भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ३ ] अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप···महेश्वर शिवकी महिमा २१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आवूर्णोद्रसमात्रं वै देवः साक्षाद्विभावसुः।<br>आवृण्वाना गन्धमात्रमापः सर्वरसात्मिकाः॥ २३साक्षात् अग्निदेव रसतन्मात्रवाले जलको आच्छादित किये रहते हैं तथा सभी रसोंसे युक्त जलतत्त्व गन्धतन्मात्रावाली पृथ्वीको आच्छादित किये रहता है॥ २३॥
क्ष्मा सा पञ्चगुणा तस्मादेकोना रससम्भवाः।<br>त्रिगुणो भगवान् वह्निर्द्विगुणः स्पर्शसम्भवः॥ २४<br><br>अवकाशस्ततो देव एकमात्रस्तु निष्कलः।<br>तन्मात्राद्भूतसर्गश्च विज्ञेयश्च परस्परम्॥ २५इस प्रकार पृथ्वी पाँच (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध) गुणोंसे, गन्धरहित शेष चार गुणोंसे जल, भगवान् अग्नि तीन गुणोंसे तथा स्पर्शसमन्वित वायु दो गुणोंसे युक्त हुए और अन्य अवयवोंसे रहित आकाशदेव मात्र एक गुणवाले हुए। इस प्रकार तन्मात्राओंके पारस्परिक संयोगवाला भूतसर्ग कहा गया है॥ २४-२५॥
वैकारिकः सात्त्विको वै युगपत्सम्प्रवर्तते।<br>सर्गस्तथाप्यहङ्कारादेवमत्र प्रकीर्तितः॥ २६राजस, तामस तथा सात्त्विक सर्ग साथ-साथ प्रवृत्त होते हैं, किंतु यहाँपर तामस अहंकारसे ही सर्गका होना बताया गया है॥ २६॥
पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्यस्य पञ्च कर्मेन्द्रियाणि तु।<br>शब्दादीनामवाप्त्यर्थं मनश्चैवोभयात्मकम्॥ २७शब्द-स्पर्श आदिको ग्रहण करनेके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा उभयात्मक मन इस जीवके लिये बनाये गये हैं॥ २७॥
महदादिविशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति च।<br>जलबुद्बुदवत्तस्मादवतीर्णः पितामहः॥ २८<br><br>स एव भगवान् रुद्रो विष्णुर्विश्वगतः प्रभुः।<br>तस्मिन्नण्डे त्विमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत्॥ २९महत्तत्त्वादिसे लेकर पंचमहाभूतपर्यन्त सभी तत्त्व अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह परमात्मा ही पितामह ब्रह्मा, शंकर तथा विश्वव्यापी प्रभु विष्णुके रूपमें उस अण्डसे जलके बुलबुलेकी भाँति अवतीर्ण हुआ। ये सभी लोक तथा उनके भीतरका यह सम्पूर्ण जगत् उस अण्डमें सन्निविष्ट था॥ २८-२९॥
अण्डं दशगुणेनैव वारिणा प्रावृतं बहिः।<br>आपो दशगुणेनैव तद्वाह्ये तेजसा वृताः॥ ३०वह अण्ड अपनेसे दस गुने जलसे बाहरसे व्याप्त था और जल बाहरसे अपनेसे दस गुने तेजसे आवृत था॥ ३०॥
तेजो दशगुणेनैव बाह्यतो वायुना वृतम्।<br>वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः॥ ३१तेज अपनेसे दस गुने वायुसे बाहरसे आवृत था और वायु अपनेसे दस गुने आकाशसे बाहरसे आवृत था॥ ३१॥
आकाशेनावृतो वायुरहङ्कारेण शब्दजः।<br>महता शब्दहेतुर्वै प्रधानेनावृतः स्वयम्॥ ३२शब्दजन्य वायुको आवृत किये हुए वह आकाश तामस अहंकारसे आवृत है। शब्द-हेतु आकाशको आवृत करनेवाला वह तामस अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है और वह महत्तत्त्व स्वयं अव्यक्त प्रधानसे आवृत है॥ ३२॥
सप्ताण्डावरणान्याहुस्तस्यात्मा कमलासनः।<br>कोटिकोटियुतान्यत्र चाण्डानि कथितानि तु॥ ३३उस अण्ड (ब्रह्माण्ड)-के ये सात प्राकृत आवरण कहे गये हैं। कमलासन ब्रह्माजी उसकी आत्मा हैं। इस सृष्टिमें करोड़ों-करोड़ों अण्डों (ब्रह्माण्डों)-की स्थितिके विषयमें कहा गया है॥ ३३॥