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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)

॥ श्रीहरिः ॥
1985
महर्षि वेदव्यासप्रणीत

श्रीलिङ्गमहापुराण

[ सचित्र, सरल हिन्दी-व्याख्यासहित ]


लिंग थापि बिधिवत करि पूजा।
सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥


गीताप्रेस गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR

गीताप्रेस गोरखपुर

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॥ श्रीहरिः ॥

1985

महर्षि वेदव्यासप्रणीत

श्रीलिङ्गमहापुराण

[ सचित्र, सरल हिन्दी-व्याख्यासहित ]


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० २०७१ द्वितीय पुनर्मुद्रण ५,०००
कुल मुद्रण १०,०००

मूल्य— ₹ २००
( दो सौ रुपये )

प्रकाशक एवं मुद्रक—
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान )
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सम्पादकीय निवेदन

पुराण भारतीय सनातन संस्कृतिकी अमूल्य निधि हैं। ये अनन्त ज्ञानराशिके भण्डार हैं। पुराणोंमें वेदोंके अर्थोंका उपबृंहण—विस्तार हुआ है, अतः इनकी वेदवत् प्रतिष्ठा है, वेदवत् प्रामाण्य है। पुराणोंको पंचम वेद कहा गया है—'इतिहासपुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते' (श्रीमद्भागवत १।४।२०)। पुराणोंकी महिमामें कहा गया है कि जो बातें वेदोंमें प्राप्त नहीं होतीं, वे पुराणोंके द्वारा ज्ञात होती हैं। इसीलिये पुराणोंके श्रवण एवं पठनका विशेष माहात्म्य है। पुराणोंके श्रवणसे सारे पापोंका क्षय होता है, धर्मकी अभिवृद्धि होती है और मनुष्य ज्ञानी हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

वेद प्रभुसम्मित वचन हैं, किंतु पुराण सुहृत्सम्मित हैं, पुराण आज्ञा नहीं देते, अपितु सच्चे मित्रकी भाँति कल्याणकारी बातोंका सत्परामर्श प्रदान करते हैं। पुराणोंका यह अपूर्व वैशिष्ट्य है कि इसमें वेदोंके गूढ़तम अर्थोंको आख्यान-शैलीमें कथानकके माध्यमसे प्रस्तुत किया गया है। अतः रोचक होनेसे ये अधिक सुगम एवं सहज ग्राह्य हैं, यथा—वेदोंमें 'सत्यं वद'—सत्य बोलोका उपदेश है। पुराणमें इसी उपदेशको महाराज हरिश्चन्द्रके आख्यानके माध्यमसे समझाया गया है, इसी कारण पुराणोंको विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई है। पुराणोंमें न केवल मानवमात्रके कल्याणकी बातें आयी हैं, अपितु जीवमात्रके कल्याणकी बातें हैं। वास्तवमें पुराण सच्चे अर्थोंमें पारमार्थिक कल्याणके सर्वोत्कृष्ट साधन हैं।

पुराण संख्यामें अठारह हैं, जो श्रीमद्भागवत, श्रीदेवीभागवत, विष्णुपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। इन्हीं अठारह महापुराणोंमें श्रीलिङ्गमहापुराणका भी परिगणन है। अन्य महापुराणोंके समान ही सर्गादि पंचलक्षणोंका निरूपण, भक्ति, ज्ञान, सदाचारकी महिमा तथा जीवका श्रेयः-सम्पादन और उसे भगवन्मार्गमें प्रतिष्ठित करा देना लिङ्गमहापुराणका तात्पर्य-विषयीभूत अर्थ है। श्रीहरिके पुराणमय विग्रहमें लिङ्गपुराणको भगवान्‌का गुल्फदेश माना गया है—'लैङ्गं तु गुल्फकम्।' (पद्मपुराण)

इस पुराणका यह नाम इसलिये दिया गया है कि इसमें परमात्मा परमशिवको लिङ्गी—निर्गुण-निराकार अर्थात् अलिङ्ग कहा गया है। यह परमात्मा अव्यक्त प्रकृतिका मूल है, लिङ्गका अर्थ है अव्यक्त अर्थात् प्रकृति—'अलिङ्गं लिङ्गमूलं तु अव्यक्तं लिङ्गमुच्यते।' (लिङ्गपुराण पू० १।३।१) 'लिङ्ग' शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—सबको अपनेमें लीन रखनेवाला या विश्वके सभी प्राणि-पदार्थोंका उद्भावक, परिचायक चिह्न अथवा सम्पूर्ण विश्वमय परमात्मा—'लयन्नाल्लिङ्गमुच्यते।' (लिङ्गपुराण पू० १।१९।१६) प्रकृति-पुरुषात्मक समग्र विश्वरूपी वेदी या बेर तो महादेवी पार्वती हैं और लिङ्ग साक्षात् भगवान् शिवका स्वरूप है—'लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः।' लिङ्गसे लिङ्गीका ख्यापन ही लिङ्गमहापुराणका विषय है। इसी विषय-वस्तुका प्रतिपादन लिङ्गपुराणमें विस्तारसे विविधरूपोंमें हुआ है।

लिङ्गपुराण दो भागोंमें विभक्त है—पूर्वभागमें एक सौ आठ अध्याय हैं और उत्तरभागमें पचपन अध्याय हैं। इसके पूर्वभागमें माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप, योगसाधना, भगवान् शिवकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन, भक्तियोगका माहात्म्य, भगवान् शिवके सद्योजात, वामदेव आदि अवतारोंकी कथा, ज्योतिर्लिङ्गके प्रादुर्भावका आख्यान, अट्ठाईस व्यासों तथा अट्ठाईस शिवावतारोंकी कथा, लिङ्गार्चन-विधि तथा लिङ्गाभिषेककी महिमा, भस्म एवं रुद्राक्ष-

[ ४ ]

धारणकी महिमा, शिलादपुत्र नन्दीश्वरके आविर्भावका आख्यान, भुवनसन्निवेश, ज्योतिश्चक्रका स्वरूप, सूर्य-चन्द्रवंश-वर्णन, शिवभक्ततण्डीप्रोक्त शिवसहस्रनामस्तोत्र, शिवके निर्गुण एवं सगुण स्वरूपका निरूपण, शिवपूजाकी महिमा, पाशुपतव्रतका उपदेश, सदाचार, शौचाचार, द्रव्यशुद्धि एवं अशौच-निरूपण, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य, दक्षपुत्री सती एवं हिमाद्रिजा पार्वतीका आख्यान, भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा शिवभक्त उपमन्युकी शिवनिष्ठा आदि विषयोंका वर्णन है।

उत्तरभागमें भगवद्गुणगानकी महिमा, विष्णुभक्तोंके लक्षण, लक्ष्मी एवं अलक्ष्मी (दरिद्रा)-के प्रादुर्भावका रोचक वृत्तान्त, दरिद्राके निवासयोग्य स्थान, द्वादशाक्षर मन्त्रकी महिमा, पशुपशविमोचन, भगवान् शिव एवं पार्वतीकी विभूतियोंका निदर्शन, शिवकी अष्टमूर्तियोंकी कथा, शिवाराधना, शिवदीक्षा-विधान, तुलापुरुष आदि षोडश महादानोंकी विधि, जीवच्छ्राद्धका माहात्म्य तथा मृत्युंजय-मन्त्र-विधान आदि विषय विवेचित हैं। अन्तमें लिङ्गमहापुराणके श्रवण-मनन एवं पाठकी फलश्रुति निरूपित है। स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी इस पुराणकी महिमा बताते हुए कहते हैं—

‘जो मनुष्य इस सम्पूर्ण लिङ्गपुराणको आदिसे अन्ततक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है। उस महात्माकी श्रद्धा मुझ (ब्रह्मा)-में, नारायणमें तथा भगवान् शिवमें हो जाती है।’ ‘लैङ्गमाद्यन्तमखिलं यः पठेच्छृणुयादपि ॥ द्विजेभ्यः श्रावयेद्वापि स याति परमां गतिम्। ××× मयि नारायणे देवे श्रद्धा चास्तु महात्मनः॥’ (लिङ्गपुराण, उत्तर०, अ० ५५)

इस प्रकार सम्पूर्ण लिङ्गपुराण विशेष रूपसे शिवोपासनामें पर्यवसित है। इसमें भगवान् शिव एवं भगवान् विष्णुका अभेदत्व प्रतिपादित हुआ है। इसमें आयी स्तुतियाँ अत्यन्त गेय तथा कण्ठ करने योग्य हैं। इसके आख्यान बड़े ही रोचक और भगवद्भक्तिको स्थिर करनेवाले हैं। इस पुराणमें सदाचारधर्मकी बड़ी प्रतिष्ठा वर्णित है और नित्यकर्मोंके सम्पादनकी बड़ी महिमा आयी है। इसमें आये सुभाषित बड़े ही ग्राह्य और कल्याणकारक हैं।

एक उपदेशमें बताया गया है कि सभी शास्त्रोंके बार-बार आलोडन तथा पुनः पुनः विचार करनेके बाद यही निश्चित होता है कि सदा नारायणका ध्यान करना चाहिये—‘आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः॥ इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा।’ (उत्तरभाग ७।१०-११) इस प्रकार लिङ्गपुराण बहुत ही उपयोगी है तथा इसके उपदेश अत्यन्त उपकारक हैं।

पं० लक्ष्मीधरविरचित ‘कृत्यकल्पतरु’ नामक एक अत्यन्त प्रसिद्ध धर्मशास्त्रीय निबन्ध-ग्रन्थ है, उसमें लिङ्गपुराणके नामसे सोलह अध्याय प्राप्त हैं, जो वर्तमानमें उपलब्ध लिङ्गपुराणसे अतिरिक्त हैं, इन सोलह अध्यायोंमें अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा यहाँके शिवायतनों एवं लिङ्गोंकी महिमा प्रतिपादित है। लिङ्गपुराण-परिशिष्टके नामसे उन्हें भी मूल तथा हिन्दी अनुवादके साथ इसमें दिया जा रहा है।

सम्पूर्ण श्रीलिङ्गमहापुराणका हिन्दी अनुवाद वर्ष २०१२ ई० के विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित हुआ था। तभीसे सुधीजनोंकी यह भावना थी कि भाषा-टीकासहित मूल लिङ्गमहापुराणका भी प्रकाशन किया जाय। इसी दृष्टिसे मूल संस्कृत तथा उसका हिन्दी अनुवादके साथ पुस्तकरूपमें इसका प्रकाशन किया जा रहा है। आशा है, प्रेमी पाठकोंको इससे प्रसन्नता होगी और वे लाभान्वित होंगे।

—राधेश्याम खेमका


श्रीहरिः

विषय-सूची

पूर्वभाग

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
१-देवर्षि नारदजीका नैमिषारण्य-आगमन, श्रीसूत-शौनक-संवादमें लिङ्गमहापुराणका उपक्रम१११५-अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश६६
२-लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन१३१६-विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति६९
३-अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन, जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा१८१७-ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमामहेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति७३
४-ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण, कालका स्वरूप, कल्प, मन्वन्तर एवं युगादिका मान तथा ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न लोकोंकी संरचना२२१८-विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य८१
५-ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि, नौ प्रकारकी सृष्टि (नवविध सर्ग)-की संरचना, मरीचि आदि ऋषियोंकी उत्पत्ति, मनु-शतरूपाका प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन२७१९-महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वर प्रदान करना तथा उमामहेश्वर-पूजनके रूपमें लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ८४
६-अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन, ब्रह्माजीसे रुद्रोंका प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा३२२०-शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव, भगवान् शिवकी मायासे दोनोंका विमोहित होना, विष्णुद्वारा ब्रह्माके प्रति शिव-माहात्म्यका कथन८६
७-माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओंकी नामावली, विभिन्न युगोंमें हुए माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन३५२१-ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य९४
८-शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन, योगका स्वरूप, अष्टांगयोगका वर्णन, विषयभोगोंकी निस्सारता, प्राणायामकी महिमा, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप३९२२-महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान, सृष्टिके लिये ब्रह्माजीद्वारा तप करना तथा सर्पों एवं रुद्रोंकी सृष्टि१०२
९-योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति४९२३-विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व१०५
१०-योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता५५२४-श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियोंका वर्णन१०९
११-श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा६१२५-लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिके लिये अन्तः एवं बाह्य स्नानकी प्रक्रिया और विविध मन्त्रोंसे आत्माभिषेचन१११
१२-रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा६२२६-भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप, सूर्यकी प्रार्थना, सूर्यसूक्तोंका पाठ, देव-ऋषि-पितृतर्पण, पंचमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान, भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान१२२
१३-पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य६३२७-लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारोंद्वारा लिङ्गपूजाका विधान, लिङ्गा-भिषेककी महिमा तथा अभिषेकके मन्त्र१२६
१४-असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य६५

[६]

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
२८-भगवान् महेश्वरके अभ्यन्तरपूजनका स्वरूप, सकल एवं निष्कल तत्त्वकी व्याख्या, छब्बीस तत्त्वोंका परिगणन एवं सम्पूर्ण चराचर जगत्‌की शिवरूपता ...१३१
२९-देवदारुवनका वृत्तान्त, अतिथिमहात्म्यमें सुदर्शन-मुनिका आख्यान तथा संन्यासधर्मका वर्णन ..........१३४
३०-शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान .......१४१
३१-देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना ..........१४५
३२-मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति .........................१४९
३३-मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश ........................१५०
३४-भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन .......................................१५२
३५-महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महा-मृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा .....................१५५
३६-राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिव-भक्तोंकी महिमाका कथन ..............................१५८
३७-नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना .........१६५
३८-विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायण-द्वारा सृष्टिका वर्णन .....................................१६८
३९-सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन ...............................१७०
४०-कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति ...........१७६
४१-विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन ........१८५
४२-शिलादद्वारा तप करनेसे भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे उनके पुत्रके रूपमें प्रकट होना और शिलादद्वारा नन्दिकेश्वर शिवकी स्तुति ...........................१९०
४३-शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना, ऋषियोंद्वारा नन्दिकेश्वरकी आयु अल्प बतानेपर शिलादका दुःखी होना तथा नन्दिकेश्वरद्वारा त्र्यम्बकमन्त्रका जप एवं महेश्वर-पार्वतीद्वारा उन्हें अपने पुत्ररूपमें अमर होनेका वरदान देना ...............................................१९३
४४-भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दि-केश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा ....१९७
४५-भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पातालोंकोंका वर्णन ....................................................२०१
४६-भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन एवं सर्वत्र भगवान् शिवकी व्यापकता, स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रियव्रतादि राजवंशोंका वर्णन, जम्बूद्वीप, कुशद्वीप तथा क्रौञ्चद्वीपके राजाओंका वर्णन ..........२०३
४७-जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन तथा आग्नीध्रके शिवभक्त नौ पुत्रोंका अजनाभवर्ष (भारतवर्ष), किम्पुरुषवर्ष आदि नौ वर्षों (देशों)-का स्वामी बनना ................२०६
४८-भूमध्यमें स्थित मेरु (सुमेरु) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन .........................२०८
४९-जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन ............२११
५०-भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन ...........................२१६
५१-दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन ...........२१८
५२-विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन, केतुमाल, कुरुवर्ष, भारतवर्ष, किम्पुरुष आदि वर्षोंमें रहनेवाले लोगों तथा उनकी लोकवृत्तिका वर्णन ........................२२०
५३-भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य ............................२२४
५४-ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव ......................२२९
५५-शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन .........................२३४
५६-सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन .............२४०
५७-बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण .................२४१
५८-ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण ............................२४४
५९-पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन, बारह मासके बारह सूर्योंका नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियोंका वर्णन ................................२४६

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
६०-मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन२४९७८-शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य३८२
६१-ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन२५१७९-शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा३८५
६२-उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन२५६८०-देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना३८७
६३-दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंश-वर्णन२५९८१-विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपशविमोचक लिङ्ग-व्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य३९२
६४-वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा२६६८२-सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल३९७
६५-सूर्यवंश तथा चंद्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम२७५८३-विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान..४०५
६६-इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन२८६८४-उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान४०९
६७-राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा२९२८५-पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा४१५
६८-ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन२९४८६-पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा४३४
६९-चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन२९८८७-सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश४४६
७०-महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविध-सर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव३०५८८-पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोत्रका स्वरूप४४८
७१-तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह३३२८९-सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन४५६
७२-त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति३४५९०-यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण४६६
७३-लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा३६१९१-आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य तथा शिवोपासनानिरूपण४६८
७४-ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य३६३९२-अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वर-पूजाविधिवर्णन४७५
७५-शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण३६६९३-हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति४९०
७६-विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल३६९९४-भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति४९२
७७-शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल, शिवक्षेत्रों तथा शिव-तीर्थोंके सेवनकी महिमा, शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य३७४९५-नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्य-कशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य४९६
९६-भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति५०२
९७-जलन्धर-वधकी कथा५१२
९८-भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना५१६

[८]

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
९९-भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य ......................५२८१०३-भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना ............................................५४४
१००-वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह .................................५३०१०४-गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ...................................५५०
१०१-सतीका हिमवान्‌की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना ..........................५३४१०५-विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा .........५५३
१०२-पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना ...........५३८१०६-दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा ................................५५६
१०७-शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ....................................५५८
१०८-भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य ....................................................५६४

उत्तरभाग

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
१-भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा ......५६७१२-भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता ..................................................६२४
२-भगवद्गुणगानका माहात्म्य .................................५७४१३-भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन ...............६२७
३-भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानबन्धु, जाम्बवती आदिसे गानविद्याकी प्राप्ति .................५७४१४-भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन ...................................६३०
४-वासुदेवपरायण विष्णुभक्तोंके लक्षण तथा उनकी महिमा .........................................................५८४१५-शिवमाहात्म्यका वर्णन ....................................६३३
५-विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान, विष्णुमायाद्वारा नारद एवं पर्वत मुनिका वानरमुख होना तथा इसीका रामावतारमें हेतु बनना ..........................५८५१६-विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा .....६३५
६-भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्राके निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन .............................५९९१७-भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन .........................................................६३७
७-भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा .........................६०६१८-देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ...............६३९
८-शिवमन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धुमूखका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना ...........६०९१९-देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना.......६४५
९-पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण ......................६१२२०-पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा .........................................................६४८
१०-उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन .....................................................६१७२१-शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ......६५३
११-भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य .....................६२०२२-शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन .........................................................६५९
२३-हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन .........................................................६६६
२४-न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य .........६६९

[९]

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
२५-शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणि-मन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन६७५४२-सुवर्णगजदानविधि७२७
४३-लोकपालाष्टकमहादानविधि७२८
२६-शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य६८५४४-त्रिमूर्तिदानविधि७२९
२७-राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण६८८४५-जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान७३०
४६-लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण७३४
४७-लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि७३६
२८-स्वायम्भुव मनुके प्रति सनत्कुमारप्रोक्त षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन७०७४८-देवताओंकी प्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवताओंके गायत्रीमन्त्र७४०
२९-षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि७१५४९-अघोरेश्वररूप भगवान् शिवके निमित्त किये गये जप, हवन एवं पूजनका फल७४४
३०-तिलपर्वतदानविधि७१६५०-विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान७४५
३१-सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि७१७५१-भगवान् शिवकी संहारिका शक्ति-वज्रेश्वरीविद्याके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा७४९
३२-सुवर्णपृथ्वीमहादानविधि७१८५२-वज्रेश्वरीविद्याकी सिद्धिका विधान७५१
३३-कल्पपादपदानविधि७१९५३-मृत्युंजयहवन-विधान७५३
३४-गणेशेशदानविधि७२०५४-मृत्युहर त्र्यम्बकमन्त्रका माहात्म्य तथा मन्त्रका व्याख्यान७५३
३५-सुवर्णधेनुदानविधि७२०५५-योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपतयोगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य७५६
३६-ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि७२१
३७-तिलधेनुदानविधिनिरूपण७२२
३८-महादानोंमें परिगणित गोसहस्रदानकी विधि७२४
३९-हिरण्याश्वदानविधि७२५
४०-कन्यादानविधि७२६
४१-हिरण्यवृषभमहादानविधि७२६

श्रीलिङ्गमहापुराण-परिशिष्ट

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
१-अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनका वर्णन७६२९-व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन८००
२-मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन७७०१०-गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा८०४
३-सगेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७७२११-कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन८११
४-कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य७७४१२-अविमुक्त तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य-वर्णन८१६
५-कपिलेश्वरमें सिद्धि प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन७७८१३-भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत तथा ब्रह्माजीद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन८१९
६-श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन७७९१४-हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, कपर्दीश्वर, अंगारेश्वर तथा छागलेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन८२२
७-कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७८२१५-चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन८२५
८-कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन७९२१६-काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा८३०

[१०]

चित्र-सूची

( रेखा-चित्र )

१- देवर्षि नारदजी ..................................................... १२सुदर्शनचक्र प्रदान करना ................................ ३७३
२- ॐकारमें सशक्तिक शिव........................................ १३३३- सूतजीद्वारा ऋषियोंको कथा सुनाना ................... ३८५
३- ब्रह्माजीके एक भाग से मनु तथा दूसरे भागसे शतरूपाका प्राकट्य......................................... १४३४- भक्तद्वारा शिवलिङ्गका पूजन करना .................. ४०९
४- प्राणायामकी विधि ............................................... ४४३५- माता पार्वतीको भगवान् शिवजीद्वारा पंचाक्षरीविद्याका उपदेश ...................................................... ४१५
५- ब्रह्माजीद्वारा ईशान भगवान् शिवकी स्तुति .............. ७१३६- योगीद्वारा ओंकारकी साधना .............................. ४७२
६- ज्योतिर्मय लिङ्गका प्राकट्य .................................. ७६३७- देवी पार्वतीको भगवान् शंकरद्वारा अविमुक्तेश्वरलिङ्गका दर्शन कराना ............................................... ४७५
७- देवताओंसहित भगवान् विष्णुद्वारा शिवजीकी स्तुति . ८२३८- शिव-पार्वती-संवाद ........................................ ४७९
८- शेषशायी विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्राकट्य ...... ८८३९- मुनि शुक्राचार्यद्वारा शुक्रेश्वरलिङ्गका स्थापन ....... ४८३
९- भगवान् शंकरका विष्णु एवं ब्रह्माजीके सामने प्रकट होना ........................................................... १०३४०- ब्रह्माजीद्वारा वाराहरूप भगवान्‌की स्तुति ............ ४९४
१०- सूर्यार्घ्यदान ....................................................... १२३४१- दैत्योंद्वारा भक्त प्रह्लादके वधका प्रयास ................ ४९७
११- हाथोंमें तीर्थ ..................................................... १२३४२- भगवान् शिवका दक्षयज्ञविध्वंसहेतु वीरभद्रको भेजना ........................................................... ५३०
१२- पंचमहायज्ञ ....................................................... १२४४३- प्रजापति दक्षद्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति .......... ५३३
१३- भगवान् विष्णुको शाप देते महर्षि भृगु ................. १३६४४- इन्द्रादि देवताओंको लेकर देवगुरु बृहस्पतिका ब्रह्माजीके पास जाना .................................... ५३६
१४- मुनियोंका भगवान् ब्रह्मासे निवेदन ..................... १३७४५- द्विजवेषधारी भगवान् शंकरको देवी पार्वतीका नमन ५३९
१५- भगवान् शिवजीका ब्रह्माजीके समक्ष स्त्री-पुरुषरूपमें प्रकट होना ................................................. १८४४६- शिशुरूप शिवद्वारा वज्रसहित इन्द्रका स्तम्भन ....... ५४१
१६- भगवान् वृषभध्वजद्वारा नन्दिकेश्वरको शतदलकमलकी माला पहनाना .............................................. १९५४७- भगवान् शंकरके चरणोंमें देवी पार्वतीद्वारा मालाका अर्पण ........................................................... ५४३
१७- शिवरूप यक्षके समीप देवताओंका अनिश्चयकी स्थितिमें शक्तिहीन होना .................................. २२७४९- देवताओंद्वारा भगवान् गणेशजीको प्रणाम करना ... ५५४
१८- देवर्षि नारदजीद्वारा दक्षपुत्रोंको उपदेश देना....... २६०४९- इन्द्रका रूप धारणकर भगवान् शंकरका उपमन्युके आश्रममें आगमन ........................................... ५६१
१९- भगवान् विष्णुद्वारा ब्रह्मर्षि वसिष्ठको आश्वासन .. २६७५०- उपमन्युद्वारा भगवान् शंकर-पार्वतीको साष्टांग प्रणाम .. ५६४
२०- कुवलाश्वद्वारा महाबली धुन्धुका वध ................... २७८५४- ऋषि उपमन्युको भगवान् श्रीकृष्णद्वारा नमन ........ ५६५
२१- महर्षि विश्वामित्रद्वारा त्रिशंकुको सशरीर स्वर्ग भेजना ........................................................... २८७५५- महामुनि मार्कण्डेय एवं राजा अम्बरीषका संवाद ... ५६७
२२- राजा त्रय्यारुणद्वारा अपने पुत्रका त्याग ................. २८७५६- यमराजका ब्रह्माजीसे अपनी चिन्ता प्रकट करना ५७०
२३- भगवान् परशुरामद्वारा सहस्रार्जुनका वध ............. २९५५७- तपस्यारत देवर्षि नारदजी ................................. ५७३
२४- माता देवकीके गर्भसे भगवान् श्रीकृष्णका अवतार .. ३०१५८- गरुडपर आसीन भगवान् नारायण एवं देवर्षि नारद ... ५८०
२५- अष्टभुजारूप कन्याका कंसके हाथसे छूटकर अन्तरिक्षमें स्थित होना .................................. ३०२५९- देवर्षि नारदको राजा अम्बरीषद्वारा पुत्रीका परिचय देना ................................................. ५९०
२६- भगवान् श्रीकृष्णद्वारा बाणासुरकी भुजाओंका छेदन. ३०४६०- भगवान् नारायणको प्रणाम करते हुए देवर्षि नारद .... ५९२
२७- शतरूपाकी तपस्या ........................................... ३२६६१- भगवती महालक्ष्मीका प्रादुर्भाव .......................... ५९९
२८- भगवान् शिवजीद्वारा ब्रह्माके समक्ष अपने ही समान हजारों पुत्रोंकी मानस-सृष्टि करना ................. ३२८६२- घरमें कलहसे अलक्ष्मीका निवास ...................... ६०२
२९- प्रजापति दक्षद्वारा देवीकी आराधना .................... ३३०६३- ऐतरेय एवं उनकी माताका संवाद ....................... ६०८
३०- ब्रह्माजीद्वारा तारकपुत्रोंको वरप्रदान .................... ३३३६४- शिवलिङ्गकी स्थापना करते भगवान् श्रीराम ........ ६२३
३१- भगवान् शिवजीद्वारा एक ही बाणसे त्रिपुरको ध्वस्त करना ३५४६५- सूतजीसे मुनियोंद्वारा प्रश्न करना ....................... ६४९
३२- नेत्ररूपी कमलदानसे प्रसन्न शिवजीद्वारा विष्णुको६६- गुरुका शिवभावसे पूजन ................................... ६५०
६७- रावणद्वारा पूजित भगवान् रावणेश्वर .................... ८०७

॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण

[ पूर्वभाग ]

पहला अध्याय

देवर्षि नारदजीका नैमिषारण्य-आगमन, श्रीसूत-शौनक-संवादमें लिङ्गमहापुराणका उपक्रम

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ <br> ॥ ॐ नमः शिवाय ॥॥ श्रीगणेशजीको नमस्कार है ॥ <br> ॥ भगवान् शिवको नमस्कार है ॥
नमो रुद्राय हरये ब्रह्मणे परमात्मने। <br> प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तकारिणे॥ १जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं अन्तके कारणीभूत [कारक] ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपात्मक प्रधान-पुरुषाधीश परमात्मा सदाशिवको नमस्कार है॥ १॥
नारदोऽभ्यर्च्य शैलेशे शङ्करं सङ्गमेश्वरे। <br> हिरण्यगर्भे स्वर्लीने ह्यविमुक्ते महालये॥ २ <br><br> रौद्रे गोप्रेक्षके चैव श्रेष्ठे पाशुपते तथा। <br> विघ्नेश्वरे च केदारे तथा गोमायुकेश्वरे॥ ३ <br><br> हिरण्यगर्भे चन्द्रेशे ईशान्ये च त्रिविष्टपे। <br> शुक्रेश्वरे यथान्यायं नैमिषं प्रययौ मुनिः॥ ४मुनि नारद शैलेश, संगमेश्वर, हिरण्यगर्भ, स्वर्लीन, अविमुक्त, महालय, रौद्र, गोप्रेक्षक, श्रेष्ठ पाशुपत, विघ्नेश्वर, केदार, गोमायुकेश्वर, हिरण्यगर्भ, चन्द्रेश, ईशान्य, त्रिविष्टप तथा शुक्रेश्वर आदि तीर्थस्थानोंमें भगवान् शंकरकी यथोचित आराधना करके नैमिषारण्य पहुँचे॥ २—४॥
नैमिषेयास्तदा दृष्ट्वा नारदं हृष्टमानसाः। <br> समभ्यर्च्यासनं तस्मै तद्योग्यं समकल्पयन्॥ ५नारदजीको देखकर नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले ऋषियोंके मनमें अतीव प्रसन्नता हुई। उन्होंने नारदजीकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करके उनके लिये उचित आसन प्रदान किया॥ ५॥
सोऽपि हृष्टो मुनिवरैर्दत्तं भेजे तदासनम्। <br> सम्पूज्यमानो मुनिभिः सुखासीनो वरासने॥ ६ <br><br> चक्रे कथां विचित्रार्थां लिङ्गमाहात्म्यमाश्रिताम्। <br> एतस्मिन्नेव काले तु सूतः पौराणिकः स्वयम्॥ ७उन नारदजीने भी मुनियोंके द्वारा प्रदत्त उस आसनको सहर्ष स्वीकार किया और उन मुनियोंसे भलीभाँति पूजित होकर तथा उस उत्तम आसनपर सुखपूर्वक विराजमान होकर वे लिङ्गमाहात्म्यसे सम्बद्ध विचित्र रहस्योंवाली कथा सुनाने लगे॥ ६ १/२॥
जगाम नैमिषं धीमान् प्रणामार्थं तपस्विनाम्। <br> तस्मै साम च पूजाञ्च यथावच्चक्रिरे तदा॥ ८इसी समय पुराणोंके ज्ञाता परम बुद्धिमान् सूतजी तपस्वी मुनियोंको प्रणाम करनेकी कामनासे नैमिषारण्य तीर्थमें पधारे। नैमिषारण्यवासी ऋषियोंने व्यासजीके

| १२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| नैमिषेयास्तु शिष्याय कृष्णद्वैपायनस्य तु।<br>अथ तेषां पुराणस्य शुश्रूषा समपद्यत॥ ९<br>दृष्ट्वा तमतिविश्वस्तं विद्वांसं रोमहर्षणम्।<br>अपृच्छंश्च ततः सूतमृषिं सर्वे तपोधनाः॥ १०<br>पुराणसंहितां पुण्यां लिङ्गमाहात्म्यसंयुताम्। | शिष्य उन सूतजीकी सम्यक् प्रकारसे स्तुति तथा पूजा की॥ ७-८ १/२ ॥<br>तत्पश्चात् अपनी कथाओंसे रोमांचित कर देनेवाले सूतजीको अतिविश्वस्त विद्वान् जानकर उन मुनियोंकी उनसे पुराण सुननेकी इच्छा हो गयी॥ ९ १/२ ॥<br>तब सभी तपस्वी ऋषियोंने मुनिवर सूतजीसे लिङ्गमाहात्म्यसे युक्त पुण्यदायिनी पुराणसंहिताके विषयमें पूछा॥ १० १/२ ॥ | | नैमिषेया ऊचुः<br>त्वया सूत महाबुद्धे कृष्णद्वैपायनो मुनिः॥ ११<br>उपासितः पुराणार्थं लब्धा तस्माच्च संहिता। | **नैमिषारण्यवासी ऋषि बोले—**महान् बुद्धिवाले हे सूतजी! पुराणोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये आपने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीकी उपासना की तथा उनसे पुराणसंहिता प्राप्त भी की है॥ ११ १/२ ॥ | | तस्माद्भवन्तं पृच्छामः सूत पौराणिकोत्तम॥ १२<br>पुराणसंहितां दिव्यां लिङ्गमाहात्म्यसंयुताम्। | अतएव पौराणिकोंमें उत्तम हे सूतजी! लिङ्ग-माहात्म्यसे युक्त दिव्य पुराणसंहिता (लिङ्गपुराण)-के विषयमें हम आपसे पूछ रहे हैं॥ १२ १/२ ॥ | | नारदोऽप्यस्य देवस्य रुद्रस्य परमात्मनः॥ १३<br>क्षेत्राण्यासाद्य चाभ्यर्च्य लिङ्गानि मुनिपुङ्गवः।<br>इह सन्निहितः श्रीमान् नारदो ब्रह्मणः सुतः॥ १४<br>भवभक्तो भवांश्चैव वयं वै नारदस्तथा।<br>अस्याग्रतो मुनेः पुण्यं पुराणं वक्तुमर्हसि॥ १५<br>सफलं साधितं सर्वं भवता विदितं भवेत्। | ब्रह्माके पुत्र श्रीमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी परमेश्वर रुद्रदेवके पावन क्षेत्रोंमें जाकर वहाँ उनके लिङ्गोंकी पूजा-अर्चना सम्पन्न करके अब यहाँ विराजमान हैं॥ १३-१४॥<br>शिवभक्त, आप, हम मुनिगण तथा नारदजी यहाँ उपस्थित हैं। इन मुनिके आगे आप पवित्र लिङ्गपुराणकी कथा कहनेमें समर्थ हैं। आपने सब कुछ सफलतापूर्वक सिद्ध कर लिया है। आपको तो सब कुछ विदित होगा॥ १५ १/२ ॥ | | एवमुक्तः स हृष्टात्मा सूतः पौराणिकोत्तमः॥ १६<br>अभिवाद्याग्रतो धीमान्नारदं ब्रह्मणः सुतम्।<br>नैमिषेयांश्च पुण्यात्मा पुराणं व्याजहार सः॥ १७ | मुनियोंके इस प्रकार कहनेपर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका मन प्रसन्नतासे प्रफुल्लित हो गया। सर्वप्रथम ब्रह्माजीके पुत्र देवर्षि नारद तथा नैमिषारण्यवासी मुनियोंका अभिवादन करके बुद्धिमान् तथा पुण्यात्मा सूतजीने लिङ्गपुराण कहना आरम्भ किया॥ १६-१७॥ | | सूत उवाच<br>नमस्कृत्य महादेवं ब्रह्माणञ्च जनार्दनम्।<br>मुनीश्वरं तथा व्यासं वक्तुं लिङ्गं स्मराम्यहम्॥ १८ | **सूतजी बोले—**शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा मुनीश्वर व्यासजीको नमस्कार करके लिङ्गपुराणकी कथा कहनेके लिये मैं इस पुराणमें प्रतिपादित विषयका स्मरण करता हूँ॥ १८॥ | | शब्दब्रह्मतनुं साक्षाच्छब्दब्रह्मप्रकाशकम्।<br>वर्णावयवमव्यक्तलक्षणं बहुधा स्थितम्॥ १९ | शब्दब्रह्म ही इसका शरीर है—यह साक्षात् |

२- लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन

अध्याय २ ]लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अकारोकारमकारं स्थूलं सूक्ष्मं परात्परम्।<br>ओङ्काररूपमृग्वक्त्रं सामजिह्वासमन्वितम्॥ २०<br>यजुर्वेदमहाग्रीवमथर्वहृदयं विभुम्।<br>प्रधानपुरुषातीतं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्॥ २१शब्दब्रह्म (स्वस्वरूप)-का प्रकाशक है। अकारादि-क्षकारान्त वर्ण ही इसके अवयव हैं, अनेक रूपोंमें स्थित होनेपर भी यह अव्यक्त है, परात्पर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होनेपर यह अकार, उकार तथा मकारात्मक स्थूल शरीरवाला है, ऐसे स्वयं-प्रकाश्य शब्दब्रह्म ॐकारका ऋग्वेद मुख है, सामवेद इसकी जिह्वा है, यजुर्वेद इसकी महाग्रीवा है तथा अथर्ववेद इसका हृदय है, यह व्यापक है, यह प्रकृति तथा पुरुषसे अतीत एवं प्रलय तथा उत्पत्तिसे रहित है॥ १९–२१॥
तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम्॥ २२जो तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरुद्र, रजोगुणसे युक्त होनेपर हिरण्यगर्भस्वरूप, सत्त्वगुणसे आविष्ट होनेपर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणोंसे रहित होनेपर महेश्वरस्वरूपमें प्रकट होता है॥ २२॥
प्रधानावयवं व्याप्य सप्तधाधिष्ठितं क्रमात्।<br>पुनः षोडशधा चैव षड्विंशकमजोद्भवम्॥ २३<br>सर्गप्रतिष्ठासंहारलीलार्थं लिङ्गरूपिणम्।<br>प्रणम्य च यथान्यायं वक्ष्ये लिङ्गोद्भवं शुभम्॥ २४प्रकृत्याश्रित होकर जो महत्, अहंकार तथा पंच-तन्मात्रात्मक (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध)—सात रूपोंमें, तदनन्तर दस इन्द्रियों, पाँच महाभूतों तथा मन इत्यादि षोडश रूपोंमें, पुनः इन षोडश रूपों और अव्यक्त, ध्याता (जीव) एवं ध्येय (शिव) इत्यादिको लेकर छब्बीस रूपोंमें व्यक्त होते हैं, जो पितामह ब्रह्माके भी पिता हैं, उन सृष्टि-पालन तथा संहाररूप लीलाके लिये लिङ्गस्वरूप धारण करनेवाले महेश्वर शिवको प्रणाम करके शुभकारक लिङ्गोद्भवकी कथासे युक्त लिङ्गपुराणका मैं यथोचितरूपसे वर्णन करूँगा॥ २३-२४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे लिङ्गोद्भवप्रतिज्ञावर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'लिङ्गोद्भवप्रतिज्ञावर्णन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥


दूसरा अध्याय

लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन

सूक्त / श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>ईशानकल्पवृत्तान्तमधिकृत्य महात्मना।<br>ब्रह्मणा कल्पितं पूर्वं पुराणं लैङ्गमुत्तमम्॥ १**सूतजी बोले—**ईशानकल्पमें लिङ्गके प्रादुर्भाव आदिसे सम्बद्ध वृत्तान्तोंको आश्रित करके महात्मा ब्रह्माने सर्वप्रथम श्रेष्ठ लिङ्गपुराणकी उद्भावना की॥ १॥
ग्रन्थकोटिप्रमाणं तु शतकोटिप्रविस्तरे।<br>चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते व्यासैः सर्वान्तरेषु वै॥ २सौ करोड़ विस्तारवाले पुराणसमुच्चयमें एक करोड़ श्लोकोंवाला यह लिङ्गपुराण सभी मन्वन्तरोंमें विभिन्न व्यासोंके द्वारा चार लाख श्लोकोंमें संक्षिप्त किया गया॥ २॥
व्यस्तेऽष्टादशधा चैव ब्रह्मादौ द्वापरादिषु।<br>लिङ्गमेकादशं प्रोक्तं मया व्यासाच्छ्रुतञ्च तत्॥ ३वही बृहद् पुराणसंहिता प्रत्येक द्वापरयुगमें

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१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्यैकादशसाहस्रे ग्रन्थमानमिह द्विजाः।<br>तस्मात् सङ्क्षेपतो वक्ष्ये न श्रुतं विस्तरेण यत्॥ ४ब्रह्मपुराणादि अठारह पुराणोंके रूपमें व्यासजीद्वारा विभक्त होती है, उनमें ग्यारहवाँ लिङ्गपुराण कहा गया है, जिसका श्रवण मैंने व्यासजीसे किया है॥ ३॥<br>हे विप्रो! [चार लाख श्लोकोंमें संक्षेपके पश्चात्] इस ग्रन्थमें श्लोकोंकी संख्या मात्र ग्यारह हजार है। अतः मैं संक्षेपमें ही इसका वर्णन कर रहा हूँ; क्योंकि मैं इसे विस्तारसे नहीं सुन सका हूँ॥ ४॥
चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते कृष्णद्वैपायनेन तु।<br>अत्रैकादशसाहस्त्रैः कथितो लिङ्गसम्भवः॥ ५विभिन्न मन्वन्तरोंमें अनेक व्यासोंद्वारा चार लाख श्लोकोंमें संक्षिप्त किये गये इस लिङ्गपुराणमेंसे वैवस्वत मन्वन्तरमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने ग्यारह हजार श्लोकोंमें लिङ्गपुराणका वर्णन किया है॥ ५॥
सर्गः प्राधानिकः पश्चात्प्राकृतो वैकृतानि च।<br>अण्डस्यास्य च सम्भूतिरण्डस्यावरणाष्टकम्॥ ६इसमें सर्वप्रथम प्राधानिक तदनन्तर प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका वर्णन किया गया है। इस अण्डकी उत्पत्ति तथा अण्डके आठ आवरणोंका इसमें वर्णन है॥ ६॥
अण्डोद्भवत्वं शर्वस्य रजोगुणसमाश्रयात्।<br>विष्णुत्वं कालरुद्रत्वं शयनं चाप्सु तस्य च॥ ७सदाशिवके ही रजोगुणके समाश्रयणसे अण्डके मध्यसे ब्रह्मारूपमें, (सत्त्वके आश्रयसे) विष्णुरूपमें, (तमोगुणके आश्रयसे) कालरूद्ररूपमें प्रादुर्भावका तथा अन्तमें उन्हीं सदाशिवका ही प्रलयकालीन जलराशिमें (नारायणके रूपमें) शयनका वर्णन किया गया है॥ ७॥
प्रजापतीनां सर्गश्च पृथिव्युद्धरणं तथा।<br>ब्रह्मणश्च दिवारात्रमायुषो गणनं पुनः॥ ८इस पुराणके अन्तर्गत प्रजापतियोंकी सृष्टि, पृथ्वीके उद्धारकी कथा तथा ब्रह्माके दिन-रात और उनकी आयुकी गणनाका वर्णन किया गया है॥ ८॥
सवनं ब्रह्मणश्चैव युगकल्पश्च तस्य तु।<br>दिव्यञ्च मानुषं वर्षमार्षं वै ध्रौव्यमेव च॥ ९<br>पित्र्यं पितॄणां सम्भूतिर्धर्मश्चाश्रमिणां तथा।<br>अवृद्धिंर्जगतो भूयो देव्याः शक्त्युद्भवस्तथा॥ १०<br><br>(चित्र)इसमें ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके युग एवं कल्प वर्णित हैं। दिव्य वर्ष, मानुष वर्ष, आर्षवर्ष, ध्रौव्यवर्ष तथा पित्र्यवर्षका इसमें वर्णन है। पितरोंकी उत्पत्ति, आश्रमियोंके धर्म, सृष्टि-विस्तारकी प्रारम्भिक दशामें सृष्टिके त्वरित अभीष्ट विकासके अभाव तथा शक्तिस्वरूपा देवीके उद्भवका वर्णन इसमें किया गया है॥ ९-१०॥
स्त्रीपुम्भावो विरिञ्चस्य सर्गो मिथुनसम्भवः।<br>आख्याष्टकं हि रुद्रस्य कथितं रोदनान्तरे॥ ११मनु तथा शतरूपाकी उत्पत्screenरूपमें ब्रह्माके स्त्री-पुरुष भावका वर्णन, मैथुनी सृष्टिका वर्णन तथा रुद्रके रुदनके पश्चात् उनके आठ नामोंका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ११॥
ब्रह्मविष्णुविवादश्च पुनर्लिङ्गस्य सम्भवः।<br>शिलादस्य तपश्चैव वृत्रारेर्दर्शनं तथा॥ १२ब्रह्मा-विष्णुके विवाद तथा उसके बाद शिवलिङ्गके प्राकट्यका वर्णन इसमें विद्यमान है। शिलादकी तपस्या

अध्याय २ ] लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन [ १५


प्रार्थनायोनिजस्याथ दुर्लभत्वं सुतस्य तु।<br>शिलादशक्रसंवादः पद्मयोनित्वमेव च॥ १३॥तथा उन्हें वृत्रारि (इन्द्र)-का दर्शन इस पुराणमें वर्णित है॥ १२॥<br><br>शिलाद तथा इन्द्रका संवाद, शिलादद्वारा अयोनिज पुत्रके लिये की गयी प्रार्थना, ऐसे पुत्रका दुर्लभत्व तथा कमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति इस पुराणमें वर्णित हैं॥ १३॥
भवस्य दर्शनञ्चैव तिष्येष्वाचार्यशिष्ययोः।<br>व्यासावताराश्च तथा कल्पमन्वन्तराणि च॥ १४॥<br><br>कल्पत्वं चैव कल्पानामाख्याभेदेष्वनुक्रमात्।<br>कल्पेषु कल्पे वाराहे वाराहत्वं हरेस्तथा॥ १५॥कलियुगोंमें आचार्य तथा शिष्यको शिवके दर्शन, व्यासोंके अवतार, कल्प, मन्वन्तर, कल्पका स्वरूप, भेदक्रमसे कल्पोंके आख्यान, कल्पोंमें वाराहकल्पमें विष्णुके वाराहावतारकी कथा आदिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें है॥ १४-१५॥
मेघवाहनकल्पस्य वृत्तान्तं रुद्रगौरवम्।<br>पुनर्लिङ्गोद्भवश्चैव ऋषिमध्ये पिनाकिनः॥ १६॥<br><br>लिङ्गस्याराधनं स्नानविधानं शौचलक्षणम्।<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं क्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम्॥ १७॥मेघवाहन कल्पका वृत्तान्त, रुद्रगरिमा, ऋषियोंके मध्य शिवलिङ्गका उद्भव, लिङ्गकी उपासना-स्नानविधि, शौचाचारका लक्षण, वाराणसीका माहात्म्य तथा क्षेत्रमाहात्म्य आदिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें उपलब्ध है॥ १६-१७॥
भुवि रुद्रालयानां तु संख्या विष्णोर्गृहस्य च।<br>अन्तरिक्षे तथाण्डेऽस्मिन् देवायतनवर्णनम्॥ १८॥पृथ्वीपर शिवालयों तथा विष्णुके मन्दिरोंकी संख्याका वर्णन और अन्तरिक्ष तथा इस ब्रह्माण्डमें देवालयोंका वर्णन इसमें है॥ १८॥
दक्षस्य पतनं भूमौ पुनः स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>दक्षशापश्च दक्षस्य शापमोक्षस्तथैव च॥ १९॥स्वारोचिष मन्वन्तरमें दक्षप्रजापतिका पृथ्वीपर पतन, दक्षको प्रदत्त शाप तथा उस शापसे दक्षकी मुक्ति इस लिङ्गपुराणमें वर्णित है॥ १९॥
कैलासवर्णनञ्चैव योगः पाशुपतस्तथा।<br>चतुर्युगप्रमाणञ्च युगधर्मः सुविस्तरः॥ २०॥कैलासका वर्णन, पाशुपतयोगका वर्णन, चारों युगोंके स्वरूप एवं प्रमाणका वर्णन तथा युगधर्मका वर्णन लिङ्गपुराणमें विस्तारके साथ उपलब्ध है॥ २०॥
सन्ध्यांशकप्रमाणञ्च सन्ध्यावृत्तं भवस्य च।<br>श्मशाननिलयश्चैव चन्द्ररेखासमुद्भवः॥ २१॥चारों युगोंके सन्ध्याकालमानका वर्णन, शिवजीके सन्ध्याताण्डवका वर्णन, शंकरजीके श्मशानवासका वर्णन तथा चन्द्रमाकी कलाओंकी उत्पत्तिका वर्णन इस पुराणमें किया गया है॥ २१॥
उद्वाहः शङ्करस्याथ पुत्रोत्पादनमेव च।<br>मैथुनातिप्रसङ्गेन विनाशो जगतां भयम्॥ २२॥<br><br>शापः सत्या कृतो देवान् पुरा विष्णूञ्च पालितम्।<br>शुक्रोत्सर्गस्तु रुद्रस्य गाङ्गेयोद्भव एव च॥ २३॥इस लिङ्गपुराणमें शंकरजीका विवाह, तत्पश्चात् पुत्ररूपमें श्रीगणेशजीकी उत्पत्ति, दीर्घकालीन कामोपभोग-प्रसंगसे जगत्के विनाशका भय, सतीके द्वारा प्रदत्त शाप, प्राचीनकालमें शिवजीद्वारा त्रिपुरवध करके देवताओं तथा विष्णुकी रक्षा, शिवजीका शुक्रोत्सर्ग तथा कार्तिकेयकी उत्पत्ति आदि वर्णित है॥ २२-२३॥
ग्रहणादिषु कालेषु स्नाप्य लिङ्गं फलं तथा।<br>क्षुब्दधीचविवादश्च दधीचोपेन्द्रयोस्तथा॥ २४॥ग्रहण आदि कालोंमें लिङ्गके अभिषेकका विधान तथा उसका फल, क्षुप तथा दधीच और दधीच तथा विष्णुका विवाद इस पुराणमें वर्णित है॥ २४॥
१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उत्पत्तिर्नन्दिनाम्ना तु देवदेवस्य शूलिनः।<br>पतिव्रतायाश्चाख्यानं पशुपाशविचारणा॥ २५<br><br>प्रवृत्तिलक्षणं ज्ञानं निवृत्त्यधिकृता तथा।<br>वसिष्ठतनयोत्पत्तिर्वासिष्ठानां महात्मनाम्॥ २६<br><br>मुनीनां वंशविस्तारो राज्ञां शक्तेर्विनाशनम्।<br>दौरात्म्यं कौशिकस्याथ सुरभेर्बन्धनं तथा॥ २७इस लिङ्गपुराणमें देवाधिदेव शूलधारी शिवजीका नन्दीश्वर नामसे प्रादुर्भाव, पतिव्रताका आख्यान, पशु (जीव) तथा पाश (बन्धन)-की मीमांसा, आसक्तिके स्वरूपका ज्ञान, निवृत्तिकी योग्यताप्राप्ति, वसिष्ठके पुत्रोंकी उत्पत्ति, महात्मा वसिष्ठपुत्रों तथा मुनियों और राजाओंका वंशविस्तार, वसिष्ठपुत्र शक्तिका विनाश, विश्वामित्रकी दुर्भावना तथा उनके द्वारा वसिष्ठकी सुरभिधेनुका बलात् अधिग्रहण आदि वर्णित किये गये हैं॥ २५-२७॥
सुतशोको वसिष्ठस्य अरुन्धत्याः प्रलापनम्।<br>स्नुषायाः प्रेषणञ्चैव गर्भस्थस्य वचस्तथा॥ २८<br><br>पराशरस्यावतारो व्यासस्य च शुकस्य च।<br>विनाशो राक्षसानाञ्च कृतो वै शक्तिसूनुना॥ २९<br><br>देवतापरमार्थं तु विज्ञानञ्च प्रसादतः।<br>पुराणकरणञ्चैव पुलस्त्यस्याज्ञया गुरोः॥ ३०वसिष्ठके पुत्रशोक, अरुन्धतीके विलाप, उनकी पुत्रवधूके प्रेषण, गर्भस्थित शिशुके वचनोद्गार, पराशर-व्यास तथा शुकदेवके अवतार, शक्तिपुत्र पराशरके द्वारा किये गये राक्षसध्वंस, देवताओंके गूढ़ रहस्यरूप विशिष्ट ज्ञान तथा गुरु पुलस्त्यके आज्ञानुसार उनके कृपाप्रसादसे [पराशरद्वारा विष्णु]-पुराणकी रचनासे सम्बन्धित विषयोंका वर्णन किया गया है॥ २८-३०॥
भुवनानां प्रमाणञ्च ग्रहाणां ज्योतिषां गतिः।<br>जीवच्छ्राद्धविधानञ्च श्राद्धार्हाः श्राद्धमेव च॥ ३१भुवनोंकी परिमिति, ग्रहों-नक्षत्रोंकी गति, जीवच्छ्राद्धकी विधि, श्राद्धके अधिकारी पात्रों तथा श्राद्धके विषयमें इस पुराणमें वर्णन है॥ ३१॥
नान्दीश्राद्धविधानञ्च तथाध्ययनलक्षणम्।<br>पञ्चयज्ञप्रभावश्च पञ्चयज्ञविधिस्तथा॥ ३२<br><br>रजस्वलानां वृत्तिश्च वृत्त्या पुत्रविशिष्टता।<br>मैथुनस्य विधिश्चैव प्रतिवर्णमनुक्रमात्॥ ३३<br><br>भोज्याभोज्यविधानञ्च सर्वेषामेव वर्णिनाम्।<br>प्रायश्चित्तमशेषस्य प्रत्येकञ्चैव विस्तरात्॥ ३४इस पुराणमें नान्दीश्राद्धके विधान, वेदाध्ययनका स्वरूप, ब्रह्मयज्ञ-पितृयज्ञ-दैवयज्ञ-भूतयज्ञ-नृयज्ञ-इन पाँच महायज्ञोंके प्रभाव तथा इन पाँच महायज्ञोंके करनेकी विधिका वर्णन किया गया है। रजस्वला स्त्रियोंके सदाचार, उस सदाचार-पालनसे विशिष्ट पुत्रकी प्राप्ति, प्रत्येक वर्णोंके अनुसार मैथुनके नियम, सभी वर्णोंके लिये अलग-अलग भोज्य तथा अभोज्यके विधिविधान और समस्त पापोंके प्रायश्चित्तके विषयमें पृथक्-पृथक् रूपसे विस्तारसे वर्णन किया गया है॥ ३२-३४॥
नरकाणां स्वरूपञ्च दण्डः कर्मानुरूपतः।<br>स्वर्गिनारकिणां पुंसां चिह्नं जन्मान्तरेषु च॥ ३५<br><br>नानाविधानि दानानि प्रेतराजपुरं तथा।<br>कल्पं पञ्चाक्षरस्याथ रुद्रमाहात्म्यमेव च॥ ३६नरकोंके स्वरूप, कर्मानुसार दण्डके विधान, स्वर्ग और नरक प्राप्त करनेवाले पुरुषोंमें दूसरे जन्मोंमें प्रकट होनेवाले चिह्न, अनेक प्रकारके दानों, यमपुरी, पंचाक्षर मन्त्रकी मीमांसा तथा रुद्रमाहात्म्यका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ३५-३६॥
वृत्रेन्द्रयोर्महायुद्धं विश्वरूपविमर्दनम्।<br>श्वेतस्य मृत्योः संवादः श्वेतार्थे कालनाशनम्॥ ३७इन्द्र-वृत्रासुरके महासंग्रामका वर्णन, विश्व-रूपके वधका निरूपण, श्वेतमुनि तथा कालका संवाद,

अध्याय २ ] लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन १७


श्लोक (संस्कृत)अर्थ (हिन्दी)
श्वेतमुनिकी रक्षाके लिये शिवद्वारा कालके संहारका इसमें वर्णन है ॥ ३७ ॥
देवदारुवने शम्भोः प्रवेशः शङ्करस्य तु।<br>सुदर्शनस्य चाख्यानं क्रमसंन्यासलक्षणम्॥ ३८देवदारुवनमें कल्याणकारी भगवान् शम्भुके प्रवेश, सुदर्शनके आख्यान एवं क्रमसंन्यासके लक्षणका वर्णन इस पुराणमें किया गया है ॥ ३८ ॥
श्रद्धासाध्योऽथ रुद्रस्तु कथितं ब्रह्मणा तदा।<br>मधुना कैटभेनैव पुरा हतगतेर्विभोः॥ ३९<br><br>ब्रह्मणः परमं ज्ञानमादातुं मीनता हरेः।<br>सर्वावस्थासु विष्णोश्च जननं लीलयैव तु॥ ४०शिव-प्राप्ति श्रद्धाद्वारा ही साध्य है—इस सिद्धान्तका ब्रह्माद्वारा निरूपण, मधु-कैटभ-संसर्गसे नष्ट ज्ञानवाले ब्रह्माको परम ज्ञान प्रदान करनेके लिये शिवप्रादुर्भाव, भगवान् विष्णुका मत्स्यरूपमें अवतार तथा सभी अवस्थाओंमें लीलापूर्वक विष्णुकी उत्पत्तिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें उपलब्ध है ॥ ३९-४० ॥
रुद्रप्रसादाद्विष्णोश्च जिष्णोश्चैव तु सम्भवः।<br>मन्थानधारणार्थाय हरेः कूर्मत्वमेव च॥ ४१भगवान् शंकरकी कृपासे श्रीकृष्ण तथा कामदेवके रूपमें प्रद्युम्नके प्रादुर्भाव एवं समुद्रमन्थनके समय मथानी-धारणके लिये भगवान् विष्णुके कूर्मावतारका वर्णन इस पुराणमें है ॥ ४१ ॥
सङ्कर्षणस्य चोत्पत्तिः कौशिक्याश्च पुनर्भवः।<br>यदूनाञ्चैव सम्भूतिर्यादवत्वं हरेः स्वयम्॥ ४२<br><br>भोजराजस्य दौरात्म्यं मातुलस्य हरेर्विभोः।<br>बालभावे हरेः क्रीडा पुत्रार्थं शङ्करार्चनम्॥ ४३संकर्षणकी उत्पत्ति, चण्डिकाके रूपमें कौशिकीके प्रादुर्भाव, यदुवंशियोंकी उत्पत्ति, स्वयं विष्णुके यदुकुलमें प्रादुर्भाव, श्रीकृष्णके मामा भोजराज (कंस)-के दुर्भाव, बालरूपमें श्रीकृष्णकी लीलाओं तथा पुत्रके लिये शंकरजीकी पूजाका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है ॥ ४२-४३ ॥
नारस्य च तथोत्पत्तिः कपाले वैष्णवाद्वरात्।<br>भूभारनिग्रहार्थे तु रुद्रस्याराधनं हरेः॥ ४४विष्णुरूप शिवसे कपालमें जलकी उत्पत्ति तथा पृथ्वीका भार उतारनेके लिये विष्णुद्वारा शंकरजीकी की गयी आराधनाका वर्णन इस पुराणमें है ॥ ४४ ॥
वैन्येन पृथुना भूमेः पुरा दोहप्रवर्तनम्।<br>देवासुरे पुरा लब्धो भृगुशापश्च विष्णुना॥ ४५<br><br>कृष्णत्वे द्वारकायां तु निलयो माधवस्य तु।<br>लब्धो हिताय शापस्तु दुर्वासस्याननाद्धरेः॥ ४६प्राचीनकालमें वेनपुत्र पृथुके द्वारा गोरूप पृथ्वीके दोहन तथा देवासुरसंग्राममें कृष्णके द्वारा प्राप्त किये गये भृगु-प्रदत्त शाप, द्वारकापुरीमें कृष्णरूपमें विष्णुके निवास, लोक-कल्याणके लिये विष्णुके द्वारा स्वीकार किये गये दुर्वासाप्रदत्त शापका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है ॥ ४५-४६ ॥
वृष्ण्यन्धकविनाशाय शापः पिण्डारवासिनाम्।<br>एरकास्य तथोत्पत्तिस्तोमरस्योद्भवस्तथा॥ ४७<br><br>एरकालाभतोऽन्योन्यं विवादे वृष्णिविग्रहः।<br>लीलया चैव कृष्णेन स्वकुलस्य च संहतिः॥ ४८<br><br>एरकास्त्रबलेनैव गमनं स्वेच्छयैव तु।<br>ब्रह्मणश्चैव मोक्षस्य विज्ञानं तु सुविस्तरम्॥ ४९वृष्णि तथा अन्धक वंशोंके विनाशके लिये पिण्डारकक्षेत्रवासी यादवोंको दिये गये शाप, मूसल तथा एरकाकी उत्पत्ति, एरका घास ले-लेकर आपसमें एक-दूसरेपर प्रहार करनेसे वृष्णिवंशियोंके विनाश, अपनी ही लीलासे श्रीकृष्णके द्वारा अपने ही कुलके विनाश, उसी एरकारूपी अस्त्रके प्रभावसे श्रीकृष्णके इच्छापूर्वक अपने धामके लिये प्रयाण तथा कृष्णरूपी ब्रह्मकी प्रयाणलीलाके

३- अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन, जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा

१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
पुरान्धकाग्निदक्षाणां शक्रभेमृगरूपिणाम्।<br>मदनस्यादिदेवस्य ब्रह्मणश्चामरारिणाम्॥ ५०<br><br>हलाहलस्य दैत्यस्य कृतावज्ञा पिनाकिना।<br>जालन्धरवधश्चैव सुदर्शनसमुद्भवः॥ ५१रहस्यका विस्तृत वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ४७-४९॥<br><br>इन्द्र बने हुए त्रिपुरासुर, गजरूपी अन्धकासुर, मृगरूपी यज्ञाग्नि, दक्ष, कामदेव, देवताओंके आदिदेव ब्रह्मा, हलाहल विष, दैत्य एवं अन्य असुरोंके शिवकृत दमनका वर्णन तथा जालन्धरवध एवं सुदर्शनकी उत्पत्तिका वर्णन भी इस पुराणमें प्राप्त है॥ ५०-५१॥
विष्णोर्वरआयुधावाप्तिस्तथा रुद्रस्य चेष्टितम्।<br>तथान्यानि च रुद्रस्य चरितानि सहस्त्रशः॥ ५२इस लिङ्गपुराणमें भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ आयुधकी प्राप्ति, रुद्रके क्रिया-कलाप तथा उनके अन्य हजारों चरित्रोंका वर्णन किया गया है॥ ५२॥
हरेः पितामहस्याथ शक्रस्य च महात्मनः।<br>प्रभावानुभवश्चैव शिवलोकस्य वर्णनम्॥ ५३<br><br>भूमौ रुद्रस्य लोकञ्च पाताले हाटकेश्वरम्।<br>तपसां लक्षणञ्चैव द्विजानां वैभवं तथा॥ ५४विष्णु-ब्रह्मा तथा महात्मा इन्द्रके अनुभव एवं प्रभावका वर्णन तथा शिवलोकका भी वर्णन है। भूमिष्ठ रुद्रलोक, पातालस्थ हाटकेश्वर, तपोंके लक्षण एवं द्विजोंके वैभवका निरूपण भी इस पुराणमें किया गया है॥ ५३-५४॥
आधिक्यं सर्वमूर्तीनां लिङ्गमूर्तेर्विशेषतः।<br>लिङ्गेऽस्मिन्नानुपूर्व्येण विस्तरेणानुकीर्त्यते॥ ५५<br><br>एतज्ज्ञात्वा पुराणस्य सङ्क्षेपं कीर्तयेत्तु यः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति॥ ५६भगवान् शंकरके विग्रहोंकी व्यापकता तथा उनकी लिङ्गमूर्तिकी विशेषता इस पुराणमें वर्णित है। इस लिङ्गमहापुराणमें पूर्वोक्त विषयोंका प्रायः क्रमिक रूपसे वर्णन किया गया है। इसे जानकर जो मनुष्य लिङ्ग-पुराणकी इस संक्षिप्त अनुक्रमणिकाका कीर्तन (पाठ) करता है, वह सभी पापोंसे छूटकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽनुक्रमणिकावर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अनुक्रमणिकावर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन, जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा

सूत उवाच<br>अलिङ्गो लिङ्गमूलं तु अव्यक्तं लिङ्गमुच्यते।<br>अलिङ्गः शिव इत्युक्तो लिङ्गं शैवमिति स्मृतम्॥ १<br><br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुर्लिङ्गमुत्तमम्।<br>गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शादिवर्जितम्॥ २<br><br>अगुणं ध्रुवमक्षय्यमलिङ्गं शिवलक्षणम्।<br>गन्धवर्णरसैर्युक्तं शब्दस्पर्शादिलक्षणम्॥ ३**सूतजी बोले—**वह निर्गुण ब्रह्म शिव (अलिङ्ग) ही लिङ्ग (प्रकृति)-का मूल कारण है तथा स्वयं लिङ्गरूप (प्रकृतिरूप) भी है। लिङ्ग (प्रकृति)-को भी शिवोद्भासित जाना गया है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिसे रहित, अगुण, ध्रुव, अक्षय, अलिङ्ग (निर्गुण) तत्त्वको ही शिव कहा गया है तथा शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिसे संयुक्त प्रधान प्रकृतिको ही उत्तम लिङ्ग कहा गया है॥ १-३॥