श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| ९९- | भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य ...................... | ५२८ | १०३- | भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना ............................................ | ५४४ |
| १००- | वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ................................. | ५३० | १०४- | गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ................................... | ५५० |
| १०१- | सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना .......................... | ५३४ | १०५- | विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा ......... | ५५३ |
| १०२- | पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना ........... | ५३८ | १०६- | दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा ................................ | ५५६ |
| १०७- | शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना .................................... | ५५८ | |||
| १०८- | भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य .................................................... | ५६४ |
उत्तरभाग
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| १- | भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा ...... | ५६७ | १२- | भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता .................................................. | ६२४ |
| २- | भगवद्गुणगानका माहात्म्य ................................. | ५७४ | १३- | भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन ............... | ६२७ |
| ३- | भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानबन्धु, जाम्बवती आदिसे गानविद्याकी प्राप्ति ................. | ५७४ | १४- | भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन ................................... | ६३० |
| ४- | वासुदेवपरायण विष्णुभक्तोंके लक्षण तथा उनकी महिमा ......................................................... | ५८४ | १५- | शिवमाहात्म्यका वर्णन .................................... | ६३३ |
| ५- | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान, विष्णुमायाद्वारा नारद एवं पर्वत मुनिका वानरमुख होना तथा इसीका रामावतारमें हेतु बनना .......................... | ५८५ | १६- | विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा ..... | ६३५ |
| ६- | भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्राके निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन ............................. | ५९९ | १७- | भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन ......................................................... | ६३७ |
| ७- | भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा ......................... | ६०६ | १८- | देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ............... | ६३९ |
| ८- | शिवमन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धुमूखका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना ........... | ६०९ | १९- | देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना....... | ६४५ |
| ९- | पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण ...................... | ६१२ | २०- | पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ......................................................... | ६४८ |
| १०- | उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन ..................................................... | ६१७ | २१- | शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ...... | ६५३ |
| ११- | भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ..................... | ६२० | २२- | शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ......................................................... | ६५९ |
| २३- | हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन ......................................................... | ६६६ | |||
| २४- | न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य ......... | ६६९ |