श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ३ ] अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप...महेश्वर शिवकी महिमा १९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जगद्योनिं महाभूतं स्थूलं सूक्ष्मं द्विजोत्तमाः।<br>विग्रहो जगतां लिङ्गमलिङ्गादभवत् स्वयम्॥ ४ | हे श्रेष्ठ विप्रो! वह जगत्का उत्पत्तिस्थान है, पंचभूतात्मक अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, आकाश, वायुसे युक्त है, स्थूल है, सूक्ष्म है, जगत्का विग्रह है तथा यह लिङ्गतत्त्व निर्गुण परमात्मा शिवसे स्वयं उत्पन्न हुआ है॥ ४॥ |
| सप्तधा चाष्टधा चैव तथैकादशधा पुनः।<br>लिङ्गान्यलिङ्गस्य तथा मायया विततानि तु॥ ५ | उस अलिङ्ग अर्थात् निर्गुण परमात्माकी मायासे सात, आठ तथा फिर ग्यारह इस तरह कुल छब्बीस रूपवाले लिङ्गतत्त्व इस ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं॥ ५॥ |
| तेभ्यः प्रधानदेवानां त्रयमासीच्छिवात्मकम्।<br>एकस्मात् त्रिष्वभूद्विश्वमेकेन परिरक्षितम्॥ ६<br><br>एकेनैव हृतं विश्वं व्याप्तं त्वेवं शिवेन तु।<br>अलिङ्गञ्चैव लिङ्गञ्च लिङ्गालिङ्गानि मूर्तयः॥ ७<br><br>यथावत् कथिताश्चैव तस्माद् ब्रह्म स्वयं जगत्।<br>अलिङ्गी भगवान् बीजी स एव परमेश्वरः॥ ८ | उन्हीं माया-वितत लिङ्गोंसे उद्भूत तीनों प्रधान देव शिवात्मक हैं। उन तीनोंमें एक ब्रह्मासे यह जगत् उत्पन्न हुआ, एक विष्णुसे जगत्की रक्षा होती है तथा एक रुद्रसे जगत्का संहार होता है। इस प्रकार शिवतत्त्वसे यह विश्व व्याप्त है। वह परमात्मा निर्गुण भी है तथा सगुण भी है। लिङ्ग अर्थात् व्यक्त तथा अलिङ्ग अर्थात् अव्यक्तरूपमें कही गयी सभी मूर्तियाँ शिवात्मक ही हैं; इसलिये यह ब्रह्माण्ड साक्षात् ब्रह्मरूप है। वही अलिङ्गी अर्थात् अव्यक्त तथा बीजी भगवत्तत्त्व परमेश्वर है॥ ६-८॥ |
| बीजं योनिश्च निर्बीजं निर्बीजो बीजमुच्यते।<br>बीजयोनिप्रधानानामात्माख्या वर्तते त्विह॥ ९ | वह परमात्मा बीज (ब्रह्मा) भी है, योनि (विष्णु) भी है तथा निर्बीज (शिव) भी है और बीजरहित वह शिव जगत्का बीज अर्थात् मूल कारण कहा जाता है। बीजरूप ब्रह्मा, योनिरूप विष्णु तथा प्रधानरूप शिवकी इस जगत्में अपनी-अपनी विश्व, प्राज्ञ तथा तैजस अवस्थाकी संज्ञा भी है॥ ९॥ |
| परमात्मा मुनिर्ब्रह्मा नित्यबुद्धस्वभावतः।<br>विशुद्धोऽयं तथा रुद्रः पुराणे शिव उच्यते॥ १० | यह विशुद्ध मुनिरूप परब्रह्म परमात्मा रुद्र नित्यबुद्धस्वभावके कारण पुराणोंमें ‘शिव’ कहे गये हैं॥ १०॥ |
| शिवेन दृष्टा प्रकृतिः शैवी समभवद् द्विजाः।<br>सर्गादौ सा गुणैर्युक्ता पुरा व्यक्ता स्वभावतः॥ ११ | हे विप्रो! शिवकी दृष्टिमात्रसे प्रकृति ‘शैवी’ हो गयी तथा सृष्टिके समय अव्यक्त स्वभाववाली वह प्रकृति गुणोंसे युक्त हो गयी॥ ११॥ |
| अव्यक्तादिविशेषान्तं विश्वं तस्याः समुच्छितम्।<br>विश्वधात्री त्वजाख्या च शैवी सा प्रकृतिः स्मृता॥ १२ | अव्यक्त तथा महत्तत्त्वादिसे लेकर स्थूल पंचमहाभूतपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् उसी प्रकृतिके अधीन है। अतः विश्वको धारण करनेवाली शैवीशक्ति प्रकृति ही अजा नामसे कही गयी है॥ १२॥ |
| तामजां लोहितां शुक्लां कृष्णामेकां बहुप्रजाम्।<br>जनित्रीमनुशेते स्म जुषमाणः स्वरूपिणीम्॥ १३ | रक्तवर्णा अर्थात् रजोगुणवाली, शुक्लवर्णा अर्थात् सत्त्वगुणवाली तथा कृष्णवर्णा अर्थात् तमोगुणवाली एवं |