श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| ६०- | मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन | २४९ | ७८- | शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य | ३८२ |
| ६१- | ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन | २५१ | ७९- | शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा | ३८५ |
| ६२- | उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन | २५६ | ८०- | देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना | ३८७ |
| ६३- | दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंश-वर्णन | २५९ | ८१- | विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपशविमोचक लिङ्ग-व्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य | ३९२ |
| ६४- | वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा | २६६ | ८२- | सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल | ३९७ |
| ६५- | सूर्यवंश तथा चंद्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम | २७५ | ८३- | विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान.. | ४०५ |
| ६६- | इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन | २८६ | ८४- | उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान | ४०९ |
| ६७- | राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा | २९२ | ८५- | पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा | ४१५ |
| ६८- | ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन | २९४ | ८६- | पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा | ४३४ |
| ६९- | चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन | २९८ | ८७- | सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश | ४४६ |
| ७०- | महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविध-सर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३०५ | ८८- | पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोत्रका स्वरूप | ४४८ |
| ७१- | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह | ३३२ | ८९- | सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन | ४५६ |
| ७२- | त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति | ३४५ | ९०- | यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण | ४६६ |
| ७३- | लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा | ३६१ | ९१- | आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य तथा शिवोपासनानिरूपण | ४६८ |
| ७४- | ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य | ३६३ | ९२- | अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वर-पूजाविधिवर्णन | ४७५ |
| ७५- | शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण | ३६६ | ९३- | हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति | ४९० |
| ७६- | विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल | ३६९ | ९४- | भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति | ४९२ |
| ७७- | शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल, शिवक्षेत्रों तथा शिव-तीर्थोंके सेवनकी महिमा, शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य | ३७४ | ९५- | नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्य-कशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य | ४९६ |
| ९६- | भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति | ५०२ | |||
| ९७- | जलन्धर-वधकी कथा | ५१२ | |||
| ९८- | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना | ५१६ |