श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ७७ ] | शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य | ३८१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सितैर्विकसितैः पद्मै रक्तैर्नीलोत्पलैस्तथा।<br>मुक्तादामैर्वितानान्ते लम्बितैस्तु सितैर्ध्वजैः ॥ ८४<br><br>सितमृत्पात्रकैश्चैव सुशलक्ष्णैः पूर्णकुम्भकैः।<br>फलपल्लवमालाभिर्वैजयन्तीभिरंशुकैः ॥ ८५<br><br>पञ्चाशद्दीपमालाभिर्धूपैः पञ्चविधैस्तथा।<br>पञ्चाशद्दळसंयुक्तमालिखेत्पद्ममुत्तमम् ॥ ८६<br><br>तत्तद्वर्णैस्तथा चूर्णैः श्वेतचूर्णैरथापि वा।<br>एकहस्तप्रमाणेन कृत्वा पद्मं विधानतः ॥ ८७<br><br>कर्णिकायां न्यसेद्देवं देव्या देवेश्वरं भवम्।<br>वर्णानि च न्यसेत्पत्रे रुद्रैः प्रागाद्यनुक्रमात् ॥ ८८<br><br>प्रणवादिन्मोऽन्तानि सर्ववर्णानि सुव्रताः।<br>सम्पूज्यैवं मुनिश्रेष्ठा गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् ॥ ८९<br><br>ब्राह्मणान् भोजयेत्तत्र पञ्चाशद्विधिपूर्वकम्।<br>अक्षमालोपवीतं च कुण्डलं च कमण्डलुम् ॥ ९०<br><br>आसनं च तथा दण्डमुष्णीषं वस्त्रमेव च।<br>दत्त्वा तेषां मुनीन्द्राणां देवदेवाय शम्भवे ॥ ९१<br><br>महाचरुं निवेद्यं च कृष्णां गोमिथुनं तथा।<br>अन्ते च देवदेवाय दापयेच्चूर्णमण्डलम् ॥ ९२<br><br>यागोपयोगद्रव्याणि शिवाय विनिवेदयेत्।<br>ओङ्काराद्यं जपेद्धीमान् प्रतिवर्णमनुक्रमात् ॥ ९३ | खिले हुए श्वेत कमलों तथा लाल कमलों और नीलकमलोंसे, वितानके किनारे लटकती हुई मोतियोंकी मालाओंसे, श्वेत ध्वजोंसे, श्वेत मिट्टीके पात्रोंसे, मनोहर जलपूरित घड़ोंसे, फल-पल्लव-मालाओंसे, वैजयन्तियोंसे, अंशुकों (रेशमी वस्त्र)-से, पचास दीप मालाओंसे तथा पाँच प्रकारके [सुगन्धित] धूपोंसे अलंकृत करके पचास दलोंसे युक्त उत्तम कमल बनाये। इस प्रकार विविध रंगके चूर्णोंसे अथवा सफेद चूर्णोंसे विधानपूर्वक एक हाथ परिमापका कमल बनाकर [उसकी] कर्णिकामें देवीसहित देवेश्वर शिवकी स्थापना करे। हे सुव्रतो! [कमलके] पत्रोंमें पूर्व दिशा आदिके क्रमसे रुद्रोंके साथ [अकार आदि] वर्णोंको स्थापित करे, जो आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः से युक्त हों। हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार [भक्त] क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे पूजन करके वहाँ विधिपूर्वक पचास ब्राह्मणोंको भोजन कराये। तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जपमाला, यज्ञोपवीत, कुण्डल, कमण्डलु, आसन, छड़ी, पगड़ी तथा वस्त्र प्रदान करके देवदेव शम्भुको महाचरु निवेदित करके एक काली गाय तथा काला वृषभ प्रदान करे; अन्तमें चूर्वनिर्मित मण्डल तथा पूजनके उपयोगके द्रव्योंको देवदेव शिवको समर्पित कर दे और आदिमें 'ओम्' लगाकर बुद्धिमान् [भक्त] प्रत्येक वर्णको अनुक्रमसे जपे॥ ८१-९३॥ |
| एवमालिख्य यो भक्त्या सर्वमण्डलमूत्तमम्।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तद्वदामि समासतः ॥ ९४<br><br>साङ्गान् वेदान् यथान्यायमधित्य विधिपूर्वकम्।<br>इष्ट्वा यज्ञैर्यथान्यायं ज्योतिष्टोमादिभिः क्रमात् ॥ ९५<br><br>ततो विश्वजिदन्तैश्च पुत्रानुत्पाद्य तादृशान्।<br>वानप्रस्थाश्रमं गत्वा सदारः साग्निरेव च ॥ ९६<br><br>चान्द्रायणादिकाः सर्वाः कृत्वा न्यस्य क्रिया द्विजाः।<br>ब्रह्मविद्यामधीत्यैव ज्ञानमासाद्य यत्नतः ॥ ९७<br><br>ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य योगी यत्काममाप्नुयात्।<br>तत्फलं लभते सर्वं वर्णमण्डलदर्शनात् ॥ ९८ | [हे विप्रो!] इस प्रकार जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उत्तम सम्पूर्ण मण्डल बनाकर जिस फलको प्राप्त करता है, उसे मैं संक्षेपमें बता रहा हूँ। समुचित रूपसे विधिपूर्वक अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके विधानके अनुसार क्रमसे ज्योतिष्टोम आदिसे लेकर विश्वजित्तक सभी यज्ञोंको करके अपने सदृश पुत्रोंको उत्पन्न करके पत्नीसहित वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट होकर अग्निकर्म करके; पुनः हे द्विजो! चान्द्रायण आदि सभी व्रत सम्पन्न करके और इसके बाद सभी क्रियाओंका त्याग करके ब्रह्मविद्याका अध्ययनकर यत्नपूर्वक ज्ञान प्राप्तकर पुनः उस ज्ञानके द्वारा ज्ञेयका दर्शन करके वह योगी जो फल पाता है, उस फलको वह सम्पूर्ण वर्णमण्डलके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर लेता है॥ ९४-९८॥ |