श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य [ ३७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति।<br>मध्याह्ने शिवतीर्थेषु स्नात्वा भक्त्या सकृन्नरः॥ ५५<br><br>गङ्गास्नानसमं पुण्यं लभते नात्र संशयः।<br>अस्तं गते तथा चार्के स्नात्वा गच्छेच्छिवं पदम्॥ ५६<br><br>पापकञ्चुकमुत्सृज्य शिवतीर्थेषु मानवः।<br>द्विजास्त्रिषवणं स्नात्वा शिवतीर्थे सकृन्नरः॥ ५७<br><br>शिवसायुज्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।<br>पुराथ सूकरः कश्चित् श्वानं दृष्ट्वा भयात्पथि॥ ५८<br><br>प्रसङ्गाद्वारमेकं तु शिवतीर्थेऽवगाह्य च।<br>मृतः स्वयं द्विजश्रेष्ठा गाणपत्यमवाप्तवान्॥ ५९ | हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवतीर्थोंमें प्रातःकाल स्नान करके वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकको जाता है। मध्याह्नकालमें शिवतीर्थोंमें एक बार भी भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गंगास्नानके समान पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है। सूर्यके अस्त हो जानेपर शिवतीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य पापकंचुक छोड़कर शिवपद प्राप्त करता है। हे द्विजो! शिवतीर्थोंमें एक बार भी त्रिस्त्रवण (तीनों कालोंमें) स्नान करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! पूर्वकालमें कोई सुअर मार्गमें कुत्तेको देखकर डरके मारे संयोगवश शिवतीर्थमें गिर पड़ा और वह एक बार डुबकी लगाकर स्वयं मर गया; इससे उसने गणाधिपति पदको प्राप्त किया॥ ५४–५९॥ |
| यः प्रातर्देवदेवेशं शिवं लिङ्गस्वरूपिणम्।<br>पश्येत्स याति सर्वस्मादधिकां गतिमेव च॥ ६०<br><br>मध्याह्ने च महादेवं दृष्ट्वा यज्ञफलं लभेत्।<br>सायाह्ने सर्वयज्ञानां फलं प्राप्य विमुच्यते॥ ६१<br><br>मानसैर्वाचिकैः पापैः कायिकैश्च महत्तरैः।<br>तथोपपातकैश्चैव पापैश्चैवानुपातकैः॥ ६२<br><br>सङ्क्रमे देवमीशानं दृष्ट्वा लिङ्गाकृतिं प्रभुम्।<br>मासेन यत्कृतं पापं त्यक्त्वा याति शिवं पदम्॥ ६३<br><br>अयने चार्थमासेन दक्षिणे चोत्तरायणे।<br>विषुवे चैव सम्पूज्य प्रयाति परमां गतिम्॥ ६४ | जो प्रातःकाल लिङ्गस्वरूपी देवदेवेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सबसे उच्च पद प्राप्त करता है; मध्याह्नमें महादेवका दर्शन करके वह यज्ञका फल प्राप्त करता है और सायंकाल दर्शन करके सभी यज्ञोंका फल प्राप्तकर मानसिक तथा वाचिक पापों, बड़े-से-बड़े शारीरिक पापों, उपपातकों और अनुपातकोंसे मुक्त हो जाता है। सूर्यकी सभी संक्रान्तियोंमें लिङ्गके आकारवाले महादेव प्रभु ईशानका दर्शन करके मनुष्य महीनेभरमें किये गये पापका त्याग करके शिवलोकको जाता है। दक्षिणायन (कर्कसंक्रान्ति) तथा उत्तरायण (मकरसंक्रान्ति) तथा विषुवत् (मेष-तुला)-संक्रान्तिमें अर्धमासपर्यन्त विधिवत् शिवकी पूजा करके मनुष्य परम गति प्राप्त करता है॥ ६०–६४॥ |
| प्रदक्षिणात्रयं कुर्याद्यः प्रासादं समन्ततः।<br>सव्यापसव्यन्यायेन मृदुगत्या शुचिर्नरः॥ ६५<br><br>पदे पदेऽश्वमेधस्य यज्ञस्य फलमाप्नुयात्।<br>वाचा यस्तु शिवं नित्यं संरौति परमेश्वरम्॥ ६६<br><br>सोऽपि याति शिवं स्थानं प्राप्य किं पुनरेव च। | पवित्रावस्थामें जो मनुष्य सव्य-अपसव्य-विधिसे अर्थात् सोमसूत्रका उल्लंघन किये बिना धीमी गतिसे चारों ओरसे शिवालयकी तीन प्रदक्षिणा करता है, वह प्रत्येक पदपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है। जो [मनुष्य] वाणीसे नित्य परमेश्वर शिवका जप करता है, वह भी शिवलोकको जाता है; उसे पाकर [उसके लिये] फिर क्या शेष रह जाता है॥ ६५–६६१/२॥ |
| कृत्वा मण्डलकं क्षेत्रं गन्धगोमयवारिणा॥ ६७<br><br>मुक्ताफलमयैश्चूर्णैरिन्द्रनीलमयैस्तथा ।<br>पद्मरागमयैश्चैव स्फाटिकैश्च सुशोभनैः॥ ६८<br><br>तथा मारकतैश्चैव सौवर्णै राजतैस्तथा।<br>तद्वर्णैर्लौकिकैश्चैव चूर्णैर्वित्तविवर्जितैः॥ ६९ | हे महाभागो! गन्ध तथा गोमय-मिश्रित जलसे मण्डलाकार क्षेत्र बनाकर उसमें मोती, इन्द्रनील, पद्मराग, स्फटिक, मरकत, स्वर्ण तथा रजत (चाँदी)-के अति सुन्दर चूर्णोंके द्वारा अथवा धनके अभावमें उसी वर्णके |