणोंसे अलंकृत थीं, अनेक हाव-भावोंसे युक्त थीं, अनेक भोग तथा रतिसे प्रेम करनेवाली थीं, नील कमलके पत्रके समान शोभावाली थीं, कमल-पत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली थीं, कमलकी पंखुड़ीके समान [कोमल] वस्त्रोंसे सुशोभित थीं, कंकण-नूपुर-हार-रंग-बिरंगे छत्र तथा वस्त्रोंसे भूषित थीं, अन्य प्रकारके आभूषणोंसे मण्डित थीं और सजावटसे प्रीति करनेवाली थीं॥ ३८–४१॥ |
अध्याय ८०] देवताओँका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वाथ वृन्दं सुरसुन्दरीणां गणेश्वराणां सुरसुन्दरीणाम्।<br>जग्मुर्गणेशस्य पुरं सुरेशाः पुरद्विषः शक्रपुरोगमाश्च॥ ४२ | देवताओंकी सुन्दर स्त्रियों तथा गणेश्वरोंकी सुन्दर स्त्रियोंको देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता त्रिपुरके शत्रु गणाधीशके पुरमें गये॥ ४२ ॥ |
| दृष्ट्वा च तस्थुः सुरसिद्धसङ्घाः पुरस्य मध्ये पुरुहूतपूर्वाः।<br>भवस्य बालार्कसहस्रवर्णं विमानमाद्यं परमेश्वरस्य॥ ४३ | [उस] पुरके मध्यमें स्थित परमेश्वर शिवके हजारों उगते हुए सूर्यके समान आभावाले भवनको देखकर इन्द्रसहित देवता तथा सिद्धगण वहाँ रुक गये॥ ४३ ॥ |
| अथ तस्य विमानस्य द्वारि संस्थं गणेश्वरम्।<br>नन्दिनं ददृशुः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः॥ ४४ | इसके बाद इन्द्र आदि सभी देवताओंने उस भवनके द्वारपर स्थित गणेश्वर नन्दीको देखा॥ ४४ ॥ |
| तं दृष्ट्वा नन्दिनं सर्वे प्रणम्याहुर्गणेश्वरम्।<br>जयेति देवास्तं दृष्ट्वा सोऽप्याह च गणेश्वरः॥ ४५<br>भो भो देवा महाभागाः सर्वे निर्धूतकल्मषाः।<br>सम्प्राप्ताः सर्वलोकेशा वक्तुमर्हथ सुव्रताः॥ ४६ | उन गणेश्वर नन्दीको देखकर सभी देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और कहा—'जय हो'। तब गणेश्वरने भी उन्हें देखकर कहा—'हे महाभाग्यशाली देवताओ! हे सुव्रतो! निष्पाप तथा सभी लोकोंके स्वामी आपलोग किसलिये आये हैं; कृपा करके बतायें॥ ४५-४६॥ |
| तमाहुर्वरदं देवं वारणेन्द्रसमप्रभम्।<br>पशुपशविमोक्षार्थं दर्शयास्मान् महेश्वरम्॥ ४७ | तत्पश्चात् देवताओंने उनसे कहा—'पशुपाश (जीवभाव)-से मुक्तिके लिये आप हमलोगोंको गजराज (ऐरावत)-के समान शुभ्र कान्तिवाले एवं वर प्रदान करनेवाले देव महेश्वरका दर्शन कराइये॥ ४७॥ |
| पुरा पुरत्रयं दग्धुं पशुत्वं परिभाषितम्।<br>शङ्किताश्च वयं तत्र पशुत्वं प्रति सुव्रत॥ ४८ | हे सुव्रत! पूर्वकालमें तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये पशुत्व स्वीकार किया गया था; उस पशुत्वके विषयमें हमलोग शंकाग्रस्त हैं॥ ४८॥ |
| व्रतं पाशुपतं प्रोक्तं भवेन परमेष्ठिना।<br>व्रतेनानेन भूतेश पशुत्वं नैव विद्यते॥ ४९<br>अथ द्वादशवर्षं वा मासद्वादशकं तु वा।<br>दिनद्वादशकं वापि कृत्वा तद् व्रतमुत्तमम्॥ ५०<br>मुच्यन्ते पशवः सर्वे पशुपाशैर्भवस्य तु। | परमेश्वर शिवके द्वारा पाशुपतव्रत कहा गया है; हे भूतेश! इस व्रतके करनेसे पशुत्व नहीं रहता है। बारह वर्षोंतक, बारह महीनोंतक अथवा बारह दिनोंतक भी उस उत्तम व्रतको करके समस्त पशु [भगवान्] शिवके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ४९-५० १/२॥ |
| दर्शयामास तान् देवान्नारायणपुरोगमान्॥ ५१<br>नन्दी शिलादतनयः सर्वभूतगणाग्रणीः।<br>तं दृष्ट्वा देवमीशानं साम्बं सगणमव्ययम्॥ ५२<br>प्रणेमुस्तुष्टुवुश्चैव प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>विज्ञाप्य शितिकण्ठाय पशुपाशविमोक्षणम्॥ ५३<br>तस्थुस्तदग्रतः शम्भोः प्रणिपत्य पुनः पुनः। | तदनन्तर सभी भूतगणोंमें अग्रणी शिलादपुत्र नन्दीने नारायण आदि उन देवताओंको [शिवका] दर्शन कराया। तब उमा तथा गणोंसहित उन सनातन प्रभु ईशानका दर्शन करके प्रीतिके कारण रोमांचित देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की तथा [उन] शितिकण्ठ (शिव)-से पशुपाशसे मुक्तिका निवेदन करके बार-बार प्रणामकर उन शम्भुके सामने वे खड़े हो गये॥ ५१—५३ १/२॥ |
| ततः सम्प्रेक्ष्य तान् सर्वान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५४ | तत्पश्चात् उन सबकी ओर देखकर देवदेव, वृषभध्वज, परमेश्वर भगवान् महेश्वर उन देवताओं तथा |
८१- विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपशविमोचक लिङ्ग-व्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य
| ३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| विशोध्य तेषां देवानां पशुत्वं परमेश्वरः।<br>व्रतं पाशुपतं चैव स्वयं देवो महेश्वरः॥ ५५<br>उपदिश्य मुनीनां च सहास्ते चाम्बया भवः।<br>तदाप्रभृति ते देवाः सर्वे पाशुपताः स्मृताः॥ ५६<br>पशूनां च पतिर्यस्मात्तेषां साक्षाद्धि देवताः।<br>तस्मात्पाशुपताः प्रोक्तास्तपेस्तेपुश्च ते पुनः॥ ५७<br>ततो द्वादशवर्षान्ते मुक्तपाशाः सुरोत्तमाः।<br>ययुर्यथागतं सर्वे ब्रह्मणा सह विष्णुना॥ ५८<br>एतद्वः कथितं सर्वं पितामहमुखाच्छ्रुतम्।<br>पुरा सनत्कुमारेण तस्माद् व्यासेन धीमता॥ ५९<br>यः श्रावयेच्छुचिर्विप्राञ्छृणुयाद्वा शुचिर्नरः।<br>स देहभेदमासाद्य पशुपाशैः प्रमुच्यते॥ ६० | मुनियोंके पशुत्वभावका शोधनकर उन्हें पाशुपतव्रतका स्वयं उपदेश करके उमाके साथ बैठ गये। तभीसे वे सब देवता पाशुपत कहे जाने लगे। वे शिव उन पशुओंके साक्षात् पति हैं, अतः देवता पाशुपत कहे गये हैं। इसके बाद उन सबने पुनः तपस्या की। तदनन्तर बारह वर्षके अन्तमें सभी श्रेष्ठ देवता पशुपाशसे मुक्त हो गये और जैसे आये थे, वैसे ही ब्रह्मा तथा विष्णुके साथ वापस लौट गये॥ ५४–५८॥<br><br>[हे मुनियो!] मैंने आप लोगोंसे यह सब कह दिया; पूर्वकालमें इसे सनत्कुमारने ब्रह्माजीके मुखसे तथा बुद्धिमान् व्यासजीने उन [सनत्कुमार]-से सुना था। जो मनुष्य शुद्ध होकर इसे ब्राह्मणोंको सुनाता है अथवा शुद्ध होकर [स्वयं] सुनता है, वह दूसरा शरीर प्राप्त करके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५९-६०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यं नामाशीतितमोऽध्यायः॥ ८०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्य' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः<br>व्रतमेतत्त्वया प्रोक्तं पशुपाशविमोक्षणम्।<br>व्रतं पाशुपतं लैङ्गं पुरा देवैरनुष्ठितम्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं त्वया श्रुतम्।<br><br>सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण पृष्टः शैलादिरादरात्॥ २<br>नन्दी प्राह वचस्तस्मै प्रवदामि समासतः।<br>देवैर्दैत्यैस्तथा सिद्धैर्गन्धर्वैः सिद्धचारणैः॥ ३<br>मुनिभिश्च महाभागैरनुष्ठितमनुत्तमम्।<br>व्रतं द्वादशलिङ्गाख्यं पशुपाशविमोक्षणम्॥ ४<br>भोगदं योगदं चैव कामदं मुक्तिदं शुभम्।<br>अवियोगकरं पुण्यं भक्तानां भयनाशनम्॥ ५<br>षडङ्गसहितान् वेदान् मथित्वा तेन निर्मितम्।<br>सर्वदानोत्तमं पुण्यमश्वमेधायुताधिकम्॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस व्रतको बता दिया; पूर्वकालमें देवताओंने लिङ्गसम्बन्धी पाशुपतव्रतका अनुष्ठान किया था, अतः आपने पहले [इसके विषयमें] जैसा भी श्रवण किया था, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें सनत्कुमारने [इस सम्बन्धमें] शिलादपुत्र नन्दीसे आदरपूर्वक पूछा था; तब नन्दीने उनसे जो बात कही थी, वही मैं भी आप लोगोंको संक्षेपमें बताता हूँ—देवताओं, दैत्यों, सिद्धों, गन्धर्वों, चारणों तथा महाभाग्यवान् मुनियोंने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस अत्युत्तम द्वादश लिङ्ग नामक व्रतको किया था। यह भोग (सुख) प्रदान करनेवाला, योग देनेवाला, मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मुक्ति देनेवाला, शिवसे सदा अवियोग करानेवाला, पुण्य देनेवाला, भक्तोंके भयका नाश करनेवाला, छः अंगोंसहित वेदोंका मंथन करके उन [शिव]-के द्वारा निर्मित, समस्त |
अध्याय ८१ ] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वमङ्गलदं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामपि मोक्षदम्॥ ७<br>सर्वव्याधिहरं चैव सर्वज्वरविनाशनम्।<br>देवैरनुष्ठितं पूर्वं ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ८ | दानोंमें उत्तम, दस हजार अश्वमेध यज्ञोंसे अधिक पुण्य देनेवाला, सभी मंगल प्रदान करनेवाला, पवित्र, समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला, संसार-सागरमें डूबे हुए प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला, सभी रोगोंको नष्ट करनेवाला तथा सभी ज्वरोंका विनाश करनेवाला है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंने किया था॥ २–८॥ |
| कृत्वाकनीयसं लिङ्गं स्नाप्य चन्दनवारिणा।<br>चैत्रमासादि विप्रेन्द्राः शिवलिङ्गव्रतं चरेत्॥ ९<br>कृत्वा हैमं शुभं पद्मं कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>नवरत्नैश्च खचितमष्टपत्रं यथाविधि॥ १०<br>कर्णिकायां न्यसेल्लिङ्गं स्फाटिकं पीठसंयुतम्।<br>तत्र भक्त्या यथान्यायमार्चयेद् बिल्वपत्रकैः॥ ११<br>सितैः सहस्त्रकमलै रक्तैर्नीलोत्पलैरपि।<br>श्वेतार्ककर्णिकारैश्च करवीरैर्बकैरपि॥ १२<br>एतैरन्यैर्यथालाभं गायत्र्या तस्य सुव्रताः।<br>सम्पूज्य चैव गन्धाद्यैर्धूपैर्दीपैश्च मङ्गलैः॥ १३<br>नीराजनाद्यैश्चान्यैश्च लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>अगरुं दक्षिणे दद्यादघोरेण द्विजोत्तमाः॥ १४<br>पश्चिमे सद्यमन्त्रेण दिव्यां चैव मनःशिलाम्।<br>उत्तरे वामदेवेन चन्दनं वापि दापयेत्॥ १५<br>पुरुषेण मुनिश्रेष्ठा हरितालं च पूर्वतः।<br>सितागरूद्भवं विप्रास्तथा कृष्णागरूद्भवम्॥ १६<br>तथा गुग्गुलुधूपं च सौगन्धिकमनुत्तमम्।<br>सितारं नाम धूपं च दद्यादीशाय भक्तितः॥ १७<br>महाचरुर्निवेद्यः स्यादाढकान्नमथापि वा।<br>एतद्वः कथितं पुण्यं शिवलिङ्गमहाव्रतम्॥ १८ | हे विप्रेन्द्रो! एक विशाल लिङ्ग बनाकर इसे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान कराकर चैत्र महीनेसे प्रारम्भ करके इस शिवलिङ्गव्रतको करना चाहिये। केसरकी कर्णिकासे युक्त, नौ रत्नोंसे जटित तथा आठ दलोंवाले एक सुन्दर सुवर्णमय कमलकी रचना करके उसकी कर्णिकामें विधिके अनुसार वेदीयुक्त स्फटिकके लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। हे सुव्रतो! उसमें भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार बिल्वपत्रोंसे, हजार श्वेत-लाल-नीले कमलोंसे, श्वेतमदारके कर्णिकारोंसे, कनैल पुष्पोंसे, कुरबकपुष्पोंसे तथा अन्य उपलब्ध पुष्पोंसे रुद्रगायत्री मन्त्रद्वारा उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे उत्तम द्विजो! गन्ध, धूप, दीप, नीराजन आदि मंगल उपचारोंसे लिङ्गमूर्ति महेश्वरका पूजन करके अघोर मन्त्रसे दक्षिणभागमें अगरु देना चाहिये, सद्योजात मन्त्रसे पश्चिम भागमें दिव्य मनःशिला और वामदेव मन्त्रसे उत्तर भागमें चन्दन अर्पित करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! तत्पुरुष मन्त्रसे पूर्व भागमें हरिताल प्रदान करना चाहिये। हे विप्रो! श्वेत अगरुसे तथा कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप, सुगन्धित तथा उत्तम गुग्गुलधूप और सितार नामक धूप भक्तिपूर्वक महेश्वरको अर्पित करना चाहिये। तत्पश्चात् महाचरुका नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये अथवा आढक-परिमाणमें अन्न निवेदित करना चाहिये। [हे विप्रो!] मैंने आप लोगोंको यह पुण्यदायक शिवलिङ्ग महाव्रत बता दिया॥ ९–१८॥ |
| सर्वमासेषु सामान्यं विशेषोऽपि च कीर्त्यते।<br>वैशाखे वज्रलिङ्गं च ज्येष्ठे मारकतं तथा॥ १९<br>आषाढे मौक्तिकं लिङ्गं श्रावणे नीलनिर्मितम्।<br>मासि भाद्रपदे लिङ्गं पद्मरागमयं शुभम्॥ २०<br>आश्विने चैव विप्रेन्द्राः गोमेदकमयं शुभम्।<br>प्रवालेनैव कार्त्तिक्यां तथा वै मार्गशीर्षके॥ २१ | यह सभी महीनोंमें सामान्य शिवलिङ्गव्रत है; अब मैं विशेषका वर्णन करता हूँ। हे विप्रेन्द्रो! वैशाखमें वज्र (हीरा)-निर्मित लिङ्ग, ज्येष्ठमें मरकतनिर्मित लिङ्ग, आषाढ़में मोतीसे निर्मित लिङ्ग, सावनमें नीलमणिसे निर्मित लिङ्ग, भाद्रपदमासमें पद्मरागसे निर्मित सुन्दर लिङ्ग, आश्विन (क्वार)-में गोमेदसे निर्मित शुभ लिङ्ग, कार्त्तिकमें प्रवाल |
| ३९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| वैडूर्यनिर्मितं लिङ्गं पुष्परागेण पुष्यके।<br>माघे च सूर्यकान्तेन फाल्गुने स्फाटिकेन च॥ २२<br><br>सर्वमासेषु कमलं हैममेकं विधीयते।<br>अलाभे रजतं वापि केवलं कमलं तु वा॥ २३<br><br>रत्नानामप्यलाभे तु हेम्ना वा रजतेन वा।<br>रजतस्याप्यलाभे तु ताम्रलोहेन कारयेत्॥ २४<br><br>शैलं वा दारुजं वापि मृन्मयं वा सवेदिकम्।<br>सर्वगन्धमयं वापि क्षणिकं परिकल्पयेत्॥ २५ | (मूँगा)-से निर्मित लिङ्ग, मार्गशीर्ष (अगहन)-में वैडूर्यसे निर्मित लिङ्ग, पौषमें पुष्पराग (पुखराज)-से निर्मित लिङ्ग, माघमें सूर्यकान्तमणिसे निर्मित लिङ्ग तथा फाल्गुनमें स्फटिकसे निर्मित लिङ्गका यजन करना चाहिये॥ १९-२२॥<br><br>सभी महीनोंमें सुवर्णमय एक कमल बनानेका विधान है। सुवर्णके अभावमें चाँदीका कमल बनाना चाहिये। रत्नोंके अभावमें सोने अथवा चाँदीसे निर्माण करना चाहिये। चाँदीके भी अभावमें ताँबे अथवा लोहेसे बनाना चाहिये। वेदीसहित पाषाणका अथवा काष्ठका अथवा मिट्टीका सर्वगन्धमय लिङ्ग बनाये अथवा क्षणिक लिङ्गकी रचना करे॥ २३-२५॥ | | हैमन्तिके महादेवं श्रीपत्रेणैव पूजयेत्।<br>सर्वमासेषु कमलं हैममेकमथापि वा॥ २६<br><br>रजतं वापि कमलं हैमकर्णिकमुत्तमम्।<br>रजतस्याप्यभावे तु बिल्वपत्रैः समर्चयेत्॥ २७<br><br>सहस्रकमलालाभे तदर्धेनापि पूजयेत्।<br>तदर्धार्धेन वा रुद्रमष्टोत्तरशतेन वा॥ २८ | हेमन्त ऋतुमें बिल्वपत्रसे महादेवकी पूजा करनी चाहिये। सभी महीनोंमें एक सुवर्णमय कमल बनाना चाहिये अथवा सुवर्णकी कर्णिकायुक्त चाँदीका उत्तम कमल बनाना चाहिये और चाँदीके अभावमें बिल्वपत्रोंसे ही [शिवका] पूजन करना चाहिये। हजार कमलोंके अभावमें उसके आधेसे ही पूजन करना चाहिये अथवा उसके भी आधेसे अथवा कम-से-कम एक सौ आठ कमलोंसे रुद्रका पूजन करना चाहिये॥ २६-२८॥ | | बिल्वपत्रे स्थिता लक्ष्मीर्देवी लक्षणसंयुता।<br>नीलोत्पलेऽम्बिका साक्षादुत्पले षण्मुखः स्वयं॥ २९<br><br>पद्माश्रितो महादेवः सर्वदेवपतिः शिवः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीपत्रं न त्यजेद् बुधः॥ ३०<br><br>नीलोत्पलं चोत्पलं च कमलं च विशेषतः।<br>सर्ववश्यकरं पद्मं शिला सर्वार्थसिद्धिदा॥ ३१<br><br>कृष्णागरुसमुद्भूतं सर्वपापनिकृन्तनम्।<br>गुग्गुलुप्रभृतीनां च दीपानां च निवेदनम्॥ ३२<br><br>सर्वरोगक्षयं चैव चन्दनं सर्वसिद्धिदम्।<br>सौगन्धिकं तथा धूपं सर्वकामार्थसाधकम्॥ ३३<br><br>श्वेतागरूद्भवं चैव तथा कृष्णागरूद्भवम्।<br>सौम्यं सीतारिधूपं च साक्षान्निर्वाणसिद्धिदम्॥ ३४ | बिल्वपत्रमें सर्वलक्षणयुक्त देवी लक्ष्मी, नीलोत्पलमें साक्षात् अम्बिका और उत्पलमें स्वयं षडानन विराजमान रहते हैं; सभी देवताओंके स्वामी महादेव शिव पद्ममें निवास करते हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्यको पूरे प्रयत्नसे बिल्वपत्रका [कभी भी] त्याग नहीं करना चाहिये और नीलोत्पल, उत्पल तथा विशेषकर कमलका त्याग नहीं करना चाहिये। पद्म सभीको वशमें करनेवाला होता है और शिला (मनःशिला) सभी सिद्धियोंको देनेवाली होती है। कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप सभी पापोंको हरनेवाला, गुग्गुल आदिके दीपोंका निवेदन सभी रोगोंका क्षय करनेवाला, चन्दन सभी सिद्धियोंको देनेवाला और सुगन्धित धूप सभी कामनाओं तथा अर्थोंका साधक है। श्वेत अगरु तथा कृष्ण अगरुसे बनाया हुआ धूप और सौम्य सीतारि [नामक] धूप साक्षात् निर्वाण-सिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ २९-३४॥ |
अध्याय ८१] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९५
| श्वेतार्ककुसुमे साक्षाच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः।<br>कर्णिकारस्य कुसुमे मेधा साक्षाद् व्यवस्थिता ॥ ३५<br><br>करवीरे गणाध्यक्षो बके नारायणः स्वयम्।<br>सुगन्धिषु च सर्वेषु कुसुमेषु नगात्मजा ॥ ३६<br><br>तस्मादेतैैर्यथालाभं पुष्पधूपादिभिः शुभैः।<br>पूजयेद्देवदेवेशं भक्त्या वित्तानुसारतः ॥ ३७ | श्वेत मदारके पुष्पमें साक्षात् चतुर्मुख ब्रह्मा निवास करते हैं और कर्णिकारके पुष्पमें साक्षात् [देवी] मेधा निवास करती हैं। करवीरके पुष्पमें गणाध्यक्ष, बक पुष्पमें स्वयं नारायण और सभी सुगन्धित पुष्पोंमें [भगवती] पार्वती विराजमान हैं। अतः यथोपलब्ध इन पुष्पोंसे तथा शुभ पुष्प, धूप, दीप आदिसे भक्तिपूर्वक अपने वित्त-सामर्थ्यके अनुसार देवदेवेश [शिव]-की पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३७॥ |
| निवेदयत्ततो भक्त्या पायसं च महाचरुम्।<br>सघृतं सोपदंशं च सर्वद्रव्यसमन्वितम् ॥ ३८<br><br>शुद्धान्नं वापि मुद्गान्नमाढकं सार्धकं तु वा।<br>चामरं तालवृन्तं च तस्मै भक्त्या निवेदयेत् ॥ ३९<br><br>उपहाराणि पुण्यानि न्यायेनैवार्जितान्यपि।<br>नानाविधानि चार्हाणि प्रोक्षितान्यम्भसा पुनः ॥ ४० | तदनन्तर भक्तिपूर्वक पायस तथा महाचरु निवेदित करे और घृतयुक्त, व्यंजनोंसहित तथा अन्य द्रव्ययुक्त शुद्ध अन्न अथवा मूँगका अन्न एक आढक (चार प्रस्थ) अथवा उसका आधा समर्पित करे। पुनः चामर और तालवृन्त (ताड़का पंखा) उन्हें भक्तिपूर्वक निवेदित करे। इसी प्रकार न्यायपूर्वक अर्जित किये गये अनेक प्रकारके पवित्र पूजायोग्य उपहारोंको जलसे प्रोक्षित करके भक्तियुक्त चित्तसे [भगवान्] रुद्रको समर्पित करे॥ ३८-४० १/२॥ |
| निवेदयेच्च रुद्राय भक्तियुक्तेन चेतसा।<br>क्षीराब्धौ सर्वदेवानां स्थित्यर्थममृतं ध्रुवम् ॥ ४१<br><br>विष्णुना जिष्णुना साक्षादन्ने सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>भूतानामन्नदानेन प्रीतिर्भवति शङ्करे ॥ ४२<br><br>तस्मात्सम्पूजयेद्देवमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।<br>उपहारे तथा तुष्टिर्व्यजने पवनः स्वयम् ॥ ४३<br><br>सर्वात्मको महादेवो गन्धतोये ह्यपांपतिः।<br>पीठे वै प्रकृतिः साक्षान्महदाद्यैर्व्यवस्थिता ॥ ४४<br><br>तस्माद्देवं यजेद्भक्त्या प्रतिमासं यथाविधि।<br>पौर्णमास्यां व्रतं कार्यं सर्वकामार्थसिद्धये ॥ ४५<br><br>सत्यं शौचं दया शान्तिः सन्तोषो दानमेव च।<br>पौर्णमास्याममावास्यामुपवासं च कारयेत् ॥ ४६ | जीतनेकी इच्छावाले विष्णुने सभी देवताओंकी स्थितिके लिये क्षीरसागरसे सारा अमृत खींचकर साक्षात् अन्नके भीतर स्थापित कर दिया। प्राणियोंको अन्नदान करनेसे शिवजीके प्रति अनुराग हो जाता है, अतः अन्नसे शिवकी पूजा करनी चाहिये। अन्नमें प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं। उपहारमें तुष्टि विद्यमान रहती है। पंखेमें स्वयं वायुदेव वास करते हैं। महादेव सभी वस्तुओंमें विराजमान रहते हैं। जलदेवता (वरुण) सुगन्धित जलमें विद्यमान हैं। पीठ (वेदी)-में महत् आदिके साथ साक्षात् [देवी] प्रकृति विराजमान हैं। अतः प्रत्येक महीने विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करनी चाहिये। समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये पूर्णिमाको व्रत [अवश्य] करना चाहिये। [व्रतमें] सत्य, शुद्धता, दया, शान्ति, सन्तोष तथा दानशीलताका पालन करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावस्याके दिन उपवास करना चाहिये॥ ४१-४६॥ |
| संवत्सरान्ते गोदानं वृषोत्सर्गं विशेषतः।<br>भोजयेद् ब्राह्मणान् भक्त्या श्रोत्रियान् वेदपारगान् ॥ ४७<br><br>तल्लिङ्गं पूजितं तेन सर्वद्रव्यसमन्वितम्।<br>स्थापयेद्वा शिवक्षेत्रे दापयेद् ब्राह्मणाय वा ॥ ४८ | वर्षके अन्तमें गोदान तथा विशेषरूपसे वृषोत्सर्ग करना चाहिये। वेदके पारगामी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। पूजा किये गये उस शिवलिङ्गको |
| ३९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | सभी सामग्रियोंसहित शिवक्षेत्रमें स्थापित कर देना चाहिये अथवा ब्राह्मणको समर्पित कर देना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥ | | य एवं सर्वमासेषु शिवलिङ्गमहाव्रतम्।<br>कुर्याद्भक्त्या मुनिश्रेष्ठाः स एव तपतां वरः ॥ ४९<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानै रत्नभूषितैः।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं नेहायाति कदाचन ॥ ५०<br>अथवा ह्येकमासं वा चरेदेवं व्रतोत्तमम्।<br>शिवलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ५१<br>अथवा सक्तचित्तश्चेद्यान्यान् सञ्चिन्तयेद्वरान्।<br>वर्षमेकं चरेदेवं तांस्तान् प्राप्य शिवं व्रजेत् ॥ ५२<br>देवत्वं वा पितृत्वं वा देवराजत्वमेव च।<br>गाणपत्यपदं वापि सक्तोऽपि लभते नरः ॥ ५३ | हे श्रेष्ठ मुनियो! जो इस प्रकार सभी मासोंमें शिवलिङ्ग महाव्रतको करता है, वही तप करनेवालोंमें श्रेष्ठ है और वह करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान तथा रत्नोंसे सुशोभित विमानोंसे शिवलोक पहुँचकर [वहाँसे] कभी भी इस लोकमें वापस नहीं आता है; अथवा जो एक महीने भी इसी प्रकार [इस] उत्तम व्रतको करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अथवा [सांसारिक भोगोंमें] आसक्तचित्तवाला व्यक्ति एक वर्षतक यदि इस प्रकार करे, तो वह जिन-जिन कामनाओंको [मनमें] संचित किये रहता है, उन-उनको प्राप्त करके शिवलोक जाता है। आसक्त मनुष्य भी [इसे करके] देवत्व, पितृत्व, इन्द्रत्व तथा गणाधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ ४९-५३ ॥ | | विद्यार्थी लभते विद्यां भोगार्थी भोगमाप्नुयात्।<br>द्रव्यार्थी च निधिं पश्येदायुःकामश्चिरायुषम् ॥ ५४<br>यान्यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान्प्राप्येह मोदते।<br>एकमासव्रतादेव सोऽन्ते रुद्रत्वमाप्नुयात् ॥ ५५ | विद्या चाहनेवाला विद्या प्राप्त करता है, भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त करता है, धन चाहनेवाला धन प्राप्त करता है और आयुकी कामना करनेवाला दीर्घ आयु प्राप्त करता है। जिन-जिन कामनाओंका मनुष्य चिन्तन करता है, उन-उनको एक मासके ही व्रतसे प्राप्त करके इस लोकमें आनन्दित रहता है और अन्तमें वह रुद्रत्व प्राप्त करता है ॥ ५४-५५ ॥ | | इदं पवित्रं परमं रहस्यं<br>व्रतोत्तमं विश्वसृजापि सृष्टम्।<br>हिताय देवासुरसिद्धमर्त्य-<br>विद्याधराणां परमं शिवेन ॥ ५६ | विश्वका सृजन करनेवाले शिवने देवताओं, असुरों, सिद्धों, मनुष्यों तथा विद्याधरोंके हितके लिये इस परम पवित्र, परम रहस्यमय एवं उत्तम व्रतकी सृष्टि की है ॥ ५६ ॥ | | सम्पूज्य पूज्यं विधिनेवमीशं<br>प्रणम्य मूर्ध्ना सह भृत्यपुत्रैः।<br>व्यपोहनं नाम जपेत्स्तवं च<br>प्रदक्षिणं कृत्य शिवं प्रयत्नात् ॥ ५७ | इस प्रकार विधिपूर्वक ईश्वरकी पूजा करके सेवकों तथा पुत्रोंके साथ सिर झुकाकर प्रणाम करके प्रयत्नपूर्वक शिवकी प्रदक्षिणा करके व्यपोहन नामक स्तवका जप करना चाहिये ॥ ५७ ॥ | | पुराकृतं विश्वसृजा स्तवं च<br>हिताय देवेन जगत्त्रयस्य।<br>पितामहेनैव सुरैश्च सार्धं<br>महानुभावेन महार्घ्यमेतत् ॥ ५८ | पूर्व कालमें विश्वकी रचना करनेवाले महानुभाव देव पितामह (ब्रह्मा)-ने देवताओंके साथ तीनों लोकोंके हितके लिये इस महामूल्यवान् स्तवको बनाया था ॥ ५८ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पशूपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथनं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पशूपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथन' नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥
८२- सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल
अध्याय ८२ ] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ३१७
बयासीवाँ अध्याय
सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सूत उवाच<br>व्यपोहनस्तवं वक्ष्ये सर्वसिद्धिप्रदं शुभम्।<br>नन्दिनश्च मुखाच्छ्रुत्वा कुमारेण महात्मना ॥ १<br>व्यासाय कथितं तस्माद् बहुमानेन वै मया।<br>नमः शिवाय शुद्धाय निर्मलाय यशस्विने ॥ २<br>दुष्टान्तकाय सर्वाय भवाय परमात्मने।<br>पञ्चवक्त्रो दशभुजो ह्यक्षपञ्चदशैर्युतः ॥ ३<br>शुद्धस्फटिकसङ्काशः सर्वाभरणभूषितः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वोपरि सुसंस्थितः ॥ ४<br>पद्मासनस्थः सोमेशः पापमाशु व्यपोहतु। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले मंगलमय व्यपोहनस्तवको बताऊँगा; इसे नन्दीके मुखसे सुनकर महात्मा सनत्कुमारने व्यासजीको बताया और उनसे परम आदरपूर्वक मैंने सुना। कल्याणकारी, शुद्ध, निर्मल, यशस्वी, दुष्टोंका नाश करनेवाले, सर्व, भव तथा परमात्माको नमस्कार है। पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, पन्द्रह नेत्रोंसे युक्त, शुद्ध स्फटिकके सदृश कान्तिमान्, सभी आभूषणोंसे विभूषित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्त, सबसे ऊपर प्रतिष्ठित तथा पद्मासनपर स्थित उमासहित भगवान् शिव पापको शीघ्र दूर करें॥ १-४ १/२ ॥ |
| ईशानः पुरुषश्चैव अघोरः सद्य एव च ॥ ५<br>वामदेवश्च भगवान् पापमाशु व्यपोहतु।<br>अनन्तः सर्वविद्येशः सर्वज्ञः सर्वदः प्रभुः ॥ ६<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>सूक्ष्मः सुरासुरेशानो विश्वेशो गणपूजितः ॥ ७<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>शिवोत्तमो महापूज्यः शिवध्यानपरायणः ॥ ८<br>सर्वगः सर्वदः शान्तः स मे पापं व्यपोहतु।<br>एकाक्षो भगवानीशः शिवार्चनपरायणः ॥ ९<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु। | ईशान, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा भगवान् वामदेव पापको शीघ्र दूर करें। वे अनन्त, सर्वविद्येश, सर्वज्ञ, सर्वद, प्रभु तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे सूक्ष्म, सुरासुरेशान, विश्वेश, गणपूजित तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे शिवोत्तम, महापूज्य, शिवध्यानपरायण, सर्वग, सर्वद तथा शान्त मेरे पापको दूर करें। वे एकाक्ष, भगवान्, ईश, शिवार्चन-परायण तथा शिवध्यानैकसम्पन्न सदा मेरे पापको दूर करें॥ ५-९ १/२ ॥ |
| त्रिमूर्तिर्भगवानीशः शिवभक्तिप्रबोधकः ॥ १०<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>श्रीकण्ठः श्रीपतिः श्रीमान् शिवध्यानरतः सदा ॥ ११<br>शिवार्चनरतः साक्षात् स मे पापं व्यपोहतु।<br>शिखण्डी भगवान् शान्तः शवभस्मानुलेपनः ॥ १२<br>शिवार्चनरतः श्रीमान् स मे पापं व्यपोहतु। | वे त्रिमूर्ति, भगवान्, ईश, शिवभक्तिप्रबोधक तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे श्रीकण्ठ, श्रीपति, श्रीमान्, सदा शिवध्यानरत तथा शिवार्चनरत मेरे पापको दूर करें। वे शिखण्डी, भगवान्, शान्त, शवभस्मानुलेपन, शिवार्चनरत तथा श्रीमान् मेरे पापको दूर करें॥ १०-१२ १/२ ॥ |
| त्रैलोक्यनमिता देवी सोल्काकारा पुरातनी ॥ १३<br>दाक्षायणी महादेवी गौरी हैमवती शुभा।<br>एकपर्णाग्रजा सौम्या तथा वै चैकपाटला ॥ १४<br>अपर्णा वरदा देवी वरदानैकतत्परा।<br>उमासुरहरा साक्षात्कौशिकी वा कपर्दिनी ॥ १५ | जो तीनों लोकोंद्वारा नमस्कृत, उल्काके आकारवाली, सनातनी देवी, दक्षकन्या, महादेवी, गौरी, हिमालयपुत्री, कल्याणमयी, एकपर्णा, अग्रजा, सौम्या, एकपाटला, अपर्णा, वरदायिनी, वरप्रदान करनेमें सदा तत्पर, उमा, असुरोंका संहार करनेवाली साक्षात् कौशिकी, कपर्दिनी, |
३१८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग खट्वाङ्गधारिणी दिव्या कराग्रतरुपल्लवा। खट्वांग धारण करनेवाली, दिव्य, हाथके अग्रभागमें नैगमेयादिभिर्दिव्यैश्चतुर्भिः पुत्रकैर्वृता ॥ १६ वृक्षका पल्लव धारण करनेवाली, नैगमेय* आदि चारों मेनाया नन्दिनी देवी वारिजा वारिजेक्षणा। दिव्य पुत्रोंसे घिरी हुई, मेनाकी पुत्री, जलसे उत्पन्न, अम्बा या वीतशोकस्य नन्दिनश्च महात्मनः ॥ १७ कमलके समान नेत्रोंवाली, शोकरहित महात्मा नन्दीकी अम्बा (माता), शुभावतीकी सखी, शान्त स्वभाववाली, शुभावत्याः सखी शान्ता पञ्चचूडा वरप्रदा। पंचचूड़ा, वर प्रदान करनेवाली, सभी प्राणियोंकी सृष्ट्यर्थं सर्वभूतानां प्रकृतित्वं गताव्यया ॥ १८ सृष्टिके लिये प्रकृतिके स्वरूपको प्राप्त, अव्यय त्रयोविंशतिभिस्तत्त्वैर्महदाद्यैर्विजृम्भिता । (शाश्वत), महत् आदि तेईस तत्त्वोंसे सम्पन्न, लक्ष्मी लक्ष्मादिशक्तिभिर्नित्यं नमिता नन्दनन्दिनी ॥ १९ आदि शक्तियोंसे सदा नमस्कृत, नन्दनन्दिनी, महादेवी मनोन्मनी महादेवी मायावी मण्डनप्रिया। मनोन्मनी, मायामयी, अलंकरणसे प्रीति करनेवाली, मायया या जगत्सर्वं ब्रह्माद्यं सचराचरम् ॥ २० [अपनी] मायासे ब्रह्मा आदि तथा चराचरसहित सम्पूर्ण क्षोभिणी मोहिनी नित्यं योगिनां हृदि संस्थिता। जगत्को क्षुब्ध एवं मोहित करनेवाली, योगियोंके एकानेकस्थिता लोके इन्दीवरनिभेक्षणा ॥ २१ हृदयमें सर्वदा विराजमान, संसारमें एक तथा अनेक रूपोंमें स्थित, नीलकमलके समान नेत्रोंवाली, गणेश्वरों- भक्त्या परमया नित्यं सर्वदेवैरभिष्टुता। ब्रह्मा-इन्द्र-यम-कुबेर आदि सभी देवताओंके द्वारा परम गणेश्राम्भोजगर्भेन्द्रयमवित्तेशपूर्वकैः ॥ २२ भक्तिसे नित्य स्तुत होनेवाली, [उनके द्वारा] स्तुत होकर संस्तुता जननी तेषां सर्वोपद्रवनाशिनी। उनकी माताके रूपमें सभी विपत्तियोंका नाश करनेवाली, भक्तानामार्तिहा भव्या भवभावविनाशिनी ॥ २३ भक्तोंके कष्टोंका हरण करनेवाली, भव्य, सांसारिक भावोंको नष्ट करनेवाली, दिव्य और बिना प्रयासके भुक्तिमुक्तिप्रदा दिव्या भक्तानामप्रयत्नतः। सा मे साक्षान्महादेवी पापमाशु व्यपोहतु ॥ २४ भक्तोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं—वे साक्षात् महादेवी मेरे पापको शीघ्र दूर करें ॥ १३–२४॥ चण्डः सर्वगणेशानो मुखाच्छम्भोर्विनिर्गतः। जो सभी गणोंके ईश, शम्भुके मुखसे निकले हुए, शिवार्चनरतः श्रीमान् स मे पापं व्यपोहतु ॥ २५ शिवार्चनमें लीन तथा श्रीयुक्त चण्ड हैं; वे मेरे पापको शालङ्कायनपुत्रस्तु हलमार्गोत्थितः प्रभुः। दूर करें। शालंकायनके पुत्र, हलमार्गसे उत्पन्न, ऐश्वर्यशाली, जामाता मरुतां देवः सर्वभूतमहेश्वरः ॥ २६ मरुतोंके जामाता, देवता, सभी भूतोंके महेश्वर, सर्वव्यापी, सर्वगः सर्वदृक् शर्वः सर्वेशसदृशः प्रभुः। सर्वद्रष्टा, शर्व, सर्वेश्वरके समान प्रभुत्वसम्पन्न, नारायण- सनारायणकैर्देवैः सेन्द्रचन्द्रदिवाकरैः ॥ २७ इन्द्र-चन्द्र-सूर्य आदि देवताओं-सिद्धों-यक्षों-गन्धर्वों- सिद्धैश्च यक्षगन्धर्वैर्भूतैर्भूतविधायकैः। भूतों, भूतोंका सृजन करनेवालों-उरगों-ऋषियों-महात्मा उरगैर्ऋषिभिश्चैव ब्रह्मणा च महात्मना ॥ २८ ब्रह्माके द्वारा स्तुत, तीनों लोकोंके स्वामी, मुनियोंके स्तुतस्त्रैलोक्यनाथस्तु मुनिरन्तःपुरं स्थितः। हृदयमें विराजमान और सबके द्वारा सर्वदा पूजित नन्दी सर्वदा पूजितः सर्वैर्नन्दी पापं व्यपोहतु ॥ २९ [मेरे] पापको दूर करें ॥ २५–२९ ॥
- सुश्रुतसंहिताके उत्तरतन्त्र अध्याय २७-३७ तकमें छोटे शिशुओंमें जो रोग होते हैं, उन्हें ग्रहोंसे उत्पन्न बताया गया है। स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती, पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका और नैगमेय (पितृग्रह)—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इन नौ ग्रहोंसे पीड़ित बालकके लक्षण अलग-अलग होते हैं। लक्षणोंके आधारपर यह ज्ञान होता है कि बालक अमुक ग्रहसे पीड़ित है। नैगम ग्रहसे पीड़ित बालकके मुखसे झाग गिरता है, वह हर समय बेचैन रहता है तथा ऊपरकी ओर देखता हुआ बराबर रोता है,
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४०० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग आदित्यश्च तथा सूर्य्यश्वांशुमांश्च दिवाकरः। एते वै द्वादशादित्या व्यपोहन्तु मलं मम ॥४३ गगनं स्पर्शनं तेजो रसश्च पृथिवी तथा। चन्द्रः सूर्य्यस्तथात्मा च तनवः शिवभाषिताः ॥४४ पापं व्यपोहन्तु मम भयं निर्नाशयन्तु मे। वासवः पावकश्चैव यमो निर्ऋतिरेव च ॥४५ वरुणो वायुसोमौ च ईशानो भगवान् हरिः। पितामहश्च भगवान् शिवध्यानपरायणः ॥ ४६ एते पापं व्यपोहन्तु मनसा कर्मणा कृतम्। नभस्वान् स्पर्शनो वायुरनिलो मारुतस्तथा ॥ ४७ प्राणः प्राणेशजीवेशौ मारुतः शिवभाषिताः। शिवार्चनरताः सर्वे व्यपोहन्तु मलं मम ॥ ४८ खेचरी वसुचारी च ब्रह्मेशो ब्रह्म ब्रह्मधीः । सुषेणः शाश्वतः पुष्टः सुपुष्टश्च महाबलः ॥ ४९ एते वै चारणाः शम्भोः पूजयातीव भाविताः । व्यपोहन्तु मलं सर्वं पापं चैव मया कृतम् ॥ ५० मन्त्रज्ञो मन्त्रवित्प्राज्ञो मन्त्रराट् सिद्धपूजितः । सिद्धवत्परमः सिद्धः सर्वसिद्धिप्रदायिनः ॥५१ व्यपोहन्तु मलं सर्वे सिद्धाः शिवपदार्चकाः। यक्षो यक्षेश धनदो जृम्भको मणिभद्रकः ॥ ५२ पूर्णभद्रेश्वरो माली शितिकुण्डलिरेव च। नरेन्द्रश्चैव यक्षेशा व्यपोहन्तु मलं मम ॥५३ अनन्तः कुलिकश्चैव वासुकिस्तक्षकस्तथा। कर्कोटकों महापद्मः शङ्खपालो महाबलः ॥ ५४ शिवप्रणामसम्पन्नाः शिवदेहप्रभूषणाः । मम पापं व्यपोहन्तु विषं स्थावरजङ्गमम् ॥ ५५ वीणाज्ञः किन्नरश्चैव सुरसेनः प्रमर्दनः। अतीशयः सप्रयोगी गीतज्ञश्चैव किन्नराः ॥ ५६ शिवप्रणामसम्पन्नाः व्यपोहन्तु मलं मम। विद्याधरश्च विबुधो विद्याराशीर्विदां वरः ॥ ५७ विबुद्धो विबुधः श्रीमान् कृतज्ञश्च महायशाः। एते विद्याधराः सर्वे शिवध्यानपरायणाः ॥ ५८ व्यपोहन्तु मलं घोरं महादेवप्रसादतः । वामदेवी महाजम्भः कालनेमिर्महाबलः ॥ ५९ सुग्रीवो मर्दकश्चैव पिङ्गलो देवमर्दनः । प्रह्लादश्चाप्यनुह्लादः संह्लादः किल बाष्कलो ॥ ६० जम्भः कुम्भश्च मायावी कार्तवीर्यः कृतञ्जयः । एतेऽसुरा महात्मानो महादेवपरायणाः ॥ ६१ व्यपोहन्तु भयं घोरमासुरं भावमेव च। गरुत्मान् खगतिश्चैव पक्षिराट् नागमर्दनः ॥ ६२ लोकप्रकाशक, लोकसाक्षी, त्रिविक्रम, आदित्य, सूर्य, अंशुमान् तथा दिवाकर - ये बारह आदित्य मेरे पापको दूर करें ॥ ४२-४३ ॥ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य तथा आत्मा - ये शिवजीकी मूर्तियाँ कही गयी हैं; ये मेरे पापको दूर करें और मेरे भयका नाश करें। इन्द्र, पावक, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, भगवान् हरि तथा शिवध्यानमें लीन प्रभु ब्रह्मा - ये मेरेद्वारा मन तथा कर्मसे किये गये पापको दूर करें ॥ ४४-४६ १/२ ॥ नभस्वान्, स्पर्शन, वायु, अनिल, मारुत, प्राण, प्राणेश और जीवेश - ये सब शिवभाषित तथा शिवार्चनपरायण मारुत मेरे पापको दूर करें। खेचरी, वसुचारी, ब्रह्मेश, ब्रह्म, ब्रह्मधी, सुषेण, शाश्वत, पुष्ट, सुपुष्ट, महाबल - ये चारण जो शम्भुकी पूजासे अत्यन्त पवित्र हैं, मेरेद्वारा किये गये समस्त पाप तथा दोषको दूर करें ॥ ४७-५०॥ मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध - ये सभी [सप्त] सिद्धगण जो सभी सिद्धियोंके प्रदाता तथा शिवके चरणोंके उपासक हैं, मेरे पापको दूर करें। यक्ष, यक्षेश, धनद, जृम्भक, मणिभद्रक, पूर्णभद्रेश्वर, माली, शितिकुण्डलि और नरेन्द्र - ये यक्षोंके स्वामी मेरे पापको दूर करें ॥ ५१-५३ ॥ शिवके प्रणाममें रत तथा शिवके शरीरके आभूषणस्वरूप अनन्त, कुलिक, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, महापद्म, शंखपाल और महाबल मेरे पापको तथा स्थावर-जंगम विषको दूर करें ॥ ५४-५५ ॥ शिवको प्रणाम करनेमें तल्लीन वीणाज्ञ, किन्नर, सुरसेन, प्रमर्दन, अतीशय, सप्रयोगी और गीतज्ञ - ये किन्नरगण मेरे पापको दूर करें। विद्याधर विबुध, विद्याराशि, विदांवर, विबुद्ध, विबुध, श्रीमान्, कृतज्ञ और महायश - ये सभी शिवध्यानपरायण विद्याधर महादेवकी कृपासे मेरे घोर पापको दूर करें ॥ ५६-५८ १/२ ॥ वामदेवी, महाजम्भ, कालनेमि, महाबल, सुग्रीव, मर्दक, पिंगल, देवमर्दन, प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, बाष्कलद्वय, जम्भ, कुम्भ, मायावी, कार्तवीर्य, कृतंजय- ये महादेवपरायण महात्मा असुर मेरे घोर भय तथा
अध्याय ८२] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ४०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नागशत्रुर्हिरण्याङ्गो वैनतेयः प्रभञ्जनः।<br>नागाशीर्विषनाशश्च विष्णुवाहन एव च॥ ६३<br>एते हिरण्यवर्णाभा गरुडा विष्णुवाहनाः।<br>नानाभरणसम्पन्ना व्यपोहन्तु मलं मम॥ ६४ | आसुरी भावको दूर करें। गरुत्मान्, खगति, पक्षिराट्, नागमर्दन, नागशत्रु, हिरण्यांग, वैनतेय, प्रभंजन, नागाशी, विषनाश, विष्णुवाहन—ये सुवर्णके रंगवाले तथा अनेकविध आभूषणोंसे युक्त विष्णुवाहन गरुड़ मेरे पापको दूर करें॥ ६३—६४॥ |
| अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च अङ्गिरा भृगुरेव च।<br>काश्यपो नारदश्चैव दधीचश्च्यवनस्तथा॥ ६५<br>उपमन्युस्तथान्ये च ऋषयः शिवभाविताः।<br>शिवार्चनरताः सर्वे व्यपोहन्तु मलं मम॥ ६६ | अगस्त्य, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, काश्यप, नारद, दधीच, च्यवन, उपमन्यु—ये तथा अन्य शिवभक्त और शिवार्चनपरायण समस्त ऋषि मेरे पापको दूर करें॥ ६५-६६॥ |
| पितरः पितामहाश्च तथैव प्रपितामहाः।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदस्तथा मातामहादयः॥ ६७<br>व्यपोहन्तु भयं पापं शिवध्यानपरायणाः।<br>लक्ष्मीश्च धरणी चैव गायत्री च सरस्वती॥ ६८<br>दुर्गा उषा शची ज्येष्ठा मातरः सुरपूजिताः।<br>देवानां मातरश्चैव गणानां मातरस्तथा॥ ६९<br>भूतानां मातरः सर्वा यत्र या गणमातरः।<br>प्रसादाद्देवदेवस्य व्यपोहन्तु मलं मम॥ ७० | शिवके ध्यानमें तल्लीन रहनेवाले पिता, पितामह, प्रपितामह, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् तथा मातामह आदि [मेरे] भय तथा पापको दूर करें। लक्ष्मी, धरणी, गायत्री, सरस्वती, दुर्गा, उषा, शची तथा ज्येष्ठा—ये देवपूजित माताएँ, देवताओंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ, भूतोंकी माताएँ तथा अन्य जो भी गणमाताएँ जहाँ-कहीं भी हों—वे सब देवदेव [शिव]-के अनुग्रहसे मेरे पापको दूर करें॥ ६७-७०॥ |
| उर्वशी मेनका चैव रम्भारतिस्तिलोत्तमा।<br>सुमुखी दुर्मुखी चैव कामुकी कामवर्धनी॥ ७१<br>तथान्याः सर्वलोकेषु दिव्याश्चाप्सरसस्तथा।<br>शिवाय ताण्डवं नित्यं कुर्वन्त्योऽतीव भाविताः॥ ७२<br>देव्यः शिवार्चनरता व्यपोहन्तु मलं मम। | अत्यन्त भक्तियुक्त होकर शिवके लिये नित्य ताण्डव [नृत्य] करनेवाली तथा शिवार्चनमें रत रहनेवाली उर्वशी, मेनका, रम्भा, रति, तिलोत्तमा, सुमुखी, दुर्मुखी, कामुकी, कामवर्धनी—ये तथा सभी लोकोंकी अन्य दिव्य अप्सराएँ और देवियाँ मेरे पापको दूर करें॥ ७१-७२ १/२ ॥ |
| अर्कः सोमोऽङ्गारकश्च बुधश्चैव बृहस्पतिः॥ ७३<br>शुक्रः शनैश्चरश्चैव राहुः केतुस्तथैव च।<br>व्यपोहन्तु भयं घोरं ग्रहपीडां शिवार्चकाः॥ ७४<br>मेषो वृषोऽथ मिथुनस्तथा कर्कटकः शुभः।<br>सिंहश्च कन्या विपुला तुला वै वृश्चिकस्तथा॥ ७५<br>धनुश्च मकरश्चैव कुम्भो मीनस्तथैव च।<br>राशयो द्वादश ह्येते शिवपूजापरायणाः॥ ७६<br>व्यपोहन्तु भयं पापं प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा॥ ७७<br>श्रीमन्मृगशिरश्चार्द्रा पुनर्वसुपुष्यसार्पकाः।<br>मघा वै पूर्वफाल्गुन्य उत्तराफाल्गुनी तथा॥ ७८<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती विशाखा चानुराधिका।<br>ज्येष्ठा मूलं महाभागा पूर्वाषाढा तथैव च॥ ७९<br>उत्तराषाढिका चैव श्रवणं च श्रविष्ठिका।<br>शतभिषक्पूर्वभद्रा च तथा प्रोष्ठपदा तथा॥ ८०<br>पौष्णं च देव्यः सततं व्यपोहन्तु मलं मम। | शिवका अर्चन करनेवाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु [मेरे] घोर भय तथा ग्रहकष्टका निवारण करें। मेष, वृष, मिथुन, शुभ कर्क, सिंह, कन्या, विशद तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन—ये बारह शिवपूजापरायण राशियाँ महेश्वरकी कृपासे [मेरे] भय तथा पापको दूर करें। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, श्रीयुक्त मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, महाभाग पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद तथा रेवती—ये देवियाँ निरन्तर मेरे पापको दूर करें॥ ७३—८० १/२॥ |
| ज्वरः कुम्भोदरश्चैव शङ्कुकर्णो महाबलः॥ ८१ | ज्वर, कुम्भोदर, शंकुकर्ण, महाबल, महाकर्ण, |