भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २ ] लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन [ १५


प्रार्थनायोनिजस्याथ दुर्लभत्वं सुतस्य तु।<br>शिलादशक्रसंवादः पद्मयोनित्वमेव च॥ १३॥तथा उन्हें वृत्रारि (इन्द्र)-का दर्शन इस पुराणमें वर्णित है॥ १२॥<br><br>शिलाद तथा इन्द्रका संवाद, शिलादद्वारा अयोनिज पुत्रके लिये की गयी प्रार्थना, ऐसे पुत्रका दुर्लभत्व तथा कमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति इस पुराणमें वर्णित हैं॥ १३॥
भवस्य दर्शनञ्चैव तिष्येष्वाचार्यशिष्ययोः।<br>व्यासावताराश्च तथा कल्पमन्वन्तराणि च॥ १४॥<br><br>कल्पत्वं चैव कल्पानामाख्याभेदेष्वनुक्रमात्।<br>कल्पेषु कल्पे वाराहे वाराहत्वं हरेस्तथा॥ १५॥कलियुगोंमें आचार्य तथा शिष्यको शिवके दर्शन, व्यासोंके अवतार, कल्प, मन्वन्तर, कल्पका स्वरूप, भेदक्रमसे कल्पोंके आख्यान, कल्पोंमें वाराहकल्पमें विष्णुके वाराहावतारकी कथा आदिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें है॥ १४-१५॥
मेघवाहनकल्पस्य वृत्तान्तं रुद्रगौरवम्।<br>पुनर्लिङ्गोद्भवश्चैव ऋषिमध्ये पिनाकिनः॥ १६॥<br><br>लिङ्गस्याराधनं स्नानविधानं शौचलक्षणम्।<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं क्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम्॥ १७॥मेघवाहन कल्पका वृत्तान्त, रुद्रगरिमा, ऋषियोंके मध्य शिवलिङ्गका उद्भव, लिङ्गकी उपासना-स्नानविधि, शौचाचारका लक्षण, वाराणसीका माहात्म्य तथा क्षेत्रमाहात्म्य आदिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें उपलब्ध है॥ १६-१७॥
भुवि रुद्रालयानां तु संख्या विष्णोर्गृहस्य च।<br>अन्तरिक्षे तथाण्डेऽस्मिन् देवायतनवर्णनम्॥ १८॥पृथ्वीपर शिवालयों तथा विष्णुके मन्दिरोंकी संख्याका वर्णन और अन्तरिक्ष तथा इस ब्रह्माण्डमें देवालयोंका वर्णन इसमें है॥ १८॥
दक्षस्य पतनं भूमौ पुनः स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>दक्षशापश्च दक्षस्य शापमोक्षस्तथैव च॥ १९॥स्वारोचिष मन्वन्तरमें दक्षप्रजापतिका पृथ्वीपर पतन, दक्षको प्रदत्त शाप तथा उस शापसे दक्षकी मुक्ति इस लिङ्गपुराणमें वर्णित है॥ १९॥
कैलासवर्णनञ्चैव योगः पाशुपतस्तथा।<br>चतुर्युगप्रमाणञ्च युगधर्मः सुविस्तरः॥ २०॥कैलासका वर्णन, पाशुपतयोगका वर्णन, चारों युगोंके स्वरूप एवं प्रमाणका वर्णन तथा युगधर्मका वर्णन लिङ्गपुराणमें विस्तारके साथ उपलब्ध है॥ २०॥
सन्ध्यांशकप्रमाणञ्च सन्ध्यावृत्तं भवस्य च।<br>श्मशाननिलयश्चैव चन्द्ररेखासमुद्भवः॥ २१॥चारों युगोंके सन्ध्याकालमानका वर्णन, शिवजीके सन्ध्याताण्डवका वर्णन, शंकरजीके श्मशानवासका वर्णन तथा चन्द्रमाकी कलाओंकी उत्पत्तिका वर्णन इस पुराणमें किया गया है॥ २१॥
उद्वाहः शङ्करस्याथ पुत्रोत्पादनमेव च।<br>मैथुनातिप्रसङ्गेन विनाशो जगतां भयम्॥ २२॥<br><br>शापः सत्या कृतो देवान् पुरा विष्णूञ्च पालितम्।<br>शुक्रोत्सर्गस्तु रुद्रस्य गाङ्गेयोद्भव एव च॥ २३॥इस लिङ्गपुराणमें शंकरजीका विवाह, तत्पश्चात् पुत्ररूपमें श्रीगणेशजीकी उत्पत्ति, दीर्घकालीन कामोपभोग-प्रसंगसे जगत्के विनाशका भय, सतीके द्वारा प्रदत्त शाप, प्राचीनकालमें शिवजीद्वारा त्रिपुरवध करके देवताओं तथा विष्णुकी रक्षा, शिवजीका शुक्रोत्सर्ग तथा कार्तिकेयकी उत्पत्ति आदि वर्णित है॥ २२-२३॥
ग्रहणादिषु कालेषु स्नाप्य लिङ्गं फलं तथा।<br>क्षुब्दधीचविवादश्च दधीचोपेन्द्रयोस्तथा॥ २४॥ग्रहण आदि कालोंमें लिङ्गके अभिषेकका विधान तथा उसका फल, क्षुप तथा दधीच और दधीच तथा विष्णुका विवाद इस पुराणमें वर्णित है॥ २४॥