भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 20
१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
पुरान्धकाग्निदक्षाणां शक्रभेमृगरूपिणाम्।<br>मदनस्यादिदेवस्य ब्रह्मणश्चामरारिणाम्॥ ५०<br><br>हलाहलस्य दैत्यस्य कृतावज्ञा पिनाकिना।<br>जालन्धरवधश्चैव सुदर्शनसमुद्भवः॥ ५१रहस्यका विस्तृत वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ४७-४९॥<br><br>इन्द्र बने हुए त्रिपुरासुर, गजरूपी अन्धकासुर, मृगरूपी यज्ञाग्नि, दक्ष, कामदेव, देवताओंके आदिदेव ब्रह्मा, हलाहल विष, दैत्य एवं अन्य असुरोंके शिवकृत दमनका वर्णन तथा जालन्धरवध एवं सुदर्शनकी उत्पत्तिका वर्णन भी इस पुराणमें प्राप्त है॥ ५०-५१॥
विष्णोर्वरआयुधावाप्तिस्तथा रुद्रस्य चेष्टितम्।<br>तथान्यानि च रुद्रस्य चरितानि सहस्त्रशः॥ ५२इस लिङ्गपुराणमें भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ आयुधकी प्राप्ति, रुद्रके क्रिया-कलाप तथा उनके अन्य हजारों चरित्रोंका वर्णन किया गया है॥ ५२॥
हरेः पितामहस्याथ शक्रस्य च महात्मनः।<br>प्रभावानुभवश्चैव शिवलोकस्य वर्णनम्॥ ५३<br><br>भूमौ रुद्रस्य लोकञ्च पाताले हाटकेश्वरम्।<br>तपसां लक्षणञ्चैव द्विजानां वैभवं तथा॥ ५४विष्णु-ब्रह्मा तथा महात्मा इन्द्रके अनुभव एवं प्रभावका वर्णन तथा शिवलोकका भी वर्णन है। भूमिष्ठ रुद्रलोक, पातालस्थ हाटकेश्वर, तपोंके लक्षण एवं द्विजोंके वैभवका निरूपण भी इस पुराणमें किया गया है॥ ५३-५४॥
आधिक्यं सर्वमूर्तीनां लिङ्गमूर्तेर्विशेषतः।<br>लिङ्गेऽस्मिन्नानुपूर्व्येण विस्तरेणानुकीर्त्यते॥ ५५<br><br>एतज्ज्ञात्वा पुराणस्य सङ्क्षेपं कीर्तयेत्तु यः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति॥ ५६भगवान् शंकरके विग्रहोंकी व्यापकता तथा उनकी लिङ्गमूर्तिकी विशेषता इस पुराणमें वर्णित है। इस लिङ्गमहापुराणमें पूर्वोक्त विषयोंका प्रायः क्रमिक रूपसे वर्णन किया गया है। इसे जानकर जो मनुष्य लिङ्ग-पुराणकी इस संक्षिप्त अनुक्रमणिकाका कीर्तन (पाठ) करता है, वह सभी पापोंसे छूटकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽनुक्रमणिकावर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अनुक्रमणिकावर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन, जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा

सूत उवाच<br>अलिङ्गो लिङ्गमूलं तु अव्यक्तं लिङ्गमुच्यते।<br>अलिङ्गः शिव इत्युक्तो लिङ्गं शैवमिति स्मृतम्॥ १<br><br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुर्लिङ्गमुत्तमम्।<br>गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शादिवर्जितम्॥ २<br><br>अगुणं ध्रुवमक्षय्यमलिङ्गं शिवलक्षणम्।<br>गन्धवर्णरसैर्युक्तं शब्दस्पर्शादिलक्षणम्॥ ३**सूतजी बोले—**वह निर्गुण ब्रह्म शिव (अलिङ्ग) ही लिङ्ग (प्रकृति)-का मूल कारण है तथा स्वयं लिङ्गरूप (प्रकृतिरूप) भी है। लिङ्ग (प्रकृति)-को भी शिवोद्भासित जाना गया है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिसे रहित, अगुण, ध्रुव, अक्षय, अलिङ्ग (निर्गुण) तत्त्वको ही शिव कहा गया है तथा शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिसे संयुक्त प्रधान प्रकृतिको ही उत्तम लिङ्ग कहा गया है॥ १-३॥