भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बहुविध प्रजाओंकी उत्पत्ति करनेवाली अजास्वरूपिणी उस प्रकृतिकी प्रेमपूर्वक सेवा करता हुआ यह बद्ध जीव उसका अनुसरण करता है॥ १३॥
तामेवाजामजोऽन्यस्तु भुक्तभोगां जहाति च।<br>अजा जनित्री जगतां साजेन समधिष्ठिता॥ १४दूसरे प्रकारका अनासक्त जीव प्रकृतिके भोगोंको भोगकर और उसकी असारता तथा क्षणभंगुरताको समझकर उस मायाका परित्याग कर देता है। परमेश्वरके द्वारा अधिष्ठित वह अजा अनन्त ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिकर्त्री है॥ १४॥
प्रादुर्बभूव स महान् पुरुषाधिष्ठितस्य च।<br>अजाज्ञया प्रधानस्य सर्गकाले गुणैस्त्रिभिः॥ १५सृष्टिके समयमें तीन गुणोंसे युक्त अजरूप पुरुषकी आज्ञासे उसमें अधिष्ठित मायासे वह महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ॥ १५॥
सिसृक्षया चोद्यमानः प्रविश्याव्यक्तमव्ययम्।<br>व्यक्तसृष्टिं विकुरुते चात्मनाधिष्ठितो महान्॥ १६सृष्टि करनेकी इच्छासे युक्त होकर उस अधिष्ठित महत्तत्त्वने स्वतः अव्यय तथा अव्यक्त पुरुषमें प्रविष्ट होकर व्यक्त सृष्टिमें विक्षोभ उत्पन्न किया॥ १६॥
महत्तस्तु तथा वृत्तिः सङ्कल्पाध्यवसायिका।<br>महत्तस्त्रिगुणस्तस्मादहङ्कारो रजोऽधिकः॥ १७<br><br>तेनैव चावृतः सम्यगहङ्कारस्तमोऽधिकः।<br>महतो भूततन्मात्रं सर्गकृद्वै बभूव च॥ १८उस महत्तत्त्वसे संकल्प-अध्यवसायवृत्तिरूप सात्त्विक अहंकार उत्पन्न हुआ तथा उसी महत्तत्त्वसे त्रिगुणात्मकरूप रजोगुणकी अधिकतावाला राजस अहंकार उत्पन्न हुआ और उस रजोगुणसे सम्यक् प्रकारसे आवृत तमोगुणकी अधिकतावाला तामस अहंकार भी उसी महत्तत्त्वसे उत्पन्न हुआ है तथा उसी अहंकारसे सृष्टिको व्याप्त करनेवाली शब्द, स्पर्श आदि तन्मात्राएँ भी उत्पन्न हुई हैं॥ १७-१८॥
अहङ्काराच्छब्दमात्रं तस्मादाकाशमव्ययम्।<br>सशब्दमावृणोत्पश्चादाकाशं शब्दकारणम्॥ १९<br><br>तन्मात्राद्भूतसर्गश्च द्विजास्त्वेवं प्रकीर्तितः।<br>स्पर्शमात्रं तथाकाशात्तस्माद्वायुर्महान् मुने॥ २०<br><br>तस्माच्च रूपमात्रं तु ततोऽग्निश्च रसस्ततः।<br>रसादापः शुभास्ताभ्यो गन्धमात्रं धरा ततः॥ २१महत्तत्त्वजन्य उस तामस अहंकारसे शब्द तन्मात्रावाले अव्यय आकाशकी उत्पत्ति हुई और बादमें शब्दके कारणरूप उस अहंकारने शब्दयुक्त आकाशको व्याप्त कर लिया। हे विप्रो! इसी प्रकार तन्मात्रात्मक भूतसर्गके विषयमें कहा गया है। हे मुने! उस आकाशसे स्पर्श-तन्मात्रावाला महान् वायु उत्पन्न हुआ। पुनः उस वायुसे रूपतन्मात्रावाले अग्निकी उत्पत्ति हुई तथा अग्निसे रसतन्मात्रावाले जलका प्रादुर्भाव हुआ। फिर रसतन्मात्रावाले उस जलसे गन्धतन्मात्रावाली कल्याणमयी पृथिवीकी उत्पत्ति हुई॥ १९-२१॥
आवृणोद्धि तथाकाशं स्पर्शमात्रं द्विजोत्तमाः।<br>आवृणोद्रूपमात्रं तु वायुर्वाति क्रियात्मकः॥ २२हे श्रेष्ठ विप्रो! आकाश स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आवृत किये रहता है तथा रूपतन्मात्रावाले अग्निको आच्छादित करके यह क्रियाशील वायु बहता रहता है॥ २२॥