श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उत्पत्तिर्नन्दिनाम्ना तु देवदेवस्य शूलिनः।<br>पतिव्रतायाश्चाख्यानं पशुपाशविचारणा॥ २५<br><br>प्रवृत्तिलक्षणं ज्ञानं निवृत्त्यधिकृता तथा।<br>वसिष्ठतनयोत्पत्तिर्वासिष्ठानां महात्मनाम्॥ २६<br><br>मुनीनां वंशविस्तारो राज्ञां शक्तेर्विनाशनम्।<br>दौरात्म्यं कौशिकस्याथ सुरभेर्बन्धनं तथा॥ २७ | इस लिङ्गपुराणमें देवाधिदेव शूलधारी शिवजीका नन्दीश्वर नामसे प्रादुर्भाव, पतिव्रताका आख्यान, पशु (जीव) तथा पाश (बन्धन)-की मीमांसा, आसक्तिके स्वरूपका ज्ञान, निवृत्तिकी योग्यताप्राप्ति, वसिष्ठके पुत्रोंकी उत्पत्ति, महात्मा वसिष्ठपुत्रों तथा मुनियों और राजाओंका वंशविस्तार, वसिष्ठपुत्र शक्तिका विनाश, विश्वामित्रकी दुर्भावना तथा उनके द्वारा वसिष्ठकी सुरभिधेनुका बलात् अधिग्रहण आदि वर्णित किये गये हैं॥ २५-२७॥ |
| सुतशोको वसिष्ठस्य अरुन्धत्याः प्रलापनम्।<br>स्नुषायाः प्रेषणञ्चैव गर्भस्थस्य वचस्तथा॥ २८<br><br>पराशरस्यावतारो व्यासस्य च शुकस्य च।<br>विनाशो राक्षसानाञ्च कृतो वै शक्तिसूनुना॥ २९<br><br>देवतापरमार्थं तु विज्ञानञ्च प्रसादतः।<br>पुराणकरणञ्चैव पुलस्त्यस्याज्ञया गुरोः॥ ३० | वसिष्ठके पुत्रशोक, अरुन्धतीके विलाप, उनकी पुत्रवधूके प्रेषण, गर्भस्थित शिशुके वचनोद्गार, पराशर-व्यास तथा शुकदेवके अवतार, शक्तिपुत्र पराशरके द्वारा किये गये राक्षसध्वंस, देवताओंके गूढ़ रहस्यरूप विशिष्ट ज्ञान तथा गुरु पुलस्त्यके आज्ञानुसार उनके कृपाप्रसादसे [पराशरद्वारा विष्णु]-पुराणकी रचनासे सम्बन्धित विषयोंका वर्णन किया गया है॥ २८-३०॥ |
| भुवनानां प्रमाणञ्च ग्रहाणां ज्योतिषां गतिः।<br>जीवच्छ्राद्धविधानञ्च श्राद्धार्हाः श्राद्धमेव च॥ ३१ | भुवनोंकी परिमिति, ग्रहों-नक्षत्रोंकी गति, जीवच्छ्राद्धकी विधि, श्राद्धके अधिकारी पात्रों तथा श्राद्धके विषयमें इस पुराणमें वर्णन है॥ ३१॥ |
| नान्दीश्राद्धविधानञ्च तथाध्ययनलक्षणम्।<br>पञ्चयज्ञप्रभावश्च पञ्चयज्ञविधिस्तथा॥ ३२<br><br>रजस्वलानां वृत्तिश्च वृत्त्या पुत्रविशिष्टता।<br>मैथुनस्य विधिश्चैव प्रतिवर्णमनुक्रमात्॥ ३३<br><br>भोज्याभोज्यविधानञ्च सर्वेषामेव वर्णिनाम्।<br>प्रायश्चित्तमशेषस्य प्रत्येकञ्चैव विस्तरात्॥ ३४ | इस पुराणमें नान्दीश्राद्धके विधान, वेदाध्ययनका स्वरूप, ब्रह्मयज्ञ-पितृयज्ञ-दैवयज्ञ-भूतयज्ञ-नृयज्ञ-इन पाँच महायज्ञोंके प्रभाव तथा इन पाँच महायज्ञोंके करनेकी विधिका वर्णन किया गया है। रजस्वला स्त्रियोंके सदाचार, उस सदाचार-पालनसे विशिष्ट पुत्रकी प्राप्ति, प्रत्येक वर्णोंके अनुसार मैथुनके नियम, सभी वर्णोंके लिये अलग-अलग भोज्य तथा अभोज्यके विधिविधान और समस्त पापोंके प्रायश्चित्तके विषयमें पृथक्-पृथक् रूपसे विस्तारसे वर्णन किया गया है॥ ३२-३४॥ |
| नरकाणां स्वरूपञ्च दण्डः कर्मानुरूपतः।<br>स्वर्गिनारकिणां पुंसां चिह्नं जन्मान्तरेषु च॥ ३५<br><br>नानाविधानि दानानि प्रेतराजपुरं तथा।<br>कल्पं पञ्चाक्षरस्याथ रुद्रमाहात्म्यमेव च॥ ३६ | नरकोंके स्वरूप, कर्मानुसार दण्डके विधान, स्वर्ग और नरक प्राप्त करनेवाले पुरुषोंमें दूसरे जन्मोंमें प्रकट होनेवाले चिह्न, अनेक प्रकारके दानों, यमपुरी, पंचाक्षर मन्त्रकी मीमांसा तथा रुद्रमाहात्म्यका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ३५-३६॥ |
| वृत्रेन्द्रयोर्महायुद्धं विश्वरूपविमर्दनम्।<br>श्वेतस्य मृत्योः संवादः श्वेतार्थे कालनाशनम्॥ ३७ | इन्द्र-वृत्रासुरके महासंग्रामका वर्णन, विश्व-रूपके वधका निरूपण, श्वेतमुनि तथा कालका संवाद, |