श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | सभी सामग्रियोंसहित शिवक्षेत्रमें स्थापित कर देना चाहिये अथवा ब्राह्मणको समर्पित कर देना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥ | | य एवं सर्वमासेषु शिवलिङ्गमहाव्रतम्।<br>कुर्याद्भक्त्या मुनिश्रेष्ठाः स एव तपतां वरः ॥ ४९<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानै रत्नभूषितैः।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं नेहायाति कदाचन ॥ ५०<br>अथवा ह्येकमासं वा चरेदेवं व्रतोत्तमम्।<br>शिवलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ५१<br>अथवा सक्तचित्तश्चेद्यान्यान् सञ्चिन्तयेद्वरान्।<br>वर्षमेकं चरेदेवं तांस्तान् प्राप्य शिवं व्रजेत् ॥ ५२<br>देवत्वं वा पितृत्वं वा देवराजत्वमेव च।<br>गाणपत्यपदं वापि सक्तोऽपि लभते नरः ॥ ५३ | हे श्रेष्ठ मुनियो! जो इस प्रकार सभी मासोंमें शिवलिङ्ग महाव्रतको करता है, वही तप करनेवालोंमें श्रेष्ठ है और वह करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान तथा रत्नोंसे सुशोभित विमानोंसे शिवलोक पहुँचकर [वहाँसे] कभी भी इस लोकमें वापस नहीं आता है; अथवा जो एक महीने भी इसी प्रकार [इस] उत्तम व्रतको करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अथवा [सांसारिक भोगोंमें] आसक्तचित्तवाला व्यक्ति एक वर्षतक यदि इस प्रकार करे, तो वह जिन-जिन कामनाओंको [मनमें] संचित किये रहता है, उन-उनको प्राप्त करके शिवलोक जाता है। आसक्त मनुष्य भी [इसे करके] देवत्व, पितृत्व, इन्द्रत्व तथा गणाधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ ४९-५३ ॥ | | विद्यार्थी लभते विद्यां भोगार्थी भोगमाप्नुयात्।<br>द्रव्यार्थी च निधिं पश्येदायुःकामश्चिरायुषम् ॥ ५४<br>यान्यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान्प्राप्येह मोदते।<br>एकमासव्रतादेव सोऽन्ते रुद्रत्वमाप्नुयात् ॥ ५५ | विद्या चाहनेवाला विद्या प्राप्त करता है, भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त करता है, धन चाहनेवाला धन प्राप्त करता है और आयुकी कामना करनेवाला दीर्घ आयु प्राप्त करता है। जिन-जिन कामनाओंका मनुष्य चिन्तन करता है, उन-उनको एक मासके ही व्रतसे प्राप्त करके इस लोकमें आनन्दित रहता है और अन्तमें वह रुद्रत्व प्राप्त करता है ॥ ५४-५५ ॥ | | इदं पवित्रं परमं रहस्यं<br>व्रतोत्तमं विश्वसृजापि सृष्टम्।<br>हिताय देवासुरसिद्धमर्त्य-<br>विद्याधराणां परमं शिवेन ॥ ५६ | विश्वका सृजन करनेवाले शिवने देवताओं, असुरों, सिद्धों, मनुष्यों तथा विद्याधरोंके हितके लिये इस परम पवित्र, परम रहस्यमय एवं उत्तम व्रतकी सृष्टि की है ॥ ५६ ॥ | | सम्पूज्य पूज्यं विधिनेवमीशं<br>प्रणम्य मूर्ध्ना सह भृत्यपुत्रैः।<br>व्यपोहनं नाम जपेत्स्तवं च<br>प्रदक्षिणं कृत्य शिवं प्रयत्नात् ॥ ५७ | इस प्रकार विधिपूर्वक ईश्वरकी पूजा करके सेवकों तथा पुत्रोंके साथ सिर झुकाकर प्रणाम करके प्रयत्नपूर्वक शिवकी प्रदक्षिणा करके व्यपोहन नामक स्तवका जप करना चाहिये ॥ ५७ ॥ | | पुराकृतं विश्वसृजा स्तवं च<br>हिताय देवेन जगत्त्रयस्य।<br>पितामहेनैव सुरैश्च सार्धं<br>महानुभावेन महार्घ्यमेतत् ॥ ५८ | पूर्व कालमें विश्वकी रचना करनेवाले महानुभाव देव पितामह (ब्रह्मा)-ने देवताओंके साथ तीनों लोकोंके हितके लिये इस महामूल्यवान् स्तवको बनाया था ॥ ५८ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पशूपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथनं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पशूपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथन' नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥