भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 384
३८२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
येन केनापि वा मर्त्यः प्रलिप्यायतनाग्रतः ।<br>उत्तरे दक्षिणे वापि पृष्ठतो वा द्विजोत्तमाः ॥ ९९<br><br>चतुष्कोणं तु वा चूर्णैरलङ्कृत्य समन्ततः ।<br>पुष्पाक्षतादिभिः पूज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १००<br><br>यस्तु गर्भगृहं भक्त्या सकृदालिप्य सर्वतः ।<br>चन्दनाद्यैः सकर्पूरैर्गन्धद्रव्यैः समन्ततः ॥ १०१<br><br>विकीर्य गन्धकुसुमैर्धूपैर्धूप्य चतुर्विधैः ।<br>प्रार्थयेद्देवमीशानं शिवलोकं स गच्छति ॥ १०२<br><br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् कल्पकोटिशतं नरः ।<br>स्वदेहगन्धकुसुमैः पूरयञ्छिवमन्दिरम् ॥ १०३<br><br>क्रमाद् गान्धर्वमासाद्य गन्धर्वैश्च सुपूजितः ।<br>क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन् राजा भवति वीर्यवान् ॥ १०४हे श्रेष्ठ द्विजो! जिस किसी भी प्रकार शिवालयको लीपकर सामने, पीछे, उत्तरमें तथा दक्षिणमें चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसे चारों ओरसे चूर्णोंसे सजाकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो [मनुष्य] एक बार भी भक्तिपूर्वक गर्भगृहको चन्दन आदि तथा कपूरसहित गन्धद्रव्योंसे चारों ओरसे लीपकर सभी ओर सुगन्धित पुष्प बिखेरकर चार प्रकारके धूपोंसे उसे धूपित करके भगवान् ईशान (शिव)-की प्रार्थना करता है, वह शिवलोकको जाता है। वह मनुष्य वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक महान् सुखोंको भोगकर अपने देहरूपी सुगन्धित पुष्पोंसे शिवमन्दिरको पूरित करता हुआ क्रमसे गन्धर्वलोक पहुँचकर वहाँ गन्धर्वोंसे भलीभाँति पूजित होता है, [पुनः] क्रमसे इस लोकमें आकर पराक्रमी राजा होता है॥ ९९-१०४॥
आदिदेवो महादेवः प्रलयस्थितिकारकः ।<br>सर्गश्च भुवनाधीशः सर्वव्यापी सदाशिवः ।<br>शिवब्रह्मामृतं ग्राह्यं मोक्षसाधनमुत्तमम् ॥ १०५<br><br>व्यक्ताव्यक्तं सदा नित्यमचिन्त्यमर्चयेत्प्रभुम् ॥ १०६वे सदाशिव आदिदेव, महादेव, सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले, जगत्के स्वामी तथा सर्वव्यापी हैं। शिवरूपी ब्रह्मसे [मोक्षसुखरूपी] अमृतको ग्रहण करना चाहिये और मोक्षके साधनस्वरूप उत्तम, व्यक्त, अव्यक्त, नित्य तथा अचिन्त्य प्रभुका सदा अर्चन करना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपलेपनादिकथनं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपलेपनादिकथन' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥


अठहत्तरवाँ अध्याय

शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>वस्त्रपूतेन तोयेन कार्यं चैवोपलेपनम् ।<br>शिवक्षेत्रे मुनिश्रेष्ठा नान्यथा सिद्धिरिष्यते ॥ १<br><br>आपः पूता भवन्त्येता वस्त्रपूताः समुद्धृताः ।<br>अफेना मुनिशार्दूला नादेयाश्च विशेषतः ॥ २**सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवक्षेत्रमें वस्त्रके द्वारा छाने हुए पवित्र जलसे ही उपलेपन-कार्य करना चाहिये; अन्यथा सिद्धि नहीं मिलती है। हे श्रेष्ठ मुनियो! विशेषकर नदीसे ग्रहण किया गया फेनरहित जल, जो पुनः वस्त्रसे छाना गया हो—ऐसा जल पवित्र होता है॥ १-२॥
तस्माद्वै सर्वकार्याणि दैविकानि द्विजोत्तमाः ।<br>अद्भिः कार्याणि पूताभिः सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥ ३अतः हे उत्तम द्विजो! समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये सभी देवकार्योंको पवित्र जलसे करना चाहिये।