भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८१] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९५

श्वेतार्ककुसुमे साक्षाच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः।<br>कर्णिकारस्य कुसुमे मेधा साक्षाद् व्यवस्थिता ॥ ३५<br><br>करवीरे गणाध्यक्षो बके नारायणः स्वयम्।<br>सुगन्धिषु च सर्वेषु कुसुमेषु नगात्मजा ॥ ३६<br><br>तस्मादेतैैर्यथालाभं पुष्पधूपादिभिः शुभैः।<br>पूजयेद्देवदेवेशं भक्त्या वित्तानुसारतः ॥ ३७श्वेत मदारके पुष्पमें साक्षात् चतुर्मुख ब्रह्मा निवास करते हैं और कर्णिकारके पुष्पमें साक्षात् [देवी] मेधा निवास करती हैं। करवीरके पुष्पमें गणाध्यक्ष, बक पुष्पमें स्वयं नारायण और सभी सुगन्धित पुष्पोंमें [भगवती] पार्वती विराजमान हैं। अतः यथोपलब्ध इन पुष्पोंसे तथा शुभ पुष्प, धूप, दीप आदिसे भक्तिपूर्वक अपने वित्त-सामर्थ्यके अनुसार देवदेवेश [शिव]-की पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३७॥
निवेदयत्ततो भक्त्या पायसं च महाचरुम्।<br>सघृतं सोपदंशं च सर्वद्रव्यसमन्वितम् ॥ ३८<br><br>शुद्धान्नं वापि मुद्गान्नमाढकं सार्धकं तु वा।<br>चामरं तालवृन्तं च तस्मै भक्त्या निवेदयेत् ॥ ३९<br><br>उपहाराणि पुण्यानि न्यायेनैवार्जितान्यपि।<br>नानाविधानि चार्हाणि प्रोक्षितान्यम्भसा पुनः ॥ ४०तदनन्तर भक्तिपूर्वक पायस तथा महाचरु निवेदित करे और घृतयुक्त, व्यंजनोंसहित तथा अन्य द्रव्ययुक्त शुद्ध अन्न अथवा मूँगका अन्न एक आढक (चार प्रस्थ) अथवा उसका आधा समर्पित करे। पुनः चामर और तालवृन्त (ताड़का पंखा) उन्हें भक्तिपूर्वक निवेदित करे। इसी प्रकार न्यायपूर्वक अर्जित किये गये अनेक प्रकारके पवित्र पूजायोग्य उपहारोंको जलसे प्रोक्षित करके भक्तियुक्त चित्तसे [भगवान्] रुद्रको समर्पित करे॥ ३८-४० १/२॥
निवेदयेच्च रुद्राय भक्तियुक्तेन चेतसा।<br>क्षीराब्धौ सर्वदेवानां स्थित्यर्थममृतं ध्रुवम् ॥ ४१<br><br>विष्णुना जिष्णुना साक्षादन्ने सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>भूतानामन्नदानेन प्रीतिर्भवति शङ्करे ॥ ४२<br><br>तस्मात्सम्पूजयेद्देवमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।<br>उपहारे तथा तुष्टिर्व्यजने पवनः स्वयम् ॥ ४३<br><br>सर्वात्मको महादेवो गन्धतोये ह्यपांपतिः।<br>पीठे वै प्रकृतिः साक्षान्महदाद्यैर्व्यवस्थिता ॥ ४४<br><br>तस्माद्देवं यजेद्भक्त्या प्रतिमासं यथाविधि।<br>पौर्णमास्यां व्रतं कार्यं सर्वकामार्थसिद्धये ॥ ४५<br><br>सत्यं शौचं दया शान्तिः सन्तोषो दानमेव च।<br>पौर्णमास्याममावास्यामुपवासं च कारयेत् ॥ ४६जीतनेकी इच्छावाले विष्णुने सभी देवताओंकी स्थितिके लिये क्षीरसागरसे सारा अमृत खींचकर साक्षात् अन्नके भीतर स्थापित कर दिया। प्राणियोंको अन्नदान करनेसे शिवजीके प्रति अनुराग हो जाता है, अतः अन्नसे शिवकी पूजा करनी चाहिये। अन्नमें प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं। उपहारमें तुष्टि विद्यमान रहती है। पंखेमें स्वयं वायुदेव वास करते हैं। महादेव सभी वस्तुओंमें विराजमान रहते हैं। जलदेवता (वरुण) सुगन्धित जलमें विद्यमान हैं। पीठ (वेदी)-में महत् आदिके साथ साक्षात् [देवी] प्रकृति विराजमान हैं। अतः प्रत्येक महीने विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करनी चाहिये। समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये पूर्णिमाको व्रत [अवश्य] करना चाहिये। [व्रतमें] सत्य, शुद्धता, दया, शान्ति, सन्तोष तथा दानशीलताका पालन करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावस्याके दिन उपवास करना चाहिये॥ ४१-४६॥
संवत्सरान्ते गोदानं वृषोत्सर्गं विशेषतः।<br>भोजयेद् ब्राह्मणान् भक्त्या श्रोत्रियान् वेदपारगान् ॥ ४७<br><br>तल्लिङ्गं पूजितं तेन सर्वद्रव्यसमन्वितम्।<br>स्थापयेद्वा शिवक्षेत्रे दापयेद् ब्राह्मणाय वा ॥ ४८वर्षके अन्तमें गोदान तथा विशेषरूपसे वृषोत्सर्ग करना चाहिये। वेदके पारगामी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। पूजा किये गये उस शिवलिङ्गको