भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| आलिख्य कमलं भद्रं दशहस्तप्रमाणतः।<br>सकर्णिकं महाभागा महादेवसमीपतः॥ ७०<br>तत्रावाह्य महादेवं नवशक्तिसमन्वितम्।<br>पञ्चभिश्च तथा षड्भिरष्टाभिश्चेष्टदं परम्॥ ७१<br>पुनरष्टाभीरीशानं दशारे दशभिस्तथा।<br>पुनर्बाह्ये च दशभिः सम्पूज्य प्रणिपत्य च॥ ७२<br>निवेद्य देवदेवाय क्षितिदानफलं लभेत्।<br>शालिपिष्टादिभिर्वापि पद्मालिख्य निर्धनः॥ ७३<br>पूर्वोक्तमखिलं पुण्यं लभते नात्र संशयः। | लौकिक चूर्णोंके द्वारा महादेवके समीप कर्णिकासहित दस हाथ परिमापका शुभ कमल बनाकर वहाँ पाँच, छः, आठ तथा नौ वाम आदि शक्तियोंके सहित परम इष्ट प्रदान करनेवाले महादेवका आवाहन करके पुनः आठ शक्तियोंसहित ईशानका आवाहन करके दस कोणोंमें दस शक्तियोंके सहित एवं उसके बाहर दस शक्तियोंके सहित शिवजीका पूजन करके तथा उन्हें प्रणाम करके देवदेवके लिये उसे निवेदित करनेसे पृथ्वीदानका फल प्राप्त होता है। निर्धन [भक्त] शालि चावलके चूर्ण आदिसे भी कमल बनाकर [पूजन करके] पूर्वोक्त समस्त पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६७—७३ १/२॥ | | द्वादशारं तथालिख्य मण्डले पद्ममुत्तमम्॥ ७४<br>रत्नचूर्णादिborder/चूर्णैस्तथा द्वादशमूर्तिभिः।<br>मण्डलस्य च मध्ये तु भास्करं स्थाप्य पूजयेत्॥ ७५<br>ग्रहैश्च संवृतं वापि सूर्यसायुज्यमुत्तमम्। | मण्डलमें रत्नोंके चूर्ण आदिसे अथवा अन्य चूर्णोंसे बारह दलोंवाला उत्तम कमल बनाकर मण्डलके मध्यमें बारह मूर्तियोंके साथ सूर्यको स्थापित करके ग्रहोंसे घिरे हुए सूर्यकी पूजा करनी चाहिये; इससे वह [भक्त] उत्तम सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है॥ ७४-७५ १/२॥ | | एवं प्राकृतमप्यार्यां षडस्रं परिकल्प्य च॥ ७६<br>मध्यदेशे च देवेशीं प्रकृतिं ब्रह्मरूपिणीम्।<br>दक्षिणे सत्त्वमूर्तिं च वामतश्च रजोगुणम्॥ ७७<br>अग्रतस्तु तमोमूर्तिं मध्ये देवीं तथाम्बिकाम्।<br>पञ्चभूतानि तन्मात्रापञ्चकं चैव दक्षिणे॥ ७८<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा बुद्धीन्द्रियाणि च।<br>उत्तरे विधिवत्पूज्य षडस्रे चैव पूजयेत्॥ ७९<br>आत्मानं चान्तरात्मानं युगलं बुद्धिमेव च।<br>अहङ्कारं च महता सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ ८०<br>एवं वः कथितं सर्वं प्राकृतं मण्डलं परम्। | इसी प्रकार प्राकृत मण्डल बनाकर उसमें छः दलोंवाला कमल बनाकर इसके मध्य भागमें आर्या ब्रह्मरूपिणी देवेशी प्रकृति, दाहिनी ओर सत्त्वमूर्ति, बायीं ओर रजोगुण, सामने तमोमूर्ति, मध्यमें देवी अम्बिका, दक्षिणमें पाँच भूतों तथा पाँच तन्मात्राओं और उत्तरमें पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंकी विधिवत् पूजा करके उस षट्दलकमलमें आत्मा-अन्तरात्मा इन दोनोंकी, बुद्धिकी तथा महत्सहित अहंकारकी पूजा करनी चाहिये; इससे वह समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। [हे मुनियो!] इस प्रकार मैंने आप लोगोंको सम्पूर्ण उत्तम प्राकृत मण्डल बता दिया॥ ७६—८० १/२॥ | | अतो वक्ष्यामि विप्रेन्द्राः सर्वकामार्थसाधनम्॥ ८१<br>गोचर्ममात्रमालिख्य मण्डलं गोमयेन तु।<br>चतुरस्रं विधानेन चाद्भिरभ्युक्ष्य मन्त्रवित्॥ ८२<br>अलङ्कृत्य वितानाद्यैश्छत्रैर्वापि मनोरमैः।<br>बुद्बुदैर्धचन्द्रैश्च हैमैरश्वत्थपत्रकैः॥ ८३ | हे श्रेष्ठ विप्रो! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले साधनका वर्णन करूँगा। मन्त्रको जाननेवाला [भक्त] विधानपूर्वक गायके गोबरसे गोचर्म* के बराबर चौकोर मण्डल बनाकर जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) करके उसे वितान आदि अथवा मनोहर छत्रोंसे, स्वर्णनिर्मित अर्धचन्द्राकार बुद्बुदोंसे, सुवर्णमय पीपलकी पत्तियोंसे, |


* जितने स्थानपर एक हजार गौएँ और दस बैल बिना बाँधे इधर-उधर स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण कर सकें, उतना स्थान गोचर्म कहलाता है—गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम्। तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्म परिकीर्तितम्॥ (पराशरस्मृति १२।४६)