श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७९ ] शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि...दीपदानकी महिमा ३८५
उन्यासीवाँ अध्याय
शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पूज्यो महादेवो मर्त्यैर्मन्दैर्महामते।<br>अल्पायुषैरल्पवीर्यैरल्पसत्त्वैः प्रजापतिः ॥ १<br>संवत्सरसहस्रैश्च तपसा पूज्य शङ्करम्।<br>न पश्यन्ति सुराश्चापि कथं देवं यजन्ति ते॥ २ | ऋषिगण बोले— हे महामते! मन्दबुद्धिवाले, अल्प आयुवाले, अल्प पराक्रमवाले तथा अल्प सामर्थ्यवाले मनुष्योंको प्रजापति महादेवकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? हजार वर्षोंतक तपस्याके द्वारा शंकरकी पूजा करके देवता भी उनका दर्शन नहीं कर पाते; तो फिर वे [मनुष्य] भगवान् शिवकी पूजा कैसे करें? ॥ १-२ ॥ |
| सूत उवाच<br>कथितं तथ्यमेवात्र युष्माभिर्मुनिपुङ्गवाः।<br>तथापि श्रद्धया दृश्यः पूज्यः सम्भाष्य एव च॥ ३<br>प्रसङ्गाच्चैव सम्पूज्य भक्तिहीनैरपि द्विजाः।<br>भावानुरूपफलदो भगवानिति कीर्तितः॥ ४ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ मुनियो! आपलोगोंने यथार्थ बात कही है, फिर भी श्रद्धापूर्वक [शिवकी] पूजा करनेपर उनका दर्शन हो सकता है और उनसे सम्भाषण किया जा सकता है। हे द्विजो! प्रसंगवश भक्तिहीन लोगोंके द्वारा भी पूजित होकर वे भगवान् उनके भावके अनुरूप फल देनेवाले कहे गये हैं॥ ३-४॥ |
| उच्छिष्टः पूजयन् याति पैशाचं तु द्विजाधमः।<br>सङ्क्रुद्धो राक्षसं स्थानं प्राप्नुयान्मूढधीर्द्विजाः॥ ५<br>अभक्ष्यभक्षी सम्पूज्य याक्षं प्राप्नोति दुर्जनः।<br>गानशीलश्च गान्धर्वं नृत्यशीलस्तथैव च॥ ६<br>ख्यातिशीलस्तथा चान्द्रं स्त्रीषु सक्तो नराधमः।<br>मदार्तः पूजयन् रुद्रं सोमस्थानमवाप्नुयात्॥ ७ | हे द्विजो! उच्छिष्ट अधम ब्राह्मण शिवकी पूजा करके पिशाचलोकको जाता है और क्रोधमें भरकर पूजन करनेवाला मूढ़बुद्धि राक्षसका स्थान (लोक) प्राप्त करता है। अभक्ष्य [भोजन]-का भक्षण करनेवाला दुष्ट मनुष्य [शिवकी] पूजा करके यक्षलोक प्राप्त करता है और नृत्य-गान करनेवाला उनकी पूजा करके गन्धर्वलोक प्राप्त करता है। प्रसिद्धिका इच्छुक और स्त्रियोंमें आसक्त नराधम बुधलोक प्राप्त करता है। मदोन्मत्त व्यक्ति रुद्रकी पूजा करता हुआ सोमलोक प्राप्त करता है॥ ५-७॥ |
| गायत्र्या देवमभ्यर्च्य प्राजापत्यमवाप्नुयात्।<br>ब्राह्मं हि प्रणवेनैव वैष्णवं चाभिनन्द्य च॥ ८<br>श्रद्धया सकृदेवापि समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रैः सार्धं प्रमोदते॥ ९ | [रुद्र] गायत्री [मन्त्र] द्वारा शिवका पूजन करके मनुष्य प्रजापतिलोकको और प्रणवके द्वारा पूजन करके ब्रह्मलोक तथा विष्णुलोकको प्राप्त करता है। श्रद्धापूर्वक एक बार भी महेश्वरका पूजन करके मनुष्य रुद्रलोकमें पहुँचकर रुद्रोंके साथ आमोद-प्रमोद करता है॥ ८-९॥ |
| संशोध्य च शुभं लिङ्गममरासुरपूजितम्।<br>जलैः पूतैस्तथा पीठे देवमावाह्य भक्तितः॥ १०<br>दृष्ट्वा देवं यथान्यायं प्रणिपत्य च शङ्करम्।<br>कल्पिते चासने स्थाप्य धर्मज्ञानमये शुभे॥ ११<br>वैराग्यैश्वर्यसम्पन्ने सर्वलोकनमस्कृते।<br>ओङ्कारपद्ममध्ये तु सोमसूर्याग्निसम्भवे॥ १२ | देवताओं तथा असुरोंसे पूजित शुभ लिङ्गको पवित्र जलसे स्वच्छ करके पीठमें भक्तिपूर्वक शिवका आवाहन करके उन्हें देखकर विधिपूर्वक प्रणाम करके धर्मज्ञानमय, उत्तम, वैराग्य-ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सभी लोगोंसे नमस्कृत, ओंकार पद्मसे युक्त मध्यभागवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निसे उत्पन्न कल्पित आसनपर स्थापित करके रुद्र शम्भुको |