भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 16
१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्यैकादशसाहस्रे ग्रन्थमानमिह द्विजाः।<br>तस्मात् सङ्क्षेपतो वक्ष्ये न श्रुतं विस्तरेण यत्॥ ४ब्रह्मपुराणादि अठारह पुराणोंके रूपमें व्यासजीद्वारा विभक्त होती है, उनमें ग्यारहवाँ लिङ्गपुराण कहा गया है, जिसका श्रवण मैंने व्यासजीसे किया है॥ ३॥<br>हे विप्रो! [चार लाख श्लोकोंमें संक्षेपके पश्चात्] इस ग्रन्थमें श्लोकोंकी संख्या मात्र ग्यारह हजार है। अतः मैं संक्षेपमें ही इसका वर्णन कर रहा हूँ; क्योंकि मैं इसे विस्तारसे नहीं सुन सका हूँ॥ ४॥
चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते कृष्णद्वैपायनेन तु।<br>अत्रैकादशसाहस्त्रैः कथितो लिङ्गसम्भवः॥ ५विभिन्न मन्वन्तरोंमें अनेक व्यासोंद्वारा चार लाख श्लोकोंमें संक्षिप्त किये गये इस लिङ्गपुराणमेंसे वैवस्वत मन्वन्तरमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने ग्यारह हजार श्लोकोंमें लिङ्गपुराणका वर्णन किया है॥ ५॥
सर्गः प्राधानिकः पश्चात्प्राकृतो वैकृतानि च।<br>अण्डस्यास्य च सम्भूतिरण्डस्यावरणाष्टकम्॥ ६इसमें सर्वप्रथम प्राधानिक तदनन्तर प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका वर्णन किया गया है। इस अण्डकी उत्पत्ति तथा अण्डके आठ आवरणोंका इसमें वर्णन है॥ ६॥
अण्डोद्भवत्वं शर्वस्य रजोगुणसमाश्रयात्।<br>विष्णुत्वं कालरुद्रत्वं शयनं चाप्सु तस्य च॥ ७सदाशिवके ही रजोगुणके समाश्रयणसे अण्डके मध्यसे ब्रह्मारूपमें, (सत्त्वके आश्रयसे) विष्णुरूपमें, (तमोगुणके आश्रयसे) कालरूद्ररूपमें प्रादुर्भावका तथा अन्तमें उन्हीं सदाशिवका ही प्रलयकालीन जलराशिमें (नारायणके रूपमें) शयनका वर्णन किया गया है॥ ७॥
प्रजापतीनां सर्गश्च पृथिव्युद्धरणं तथा।<br>ब्रह्मणश्च दिवारात्रमायुषो गणनं पुनः॥ ८इस पुराणके अन्तर्गत प्रजापतियोंकी सृष्टि, पृथ्वीके उद्धारकी कथा तथा ब्रह्माके दिन-रात और उनकी आयुकी गणनाका वर्णन किया गया है॥ ८॥
सवनं ब्रह्मणश्चैव युगकल्पश्च तस्य तु।<br>दिव्यञ्च मानुषं वर्षमार्षं वै ध्रौव्यमेव च॥ ९<br>पित्र्यं पितॄणां सम्भूतिर्धर्मश्चाश्रमिणां तथा।<br>अवृद्धिंर्जगतो भूयो देव्याः शक्त्युद्भवस्तथा॥ १०<br><br>(चित्र)इसमें ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके युग एवं कल्प वर्णित हैं। दिव्य वर्ष, मानुष वर्ष, आर्षवर्ष, ध्रौव्यवर्ष तथा पित्र्यवर्षका इसमें वर्णन है। पितरोंकी उत्पत्ति, आश्रमियोंके धर्म, सृष्टि-विस्तारकी प्रारम्भिक दशामें सृष्टिके त्वरित अभीष्ट विकासके अभाव तथा शक्तिस्वरूपा देवीके उद्भवका वर्णन इसमें किया गया है॥ ९-१०॥
स्त्रीपुम्भावो विरिञ्चस्य सर्गो मिथुनसम्भवः।<br>आख्याष्टकं हि रुद्रस्य कथितं रोदनान्तरे॥ ११मनु तथा शतरूपाकी उत्पत्screenरूपमें ब्रह्माके स्त्री-पुरुष भावका वर्णन, मैथुनी सृष्टिका वर्णन तथा रुद्रके रुदनके पश्चात् उनके आठ नामोंका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ११॥
ब्रह्मविष्णुविवादश्च पुनर्लिङ्गस्य सम्भवः।<br>शिलादस्य तपश्चैव वृत्रारेर्दर्शनं तथा॥ १२ब्रह्मा-विष्णुके विवाद तथा उसके बाद शिवलिङ्गके प्राकट्यका वर्णन इसमें विद्यमान है। शिलादकी तपस्या
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