श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पाद्यमाचमनं चार्घ्यं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे।<br>स्नापयेद्दिव्यतोयैश्च घृतेन पयसा तथा॥ १३<br>दध्ना च स्नापयेद् रुद्रं शोधयेच्च यथाविधि।<br>ततः शुद्धाम्बुना स्नाप्य चन्दनाद्यैश्च पूजयेत्॥ १४<br>रोचनाद्यैश्च सम्पूज्य दिव्यपुष्पैश्च पूजयेत्।<br>बिल्वपत्रैरखण्डैश्च पद्मैर्नानाविधैस्तथा॥ १५<br>नीलोत्पलैश्च राजीवैर्नन्द्यावर्तैश्च मल्लिकैः।<br>चम्पकैर्जातिपुष्पैश्च बकुलैः करवीरकैः॥ १६<br>शमीपुष्पैर्बृहत्पुष्पैरून्मत्तागस्त्यजैरपि ।<br>अपामार्गकदम्बैश्च भूषणैरपि शोभनैः॥ १७<br>दत्त्वा पञ्चविधं धूपं पायसं च निवेदयेत्।<br>दधिभक्तं च मध्वाज्यपरिल्लुतमतः परम्॥ १८<br>शुद्धान्नं चैव मुद्गान्नं षड्विधं च निवेदयेत्।<br>अथ पञ्चविधं वापि सघृतं विनिवेदयेत्॥ १९<br>केवलं चापि शुद्धान्नमाढकं तण्डुलं पचेत्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं चान्ते नमस्कृत्य मुहुर्मुहुः॥ २०<br>स्तुत्वा च देवमीशानं पुनः सम्पूज्य शङ्करम्।<br>ईशानं पुरुषं चैव अघोरं वाममेव च॥ २१<br>सद्योजातं जपंश्चापि पञ्चभिः पूजयेच्छिवम्।<br>अनेन विधिना देवः प्रसीदति महेश्वरः॥ २२ | पाद्य-आचमन-अर्घ्य प्रदान करके उन्हें दिव्य जलोंसे स्नान कराना चाहिये। पुनः घी, दूध तथा दहीसे रुद्रको स्नान कराना चाहिये एवं विधिपूर्वक स्वच्छ करना चाहिये। तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर चन्दन आदिसे पूजन करना चाहिये; पुनः रोचन आदिसे पूजन करके दिव्य पुष्पों, अखण्ड बिल्वपत्रों, अनेक प्रकारके पद्द्मों, नीलकमलों, रक्तकमलों, नन्द्यावर्तपुष्पों, मल्लिका, चम्पक, जातिपुष्पों, बकुलों, कनैंरके पुष्पों, शमीपुष्पों, बृहत्पुष्पों, धतूरके पुष्पों, अगस्त्यके उदित होनेपर खिलनेवाले पुष्पों, अपामार्ग-कदम्बके गुच्छों तथा सुन्दर आभूषणोंसे पूजन करके पाँच प्रकारके धूप प्रदान करके पायस (खीर) निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर दधिमिश्रित भात, मधु-घृत मिला हुआ भात, पका हुआ अन्न और मूँगका पका हुआ अन्न—यह छः प्रकारका अन्न निवेदित करे; अथवा पाँच प्रकारका घृतमिश्रित अन्न निवेदित करे; अथवा केवल एक आढक (चार प्रस्थ) शुद्ध चावल पकाये और उसे निवेदित करे। अन्तमें प्रदक्षिणा करके बार-बार नमस्कारकर देवता ईशानकी स्तुति करके पुनः शंकरजीकी विधिवत् पूजा करके ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात मन्त्रोंका जप करते हुए इन पाँच मन्त्रोंसे शिवकी पूजा करे। इस विधिसे [पूजा करनेपर] देव महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १०—२२॥ |
| वृक्षाः पुष्पादिपत्राद्यैरुपयुक्ताः शिवार्चने।<br>गावश्चैव द्विजश्रेष्ठाः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ २३<br>पूजयेद्यः शिवं रुद्रं शर्वं भवमजं सकृत्।<br>स याति शिवसायुज्यं पुनरावृत्तिवर्जितम्॥ २४<br>अर्चितं परमेशानं भवं शर्वमुमापतिम्।<br>सकृत्प्रसङ्गाद्वा दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २५<br>पूजितं वा महादेवं पूज्यमानमथापि वा।<br>दृष्ट्वा प्रयाति वै मर्त्यो ब्रह्मलोकं न संशयः॥ २६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवपूजनमें उपयोग किये गये पुष्प, पत्र आदिके साथ वृक्ष और गायें—ये सब परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो एक बार भी शिव, रुद्र, शर्व, भव, अजकी पूजा करता है; वह पुनर्जन्मरहित शिवसायुज्यको प्राप्त कर लेता है। एक बार अथवा प्रसंगवश भी पूजित परमेश्वर, भव, उमापतिका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पूजित किये गये अथवा पूजित होते हुए महादेवका दर्शनकर मनुष्य ब्रह्मलोकको जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २३—२६॥ |
| श्रुत्वानुमोदयेच्चापि स याति परमां गतिम्।<br>यो दद्याद् घृतदीपं च सकृल्लिङ्गस्य चाग्रतः॥ २७<br>स तां गतिमवाप्नोति स्वाश्रमैर्दुर्लभां स्थिराम्।<br>दीपवृक्षं पार्थिवं वा दारवं वा शिवालये॥ २८ | जो [शिवके सम्बन्धमें] कुछ भी सुनकर उसका अनुमोदन करता है, वह परमगति प्राप्त करता है। जो शिवके समक्ष एक बार भी घृतका दीपक अर्पित करता है, वह वर्णाश्रमी लोगोंके लिये दुर्लभ स्थिर गति प्राप्त |